तू जाग रे चेतन प्राणी | Tu Jaag Re Chetan Prani

हे वीर प्रभुजी हम पर, अनुपम उपकार तुम्हारा।
तुमने दिखलाया हमको, शुद्धातम तत्त्व हमारा।।
हम भूले निज वैभव को, जड़-वैभव अपना माना।
अब मोह हुआ क्षय मेरा, सुनकर उपदेश तुम्हारा।।

तू जाग रे चेतन प्राणी, कर आतम की अगवानी।
जो आतम को लखते हैं, उनकी है अमर कहानी ।।

है ज्ञान मात्र निज ज्ञायक, जिसमें हैं ज्ञेय झलकते,
यह झलकन भी ज्ञायक है, इसमें नहिं ज्ञेय महकते।
मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी, मेरी चैतन्य निशानी, जो आतम... ॥(1)

अब समकित सावन आया, चिन्मय आनन्द बरसता,
भीगा है कण-कण मेरा, हो गई अखण्ड सरसता।
समकित की मधु चितवन में, झलकी है मुक्ति निशानी॥(2)

ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शान्ति बरसती इनमें,
मानो आया सिद्धालय, मेरी बस्ती हो इसमें ॥
मैं हूँ शिवपुर का वासी, भव-भव की खतम कहानी॥(3)

Artist - अज्ञात

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