उत्तम आर्जव
परिभाषा
आर्जव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल-कपट मायाचार के अभावरूप शान्ति स्वरूप जो पर्याय प्रकट होती है, उसे भी आर्जव कहते हैं।
ऋजुता अर्थात् सरलता का नाम आर्जव है।
माया किसे कहते हैं ?
छल-कपट को माया कहते हैं।
माया कषाय के कारण आत्मा में स्वभावगत सरलता न रहकर कुटिलता उत्पन्न हो जाती है। मायाचारी का व्यवहार सहज एवं सरल नहीं होता। वह सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ है।
जीव मायाचारी क्यों करता है?
- जब हम कोई काम स्वयं ना कर सकें और उसे छल-कपट या ठगी से सिद्ध करना चाहे।
- हम जैसे है, वैसे दूसरों को ना दिखाकर, स्वयं को कुछ और दिखना चाहते हों।
मायाचारी के नुकसान
- मायाचारी व्यक्ति पर कोई विश्वास नहीं करता है।
- छल-कपट उजागर होने पर विश्वसनीयता जाती है तथा बहुत अपमान होता है।
उत्तम आर्जव धर्म
कपट न कीजे कोय, चोरन के पुर ना बसें।
सरल-सुभावी होय, ताके घर बहु-संपदा।।
उत्तम आर्जव-रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दु:खदानी।
मन में हो सो वचन उच्चरिये, वचन होय सो तन सों करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निरमल आरसी।
मुख करे जैसा लखे तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी।।
नहिं लहे लक्ष्मी अधिक छल करि, कर्म-बंध-विशेषता।
भय-त्यागी दूध बिलाव पीवे, आपदा नहीं देखता।।
द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन
सरल अर्थ
कोई भी छल-कपट, मायाचारी मत करो क्योंकि ऐसा करने वालों अर्थात् चोरों आदि के नगर कभी नहीं बसे (बने)। तात्पर्य यह है कि छल-कपट चोरी आदि करने से नगरों में नहीं रह पाये। और जो सरल स्वभाव वाले होते हैं, उनके घर में बहुत संपत्ति होती है।
उत्तम आर्जव धर्म परंपरा से जीव का सरल स्वभाव कहा गया है। और थोड़ा-सा भी छल-कपट बहुत से दुःख, कष्ट देने वाला होता है। इसलिए उससे बचने के लिए ही मन में जो हो, सो शब्दों में कहना चाहिए, जो शब्दों में कहा जाये, उसे शरीर से भी करना चाहिए। इसप्रकार अपने तीनों योगों (मन-वचन-काय) को सरल/एक जैसा कीजिए। जैसे स्वच्छ दर्पण में जैसा हमारा मुख होता है, वैसा ही दिखता है। छल कपट से प्रीति करना अंगारों से प्रीति करने के समान है। कोई भी अधिक मायाचारी करके धन-संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु ऐसा करने से अधिक कर्मों का बंध होता है। छल-कपट करते समय वह कर्म बंध का ध्यान नहीं करता है। जैसे बिल्ली दूध पीते समय भय का त्याग करती है, वह ध्यान नहीं रखती कि पीछे से मार पड़ेगी; उसीप्रकार छल-कपट करने वाला भी कर्म-बंध एवं आपत्ति का ध्यान नहीं रखता है।
उदाहरण
उत्तम आर्जव धर्म में प्रसिद्ध
वादिरराज मुनिराज
मायाचारी के कारण दुर्गति
को प्राप्त
मृदुमति
उत्तम आर्जव धर्म
आर्जव आत्म स्वभाव है।
मायाचारी विभाव है।।
छल-कपटी तो डरता-छिपता।
सरल स्वभावी निर्भर रहता।।
माया से मृदुमति पशु हुए।
आर्जवी वादिराज प्रभु हुए।।
- समकित शास्त्री
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कहानी
लंदन में शेक्सपीयर का लोकप्रिय नाटक चल रहा था। वहाँ के धर्म पुरोहित का मन उत्सुकता से भर गया। वह नाटक देखना चाहता था, पर उसने अपने उपदेश में नाटक देखने वालों की कटु आलोचना की थी और उसे बुरा बताया था। उसे एक उपाय सूझा। उसने नाटक थियेटर के मैनेजर के नाम एक पत्र लिखते हुए उसने अनुरोध किया मैं आपका नाटक देखना चाहता हूँ, पर वहाँ कोई ऐसी व्यवस्था है क्या, जिससे मैं नाटक देख सकूँ, पर दर्शक मुझे नहीं देख सकें?
मैनेजर ने उत्तर लिखा- आप यहाँ अवश्य आइये। आप जैसे लोगों के लिए पीछे चोर दरवाजा है और बैठने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था है। वहाँ बैठकर आप दर्शकों की आँखों से बच सकते हैं, पर परमात्मा की नजरों से आप बच सकें- ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ नहीं है।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3023.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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