उपदेश का स्वरूप - जैन स्वाध्याय सामग्री | Updesh ka Swaroop - Jain Swadhyay Samagri

उपदेश का स्वरूप

सूत्रधार — हम तीर्थज्ञान ज्ञानदेवता के सिद्धार्थी यह रूप आचार्यवर्य पंडित टोडरमल जी द्वारा रचित मोक्ष मार्ग प्रकाशक के आठवें अधिकार उपदेश का स्वरूप के आधार पर चार अनुयोगों के स्वरूप पर प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें चार खंडों में माध्यम से क्रमशः अनुयोगों का प्रयोजन, व्याख्यान विधान, व्यवहार्यत्व पद्धति, दोष कल्पना का निराकरण प्रस्तुत किया है।

अनुक्रमणिका

आप सभी स्वाध्यायी जीवों से निश्चित ही मोक्षमार्ग प्रकाशक का अध्ययन किया होगा, इस रूपक के माध्यम से निश्चित ही आपका अभ्यास और दृण होगा।

(मंगलाचरण पूर्वक तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से गणधर द्वारा 4 वेदों की उत्पत्ति होती है, चारों वेद अपनी उत्पत्ति का प्रयोजन क्रमशः प्रस्तुत करते हैं)

दृश्य 1

(प्रथम दृश्य में द्वंद द्वारा अनुयोगों के प्रयोजन की जिज्ञासा पर अनुयोग अपना प्रयोजन प्रस्तुत करते हैं)

द्वंद — हे देवाधिदेव चार वेदों की उत्पत्ति का क्या प्रयोजन है ?

प्रथमानुयोग — मैं संसार की विचित्रता, पुण्य-पापका फल, महापुरुषों की प्रवृत्ति इत्यादि निरूपण से जीवों को धर्ममें लगाऊंगा।
जो जीव तुच्छबुद्धि ही से भी मेरे द्वारा धर्म सम्मुख होंगे क्योंकि वे जीव सूक्ष्म निरूपण को नहीं पहचानते, लौकिक कथाओं को जानते हैं, वहां उनका उपयोग लगता है। तथा मुझमें लौकिक प्रवृत्तित रूप ही निरूपण होने से उसे वे भली-भांति समझ जाते हैं।
तथा लोक में तो राजनैतिक कथाओं में पापका पोषण होता है। मैं महापुरुषोंव राजादिक की कथाएँ तो करूंगा परन्तु प्रयोजन धर्म-रहो पाप को छुड़ा कर धर्म में लगाने का का ही रहेगा। इसलिये वे जीव कथाओंके लालचसे तो मुझे पढ़ने लगेंगे। फिर पाप को बुरा, धर्म को भला जानकर धर्म में रुचित हो जायेंगे।

नैपथ्य — यह अनुयोग अदृष्टचरण शिष्यादिक के अर्थ उत्पन्न हुआ अतः इसका नाम प्रथमानुयोग होगा।

करणानुयोग — मैं जीवों के व कर्मों के विशेष तथा त्रिलोकदिक की रचना निरूपित करके जीवों को धर्म में लगाऊंगा। जो जीव धर्ममें उपयोग लगाना चाहते हैं वे जीवों के गुणस्थान-मार्गणा आदि विविध तथा कर्मों के कारण अवस्था फल किस-किसके कैसे-कैसे पाये जाते हैं इत्यादि विविध तथा त्रिलोक में नरक स्वर्गादिक ठिकाने पहिचान कर पाप से विमुख होकर धर्म में लगते हैं तथा ऐसे विचार में उपयोग रम जाये तब पाप-प्रवृत्ति छूटकर स्वयमेव तत्काल धर्म उत्पन्न होवेगा, उस अभ्यास से तत्वज्ञान की भी प्राप्ति शीघ्र होती है।
तथा मेरे अभ्यास से ऐसे सूक्ष्म यथार्थ कथन ज्ञान में ही है, अन्यत्र नहीं, इस प्रकार महिमा जानकर जिनमत के श्रद्धासी होगा।

नैपथ्य — इसमें गणित कार्य के कारण इष सूत्र की व्याख्या होगी अतः यह करणानुयोग कहलायेगा।

चरणानुयोग — मैं नाना प्रकार धर्म के साधन निरूपित करके जीवों को धर्म में लगाऊंगा। जो जीव हित अहित को नहीं जानते, हितरूपि पाप कार्यों में तत्पर हो रहते हैं उन्हें जिन प्रकार पापकार्यों को छोड़कर धर्मकार्यों में लगे, उस प्रकार उपदेश दूंगा, उस उपदेश जो जीव श्रवण करेंगे तो धर्ममुख हुए, वे जीव गृहस्थधर्म व मुनिधर्म का विधान सुनकर अपने चेष्टा वश धर्म साधना लगेंगे।

ऐसे साधन से स्वभाव मन्द होती है और उसके फल में इतना तो होता है कि कुगति में दुःख नहीं पाते, किन्तु सुगति में सुख प्राप्त करते हैं। तथा ऐसे साधन से जिनमत का निमित्त बना रहता है, वहां तत्वज्ञान की प्राप्ति होना ही तो हो जाता है।

नैपथ्य — यह जीव को सम्यक आचरण की प्रेरणा देगा अतः यह चरणानुयोग कहलायेगा।

द्रव्यानुयोग — मैं द्रव्यों का व तत्वों का निरूपण करके जीवों को धर्म में लगाऊंगा। जो जीव जीवादिछह द्रव्यों को व तत्वों को नहीं पहिचानते। आपको परकी भिन्न नहीं जानते, उन्हें हेतु-दृष्टान्त युक्ति द्वारा व प्रमाण-नयादि द्वारा उनका स्वरूप इस प्रकार दिखाऊंगा जिससे उनको प्रतीति हो जाये। उनके अभ्यास से अनादि अनन्तता दूर हो जाए। अनन्तत कषायिक भावादिक छूट भवित हो जाए तथा जिनमत की प्रतीति हो जाए और उनके भाव का पहिचानना का अभ्यास रहे, तो शीघ्र ही तत्वज्ञान हो जाये।

नैपथ्य — द्रव्यादि की मुख्यता से कथन करने के कारण यह द्रव्यानुयोग कहलायेगा।

देव — श्री जिनेंद्र की वाणी द्वारा उत्पन्न यह चारों अनुयोग अज्ञानियों के हितार्थ अत्यंत उत्तम है, परंतु क्या तत्वज्ञानी जीवों को भी इनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सकता है?

प्रथमानुयोग — हां बिलकुल जिन जीवों के तत्वज्ञान हुआ हो, पश्चात मुझे जो पढ़े-सुने तो उन्हें मैं उसके उदाहरणरूप भासित होऊंगा और धर्मत्मा धर्मात्माओं की प्रशंसा और पापियों की निन्दा जिसमें हो ऐसी किन्हीं पुराण-पुष्पों की कथा सुनने से धर्म में अति उत्साहवान होंगे।

करणानुयोग — जो जीव तत्वज्ञानी होकर मेरा अभ्यास करेंगे, उनमें मैं उसके विशेषणरूप भासित होऊंगा। जो जीवादि तत्वोंको आप जानता है, उन्हीं के विशेष में कहूंगा,
इस अभ्यास से तत्वज्ञान निर्मल होगा, तत्वोंके बहुत विशेष जाने तो निर्मल तत्वज्ञान होता है। तत्वज्ञान निर्मल होने पर आप ही विशेष धर्मात्मा होगा।
हां इस काल और उपद्रव का उपयोग निष्कार एकाग्र नहीं रहता, इसलिये ज्ञानी मेरे अभ्यासमें उपयोग को लगायेंगे।

चरणानुयोग — जो जीव तत्वज्ञानी होकर मेरा अभ्यास करेंगे उन्हें सर्व आचरण अपने वीतरागभाव के अनुसार भासित होगा। एकदेश व सर्वेश वीतरागता होनेपर ऐसी श्रावकदशा-मुनिदशा होगी।

द्रव्यानुयोग — जिनके तत्वज्ञान हुआ हो वे जीव मेरा अभ्यास करें तो उन्हें अपने श्रद्धान के अनुसार वह सर्व कथन प्रतिभाषित होते हैं।
जो मेरा अभ्यास करता रहे तो उसे तत्वज्ञान रहता है, न करे तो भूल जाता है। अथवा संक्षेपस्वरूप से तत्वज्ञान हुआ था, वह नाना युक्ति-हेतु-दृष्टान्तादि द्वारा स्पष्ट हो जावे तो उसमें शिथिलता नहीं हो सकती। तथा इस अभ्याससे गाढ़ि पतन से शीघ्र मोक्ष पायेगा।

सभी देव — साधिसधपी यह जो अनुयोग जगत के मंगल हेतु अत्यंत मंगलकारी है।
(जा वाणी के ज्ञान ते …)
प्रथम दृश्य समाप्त

द्वितीय दृश्य

अनुयोगों का व्याख्यान विधान

प्रथमानुयोग का व्याख्यान विधान

यवन 1 — भाई मुझे तो लग रहा था कि मैं राग रंग का प्रेमी व्यक्ति प्रथमानुयोग में जो राग की बातें हैं उन्हें पढ़ कर आनंदित होऊंगा, लेकिन इनके अभ्यास से मेरी रुचि अब धर्म की ओर लगने लगी है।
मैंने प्रथमानुयोग में पढ़ी बड़े बड़े तीर्थंकर के कल्याण मनाने आते हैं उनकी भक्ति स्तुति आदि करते हैं, देवों निदान नहीं होते हैं तीर्थंकर भगवान।

यवन 2 — भाई मैंने प्रथमानुयोग से ज्ञान की उपवास का तत्काल बहुत फल प्राप्त होता है, नमस्कार मंत्र के स्मरण से शांतिमय पुण्य बंध होता है, पाप कार्य से नीचगति प्राप्त होती है, इसीलिए मैं कभी पाप नहीं करूंगा।

यवन 3 — अरे भाई! देखो कुमार ने कितना महान कार्य किया मासोप को मणि पर कितना करुणा थी, महान बड़करो राजा में देखा मुनिका में जिनविधि को नमस्कार किया पर सिहोदर कभी।

यवन 4 — कभी भी कोई आपत्ति हो तो जिनेंद्र देव को स्मरण करना चाहिए उससे सभी फल प्राप्त हो जाते हैं।

देव 1 — हे देव इन लोगों ने जो अध्ययन किया है क्या वह सिद्धांत विरोषी नहीं लगता।?

देव — नहीं देव! प्रथमानुयोग के व्याख्यान का विधान ऐसा ही है, अज्ञानी जीवों को धर्म में लगाने के अर्थ मूल प्रयोजन यदाकदा कहकर कुछ यथार्थत अपने अनुसार वर्णन करते हैं, जहां जिसकी मुख्यता हो वहां उसी को पोषण करते हैं, अज्ञानी जीव बहुत फल दिखाए बिना धर्म में नहीं लगते अतः अन्य पांच कार्यों से बच कर धर्म मार्ग में जीव लगे यही प्रयोजन होता है।

करणानुयोग

यवन 1 — जैसा के करणानुयोग द्वारा जैसा करणानुयोग में व्याख्यान है, जिस प्रकार वचनगोचर होकर स्पष्टरूप से ज्ञान में आए उस प्रकार संक्षिप्त कर के उपदेश देते हैं।
करणानुयोग में उद्भवों की प्रवृत्ति के अनुसार वर्णन नहीं किया है, केवल-ज्ञानगम्य पदार्थोंका निरूपण है। तथा किसी जीवके कषायकी अंतरंग कषायशक्ति बहुत है, तो उसे लोककषायी कहते हैं। तथा कही उपदेशक मुख्यता से उपदेश व्याख्यान होता है, उसे सर्वथा उसी प्रकार नहीं मानते।

चरणानुयोग

यवन 2 — चरणानुयोग में जिनप्रकार जीव के अपनी बुद्धिगोचर धर्मात्मा आचरण हो ऐसा उपदेश दिया है। नहीं धर्म तो निज स्वरूप मोक्षमार्ग ही है, उसके साधनरूप व्यवहार से धर्म है, मुनिमें व्यवहाररूप में प्रधानता से नाम प्रगट उपचार धर्म के भेदिकों का इसमें निरूपण किया जाता है। कषाय निवृत्तिरूप में व कुछ ग्रहण-त्यागका विकल्प नहीं है, और इसके विपरीत अवस्था में विकल्प इतना नहीं है। इसलिये इस जीव को धर्मविरोधी कार्यों को छुड़ाने का और धर्मसाधनारूपी कार्यों को ग्रहण करने का उपदेश इसमें है।
वह उपदेश दो प्रकार से दिया जाता है निश्चयसहित व्यवहार का उपदेश देते हैं। एक तो व्यवहारही का उपदेश देते हैं।

यवन 4 — द्रव्यानुयोग में जीवों के जीवादि द्रव्यों का यथार्थ श्रद्धान जिस प्रकार हो उस प्रकार विशेष, युक्ति, हेतु, दृष्टान्तपूर्वक का द्रव्यानुयोग में वर्णन करते हैं, क्योंकि इससे यथार्थ श्रद्धान कराने का प्रयोजन है। स्व-पर भेदविज्ञानादिक जिस प्रकार हो उस प्रकार जीव-अजीव का निर्णय करते हैं।
द्रव्यानुयोग में निश्चय अध्यात्म-उपदेश की प्रधानता हो, वहां व्यवहारधर्म का भी निषेध करते हैं।

व्याख्यान पद्धति

यवन — अरे भाई अब कोई इन सब की पद्धति को भी तो समझा दो।
देव — प्रथमानुयोग में अलंकार शास्त्र और काव्य शास्त्रों की पद्धति मुख्य है।
देव 2 — करणानुयोग में गणित शास्त्रों की पद्धति मुख्य है।
देव 3 — चरणानुयोग में सुभाषित नीति शास्त्रों की पद्धति मुख्य है।
देव 4 — द्रव्यानुयोग में न्याय शास्त्रों की पद्धति मुख्य है।
यवन 1 — भाई व्याकरण, न्याय, छन्द, कोषादिक शास्त्र व वैद्यक, ज्योतिष, मन्त्रादि शास्त्र भी जिनमत में पाये जाते हैं। उनका क्या प्रयोजन है?
यवन 2 — अरे भाई शास्त्रों को पढ़ने वाले लोग देश देश देशांतर में बहुत हैं, उनकी भाषा भी अलग है, लेखक यदि अपनी जन भाषा में ग्रंथ लिखे तो अन्य भाषा वाले को उसका भाव कैसे ख्याल में आए,
व्याकरण आदि से सूक्ष्म अर्थ ख्याल में आता है, इसलिए व्याकरण न्याय से युक्त ग्रंथों की रचना कि।
यवन 6 — मुझे तो वैद्यक शास्त्रों में रुचि थी, यदि यह जैन धर्म में न होते तो इनके निमित्त में जैन धर्म में न लग पाता।
यवन 3 — तभी तो मुनिराजों ने इन ग्रंथो का भी निर्माण किया है। हां लेकिन यदि कोई इन्ही में अटक जाए तो ठीक नहीं।

अनुयोगों में दोष कल्पना का निराकरण

( सामान्य जन में अनुयोगों के संबंध में कुछ भ्रांतियां उत्पन्न होने लगी, जिनका उन्हे उत्तर भी बडी सुगमता से मिला )
यवन 1 — मुझे नहीं पढ़ने प्रथमानुयोग के ग्रंथ इनमे श्रंगार संग्राम की बहुत बाते होती है।
यवन 2 — सही कहा भैया ग्रंथो में रागादिक के निमित्त
कथन होने ही नहीं चाहिए।
यवन 3 — भई में तो बहुत विरागी जीव हूं मुझे तो इन ग्रंथो का अध्यन करना बिलकुल योग्य नहीं है
यवन 4 — हा बाबा! यदि इन्हें पढ़ने से हमे राग उत्पन्न हो गया तो, और दूसरो की कहानियो को पड़के हम क्या करे।
इंद्र — अरे भव्यो! प्रथमानुयोग में कोई दोष नहीं है।
रागादिक श्रंगारादिक का वर्णन बहुत करके अंत में उनकी असारता को ही बताया है,
और जैसे बालक को बतासा में औषधि देते हैं, उसी प्रकार रागी को श्रोता आदि के माध्यम से धर्म में रुचि लगाई है।
और यदि तुम विरागी हो तो तुम्हे तो पता ही होगा की यहां इसी प्रकार कथन होते हैं,
अरे भाई ग्रंथो में तो जहां जहां धर्म का ही पोषण है, यदि तुम यही रागी हो गए तो अन्यत्र कहां विरागी हो पाओगे, और धर्मात्माओं की कथा सुनने से तो धर्म में ही रुचि लगती है।
सभी — वाह! वाह! धन्य है प्रथमानुयोग ।

करणानुयोग दोष कल्पना

यवन — करणानुयोग में गणित विकल्प आदि को जानने से क्या लाभ इससे अच्छा तो व्रत भक्ति कर ले या आत्मनुभव कर ले इससे अपना भला होगा ।
यवन 2 — अरे भाई करणानुयोग में कठिनाई बहुत है, कौन इतना दिमाग लगाए।
देव — सुनो ! व्रतादिक की अपेक्षा करणानुयोग के अभ्यास से अधिक कषाय मंद होती है और वर्तमान राग तो घटता ही है आगामी राग आदि घटाने का कारण भी है, और व्रतादि तो बाह्य निमित्त के साधन है, लेकिन करणानुयोग अभ्यास अंतरंग निमित्त का साधन है ।
और यदि वस्तु शीघ्र जानने में आ जाए तो उसमे उपयोग नहीं लगता और उसकी महिमा भी नहीं आती, और उत्साह भी नहीं रहता । और तूं कह रहा है खेद होता है तो प्रमादि रहने में धर्म नहीं होता धर्म के लिए उद्यम करना पड़ता है।

चरणानुयोग दोष कल्पना

यवन — चरणानुयोग में बाहर व्रतादि साधन का उपदेश है उससे कुछ सिद्धि नहीं होती, अपने परिणाम निर्मल होने चाहिए, इसलिए चरणानुयोग को नहीं पढ़ना चाहिए।
उत्तर — यदि बाह्यसंयम से कुछ सिद्धि न हो तो सर्वार्थसिद्धिवासी देव सम्यग्दृष्टि बहुत ज्ञानी हैं उनके तो चौथा गुणस्थान होता है और गुणव्रत श्रावक मनुष्यों के पंचम गुणस्थान होता है, तो क्यों कारण है ? तथा तीर्थंकरादिक गृहस्थपणे छःप्रकार शीलव्रतसे संयम युक्त भये ? इसलिए यह नियम है कि बाह्य संयम साधन बिना परिणाम निर्मल नहीं हो सकते, इसलिये बाह्य साधन का विधान जानने के लिये चरणानुयोग का अभ्यास अवश्य करना चाहिये।

द्रव्यानुयोग में दोष कल्पना का निराकरण

यवन 1 — द्रव्यानुयोग में व्रत-संयमादि व्यवहार धर्म का निषेध है, हीनपना बताया है, विषय भोगने से निर्जरा कही है, पढ़ने से स्वच्छंद्वी हो जायेंगे, पुण्य छोड़कर पाप में प्रवर्तन करेंगे। इसलिये इसे नहीं पढ़ना चाहिये।
उत्तर — गधा मिश्री खाकर मर जाता है, तो मनुष्य तो मिश्री खाना नहीं छोड़ेगे। इसी तरह विपरीत बुद्धि अध्यात्म ग्रन्थ पढ़कर स्वच्छंद्वी हो जाता है तो विवेकी तो अध्यात्म ग्रन्थ पढ़ना नहीं छोड़ते हैं। उसे स्वच्छन्दता के दोष - नरक, तिर्यंच गति में जाने और वहां के दुख दिखाते हैं। यदि कोई स्वच्छन्द होता है तो वह ग्रन्थ का दोष नहीं है, उसी जीव का दोष है।
भाई यह काल साक्षात् मोक्ष न होने की अपेक्षा निकृष्ट है, आत्मानुभवनादिक द्वारा सम्यक्त्ववादिक होना इस काल में मना नहीं है, इसलिये आत्मानुभवनादिक के अर्थ द्रव्यानुयोग का अवश्य अभ्यास करना।
यवन — अहो हमने अपनी अज्ञानता वश जिनवाणी पर मिथ्या दोष लगाया, अरे यह जिनवाणी तो महान पुण्य के उदय से हमे मिले है, इस पंचम काल में जिनदेव के विरह में भी आचार्यों ने नाना युक्तियों द्वारा जैसे बने तैसे हम अज्ञानियों को धर्म में लगाने के लिए इन ग्रंथो की रचना की ।
(इस दुखम पंचम काल में …)
यवन 2 — धन्य है वे महान पंडित टोडरमल जी जिन्होने अत्यंत सरल भाषा में हमे अनुयोगों का स्वरुप समझाया,
समयसार के साथ इन्ही के ग्रंथ को पढ़ कर ही तो अध्यात्म सत्पुरुष श्री कांजी स्वामी ने मिथ्या मत को त्यागकर और अध्यात्म की गंगा को जन जन तक पहुंचाया जिसके प्रभाव से दादा डॉक्टर हुकमचंद भारिल्ल, बाबू जुगलकिशोर जी युगल, पंडित बाबूभाई मेहता, पण्डित हेमचंद जी हेम जैसे अनेक विद्वान हुई और वर्तमान में इन्ही के निमित्त लाखो लोग तत्व ज्ञान से जुड़े रहे है।
पूज्य गुरुदेव श्री के प्रताप से ही जयपुर में अध्यात्मरत्न पंडित टोडरमल जी के नाम से महापदमालय पारस हुमा और देश में अनुयोगों सहित अध्यात्मसार श्रीमद्भगवद् वीतराग जी, पंडित शांति कुमार जी जैसे अनेक विद्वान तैयार हुए, और इन्ही विद्वानों ने आगे और अनेक विद्यालयो महाविद्यालयों का निर्माण कराया जिसके कारण हम जैसे लाखो बच्चे जो कभी नमोंकार मंत्र तक नहीं जानते थे वह आने वाले कल हजारो को जैन धर्म का मर्म समझाएंगे।
हम सब भी इन सभी विद्वानों को आदर्श बना कर स्वयं जिनधर्म को आत्मसात कर जैन धर्म के प्रचार प्रसार में समर्पित हो यही कामना


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3455.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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