उपदि बहा
- यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -
जैन चित्र कथाएं
सुनो सुनाये सत्य कथाएं
आशीर्वाद
परम पूज्य ज्ञान दिवाकर आचार्य श्री भरत सागर जी महाराज
कुलकर युग
इस भरतक्षेत्र के मध्यवर्ती आर्यखंड में एक युग ऐसा था, जिसे हम आज की सभ्यता का आरंभिक युग कह सकते हैं। उस समय यहां के मनुष्यों के शरीर वज्र के समान कठोर थे। वे खूब लंबे तगड़े आकार के हुआ करते थे। उनके शरीर तपाये हुए सोने के समान दमकते थे। वे मुकुट, कुंडल, हार, करधनी, कड़ा, बाजुबंद आदि धारण करते थे। वे मानव सबके सब बड़े बलवान, साहसी, धीर-वीर, तेजस्वी और प्रतापी हुआ करते थे। उनके वक्षस्थल चौड़े होते थे। उन्हें तीन दिनों में एक बार भोजन की इच्छा होती थी। तब वे कल्पवृक्ष से फल प्राप्त कर भोजन कर लेते थे उन्हें न परिश्रम करना पड़ता था, न उन्हें रोग आदि होते थे। न मानसिक पीड़ा होती थी और न ही कोई चिंता सताती थी। उन्हें न संपत्ति संग्रह की चिंता थी और न खर्च करने की कोई लालसा। वे जो कुछ चाहते थे - उन्हें कल्पवृक्षों से मिल जाता था। कल्पवृक्षों में यह विशेषता थी कि वे पुण्यात्मा पुरुषों को मनचाहे फल प्रदान करते थे। उस समय मृत्यु का स्वरूप भी भिन्न था। आयु पूर्ण होने पर पुरुषों को जम्हाई आती थी और स्त्रियों को छींक। बस वे शरीर त्याग कर स्वर्ग चले जाते थे।
धीरे - धीरे ऐसा युग आया जब कल्पवृक्षों में कमी होने लगी। मनुष्यों का आकार भी घटने लगा। तब वे मनुष्य दो दिन बाद भोजन किया करते थे। किंतु उनकी कांति और सुंदरता में कोई कमी नही आयी थी।
किंतु फिर ऐसा युग आया जब कल्पवृक्ष और भी कम हो गए। मनुष्यों के बल, पराक्रम आदि में भी और कमी आ गयी। उनकी ऊंचाई भी कम हो गयी। वे एक दिन में आंतरे के बराबर भोजन करते थे।
कालवृक्षों का अंत
इस प्रकार जब आठवां युग आया तो कल्पवृक्षों की शक्ति एकदम घट गयी। उस समय प्रवृत्तिनामक कुलकर विद्वान थे जो मनुष्यों को हितकारी मार्ग बताते थे। एक दिन पश्चिम में अस्त होता सूर्य और पूर्व में उगता हुआ चंद्रमा - दोनों एक साथ दिखाई दिए। प्रवृत्ति कुलकर ने अपने प्रजाजनों से कहा- ‘हे भद्र पुरुषों, तुम्हें ये जो सूर्य-चंद्र दिखाई दे रहे हैं ये अत्यंत ज्योतिषीय ग्रह हैं। ये सदा आकाश में घूमते रहते हैं। अभी तक इनका प्रकाश कल्पवृक्षों के कारण छिपा हुआ था। अब चूंकि कल्पवृक्षों का प्रकाश कम हो गया है, इसलिए ये दिखने लगे हैं। लेकिन तुम्हें इनसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।’ इसके बाद उन प्रवृत्ति कुलकर ने नयी व्यवस्था के बारे में बताया कि अब कैसे जीवन जीना है।
प्रवृत्ति कुलकर के बाद सन्मति नामक द्वितीय कुलकर हुए। एक रात को आकाश में तारागण अपने पूरे प्रकाश से चमकते हुए दिखाई दिए। प्रजाजनों ने ऐसा दृश्य कभी न देखा था। वे डरे हुए सन्मति कुलकर के पास गए। उन्होंने आकाश को देखकर कहा- ‘डरो नहीं! ये तो तारागण और नक्षत्र हैं। ये तो सदा से आकाश में रहे हैं। कल्पवृक्षों के कारण ये दिखाई नहीं देते थे। अब दिखने लगे हैं। आज से तुम्हें सूर्य, चंद्रमा, तारागण, आदि का उदय-अस्त दिखाई देंगे। इससे रात-दिन के रूप में दिन का विभाजन होगा।’
चित्र में एक व्यक्ति कुछ लोगों को समझा रहा है।
इसके बाद तीसरे कुलकर यानी क्षेमंकर मनु का युग आया। यह भी महाप्रतापी और सुंदर बलिवंत शरीर वाले थे। जिन पशुओं अर्थात् सिंह, बाघ, तेंदुआ, आदि का लोग लालन-पालन करते थे, वे अब दांत दिखाकर गुर्राने लगे थे और काटने को दौड़ते थे। उनको भयंकर गर्जना से ही लोग डरने लगे थे। तब प्रजाजन क्षेमंकर कुलकर के पास गए। उन्होंने पूछा- ‘हे देव, जिन सिंह आदि पशुओं के हम प्यार से पालते रहे हैं, वे अब भयानक हो रहे हैं। अरस्तु हमें क्या करना चाहिए?’
क्षेमंकर कुलकर ने कहा- ‘अब उन पशुओं को पालने की बजाय उन्हें छोड़ देना चाहिए। कालदोष के कारण उनमें विकार आ गए हैं। अब वे विश्वास योग्य नहीं रहे हैं!’
क्षेमंकर की बात सुनकर लोगों ने पशुओं को छोड़ दिया।
इसके बाद क्षेमंकर नामक चौथे कुलकर हुए। उस समय तक सिंह आदि पशु हिंसक हो गए थे। क्षेमंकर चौथे मनु ने इन हिंसक पशुओं से बचने के लिए लाठी आदि के प्रयोग तथा उपाय बताए। चूंकि उन्होंने प्रजा के कुशल-क्षेम के लिए, उसे हिंसक पशुओं से बचने का उपाय बताया था, इनका ‘क्षेमंकर’ पड़ा था।
इनके बाद ‘सीमंकर’ नामक कुलकर हुए। उनके समय में कल्पवृक्षों की संख्या कम हो गयी और जनसंख्या ज्यादा हो गयी। तब उन्होंने कल्पवृक्षों का विभाजन किया कि इतने कल्पवृक्ष इन लोगों के लिए हैं और इतने उन लोगों के लिए। इस प्रकार उन्होंने लोगों को आपस में टकराने से बचा लिया-क्योंकि उन्होंने सबकी सीमा बांध दी थी। इसीलिए वह ‘सीमंकर’ कहलाए।
‘सीमंकर’ के बाद ‘सीमंधर’ कुलकर हुए। इनके समय में कल्पवृक्ष और कम रह गए। उनमें फल भी कम उत्पन्न होते थे। इससे लोगों में झगड़े होने लगे। तब सीमंधर ने कल्पवृक्षों और छोटी-छोटी झाड़ियों तक पर चिन्ह लगाकर उनका बंटवारा कर दिया।
लेकिन कल्पवृक्षों के फल तो कम होते जा रहे थे। स्थिति तब और बिगड़ गयी जब विमलवाहन नाम के सातवें कुलकर का समय आया। इन्होंने हाथी, घोड़ा, आदि सवारी योग्य पशुओं पर सवारी करने के तरीके बताए थे।
चक्षुष्मान आठवें मनु अर्थात् कुलकर थे। इस समय तक नियम यह था कि संतान के जन्म के साथ ही माता-पिता की मृत्यु हो जाती थी। वे संतान का मुख तक नहीं देख पाते थे। किंतु चक्षुष्मान कुलकर के समय में माता-पिता अपनी संतान का मुख क्षणभर देखने योग्य हो गए। लोगों के लिए यह नयी बात थी। इसलिए इन कुलकर का नाम ‘चक्षुष्मान’ हुआ।
यशस्वान नामक नौवें मनु बड़े ही यशस्वी थे। इनके यश से प्रजा को इतना अवसर मिलने लगा कि वह अपनी संतान के जन्म के बाद, उसे आशीर्वाद दे सके और तब मृत्यु हो।
दसवें मनु थे अभिचंद्र। उनका मुख चंद्रमा के समान सौम्य था। उनके समय में प्रजा अपनी संतान का मुख देखने लगी। उसे आशीर्वाद देने लगी और रात के समय उसे चंद्रमा दिखाकर उसके साथ मनोविनोद करने लगी। इसलिए उनका नाम ‘अभिचंद्र’ पड़ा था।
ग्यारहवें मनु का नाम था- ‘चंद्रभ’ उनका मुख चंद्रमा के समान था। ये समय की गतिविधि जानने वाले थे। ये समस्त कलाओं-विद्याओं को धारण किए हुए ही उत्पन्न हुए थे। जनता को ये बहुत प्रिय थे। इन मनु ने सबको आनंद दिया था अरस्तु इनका नाम चंद्रभ पड़ा था।
मरुदेव बारहवें मनु थे। वे सूर्य के समान देदीप्यमान थे। वह स्वयं ही विलक्षण सूर्य थे। इनके समय में प्रजा अपनी-अपनी संतानों के साथ बहुत दिनों तक जीवित रहने लगी थी। लोग अपनी संतानों का मुख देख सकते थे, उसे स्पर्श कर सकते थे। मरुदेव के समय में ही, पानी में छोटी-बड़ी नाव चलाने का काम शुरू हुआ।
प्रेसेनजित नाम के तेरहवें कुलकर हुए। इनके समय में उत्पन्न हुए बालकों के शरीर पर एक झिल्ली सी चढ़ी रहती थी। प्रेसेनजित ने इस झिल्ली को फाड़ने का उपदेश दिया था। इस झिल्ली की प्रसन्न भी कहते हैं। उसे जीतने का आदेश देने के कारण इनका नाम प्रेसेनजित पड़ा था।
प्रेसेनजित के बाद नाभिराज़ अंतिम कुलकर हुए। ये अत्यंत बुद्धिमान थे। इनके पूर्व कुलकरों ने जिस व्यवस्था के भार को धारण किया था, इनमें वे सभी विशेषताएं विद्यमान थीं। इनका मस्तक मुकुट से शोभायमान था। वह कानों में कुंडल, वक्ष पर रत्नजटित हार धारण किए थे। उनका बलिष्ठ शरीर अत्यंत सुंदर और कांतियुक्त था। जैसा शरीर देवों के राजा इन्द्र को भी मिलना कठिन था। इनके समय में उत्पन्न हुए बालक के नाभि दिखाने देने लगी थी। नाभिराज़ ने उस नाभि से लगी नाल काटने का आदेश दिया था। इसीलिए उनका नाम नाभिराज़ पड़ गया था। उस समय आकाश में बादलों का छाना और वर्षा करना आरंभ हो चुका था। कल्पवृक्षों का युग समाप्त हो चुका था। वर्षा से धरती भीगने लगी। फिर धरती ने अंकुर दिखाई दिए। फिर पौधे और फिर फल इस तरह बिना बोए बहुत सी चीजें उग आयी थीं। चावल, जौ, गेहूं, तिल, मसूर, सरसों, धनिया आदि खूब उत्पन्न होने लगे थे। इससे प्रजा को अपना भोजन प्राप्त करने का विकल्प मिल गया था। किंतु उसके उपभोग की विधि ज्ञात न थी। इसलिए प्रजाजन उस समय के अंतिम कुलकर नाभिराज़ के पास आए और अपनी कठिनाई कही- ‘हे देव! इस धरती पर अनेक वृक्ष उत्पन्न हुए हैं। वे फलों से लदे हुए हैं और जैसे हमें बुला रहे हैं। क्या ये फल खाने योग्य हैं?’
नाभिराज़ ने कहा- 'अब कल्पवृक्ष समाप्त हो गए हैं। अब इन साधारण वृक्षों के पके हुए फल तुम्हारे जैसा ही उपकार करेंगे जैसा कल्पवृक्ष करते थे। लेकिन कुछ विषैले वृक्षों से सावधान रहना होगा। ‘ईख की ओर संकेत करके उन्होंने कहा कि इसे तो दांतों से काटकर चूसना होगा या किसी यंत्र से दबाकर इसका रस निकालकर पीना होगा।’
नाभिराय ने थाली आदि अनेक बर्तन मिट्टी से बनाकर दिए तथा इसी प्रकार अन्य लोगों को बनाने के लिए कहा। इससे प्रजा, नाभिराय से अत्यंत प्रसन्न हुई, क्योंकि उसे अनाज के उपयोग और उसका भोजन बनाने कि विधि उन्होंने बताई थी। प्रजा ने नाभिराय का अभिनंदन किया। चूंकि नाभिराय ने कल्पवृक्षों का विकल्प बताया था, और उसी प्रकार से प्रजा का हित किया था, इसलिए वह कल्पवृक्ष के समान ही माने गए थे।
प्रतिश्रुति से लेकर नाभिराय तक जिन चौदह कुलकरों ने जन्म लिया था, वे सब उन्नत कुलीन महापुरुष थे। इन्होंने प्रजा के हित के लिए उपदेश दिए थे। आर्य पुरुषों को इन्होंने ‘कुल’ की भांति रहने के उपदेश दिए थे, इसलिए ये कुलकर कहलाए। इन्होंने अनेक वंश स्थापित किए थे इसलिए कुलकर कहलाए तथा युग के आरंभ में होने से इन्हें ‘युगादिपुरुष’ भी कहा गया।
भगवान ऋषभदेव तीर्थंकर भी थे और कुलकर भी। इसी प्रकार महाराज भरत चक्रवर्ती भी थे और कुलधर भी। उन कुलकरों में से आरंभ के पांच कुलकरों ने अपराधी मनुष्यों के लिए ‘हा’ दण्ड की व्यवस्था की थी- अर्थात् खेद है कि तुमने ऐसा अपराध किया। उनके बाद के कुलकरों ने ‘हा’ और ‘मा’ - इन दो प्रकार के दंडों की व्यवस्था की अर्थात् ‘खेद है कि तुमने ऐसा अपराध किया, अब आगे ऐसा नहीं करना।’
शेष कुलकरों ने ‘हा’, ‘मा’ और ‘धिक’ - इन तीन प्रकार के दंडों की व्यवस्था की- अर्थात् ‘खेद है, अब ऐसा नहीं करना और तुम्हें धिक्कार है जो रोकेने पर भी अपराध करते हो।’
इस प्रकार इन कुलकरों ने प्रजा के हित के लिए कार्य किया और उसको कल्याण का मार्ग बताया।
राजा प्रसेनजित के समय में प्रजा सुखी और धन-धान्य से पूर्ण थी। जब उनके राजकुमार ने जन्म लिया तो सर्वत्र खुशियां मनाई गयीं। राजा प्रसेनजित ने, राजकुमार का नाम रखा- श्री नाभिराय।
राजकुमार श्री नाभिराय देखने में अत्यंत सुंदर थे। राजा प्रसेनजित का मन, नाभिराय को देखकर कमल के जैसा खिला रहता था। नाभिराय भी अत्यंत गुणी और चतुर सिद्ध हो रहे थे। जैसे जैसे वह बड़े हुए, उनके गुणों का विकास होता गया।
जब श्री नाभिराय युवा हुए तो वे महान बलशाली, विद्वान, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक सिद्ध हुए। उनके गुणों का समुचित विकास देखकर राजा प्रसेनजित ने मन में विचार किया कि क्यों न राजकुमार नाभिराय का विवाह कर दिया जाय। उन्होंने जब अपने मन की बात दृढ़ जनों से कही तो वे बोले- “महाराज! आपका विचार अति उत्तम है। राजकुमार अब विवाह योग्य हो गए हैं। उनका विवाह अवश्य करें।”
श्री नाभिराय के लिए सुंदर-सुंदर राज कन्याओं के प्रस्ताव आने लगे। अंततः वह प्रस्ताव भी आया, जिसे नाभिराय के साथ विवाह की स्वीकृति मिली। वह प्रस्ताव था - एक अत्यंत रूपवती, गुणवती कन्या मरुदेवी का।
विवाह की तैयारियां आरंभ हुई। निश्चित दिन बारात चली। उस बारात की शोभा इतनी भव्य थी कि इन्द्र देवतीओं का मन भी उसमें शामिल होने के लिए ललचा गया। वे भी आकाशमार्ग से बारात के साथ-साथ चलने लगे।
मरुदेवी के यहां सभी बारातियों का समुचित स्वागत हुआ। फिर नियमानुसार विवाह हुआ और सभी अपने-अपने स्थान को पधारे। प्रसेनजित जब बारात लेकर लौटे तो जन समूह ने ‘जय नाभिराय’ और ‘जय मरुदेवी’ के घोष से उनका स्वागत किया।
अब राजा प्रसेनजित ने सोचा कि नाभिराय और मरुदेवी के निवास के लिए एक सुंदर भवन का निर्माण कराना चाहिए, जहां दोनों आनंदपूर्वक जीवन के सुख भोगें। तब इसके लिए सरयू नदी के तट पर अयोध्या नगर की भूमि का एक भाग चुना गया और वहीं उस भवन का निर्माण कराया गया। नाभिराय और मरुदेवी- दोनों सुखपूर्वक उसमें रहने लगे।
कुछ समय बाद पश्चात राजा प्रसेनजित ने सोचा कि अब नाभिराय हर प्रकार से योग्य हो गए हैं। यह राजपाट अब उन्हें ही सौंप देना चाहिए। मुझे तो अब मुक्त होकर रहना चाहिए।
आखिर काफी सोच विचार के बाद एक दिन राजा प्रसेनजित ने नाभिराय से अपने मन की बात कह दी। उन्होंने कहा- “पुत्रवर! अब तुम इस योग्य हो गए हो कि राज्य का कार्यभार संभाल सको। मेरा तो बुढ़ापा आ गया। मैं चाहता हूं कि राजकाज तुम संभाल लो तो मैं जीवन के शेष दिन शांति पूर्वक बिता लूं।”
नाभिराय ने कहा- “पिता जी, आपके होते हुए, राजगद्दी पर बैठना मुझे शोभा नहीं देता। आपके सामने मेरी योग्यता कुछ भी नहीं है। इसलिए राजगद्दी पर आप विराजें और आपकी आज्ञा से मैं समस्त राजकाज संपन्न करूंगा।”
‘नाभिराय’ से राजा प्रसेनजित ने कहा- “तुम मुझे जो आदर दे रहे हो उससे मेरा मन गद्गद् हो उठा है। किंतु मैं तो शांति चाहता हूं। इसलिए गद्दी पर तो तुम्हें ही बैठना होगा।”
पिता की आज्ञा के सामने नाभिराय कुछ न कह सके। राज्याभिषेक की तैयारियां शुरू हो गयीं। सब ओर खुशी की लहर दौड़ गयी। राज्याभिषेक के दिन पूरा नगर जगमग उठा। खूब धूमधाम से नाभिराय को राजगद्दी पर बिठाया गया।
नाभिराय ने राजा बनकर जीवन का एक ही ध्येय बनाया कि प्रजा की सेवा ही सब कुछ है, प्रजा सुख से रहे तो राजा की सेवा सफल है। प्रजा को दुख देने वाला राजा राजगद्दी पर बैठे रहने का अधिकारी नहीं है। इस प्रकार नाभिराय ने अपनी प्रजा को सुखी बनाने के लिए सभी उपाय किये। वे स्वयं भी सुख से रहने लगे।
कुछ समय पश्चात इन्द्रलोक में राजा इन्द्र एक दिन किसी गंभीर विषय पर विचार कर रहे थे। उनके दरबार में हो रहे नृत्य-संगीत में भी उनका मन नहीं लग रहा था। कुबेर ने राजा इन्द्र की यह दशा देखी तो उनके निकट आकर बोले- "हे इन्द्रराज! आज आप किस बात के लिए विचार मग्न है? इन्द्रराज ने कहा ‘कुबेर जी, धरती पर प्रथम तीर्थंकर के जन्म का समय आने वाला है। इस धरती पर मानवता, धर्म और आत्मविकास की शक्ति प्रदान करने के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है। उनके आने से धर्म की उन्नति होती है, पापियों का नाश होता है और धर्म-भक्तों को मुक्ति मिलती है।’
कुबेर ने कहा- “हे देवराज! आपकी बात सत्य है। किंतु इन तीर्थंकर के विषय में कुछ जिज्ञासा है। कृपया उसे दूर करें।”
देवराज इन्द्र ने कहा- "सुनिए, तीर्थंकर के जन्म की कथा मैं सुनाता हूं। अलकापुरी नाम की एक नगरी थी। उसके राजा का नाम था- अतिबल। उनकी रानी का नाम था- महावरा। राजा अतिबल के राज्य में सब ओर सुख चैन था। राजा अतिबल का एक बेटा भी था। वह सुंदर,
सुशोल और गुणवान था। जब राजा का बुढ़ापा आया तो उन्होंने राज्य का कार्यभार पुत्र महाबल को सौंपने की घोषणा कर दी। शुभ घड़ी देखकर महाबल का राज्याभिषेक कर दिया और जिन दीक्षा लेकर अतिबल धर्म में अनुरक्त हो गए।
राजा अतिबल के चार मंत्री थे। उनमें से एक स्वयं-बुद्धि भी थे। ये चारों मंत्री राजा महाबल को राज्य-शासन चलाने में मदद देने लगे। एक दिन मंत्री स्वयं-बुद्धि अकृत्रिम चैत्यालयों में विराजमान जिन प्रतिमाओं की भक्तिपूर्वक वन्दना करने की इच्छा से सुमेरु गिरि पर गए।
एक दिन जब वे ध्यान में लीन थे, तो उसी स्थान पर आदित्य और अरिंजय नामक दो ऋषि उनके पास आए। स्वयं बुद्धि ने दोनों मुनियों को आदर सहित प्रणाम किया। फिर उनसे पूछा- ‘हे मुनि श्रेष्ठ ! कृपया यह बताएं कि वह कौन सा तत्व है जिसको पाकर जीवन के समस्त सुखों को पाने की इच्छा पूर्ण हो जाती है।’
‘हे साधक ! वह तत्व आत्म चिंतन ही है, जिसे पाकर कुछ पाने की इच्छा शेष नहीं रहती।’ मुनिवर ने कहा।
‘हे मुनिवर ! आप ज्ञानी हैं। त्रिकालदर्शी हैं। कृपया यह बताएं कि राजा महाबल कैसे हैं ?’ स्वयं-बुद्धि ने पूछा मुनि श्रेष्ठ ने कहा- ‘राजा महाबल अत्यंत सुखी और प्रसन्न हैं। उनके राज्य में प्रजा को हर तरह का सुख है।’
‘हे मुनिश्रेष्ठ ! कृपया मुझे राजा महाबल के पूर्व जन्म की कथा सुनाएं।’
‘तुम्हारी जिज्ञासा अत्यंत सुंदर है, साधक। अब हम राजा महाबल के पूर्व भव की कथा सुनाते हैं।’ मुनिवर ने कहा- 'प्राचीन काल में गंधिल प्रदेश में ‘सिंह नगर’ नामक एक सुंदर नगर था। इस पर श्रीषेण नामक राजा का शासन था। सिंह नगर का हर प्राणी सुख और आनंद का जीवन बिता रहा था। राजा श्रीषेण के दो पुत्र थे- जय वर्मा और श्री वर्मा। जब राजा श्रीषेण बूढ़े हुए तो उन्होंने प्रजाजनों के अतिशय प्रिय अपने छोटे पुत्र श्री वर्मा को राज्य शासन सौंप दिया। अपनी उपेक्षा होने के कारण बड़े राजकुमार जय वर्मा ने सर्व-सुखों को त्यागकर जिनदीक्षा ले ली। वे पद्मासन में बैठ कर केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए वन में तपसाधना करने लगे।
एक दिन की बात है, जयवर्मा अपनी साधना में लीन थे। आकाश मार्ग से एक विद्याधर विहार करता हुआ वहां आया। जयवर्मा की साधना में विघ्न पड़ा। उन्होंने आकाश में उस विद्याधर को देखा। वह आनंद में डूबा हुआ था। जीवन का सर्वश्रेष्ठ सुख भोग रहा था। जयवर्मा उस दृश्य को देखकर अपने को न रोक सके। उनके मन में भी वैसा ही सुख पाने की इच्छा जाग उठी। किंतु वन में वह सुख पाना असंभव था। अस्तु उन्होंने किसी तरह अपनी इच्छा को रोक लिया।
किंतु उनकी तपस्या तो खंडित हो चुकी थी। उसी समय एक भयंकर नाग अपने आप बांबी से निकला और उसने जय वर्मा को डस लिया। जयवर्मा की तत्काल मृत्यु हो गयी। तप साधना के समय केवल वह विचार मात्र के आने से जयवर्मा को यह दंड मिला था। वे अपनी अपूर्ण सुखोपभोग की इच्छा लिए ही इस शरीर से मुक्त हुए थे। अतः अगले जन्म में भी वह राजा हुए और वही महाबल के नाम से समस्त सुख भोग रहे हैं।
राजा महाबल के पूर्वभव की कथा सुनकर स्वयं-बुद्धि अत्यंत प्रसन्न हुए।
तब मुनिवर ने कहा- ‘अब हम राजा के वर्तमान जीवन का कथा सुनाते हैं। आपके राजा महाबल ने आज ही रात्रि के अंतिम प्रहर में दो स्वप्न देखे हैं। एक तो यह कि राजा कीचड़ में फंस गए हैं। उन्हें तीनों मंत्री बचाकर ले आते हैं। दूसरा सपना है एक दीपक जिसकी रोशनी प्रतिक्षण कम होती जाती है हे स्वयं-बुद्धि भोंवर आप जाकर राजा को बताएं कि इन सपनों का अर्थ क्या है। पहले स्वप्न का अर्थ शुभसूचक है। किंतु दूसरे का अमंगलकारी है। अर्थात राजा की आयु अब कुछ ही वर्ष की है।’
यह कहकर उन मुनियों ने वहां से प्रस्थान किया। स्वयं-बुद्धि ने भी वन को त्याग दिया और राजा महाबल के पास आए। उन्होंने राजा से मुनियों द्वारा बताए सपनों का फल बताया। राजा महाबल उन स्वप्नों का अर्थ जानने के लिए स्वयं उत्सुक थे। मंत्री स्वयं-बुद्धि से उनके फल जानकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए।
अस्तु, अब अठान्निका पर्व आया तो राजा महाबल ने ‘णमोकार मंत्र’ जपते - जपते अपना शरीर छोड़ दिया, और ईशान स्वर्ग में गए।
ईशान स्वर्ग में जब ललितंग देव की आयु पुष्कल प्रत्यय की रह गयी तब उन्हें पुण्य के कारण स्वयंप्रभा नामक प्रिय पत्नी प्राप्त हुई। अपनी इस पत्नी में अतिशय अनुरक्त उन्हें ललितंग देव का समय कैसे व्यतीत हो जाता उसे पता ही नहीं चलता। इसी तरह उसकी आयु के ६ मास ही शेष रह गए। अपनी माला के स्थान होने से अपनी शेष ६ मास की आयु जान वह चिंतित हो उठा। उनको चिंतित देख सामायिक जाति के देवों ने उनको सम्बोधित किया और धर्म में वृद्धि लगाने को कहा क्योंकि धर्म ही स्वर्ग तथा मोक्ष का कारण है।
ललितंग ने एक चैत्यालय में जाकर भगवद् भक्ति आरम्भ कर दी। किंतु स्वयं-प्रभा से प्राप्त होने वाले सुख का विचार मन से न निकाल सके। स्वर्ग से च्युत होकर वे वज्रबाहु राजा के रूप में उत्पन्न हुए।
इस प्रकार इन्द्र देव ने कथा सुनाते हुए कहा- ‘हे कुबेर, बार-बार सुखोपभोग की इच्छा करने के कारण दसवें भव में वे अहमिन्द्र कहलाए। अब वही तीर्थंकर के रूप में जन्म लेने वाले हैं।’
इन्द्रराज से यह कथा सुनकर कुबेर बहुत प्रसन्न हुए। इन्द्र ने कहा- ‘तीर्थंकर आदिनाथ की सेवा का अवसर अत्यंत पुण्यदायी है। इसलिए अब आप वह करें जो मैं कहता हूं। आप देवों का दल लेकर जाएं। वहां एक अत्यंत सुंदर नगरों का निर्माण करें। साथ ही नाभिराय और मरुदेवी के लिए सुंदर प्रासाद का निर्माण करें।’
अयोध्या में रत्न वृष्टि
इन्द्रदेव की आज्ञा पाकर कुबेर ने शीघ्र ही एक वैभवशाली नगरी की रचना की। और श्री नाभिराय और मरुदेवी के लिए एक सुंदर प्रासाद भी निर्मित हुआ था। इस नवनिर्मित प्रासाद में सभी प्रकार के सुख उपलब्ध थे। राजा नाभिराय और मरुदेवी इसमें निवास करने लगे। समस्त सुखों का भोग करते हुए उनका जीवन आनंद पूर्वक बीतने लगा।
एक दिन रानी मरुदेवी ने राजा नाभिराय से कहा- ‘स्वामी, रात्रि के अंतिम प्रहर में मैंने सोलह स्वप्न देखे हैं। उनका फल क्या है, यह बताएं।’
नाभिराय ने उन स्वप्नों के बारे में पूछा। मरुदेवी ने कहा- पहले स्वप्न में मैंने ऐरावत हाथी के गंडस्थल से मद बहते देखा। दूसरे स्वप्न में सफेद वृषभ को मन्द गम्भीर शब्द करते हुए देखा। तीसरे स्वप्न में एक श्वेत गवाला एवं रक्तवर्ण के कंधे से युक्त सिंह देखा। चौथे स्वप्न में कमलासना लक्ष्मी के दर्शन हुए। पांचवें स्वप्न में सुंदर फूलों की माला देखी। छठवें स्वप्न में सूर्योदय देखा। सातवें स्वप्न में चंद्रमा देखा आठवें स्वप्न में दो स्वर्ण कलश देखे। नौवां सपना हंसते हुए कमलों से पूर्ण तालाब में क्रीड़ा करती हुई दो मछलियों का था। दसवें सपने में तैरते हुए कमलों के परागों से पीतवर्ण हुआ पानी वाले तालाब को देखा। ग्यारहवां स्वप्न समुद्र की ऊंची-ऊंची लहरें उठ रही थीं। बारहवें सपने में सोने का रत्नजटित सिंहासन देखा। तेरहवें में रत्नों से जड़ा एक देव विमान आकाश में उड़ते देखा। चौदहवें में नागेन्द्र भवन। पन्द्रहवें में रत्नों की राशि जिसमें सिखाने से किरणें फूट रही थीं। सोलहवें में धुआं रहित अग्नि देखी। बस इन स्वप्नों के बाद मेरी आंख खुल गयी। हे नाथ ! अब इन स्वप्नों का फल सुनने की इच्छा है।’
राजा नाभिराय ने इन स्वप्नों को विस्तार से सुनकर कहा- 'हे रानी ! ये स्वप्न अत्यंत शुभ-सूचक हैं। आपने जो ऐरावत हाथी देखा है, उसका अर्थ है कि अब आप अवश्य ही पुत्रवती
होने वाली है। श्वेत वृषभ के दर्शन का अर्थ है कि आपका वह पुत्र समस्त लोकों का स्वामी होगा। सिंह का अर्थ है कि आपका वह पुत्र, सिंह के समान बलशाली होगा। उसके अतुल बल की प्रशंसा समस्त लोकों में होगी। सुंदर बहुरंगे पुष्पों की माला बताती है कि आपका पुत्र पुष्पों की सुगंध के समान धर्म की सुगंध सर्वत्र फैलायेगा। कमलासना लक्ष्मी के दर्शनों का अर्थ तो स्पष्ट ही है कि वह पुत्र वैभवशाली होगा और उसे धन की कमी कभी न होगी। पूर्ण चंद्र और चाँदनी तथा तारागण बताते हैं कि उसकी शीतल छाया उसकी प्रजा को शांति और सुख प्रदान करेगी। इसी प्रकार सूर्योदय का अर्थ है कि आपका पुत्र सूर्य के समान प्रखर और तेजस्वी बनकर इस पृथ्वी पर चमकेगा, अपने प्रकाश से जगत् को आलोकित करेगा। दो कलश इस बात का प्रतीक है कि वह संसार की समस्त संपत्ति का सुख भोगेगा। समुद्र के दर्शन का अर्थ है कि आपका पुत्र केवल-ज्ञानी होगा। रत्नजटित सिंहासन का अर्थ है- उसे इस जगत् में सर्वत्र सम्मान प्राप्त होगा। और रत्नजटित विमान का अर्थ है कि वह पुत्र स्वर्ग से अवतरित होगा। सुंदर भवन का अर्थ है कि वह पुत्र अवधि ज्ञान से पूर्ण होगा। रत्न राशियों का अर्थ है कि उस पुत्र में समस्त गुण होंगे और उनसे वह जगत् को आलोकित करेगा, अज्ञानता के अंधकार को दूर हटाएगा। बिना धुएँ की अग्नि का अर्थ है, वह प्रिय, तुम्हारा पुत्र अत्यंत गुणवान होगा। ’
नाभिराजा से सोलह स्वप्नों के अर्थ सुनकर रानी मरुदेवी अत्यंत प्रसन्न हुई।
देवियों द्वारा माता की सेवा
उधर आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में वज्रनाभि अभिमिंद्र, देवायु का अंत होने पर सर्वार्थ सिद्धि विमान से मुक्त होकर मरुदेवी के गर्भ में प्रकट हुआ।
देवलोक के राजा इन्द्र की अवधिज्ञान से पता लग गया कि भगवान ऋषभदेव मरुदेवी के गर्भ में आ गए हैं। अस्तु वह देवों के साथ आए और उन्होंने राजा और रानी - दोनों की परिक्रमा करके पूजा की फिर संगीत-नृत्य के विविध कार्यक्रम प्रस्तुत करके वातावरण को आनंदमय बना दिया। इन्द्र की आज्ञा से स्वर्ग की देवियाँ मरुदेवी की सेवा करने लगीं। तथा उन्हें हर प्रकार के सुख प्रदान करने लगीं। वे देवियाँ मरुदेवी को स्नान करातीं, वस्त्राभूषणों से अलंकृत करतीं, स्वादिष्ट भोजन करातीं। और उनका हर तरह से मनोरंजन करतीं।
तीर्थंकर का जन्म
इस प्रकार नौ महीने बीत गए। चैत्र कृष्ण नवमी के दिन, सूर्योदय के समय, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में और ब्रह्म नामक महायोग में, रानी मरुदेवी ने एक ज्योतिषज्ञ के जैसे पुत्र को प्राप्त किया। वह शिशु होकर भी गुणों से पूर्ण तथा तीन लोकों का स्वामी था। उस समय सभी दिशाएँ शांत और स्वच्छ हो गयी थीं। आकाश निर्मल हो गया था।
उधर इन्द्र का सिंहासन डोल उठा तो उसने जान लिया कि समस्त पापों को जीतने वाले जिनेंद्र देव का जन्म हुआ है। अस्तु तीर्थंकर रूपी सूर्य के उदित होने की शुभ सूचना पाकर इन्द्र ने उनका जन्माभिषेक करने का निश्चय किया।
सौधर्म स्वर्ग के राजा इन्द्र ऐरावत हाथी पर इन्द्राणी के साथ सवार हुए और अपने साथ देवगणों को लेकर भगवान ऋषभदेव के जन्माभिषेक के लिए चल पड़े। विविध वाद्यों के संगीत और प्रभु की जय-जयकार से पूरा नभ मंडल गूँजने लगा था।
इसके साथ ही देवों की सेनाओं ने आकाश से पृथ्वी पर उतर कर अयोध्या नगरी को घेर लिया था। राजा इन्द्र और इन्द्राणी नाभिराजा के आंगन में पधारे। उनके साथ देवगण भी आए। इन्द्राणी ने मरुदेवी के पास जाकर उन्हें तथा उनके पुत्र को प्रणाम किया और उनके दर्शन किए। इन्द्राणी ने तीन बार उनकी परिक्रमा की, फिर जिनमाता के सामने खड़े होकर प्रार्थना की- 'हे
माता ! तुम तीनों लोकों का कल्याण करने वाली मंगलमयी माता हो। तुम पुण्यवती हो, महादेवी हो, वत्सलिनि हो।’
इसके बाद इन्द्राणी ने अपनी माया से मरुदेवी के पास दूसरा शिशु रख दिया और ज्योति पूर्ण शिशु को अपने दोनों हाथों से उठा लिया। उस समय इन्द्राणी की लगा जैसे उन्होंने तीनों लोकों का सुख प्राप्त कर लिया है। वह दिव्य शिशु को लेकर आयी। और उसे इन्द्र की गोद में दे दिया। इन्द्र भी दिव्य बालक को देखकर प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान की स्तुति की। 'हे देव आप तीनों जगत् के ज्योति हो, तीनों जगत् के स्वामी है। हे नाथ, आप गुरुओं के भी गुरु है, अस्तु आपको नमस्कार है। हे भगवन, आपने तीनों लोकों को जीत लिया है, इसलिए आपसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए, हम आपके चरण कमलों को बड़े आदर से अपने मस्तक पर धारण करते है।
इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र ने हाथ उठाकर सबको संकेत दिया कि वे शीघ्र ही सुमेरु पर्वत के लिए प्रस्थान करें।
सुमेरु पर्वत पर अभिषेक
सुमेरु पर्वत, तीर्थंकर भगवान के पवित्र अभिषेक की भूमि बनकर सदा पवित्र रहता है। स्वर्ग के समान कांति वाले सुमेरु पर्वत पर पहुंचकर इन्द्र ने पहले उसकी परिक्रमा की। उस सुमेरु पर्वत पर पांडुक वन में ‘पांडुक’ नामक एक शिला है जिस पर तीर्थंकर भगवानों का अभिषेक होता रहा है। उस पवित्र शिला पर इन्द्र ने जिनेंद्ररूपी-सूर्य शिशु को विराजमान कराया। वह पांडुक शिला सदैव निर्मल रहती है। उस पर इन्द्र ने क्षीर सागर के जल से कई बार प्रक्षालन किया है, इसीलिए वह पवित्रता की चरम सीमा को धारण कर रही है। निर्मलता, पवित्रता, और पूज्यनीयता से युक्त वह पांडुक-शिला, जिनेंद्र देव की माता के समान शोभायमान होती है।
जिनेंद्र देव के दर्शनों की अभिलाषा लिए देवगण, पांडुक-शिला के चारों ओर बैठ गए। उस समय वहां का वातावरण ऐसा हो रहा था, मानो स्वर्ग का वैभव सुमेरु पर्वत पर उतर आया हो। चारों ओर संगीत-नृत्य की ध्वनियाँ गूँज रही थीं।
सर्वप्रथम इन्द्र ने विधि पूर्वक भगवान का अभिषेक करने के लिए कलश उठाया। मनोच्चार से सारा गगन मंडल गूँज उठा। फिर इन्द्राणी ने अभिषेक किया। इसके बाद देवगणों ने, क्षीर सागर के जल से भरे कलशों से अभिषेक किया। इसके बाद इन्द्राणी ने निर्मल-कोमल वस्त्र से शिशु-ऋषभदेव के शरीर को पोंछा। उनके ललाट पर आदर पूर्वक तिलक लगाया और फिर उन्हें बहुमूल्य वस्त्र तथा आभूषण पहनाए। उस समय भगवान की शोभा कल्पवृक्ष के समान प्रतीत
हो रही थी। इन्द्र तथा वहाँ उपस्थित सभी देवगणों ने प्रभु के उस मनोहर दिव्य रूप के दर्शन किए। फिर सबने उनकी स्तुति की- 'हे देव, आप देवों में आदि देव हैं, तीनों लोकों के आदि गुरु हैं, जगत् के विधाता हैं और धर्म के आदि नायक हैं। 'हे देव ! आप ही जगत के स्वामी, जगत के पिता और जगत के रक्षक हैं। हे देव ! यद्यपि आप बिना स्नान किए ही पवित्र हैं, तथापि देवों पर्यंत के जो आपका अभिषेक किया गया है, वह पापों से मलिन हुए इस जगत को पवित्र करने के लिए किया गया है। हे देव ! आपके अभिषेक से केवल हम ही नहीं, सुमेरु पर्वत और क्षीर सागर भी पवित्र हुए हैं। फिर इन्द्र ने ही शिशु का नामकरण किया। उन्हें ‘वृषभ’ नाम ही सबसे श्रेष्ठ लगा। उन्होंने कहा- ‘वृष का अर्थ श्रेष्ठ धर्म है- वृष का अर्थ है महान परोपकारी। चूंकि यह शिशु जगत में श्रेष्ठ है, चूंकि यही धर्म का स्वामी है- अस्तु यही ‘वृषभ’ है- यही ‘ऋषभ’ है।’ इन्द्र की इस घोषणा के पश्चात्, उपस्थित जनसमूह ‘जय आदिनाथ’ ‘जय वृषभ देव’ का घोष कर उठा।
नाभिराज और मरुदेवी, ऐसे शिशु का पाकर धन्य हो उठे थे। वे हर पल सुख से बिलोने लगे थे। शिशु आदिनाथ धीरे-धीरे विकास पाने लगे। राजा-रानी दोनों, शिशु की एक-एक क्रिया, एक-एक क्रीड़ा को निहारते और पुलकित होते। वे उसकी चर्चा करते हुए कभी न थकते। वे प्रभु को बार-बार भीखदाते थे कि उन्हें ऐसा अलौकिक शिशु मिला है।
जब शिशु आदिनाथ घुटनों के बल चलने लगे तो उनके पैरों में नूपुर पहना दिए। जब वह चलते तो नूपुर मधुर ध्वनि करते। दास-दासियां उन्हें हर पल अपनी नजरों के सामने रखते। वह खेलते-किलकारी भरते और आनंदपूर्ण दृश्य को देखकर राजा रानी खुशी से फूले न समाते।
दिन, मास और वर्ष बीते। बालक आदिनाथ अन्य बच्चों के साथ खेलने लगे वह उन्हें अपने साथ खिलाते ही न थे बल्कि स्वयं भी उनके साथ खेलते।
इस प्रकार प्रभु की स्तुति के पश्चात्, इन्द्र तथा इन्द्राणी, प्रभु को गोद में लेकर देवगणों के साथ आयोध्यापुरी लौट आए।
इन्द्र, भगवान ऋषभदेव को गोद में लेकर नाभिराज के राजभवन में आए। वहाँ आंगन में उन्होंने शिशु रूपी भगवान को विराजमान कराया ताकि लोग उनके भरपूर दर्शन कर सकें। सर्वप्रथम स्वयं राजा नाभिराज ने उनके दर्शन पाकर अपने को परम सौभाग्यशाली माना। इसके बाद इन्द्राणी ने शिशु को उठाया और मरुदेवी के पास ले गयी। वहां उन्होंने मायावी शिशु को उठाकर शिशु -भगवान को लिटा दिया और अपना माया हटा दी।
१४
अब इन्द्र और इन्द्राणी ने राजा नाभिराज और रानी मरुदेवी को बहुत से आभूषण आदि भेंट किए और उनकी पूजा की। इन्द्र ने कहा- ‘इस संसार में आप दोनों महाभाग्यशाली हैं, क्योंकि समस्त लोकों में आपको ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुआ है। आज आपका यह भर हम लोगों के लिए जिनालय के समान पूज्य है।’ इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र, इन्द्राणी तथा देवगण स्वर्ग लोक चले गए। आयोध्यावासियों ने भी भगवान का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया। पूरी आयोध्या नगरी इस अवसर पर स्वर्ग के समान सजी हुई थी। हर ओर गीत-नृत्य हो रहे थे। सर्वत्र उल्लास का वातावरण था।
भगवान वृषभदेव जगत भर में श्रेष्ठ हैं, इसलिए इन्द्र ने उनका नाम ‘वृषभ देव’ रखा था। गर्भावतरण के समय मरुदेवी ने एक वृषभ देखा था, इसलिए भी देवों ने उनका ‘वृषभ’ नाम से आह्वान किया था।
भगवान वृषभदेव की बाल्यावस्था सबको आनंद देने वाली थी। वे बाल भगवान चंद्रमा के समान शोभायमान होते थे। जब भगवान की बाल्यावस्था समाप्त हुई तो उनका किशोर-शरीर बहुत हसीं सुंदर हो गया। वह भगवान समस्त विद्याओं के ईश्वर थे, इसलिए उन्हें समस्त विद्याएं स्वतः ही प्राप्त हो गयी थी। वह सरस्वती के स्वामी थे, इसलिए समस्त शास्त्रों का ज्ञान उन्हें अपने आप ही प्राप्त हो गया था। इसलिए वह समस्त लोक के गुरु हो गए थे। इस प्रकार भगवान वृषभ देव अपने माता-पिता, परिजनों और जगत के समस्त जीवों को सुख देते हुए विकास कर रहे थे।
इस प्रकार बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक ऋषभ देव ने समस्त विद्याएं प्राप्त की और उन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया। उन्होंने इन सबके साथ जिन-भक्ति का महत्व भी समझा लिया था। उन्होंने जिन-भक्ति के प्रति श्रद्धा-भाव जात कर लिया था। उनके इस बहुमुखी विकास को देखकर न केवल राजा-रानी, बल्कि प्रजा भी प्रसन्न थी। उन सबको इसका संतोष था कि उनका भविष्य जिन हाथों से संवरना है, वे अत्यंत शक्तिशाली एवं सर्वगुण सम्पन्न हैं।
युवावस्था को प्राप्त करने पर ऋषभदेव में सभी गुणों के लक्षण स्पष्ट दिखायी देने लगे थे। उनकी सभी विद्याओं का ज्ञान था। जगत का कोई रहस्य उनसे अनजाना नहीं रहा। तभी तो वह तीर्थंकर कहलाए।
राजा नाभिराज और रानी मरुदेवी की आयु बढ़ी। अब आदिनाथ युवा हुए तो राजा-रानी ने पुत्र के विवाह पर विचार करना आरंभ किया। उनके सामने यही प्रश्न था कि ऐसे प्रतिभवान, शालीन और ज्ञानी पुत्र के लिए, वधू का चुनाव सोच समझकर करना चाहिए। इस प्रश्न पर विचार करने के लिए राजा नाभिराज ने देवराज इन्द्र से विचार-विमर्श किया।
१५
इन्द्र ने ऋषभ के विवाह के लिए अपनी स्वीकृति तत्काल दे दी। श्री नाभिराज को विश्वास हो गया कि वह जो कुछ करने जा रहे हैं, वह उचित है।
आयोध्या लौटकर नाभिराज ने सोचा कि एक बार ऋषभ कुमार से भी पूछ लेना उचित होगा। अनसूए एक दिन उचित अवसर देखकर नाभिराज ने ऋषभ से कहा- ‘हे पुत्र ! हमारी इच्छा है कि अब आप विवाह कर लें। कुल की मर्यादा में से है। आपको द्वारा हमारा वंश आगे चलेगा।’
पिता की बात सुनकर ऋषभ कुमार ने विचार किया। फिर पिता के सामने ‘ओऽम्’ का उच्चार इतने सशक्त ढंग से किया कि वह स्वयं स्वीकृति-सूचक बन गया।
उन दिनों महाकच्छ और कच्छ नामक राजाओं की दो बहनें थी। एक का नाम सुनंदा था और दूसरी का यशस्वती। दोनों गुणवती, रूपवती, सुशील और शालीन थी। किंतु इन दोनों में सुनंदा अधिक सुंदर और सुलक्षणा थी। नाभिराज के मन में आया कि यह निर्णय लेने से पूर्व भी देवराज इन्द्र से परामर्श कर लेना उचित होगा।
देवराज इन्द्र भी अयोध्या पहुंचकर नाभिराज से कहा ‘हे मण्डलेश्वर’ ‘आप जानते हैं कि ऋषभ कुमार अब युवा हो गए हैं। उनका विवाह करना उचित है तब नाभिराज ने कहा हमने सुनंदा और यशस्वती राजकुमारियों को उनके लिए चुना है। आप कृपया परामर्श दें कि क्या यह संबंध ठीक होगा?’
ऋषभ का विवाह
देवराज इन्द्र ने ऋषभ कुमार का ध्यान किया फिर बोले- ‘हे नृवर ! आपका प्रस्ताव उत्तम है। सुनंदा अत्यंत सौभाग्यवती और गुणवती है। यशस्वती भी यशस्वी और सुलक्षणा है। ये दोनों ही ऋषभ कुमार के लिए हर तरह से श्रेष्ठ हैं।’
देवराज इन्द्र से विवाह-प्रस्ताव का अनुमोदन पाकर नाभिराज अत्यंत प्रसन्न हुए। देवराज ने कहा- ‘हे नृपवर ! अब आप शीघ्र ही इस शुभकार्य की समरता करें। आयोध्या नगरी में जाकर विवाह की तैयारी करें। इसी में सबका कल्याण है।’
नाभिराज प्रसन्न हुए। जब यह शुभ समाचार मरुदेवी ने सुना तो उनका हर्षे से ठिकाना न रहा। राजमहल ही नहीं, पूरी आयोध्या नगरी में जैसे खुशियां बरसने लगी। ऋषभ देव तो आयोध्यावासियों के प्राण बन चुके थे। उनके विवाह के अवसर पर सर्वत्र वे छाए हुआ था। ऐसा लगता था कि प्रकृति भी इस अवसर के लिए सुसज्जित होकर शोभा फैला रही है।
१६
बड़ी धूमधाम से सुनंदा के साथ ऋषभ देव का विवाह हुआ। अयोध्या वासियों ने उन्हें हृदय से आशीर्वाद दिया। सब ओर मंगलगीतों और नृत्य-संगीत की ध्वनियाँ गूँज उठीं।
विवाह कार्य होने पर आकाश से पुष्प वर्षा हुई। ऋषभ देव सा पति पाकर यशवती और सुनंदा दोनों - धन्य हो गयीं। दोनों बहुएँ राजमहल में आयीं। मरुदेवी के दोनों ने चरण छुए। मरुदेवी ने दोनों बहुओं को बाहों में भर लिया सब ओर खुशियाँ बिखरी हुई थीं।
इस प्रकार वह गृहस्थ जीवन के प्रति अनुरक्त हुए।
ऋषभ कुमार के सामने भी इस संसार के समस्त ऐश्वर्य बिखरे हुए थे। इस जगत में आकर उन्हें संसार के समस्त कर्म तो करने ही थे। इसलिए दोनों रानियों के साथ वह सुखमय जीवन बिताने लगे। ऋषभ कुमार जैसा महिमामय पति पाकर दोनों रानियों का मस्त होना भी स्वाभाविक ही था। यशवती की हर क्षण यही अभिलाषा रहती थी कि मुझे ऋषभ कुमार के चरणों में ही स्थान मिलता रहे। वह कहती थी कि इस जगत में पति के चरणों की धूल समान कोई वस्तु नहीं है। इसीलिए उसके मन में एक ही अभिलाषा रहती थी कि मैं तन, मन, कर्म और वचन - हर प्रकार से पति की सेवा में ही अनुरक्त रहूँ।
दूसरी ओर सुनंदा भी ऋषभदेव को पाकर धन्य हो गयी थी। उसे सर्वत्र अपने प्रियतम की छवि ही दिखाई देती थी। अपने प्रियतम ऋषभदेव के ध्यान में वह इतना लीन हो चुकी थी कि किसी भी क्षण उनकी ओर से उसका मन न हटता था। उसे उठते-बैठते सोते-जागते हर पल यही लगता कि कुमार ऋषभदेव ही उसकी साँसों में बसे हैं। बस, इसी कारण वह यही चाहती थी कि प्रियतम के चरण कमलों में ही उसका ध्यान लगा रहे।
इस प्रकार दोनों बहुएँ, अपने पति को पूर्णतः समर्पित होकर, उनकी सेवा में अनुरक्त हो गयी थीं। किंतु वे मरुदेवी को भी उतना ही सम्मान देती थीं। जब भी अवसर मिलता दोनों आकर उनकी सेवा करतीं। मरुदेवी दोनों वधुओं को पाकर खुशी से फूली न समातीं। उन्हें धर्म, नीति, आचार - व्यवहार की बातें बतातीं। कुल-परंपरा और लोक लाज के विषय में बतातीं।
ऋषभदेव के गृहस्थ-जीवन प्रवेश से राजा नाभिराज़ भी अत्यंत प्रमुदित रहते थे। वे जब ऋषभदेव को देखते तो गर्व से भर जाते। उन्नत ललाट, बलाष्ट कंधे और भुजाएँ। उभरी हुई छाती - ऐसा सुगठित शरीर और अपूर्व शक्ति का पुंज पाकर फूले न समाते।
ऋषभदेव को पाकर, वह संसार के समस्त सुखों की इच्छा त्याग चुके थे। उनके लिए एक मात्र ऋषभदेव ही सुख को सागर थे।
धीरे-धीरे समय बीतने लगा। राजा नाभिराज और रानी मरुदेवी की अब यही अभिलाषा थी कि राजमहल किलकारियों से भर जाय। नन्हे-नन्हे हाथ पैरों वाले शिशु यहाँ खेलें। ऋषभदेव जैसी ही तेजस्वी संतान हो। यही इच्छा उन दोनों के मन में पल रही थी।
पुत्र जन्म
एक रात को यशवती रानी ने सपना देखा। स्वप्न में उन्होंने प्रज्ञा हुआ पृथ्वी, सुमेरु पर्वत, चन्द्रमा सहित सूर्य, हंस सहित सरोवर तथा चंचल लहरों वाला समुद्र देखा। स्वप्न देखने के साथ ही मंगलवाद्य के साथ मंगलाचरण के शब्दों को सुनकर उनकी आँख खुल गयी। प्रातः काल की मधुर बेला थी।
रानी यशवती उस सपने को लेकर कुछ समझ नहीं पा रही थी। आखिर उसका अर्थ क्या था? और इस अर्थ को कौन बताएगा? सवेरे के नित्य कर्म करके यशवती सोचने लगी कि क्यों न इसके विषय में स्वयं ऋषभदेव से ही पूछ ले। अस्तु उन्होंने दासी भेजकर ऋषभदेव से पूछा कि वे आपकी सेवा में उपस्थित होना चाहती हैं। उस समय रानी सुनंदा ऋषभदेव के पास थी। यशवती के आगमन की सूचना पाकर वह चली गयी। कुछ ही समय में स्वामी की सेवा में यशवती उपस्थित हो गयी। ऋषभदेव के चरण कमलों में प्रणाम करके यशवती ने कहा - ‘हे स्वामी! आप तो भिक्षु के समान ज्ञानी और गंभीर हैं। आपकी कृपा का एक जल बिंदु ही हमें मिल जाय तो हम कृतार्थ हो जाएँ। हमारा सब कुछ आपके चरणों में समर्पित है।’
ऋषभ ने कहा, ‘हे यशवती! मेरे लिए तुम और देव सुनंदा - दोनों ही प्राणों से भी प्रिय हो। मैं अपनी हर साँस में तुम दोनों को ही अनुभूति पाता हूँ। हर क्षण में तुम्हारे ही कल्याण की बात सोचता हूँ।’ हे स्वामी! मैं आपसे कुछ पूछने आयी हूँ।’ यशवती ने कहा।
‘तुम अपने मन की बात निस्संकोच निर्भय होकर कहो।’ ऋषभ ने कहा।
‘स्वामी, कल रात मैंने एक विचित्र सपना देखा है। वह सपना अत्यंत सुहावना और मनारम था। मैंने उसमें पृथ्वी को प्रज्ञा हुआ, सुमेरु पर्वत को देखा है। सूर्य एवं चन्द्रमा की पूर्ण आभा देखी है। जल से परिपूर्ण सरोवर देखा है। जिसमें हंसों के जोड़े तैरते हुए देखे हैं। फिर मैंने समुद्र की लहरों को देखा। हे स्वामी! इन स्वप्नों का अर्थ मैं नहीं समझ पायी। जब से ये स्वप्न देखा है, मेरा मन उद्विग्न है। आप तो त्रिकालदर्शी हैं। कृपया इन सपनों का फल बताकर मेरे मन को शांत करें।’
ऋषभ देव ने कहा - 'हे यशवती, तुमने जो सुमेरु पर्वत देखा है, वह तो अत्यंत महान है। इसका अर्थ यह है कि तुम्हें जो पुत्र - रत्न प्राप्त होने वाला है, वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। सूर्य का
अर्थ
अर्थ है कि वह पुत्र, सूर्य जैसा तेजस्वी होगा। चंद्र के समान गोरा और सुंदर होगा, जिससे यह समस्त धरती प्रकाशित होगी। जल से भरे सरोवर में जिन हंसों को तुमने देखा है, वे इस बात के प्रतीक हैं कि तुम्हारा पुत्र हंसों के गुण वाला होगा वह नीर-क्षीर विवेक वाला होगा। उसके विशाल वक्ष स्थल पर लक्ष्मी विराजमान होगी। वह धन-धान्य से पूर्ण होगा। पृथ्वी को प्रसा हुआ देखने का अर्थ है कि तुम्हारी पुत्र इस धरती का स्वामी होगा। समुद्र की आती हुई लहरों का अर्थ है कि वह तुम्हारा पुत्र अब शीघ्र ही आने वाला है।’
ऋषभ से सपनों का अर्थ सुनकर यशवती मन ही मन पुलकित हो उठी।
ऋषभ ने कहा - ‘हे यशवती ! तुम्हारा वह पुत्र अत्यंत यशस्वी होगा। वह इस जगत् के पालक के रूप में जाना जायेगा। वह इस धरती पर प्रथम जन्मनायक के रूप में विख्यात होगा। सर्वत्र उसका नाम होगा और भविष्य में भी उसे स्मरण किया जायेगा।’
यशवती ने जब से, एक यशस्वी पुत्र के आगमन की बात सुनी, वह मन ही मन प्रसन्न रहने लगी। हर पल किसी के आने की आहट की प्रतीक्षा रहती। कुछ समय पश्चात वह गर्भवती हुई। अब तो यशवती को देखभाल पहले से भी अधिक होने लगी। दास-दासियां उसे हर क्षण प्रसन्न रखने का प्रयत्न करने लगी। वह जब, जिस वस्तु की इच्छा करती, उन्हें उपलब्ध करा दी जाती। नाभिराय और मरुदेवी भी उनकी सुविधा का पूरा ध्यान रखते। उन्हें प्रसन्न और प्रमुदित रखने के विविध उपाय किए जाते। ऋषभ देव भी यशवती का पूरा ध्यान रखते। उन पर अपने असीम प्यार की वर्षा करते जिससे यशवती अत्यंत प्रसन्न और आनंद से परिपूर्ण रहे।
इस प्रकार समय पूरा हुआ। यशवती ने अपने यशस्वी पुत्र को जन्म दिया। इस शुभ समाचार से सर्वत्र हर्षोल्लास छा गया। सारे अयोध्यानगर में संगीत और नृत्य की ध्वनियां गूंज उठी। नाभिराय और मरुदेवी, याचकों को दान दे देकर भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। मंगल गीतों से राजमहल गूंज उठा। जन-समूह बधाई देने आ पहुंचा। आकाश जय-जयकार से गूंज उठा।
उधर राज दरबार में राजा नाभिराय, नगर के गण्यमान्य व्यक्तियों, मंत्रियों, और श्रेष्ठियों से बधाई स्वीकार करने लगे। विद्वानों की सभा में नवजात शिशु के बारे में विचार किया और नाभिराय से कहा - ‘हे राजन ! आपका यह पोता अत्यंत शुभ लक्षणों वाला है। यह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा इसके पुण्य कर्मों से जनता का भला होगा। इस धरती पर सर्वत्र सुख और वैभव के दर्शन होंगे। इसके राज्य में सब समान होंगे। यह इस जगत् का कल्याण करेगा। अस्तु हमने इसका नाम ‘भरत’ रखा है।’ ‘भरत’ का अर्थ है जो इस धरती को धन-धान्य से भर दे, जो सर्वत्र सुख-शांति की महिमा बिखेर दे।’
काव्य
विद्वानों की यह घोषणा सुनकर पूरी राज सभा ‘भरत’ का जय-जयकार कर उठी। शिशु भरत राजमहल की शोभा बन गए। शिशु भरत के चरणों में चक्र, छत्र, तलवार, दंड आदि के प्रतीक चिन्ह देखकर सभी हर्षित थे। वह सबके लिए आनंद का कारण थे। सभी शिशु भरत के दर्शनों के लिए लालायित रहते वह चंद्रमा की कलाओं की तरह धीरे-धीरे बड़े होने लगे।
कुछ ही समय पश्चात् रानी यशवती फिर से गर्भवती हुई, इस बार उन्होंने एक कन्या रत्न को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया - ‘ब्राह्मी’। कहते हैं, कालांतर में रानी यशवती ने वृषभसेनादि निन्यानवे पुत्रों को जन्म दिया था।
ऋषभ देव की दूसरी रानी सुनंदा के प्रति भी उनका सम्मान प्रेम था। अपने प्रिय का स्नेह पाकर वह भी गर्भवती हुई और उन्होंने ‘बाहुबली’ जैसे बलशाली पुत्र को जन्म दिया - जिसका नाम रखा गया - ‘सुंदरी’।
बाहुबली शैशवावस्था में ही इतने सुडील और शक्तिशाली थे कि इन्द्र भी सनके सामने हल्के पड़ते थे।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3056.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है