सम्यग्दर्शन: सभी ग्रंथों से संकलन (पृष्ठ संदर्भ सहित)

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ग्रंथ: समयसार · पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका · नीतिवाक्यामृत · पञ्चस्तोत्र संग्रह · कर्मप्रकृति · मूलाचार प्रदीप · श्रेणिक चरित्र · जिनदत्त चरित्रम् · पाण्डव पुराण

भाग २ (आगे की पोस्ट): मोक्षमार्ग प्रकाशक, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, योगसार, परमात्मप्रकाश, न्यायदीपिका और न्याय मन्दिर के उद्धरण

भाग ३: सम्यग्दर्शन की परिभाषा एवं स्वरूप: छहढाला, अष्टपाहुड, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, ज्ञानार्णव और पञ्चाध्यायी से


१. सम्यग्दर्शन का स्वरूप एवं लक्षण

  • समयसार, गाथा १३ (पढ़ें)

    भूतार्थ से जाने हुए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष - ये नवतत्त्व ही सम्यग्दर्शन हैं।

  • समयसार, गाथा १५५ (पढ़ें)

    जीवादि पदार्थों का श्रद्धान सम्यक्त्व है, उन्हीं जीवादि पदार्थों का अधिगम (जानना) ज्ञान है और रागादि का त्याग चारित्र है - यही मोक्ष का मार्ग है।

  • समयसार, गाथा ३५६ से ३६५ (पढ़ें)

    जिसप्रकार कलई अपने स्वभाव से दीवाल आदि परद्रव्यों को सफेद करती है; उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि अपने स्वभाव से परद्रव्यों का श्रद्धान करता है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १४, PDF पृष्ठ २५ (पढ़ें)

    सबसे पहले १. जीवादि पदार्थों में शंकादि दोष रहित श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन का जिसमें धारण होवे उसको दर्शन प्रतिमा कहते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७२, PDF पृष्ठ ४७ (पढ़ें)

    गणधरादिदेव जीवादि पदार्थ तथा आप्त और गुरुओं पर श्रद्धान रखने को सम्यग्दर्शन कहते हैं तथा जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है तथा जो संशयरहित तथा पूर्ण है ऐसे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं तथा प्रमाद सहित कर्मों के आगमन के रुक जाने को सम्यक्चारित्र कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ही मुक्ति का मार्ग …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ८१, PDF पृष्ठ ४९ (पढ़ें)

    आत्मारूपी निर्मल तेज में निश्चय (विश्वास) करना तो निश्चयसम्यग्दर्शन है तथा उसी तेज में जानपना निश्चयज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानस्वरूप में स्थित रहना सम्यक्चारित्र है और इन तीनों की एकता कर्मबंध के नाश करने वाली है तथा इस निश्चयरत्नत्रय से जो बाह्य है

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ४. एकत्वसप्तति श्लोक १४, PDF पृष्ठ १३९ (पढ़ें)

    आत्मा का निश्चय तो सम्यग्दर्शन है तथा आत्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मा में निश्चल रीति से रहना सम्यक्चारित्र है तथा इन तीनों की जो एकता वही मोक्ष का कारण है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ११. निश्चयपञ्चाशत श्लोक १४, PDF पृष्ठ २३६ (पढ़ें)

    जिस प्रकार अग्नि में उष्णता है उसी प्रकार से आत्मा में ज्ञान हैं इस प्रकार की दृढ़ प्रतीति है इसका नाम सम्यग्दर्शन है और आत्मा का जो भलीभाँति ज्ञान है उसको निश्चयज्ञान कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सहित आत्मा, उस आत्मा में समीचीन स्वस्थता उसको चारित्र कहते हैं।

  • नीतिवाक्यामृत, १. धर्मसमुद्देश:, PDF पृष्ठ २२ (पढ़ें)

    आप्त-सत्यार्थ ईश्वर आगम और मोक्षोपयोगी जीवादि सात तत्त्वों का लोकमूढ़ता आदि २५ दोषों से रहित और निःशङ्कित आदि आठ अंगों सहित जैसा का तैसा-यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है जो कि प्रशम (क्रोधादि कषायों की मंदता) और संवेग (संसार से भय करना) आदि विशुद्ध परिणामरूप चिह्नों से जाना जाता हैं ॥१॥

  • नीतिवाक्यामृत, PDF पृष्ठ २३ (पढ़ें)

    उक्त आप्त, आगम और पदार्थों का यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। अब सम्यग्ज्ञान का निरूपण करते हैं-जो वस्तु के समस्त स्वरूप को जैसा का तैसा, हीनाधिकता-रहित तथा संशय, विपर्यय और अनध्यवसायरूप मिथ्याज्ञान से रहित निश्चय करता है एवं जो मनुष्यों का तीसरा दिव्य नेत्र है उसे सम्यग्ज्ञान कहते हैं ॥१॥

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ५४ (पढ़ें)

    इस प्रकार दर्शन, ज्ञान और सम्यक्त्व ये तीन जीव के गुण सिद्ध होते हैं अर्थात् देखना दर्शनगुण है, जानना ज्ञानगुण है और श्रद्धान करना सम्यक्त्वगुण है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ २७६ (पढ़ें)

    इस संसार में तत्त्वों का श्रद्धान करने से ही निर्मल सम्यग्दर्शन होता है इसलिए अब हम उन तत्त्वों का ही स्वरूप निरूपण करते हैं। भगवान् जिनेन्द्रदेव ने जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व बतलाए हैं।

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक १६७ से १७०, PDF पृष्ठ २२९ (पढ़ें)

    जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित, पूर्वापर विरोध-रहित शास्त्रों द्वारा निरूपित निर्दोष सात तत्त्वों का श्रद्धान् सम्यग्दर्शन कहा गया है।

  • पाण्डव पुराण, एकोनविंशं पर्व श्लोक २६३ से २६८, PDF पृष्ठ ४११ (पढ़ें)

    तत्त्वार्थ-श्रद्धान को दर्शन-आराधना कहते हैं और इस में सम्यक्त्व की आराधना की जाती है।

  • पाण्डव पुराण, त्रयोविंशं पर्व श्लोक ६१ से ७०, PDF पृष्ठ ४७१ (पढ़ें)

    शंका आदि आठ दोष रहित तथा आठ अंग सहित जो पदार्थों का श्रद्धान करना है उसे सम्यग्दर्शन कहते हैं।


२. सम्यग्दर्शन के आठ अंग

  • समयसार, गाथा २२८ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि जीव निःशंक होते हैं, इसीकारण निर्भय भी होते हैं। चूँकि वे सप्तभयों से रहित होते हैं; इसलिए निःशंक होते हैं।

  • समयसार, गाथा २२९ (पढ़ें)

    जो आत्मा कर्मबंध संबंधी मोह करनेवाले मिथ्यात्वादि भावरूप चारों पादों को छेदता है; उसको निःशंक अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३० (पढ़ें)

    जो चेतयिता आत्मा कर्मों के फलों के प्रति और सर्व धर्मों के प्रति कांक्षा नहीं करता; उसको निःकांक्षित अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३१ (पढ़ें)

    जो चेतयिता आत्मा सभी धर्मों के प्रति जुगुप्सा (ग्लानि) नहीं करता; उसको निर्विचिकित्सा अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३२ (पढ़ें)

    जो चेतयिता आत्मा समस्त भावों में अमूढ़ है, यथार्थ दृष्टिवाला है; उसको निश्चय से अमूढ़दृष्टि अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३३ (पढ़ें)

    जो चेतयिता सिद्धों की भक्ति से युक्त हैं और परवस्तुओं के सभी धर्मों को गोपनेवाला है; उसको उपगूहन अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३४ (पढ़ें)

    जो चेतयिता उन्मार्ग में जाते हुए अपने आत्मा को सन्मार्ग में स्थापित करता है, वह स्थितिकरण अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३५ (पढ़ें)

    जो चेतयिता मोक्षमार्ग में स्थित निश्चय से सम्यग्दर्शन, ज्ञान व चारित्र - इन साधनों के प्रति अथवा व्यवहार से आचार्य, उपाध्याय और साधु - इन साधुओं के प्रति वात्सल्य करता है; वह वात्सल्य अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा २३६ (पढ़ें)

    जो चेतयिता विद्यारूपी रथ पर आरूढ़ हुआ, मनरूपी रथ के पथ में भ्रमण करता है; वह जिनेन्द्र भगवान् के ज्ञान की प्रभावना करनेवाला अर्थात् प्रभावना अंग का धारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७३, PDF पृष्ठ ४७ (पढ़ें)

    आचार्य कहते हैं कि अंतःकरणरूपी पृथ्वी में बोया हुआ तथा निःशंकित आदि आठ गुणरूपी उत्तम जल की भरी हुई नलियों से सींचा हुआ सम्यग्दर्शनरूपीबीज, सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओं का धारी तथा चारित्ररूपी पुष्प से सहित वृक्षरूप में परिणत होकर शीघ्र ही भव्य जीवों को मोक्षरूपी फल से संतुष्ट करता है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १५३० से १५३२, PDF पृष्ठ २९४ (पढ़ें)

    इन तत्त्व और पदार्थों में परम श्रद्धा धारण कर इस सम्यग्दर्शन को शुद्ध करने के लिए आगे कहे हुए सम्यग्दर्शन के आठों अंगों का पालन करना चाहिए।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ २९५ (पढ़ें)

    ऊपर कहे हुए समस्त तत्त्वों में, पदार्थों में, तीर्थंकर परमदेव में, उनके कहे हुए आगम में, निर्ग्रन्थ गुरु में भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहे हुए दयामय धर्म में और रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग में विद्वान् पुरुषों को सब तरह की शंकाओं का त्याग कर देना चाहिए। इसको सम्यग्दर्शन का पहला निःशंकित अंग कहते हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १५५५ से १५५७, PDF पृष्ठ २९८ (पढ़ें)

    यदि कोई श्रावक वा मुनि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र वा घोर तपश्चरण से अथवा परीषह वा उपसर्ग से चलायमान होते हों तो हित करने वाले धर्मरूप वचनों से उनको उनकी उसी क्रिया में स्थिर कर देना स्थितिकरण अंग कहलाता है।

  • श्रेणिक चरित्र, चतुर्दशः सर्गः, PDF पृष्ठ २४८ (पढ़ें)

    अष्ट अंग सहित सम्यग्दर्शन के धारक बड़े-बड़े देवों द्वारा पूजित वारिषेण मुनि तेरह प्रकार चारित्र का पालन करने लगे।


३. सम्यग्दर्शन के बाधक: मिथ्यात्व एवं दोष

  • समयसार, गाथा १५७ (पढ़ें)

    जिसप्रकार कपड़े की सफेदी मैल के मिलने से नष्ट हो जाती है, तिरोभूत हो जाती है; उसीप्रकार मिथ्यात्वरूपी मैल से लिप्त होने पर सम्यक्त्व तिरोहित हो जाता है - ऐसा जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा १६१ (पढ़ें)

    सम्यक्त्व का प्रतिबंधक मिथ्यात्व है - ऐसा जिनवरों ने कहा है। उसके उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है - ऐसा जानना चाहिए।

  • समयसार, गाथा १९० से १९२ (पढ़ें)

    पूर्वकथित मोह-राग-द्वेष रूप आस्रवभावों के हेतु मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरतभाव और योग - ये चार अध्यवसान हैं - ऐसा सर्वदर्शी भगवानों ने कहा है। हेतुओं का अभाव होने से ज्ञानियों के नियम से आस्रवभावों का निरोध होता है और आस्रवभावों के अभाव से कर्मों का भी निरोध होता है। कर्म के निरोध से नोकर्मों का निरोध होता है और नोकर्मों …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक ३९, PDF पृष्ठ ११२ (पढ़ें)

    जो लोभ पूज्य जन जो अर्हन्त आदिक उनकी पूजा आदि में हानि को पहुँचाने वाला है वह लोभ इस भव में तथा परभव में समस्त मनुष्यों के सम्यग्दर्शन आदि गुणों को घातता है किन्तु जो लोभ लौकिक विवाह आदि कार्यों में किया जाता है उस लोभ को तो इस जन्म में मनुष्य केवल दोष ही कहते हैं इसलिए मनुष्य को दान पूजन आदि में कदापि लोभ नहीं करना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ७. देशव्रतोद्योतन श्लोक ३, PDF पृष्ठ १७३ (पढ़ें)

    मोक्षरूपी वृक्ष का बीज तो सम्यग्दर्शन है तथा संसाररूपी वृक्ष का बीज मिथ्यात्व है ऐसा सर्वज्ञदेव ने कहा है इसलिए मोक्षाभिलाषी उत्तमपुरुषों को सम्यग्दर्शन के पाने पर उसकी रक्षा करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि नरक, तिर्यञ्च आदि नाना प्रकार की योनियों से व्याप्त इस संसार में अनादि काल से भ्रमण करता हुआ और खोटे …

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १६७ (पढ़ें)

    अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया और लोभ सम्यग्दर्शन का घात करते हैं, उसे वे प्रकट नहीं होने देते।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १४४ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि पुरुषों को कुदेव, कुलिंगी, पाखंडी, उनके मठ, उनके प्रतिबिंब, कुतीर्थ, कुशास्त्र, छहों अनायतन आदि कभी नहीं देखने चाहिए क्योंकि ये बहुत से स्थान मिथ्यात्व को बढ़ाने वाले हैं, इसलिए सम्यग्दर्शनरूपी रत्न में मल उत्पन्न होने की शंका से डरकर ऐसे स्थान कभी नहीं देखने चाहिए।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १४७ (पढ़ें)

    मिथ्या काव्यों के सुनने से पाप होता है, पाप से बुद्धि विपरीत हो जाती है, बुद्धि के विपरीत होने से सम्यग्दर्शन छूट जाता है और सम्यग्दर्शन के छूट जाने से उन दुष्टों को महादुःख उत्पन्न होता है।

  • मूलाचार प्रदीप, तृतीयोऽधिकारः, PDF पृष्ठ २०४ (पढ़ें)

    इसका भी कारण यह है कि नीच लोगों के संसर्ग से वा उनको नमस्कार करने से सज्जनों का समस्त श्रेष्ठ गुणों के साथ सम्यग्दर्शन दूर भाग जाता है और मिथ्यात्व आदि दोष सब उन सज्जनों में आ मिलते हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ ३०० (पढ़ें)

    तीन मूढ़ताएँ, आठ मद, छह अनायतन और आठ शंकादिक दोष ये सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष कहे जाते हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १५८७, PDF पृष्ठ ३०२ (पढ़ें)

    पहले सम्यग्दर्शन के जो निःशंकित आदि आठ अंग बतलाए हैं उनसे विपरीत शंका, कांक्षा आदि आठ दोष कहलाते हैं। ये दोष भी सम्यग्दर्शन में मलिनता उत्पन्न करने वाले हैं इसलिए बुद्धिमानों को इनका भी सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।


४. सम्यक्त्व के भेद, उत्पत्ति एवं कर्मसिद्धान्त

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ४. एकत्वसप्तति श्लोक १२, PDF पृष्ठ १३९ (पढ़ें)

    जिसको सिद्धि होने वाली है ऐसा जो भव्य, वह १. देशना, २. प्रायोग्य, ३. विशुद्धि, ४. क्षयोपशम तथा ५. करणलब्धि इस प्रकार इन पाँच लब्धि स्वरूप सामग्री के विशेष से सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र रूपी रत्नत्रय का पात्र बनता है अर्थात् रत्नत्रय को धारण करता है वही मोक्ष मात्र में स्थित है ऐसा समझना चाहिए।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ४१ (पढ़ें)

    मंगलाचरण और ग्रन्थ-निरूपण-प्रतिज्ञा-मैं (ग्रन्थकार नेमिचन्द्र) अनन्त ज्ञानादि गुणरूप रत्नों के आभूषण धारण करने वाले, महान् बलशाली और क्षायिक सम्यक्त्वरूप रत्न के स्थान ऐसे नेमिनाथ तीर्थंकर को तथा उक्त विशेषणों से विशिष्ट एवं धर्मतीर्थरूप रथ के चक्र की धुरा को धारण करने वाले ऐसे महावीर तीर्थंकर को नमस्कार करके …

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ५१ (पढ़ें)

    अब ग्रन्थकार घातियाकर्मों से घात किये जाने वाले गुणों को बतलाते हैं-केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य और क्षायिकसम्यक्त्व तथा ‘च’ शब्द से सूचित क्षायिकचारित्र और क्षायिकदानादिरूप क्षायिक गुणों को; तथा मतिज्ञानादि क्षायोपशमिक गुणों को भी ये ज्ञानावरणादि कर्म घात करते हैं, इसलिए उन्हें घातिया कर्म कहते हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ५६ (पढ़ें)

    उसके पश्चात् दर्शन और सम्यक्त्वगुण के आवरण करने या घातने वाले कर्मों का निर्देश किया गया है। वीर्यगुण शक्तिरूप है और यह शक्तिरूप गुण जीव और अजीव दोनों में पाया जाता है, इसलिए उसके घात करने वाले अन्तराय कर्म का सब कर्मों के अन्त में निर्देश किया गया है।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ७२ (पढ़ें)

    वेदनीयकर्म के दो भेद हैं-१. सातावेदनीय, २. असातावेदनीय। मोहनीयकर्म दो प्रकार का है-१. दर्शनमोहनीय, २.चारित्रमोहनीय। जो आत्मा के सम्यग्दर्शन गुण का घात करे, उसे दर्शन मोहनीय कहते हैं और सम्यक् चारित्र गुण का घात करने वाले कर्म को चारित्रमोहनीय कहते हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ७२ (पढ़ें)

    दर्शनमोहनीय कर्म के भेद-दर्शनमोहनीय कर्म बन्ध की अपेक्षा एक मिथ्यात्व रूप ही है किन्तु उदय और सत्त्व की अपेक्षा तीन प्रकार का जानना चाहिए-१. मिथ्यात्व, २. मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) और ३. सम्यक्त्वप्रकृति।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ७४ (पढ़ें)

    दर्शनमोह के तीन भेद होने का दृष्टान्तपूर्वक वर्णन-यन्त्र (जाँता या चक्की) से दले हुए कोदों के समान प्रथमोपशम सम्यक्त्व परिणामरूप यन्त्र से मिथ्यात्व रूप कर्म द्रव्य तीन प्रकार का हो जाता है और वह द्रव्य प्रमाण में क्रम से असंख्यात गुणित-असंख्यातगुणित हीन होता है।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ७७ (पढ़ें)

    अनन्तानुबन्धी आदि चारों प्रकार की कषायों के कार्य-जो सम्यक्त्व, देशचारित्र, सकलचारित्र और यथाख्यात चारित्ररूप परिणामों को कसे या घात करे, उसे कषाय कहते हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ९८ (पढ़ें)

    अब ग्रन्थकार अबन्ध प्रकृतियों को अर्थात् जिनका बन्ध नहीं होता, उन प्रकृतियों को गिनाते हैं-चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध, सात स्पर्श, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, पाँच बन्धन और पाँच संघात ये अट्ठाईस अबन्ध प्रकृतियाँ हैं अर्थात् इनके अतिरिक्त शेष एक सौ बीस प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य होती हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ १०० (पढ़ें)

    अब ग्रन्थकार भेद और अभेद विवक्षा से बन्ध और उदय रूप प्रकृतियों की संख्या कहते हैं-भेद-विवक्षा से बन्ध योग्य प्रकृतियाँ एक सौ छियालीस हैं, क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति इन दो प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता, किन्तु अभेद-विवक्षा से एक सौ बीस प्रकृतियाँ बन्ध योग्य होती हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ १०२ (पढ़ें)

    अब देशघाती प्रकृतियों को गिनाते हैं-केवलज्ञानावरण को छोड़कर ज्ञानावरणकर्म की शेष चार प्रकृतियाँ, पूर्वोक्त ६ भेदों के सिवाय दर्शनावरण की शेष तीन प्रकृतियाँ, सम्यक्त्वप्रकृति, संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्यादि नौ नोकषाय और अन्तराय की पाँचों प्रकृतियाँ ये छब्बीस देशघाती प्रकृतियाँ हैं।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ १०४ (पढ़ें)

    अब अनन्तानुबन्धी आदि चारों कषायों के कार्य बतलाते हैं-पहली अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यक्त्व को, दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकषाय देशचारित्र को, तीसरी प्रत्याख्यानावरणकषाय सकलचारित्र को और चौथी संज्वलनकषाय यथाख्यात चारित्र को घातती है।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ ११२ (पढ़ें)

    अब उक्त चार प्रकृतियों के बन्ध करने वाले स्वामियों का निर्देश करते हैं-देवायु का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध प्रमत्तसंयत करता है। आहारक शरीर और आहारक शरीर अंगोपांग का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अप्रमत्तसंयत करता है और तीर्थंकर प्रकृति का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अविरतसम्यग्दृष्टि मनुष्य करता है।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ १२३ (पढ़ें)

    अब दर्शनमोहनीय के मिथ्यात्व आदि भेदों में जो विशेषता है, उसे बतलाते हैं-मिथ्यात्व प्रकृति के लता भाग से लेकर दारूभाग के अनन्तवें भाग तक देशघाती स्पर्द्धक सम्यक्त्वप्रकृति के हैं।

  • कर्मप्रकृति, गाथा १५८, PDF पृष्ठ १३५ (पढ़ें)

    क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उत्कृष्टतः चौथे भव में सिद्धि को प्राप्त करता है।

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १६६ (पढ़ें)

    जो तत्त्वार्थ की श्रद्धारूप सम्यग्दर्शन में चल, मलिन तथा अगाढ़ दोष उत्पन्न करे वह सम्यक्त्वप्रकृति है।

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १९२ (पढ़ें)

    अभव्यों के करणत्रय का अभाव उनके कभी भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के कारण करणत्रय होना असंभव है।

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १९२ (पढ़ें)

    मिथ्यादृष्टि के सम्यक्त्व का विधान अनादि मिथ्यादृष्टि अथवा सादि मिथ्यादृष्टि पाँच लब्धियों के सद्भाव में प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करता है।

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १९८ (पढ़ें)

    …अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया तथा लोभ में से किसी एक कषाय के उदय होने पर जीव सम्यक्त्व की विराधना करके जब तक मिथ्यात्व को प्राप्त होता है, तब तक सासादन सम्यग्दृष्टि नामक द्वितीय गुणस्थानवर्ती होता है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १३८० से १३८१, PDF पृष्ठ २७२ (पढ़ें)

    इनमें भी सबसे प्रसिद्ध सम्यग्दर्शन है जो शुद्धि का कारण है, गुणों से सुशोभित है और दोषों से रहित है। ऐसे सम्यग्दर्शन को ही मैं सबसे पहले कहता हूँ। भव्यजीवों के होने वाला यह सम्यग्दर्शन भगवान् जिनेन्द्रदेव ने दो प्रकार का बतलाया है एक निसर्गज और दूसरा अधिगमज।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १३८२ से १३८३, PDF पृष्ठ २७२ (पढ़ें)

    जो भव्य जीव है, पंचेन्द्रिय है, संज्ञी है और संसाररूपी समुद्र के किनारे आ लगा है उसके काल प्राप्त कर पर जो देव-शास्त्र-गुरु में, तत्त्वों में और मोक्षमार्ग में, बिना गुरु के उपदेश के बहुत शीघ्र स्वयं महा निश्चय हो जाता है उसको निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १३८५, PDF पृष्ठ २७३ (पढ़ें)

    अथवा औपशमिक, मुक्तिस्त्री को वश में करने वाला क्षायिक और क्षायोपशमिक के भेद से इस सम्यग्दर्शन के तीन भेद हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १३८८, PDF पृष्ठ २७३ (पढ़ें)

    तथा इन्हीं सातों प्रकृतियों का जब पूर्णरूप से क्षय हो जाता है तब आसन्न भव्यजीवों को क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है। यह क्षायिक सम्यग्दर्शन साक्षात् मोक्ष देने वाला है और प्रकट होने के बाद सदा बना रहता है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ २७४ (पढ़ें)

    यह तीनों प्रकार का सम्यग्दर्शन केवल भव्यजीवों के ही होता है। अभव्यों के नहीं। ऐसा भगवान् जिनेन्द्रदेव ने कहा है। दूरभव्यों के भी यह सम्यग्दर्शन नहीं होता।

  • श्रेणिक चरित्र, प्रथमः सर्गः श्लोक १७ से १८, PDF पृष्ठ १३ (पढ़ें)

    अतिशय मनोहर निर्मल समस्त दोषों से रहित क्षायिक सम्यक्त्व को धारण किया और समस्त इन्द्रियों को संकोच कर शुद्ध सम्यग्दर्शन से विभूषित हुए। जिसने भगवान् महावीर स्वामी के सामने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया और समस्त लोक में सर्वथा आश्चर्य करने वाले आस्तिक्य गुण को प्राप्त किया ॥१७-१८॥

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः, PDF पृष्ठ २३१ (पढ़ें)

    इस प्रकार भविष्यत्काल में होने वाले श्री पद्मनाभ तीर्थंकर के जीव महाराज श्रेणिक के चरित्र में भट्टारक श्री शुभचन्द्राचार्य विरचित महाराज श्रेणिक को क्षायिक सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति वर्णन करने वाला द्वादश सर्ग समाप्त हुआ।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः, PDF पृष्ठ २४० (पढ़ें)

    राजन्! आप क्षायिक सम्यग्दृष्टि हैं आपके संग चरित्र भ्रष्ट इस मुनि-आर्यिका युगल के

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ७४ (पढ़ें)

    …भी संसार से भयभीत भीम महामुनि ने बारह भावनाओं का चिन्तन कर और अधःकरण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण परिणामों के द्वारा पाप-कर्मों को हल्का कर क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक-चारित्र प्राप्त किया एवं विघ्न बाधा-रूप मेघों को उड़ाने के लिए वायु के समान और घाति-कर्मों के घातक उन महामुनि ने केवलज्ञान प्राप्त कर तथा कुछ समय बाद…


५. रत्नत्रय और मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन

  • समयसार, गाथा १४४ (पढ़ें)

    जो सर्वनयपक्षों से रहित कहा गया है, वह समयसार है। इसी समयसार को ही केवल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान - ऐसी संज्ञा (नाम) मिलती है। तात्पर्य यह है कि नामों से भिन्न होने पर भी वस्तु एक ही है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७, PDF पृष्ठ २२ (पढ़ें)

    …जीवों पर दया करना इसी का नाम धर्म है अथवा एकदेश गृहस्थ का धर्म तथा सर्वदेश मुनियों का धर्म इस प्रकार उस धर्म के दो ही भेद हैं अथवा उत्कृष्ट रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र) ही धर्म है अथवा उत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव आदिक दश प्रकार भी धर्म है अथवा मोह से उत्पन्न हुए समस्त विकल्पों से रहित तथा जिसको वचन …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १२, PDF पृष्ठ २४ (पढ़ें)

    जिस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय की समस्त सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र भक्ति से पूजन करते हैं तथा जो मोक्ष का उत्कृष्ट कारण है अर्थात् जिसके बिना कदापि मुक्ति नहीं हो सकती तथा जो तीन लोक का प्रकाश करने वाला है ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय को देह की स्थिरता रहते हुए ही …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ३८, PDF पृष्ठ ३५ (पढ़ें)

    …चौरासी लाख उत्तरगुण तथा मिथ्यात्व, मोह, मद का त्याग और शम-दम, ध्यान तथा प्रमाद रहित स्थिति और वैराग्य तथा जिनशासन की महिमा के बढ़ाने वाले अनेक गुण और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप निर्मल रत्नत्रय तथा अंत में समाधि विद्यमान है ऐसा मुनियों का धर्म अक्षयपद आनन्द के लिए है।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ६३, PDF पृष्ठ ४४ (पढ़ें)

    जिस वज्र के शब्द के भय से चकित होकर समस्त लोकमार्ग को छोड़ देते हैं ऐसे वज्र के गिरने पर भी जो शान्तात्मा मुनि, ध्यान से कुछ भी विचलित नहीं होते तथा जिन्होंने सम्यग्ज्ञानरूपी दीपक से समस्त मोहान्धकार को नाश कर दिया है और जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं वे मुनि परीषहों के जीतने में कब चलायमान हो सकते हैं?

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७०, PDF पृष्ठ ४६ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी तथा शांत और मोक्षाभिलाषी जो मुनि दुष्टों से अपमानित होकर भी स्वच्छ अंतःकरण से समता को धारण करता है उसकी तो आत्मा शुद्ध ही होती है किन्तु जो उनकी निन्दा करने वाले हैं उन्होंने अपनी आत्मा का घात कर लिया क्योंकि वे दुष्ट कल्याण रहित पुरुष ऐसे नरक में गिरेंगे जो नरक भयंकर …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७१, PDF पृष्ठ ४६ (पढ़ें)

    पुण्ययोग से मनुष्य भव को पाकर तथा शान्ति को प्राप्त होकर और भोगों को रोग तुल्य जानकर तथा वन में जाकर समस्त परिग्रह से रहित होकर जो यतीश्वर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र में स्थित होते हैं, वचनागोचर गुणों से सहित उन मुनियों की प्रथम तो कोई स्तुति का करने वाला ही नहीं, यदि कोई स्तुति कर सके भी तो वे ही पुरुष …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७४, PDF पृष्ठ ४७ (पढ़ें)

    उसी प्रकार जो मुनि तप आदि का तो बहुत थोड़ा करने वाला है किन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है किन्तु जो तप आदि का तो बहुत करने वाला है परन्तु सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय का धारी नहीं है, वह कितना भी प्रयत्न करे तो भी मोक्ष को नहीं पा सकता इसलिए मोक्षाभिलाषियों को

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७५, PDF पृष्ठ ४८ (पढ़ें)

    इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि केवल सम्यग्दर्शन तथा केवल सम्यग्ज्ञान और केवल सम्यक्चारित्र मोक्ष के लिए कारण नहीं हैं किन्तु तीनों मिले हुए ही हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७६, PDF पृष्ठ ४८ (पढ़ें)

    जो समस्त अंधकार के नाश करने वाले हैं तथा अमूल्य और मनोहर हैं ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी तीन रत्नों से ही अपनी आत्मा को शोभित करो ये ही वास्तविक रत्न है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७९, PDF पृष्ठ ४९ (पढ़ें)

    व्यवहारनय की अपेक्षा से ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र जुदे-जुदे मालूम पड़ते हैं, निश्चयनय की अपेक्षा से इनमें किसी प्रकार का भेद नहीं है किन्तु ये तीनों आत्मस्वरूप ही हैं तथा समस्त लोकालोक को देखने वाले केवली भगवान् वास्तविक रीति से इन तीनों को चैतन्य से अभिन्न स्वरूप ही देखते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ९७, PDF पृष्ठ ५५ (पढ़ें)

    …भगवान् के वचनों का सुनना बड़ा दुर्लभ है यदि उनके सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जावे तो संसार में अधिक जीवन नहीं मिलता यदि अधिक जीवन भी मिले तो सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होनी अतिकठिन है यदि किसी पुण्य के उदय से अखण्ड तथा निर्मल सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति भी हो जावे तो उस संयमधर्म के …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १२८, PDF पृष्ठ ६७ (पढ़ें)

    तुम सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी निधि के लिए अवश्य यत्न करो।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १३४, PDF पृष्ठ ७० (पढ़ें)

    …आत्मा शून्य है, न जड़ है, न पंचभूत से उत्पन्न हुआ है, न कर्ता है, न एक है, न क्षणिक है, न लोकव्यापी है, न नित्य है, किन्तु अपने शरीर के परिमाण है तथा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदि गुणों का आधार है और अपने कर्मों का कर्ता है और अपने ही कर्मों का भोक्ता है तथा एक ही क्षण में सदा काल उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों धर्मों …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १३८, PDF पृष्ठ ७५ (पढ़ें)

    …व्यय, ध्रौव्य तीनों धर्मों से सहित है और संसारावस्था में यह कर्मों से सहित है परन्तु मोक्ष अवस्था में इसके साथ किसी कर्म का सम्बन्ध नहीं तथा यह आत्मा सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान का धारक है और तीनों लोक के शिखर पर विराजता है।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक २८, PDF पृष्ठ १०८ (पढ़ें)

    बैरी भी यदि अपने घर आवे तो सज्जन मनुष्य मधुर-मधुर वचनों से तथा भोजन आदि से उसका बड़ा भारी सम्मान करते हैं तो जो उत्तम सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय के धारी हैं तथा पूज्य हैं ऐसे

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ४. एकत्वसप्तति श्लोक १३, PDF पृष्ठ १३९ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र इन तीनों का समुदाय ही मुक्ति का कारण है और वास्तविक सुख की प्राप्ति मोक्ष में ही है इसलिए भव्य जीवों को उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ४. एकत्वसप्तति श्लोक १५, PDF पृष्ठ १४० (पढ़ें)

    अथवा शुद्ध निश्चयनय से एक चैतन्य ही मोक्ष का मार्ग है क्योंकि आत्मा एक अखंड पदार्थ है इसलिए उसमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र आदि भेदों का अवकाश नहीं है अर्थात् अखंड तथा एक आत्मा के सम्यग्दर्शन आदि टुकड़े नहीं हो सकते।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक २, PDF पृष्ठ १५८ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीनों के समुदाय को धर्म कहते हैं तथा प्रमाण से निश्चित यह धर्म ही मोक्ष का मार्ग है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक ३, PDF पृष्ठ १५८ (पढ़ें)

    जो मनुष्य इस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप मोक्षमार्ग में गमन नहीं करते हैं उनको कदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और उनके लिए संसार दीर्घतर हो जाता है अर्थात् उनका संसार कभी भी नहीं छूटता।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक २९, PDF पृष्ठ १६३ (पढ़ें)

    जो जिनेन्द्र के सिद्धान्त के अनुयायी हैं उन भव्य जीवों को योग्यतानुसार, जो उत्कृष्टस्थान में रहने वाले हैं ऐसे परमेष्ठियों में विनय अवश्य करनी चाहिए तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र में और इनके धारण करने वाले महात्माओं में भी अवश्य विनय करना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक ३०, PDF पृष्ठ १६४ (पढ़ें)

    विनय से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र तथा तप आदि की प्राप्ति होती है इसलिए उस विनय को गणधर आदि महापुरुष मोक्ष का द्वार कहते हैं अतः मोक्ष के अभिलाषी भव्यों को यह विनय अवश्य करनी चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक ५५, PDF पृष्ठ १६९ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रय की जो प्राप्ति है उसी का नाम बोधि है और इस बोधि की प्राप्ति संसार में अत्यन्त कठिन है यदि किसी रीति से उसकी प्राप्ति भी हो जावे तो उसकी रक्षा के लिए विद्वानों को प्रबल यत्न करना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ७. देशव्रतोद्योतन श्लोक २, PDF पृष्ठ १७२ (पढ़ें)

    खोटे कर्म के उदय से दुःखित भी जो मनुष्य संतुष्ट होकर इस अत्यन्त पवित्र सम्यग्दर्शन में निश्चल स्थिति को करता है अर्थात् सम्यग्दर्शन को धारण करता है वह अकेला ही अत्यन्त प्रशंसा के योग्य समझा जाता है किन्तु जो अत्यन्त आनन्द के देने वाले सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयरूपी मोक्षमार्ग से बाह्य है तथा वर्तमान काल में शुभकर्म के …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ७. देशव्रतोद्योतन श्लोक ८, PDF पृष्ठ १७५ (पढ़ें)

    समस्त जीवों की अभिलाषा सदा यही रहा करती है कि हमको सुख मिले परन्तु यदि अनुभव किया जावे तो वास्तविक सुख मोक्ष में ही है और उस मोक्ष की प्राप्ति सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय के धारण करने से ही होती है और उस रत्नत्रय की प्राप्ति निर्ग्रन्थ अवस्था में ही होती है और निर्ग्रन्थ अवस्था शरीर के होने …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ८. सिद्ध स्तुति श्लोक १८, PDF पृष्ठ १९२ (पढ़ें)

    …सिद्धपनेकी प्राप्ति के लिए ही है किन्तु जो अज्ञानी मनुष्य उसको अन्य प्रयोजन के लिए कल्पना करते हैं वे निश्चय से मोक्षमार्ग से भ्रष्ट हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप मोक्षमार्ग का उनको अंशमात्र भी ज्ञान नहीं है क्योंकि विचारशील होने पर परंपरा से आये हुए द्रव्यश्रुत को छोड़कर यदि वह भावश्रुत …

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ८. सिद्ध स्तुति श्लोक २६, PDF पृष्ठ १९५ (पढ़ें)

    जिन सिद्धों के समस्त आत्म प्रदेशों से कर्म बंध छूट गया है तथा जिनके समस्त आत्म प्रदेशों में समीचीन दर्शन मौजूद है अर्थात् जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं और समस्त पदार्थों के समूह को जानने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी किरण जिनके समस्त आत्म प्रदेशों में व्याप्त है तथा जिनके सर्वत्र सर्वोत्कृष्ट चिदानंद स्वरूप तेज स्फुरायमान है और जो…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ८. सिद्ध स्तुति श्लोक २८, PDF पृष्ठ १९६ (पढ़ें)

    जो सिद्धों की गति है वही तो एक सुगति है तथा जो उनका सुख है वही वास्तविक सुख है और वे सिद्ध ही सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान हैं इसलिए ये तथा इनसे भिन्न और भी जो सिद्धों का स्वरूप है वह समस्त मुझे प्रिय है किन्तु इनसे अतिरिक्त और मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है ऐसा मन में दृढ़ श्रद्धान करके मैंने सर्वकाल उन्हीं सिद्धों का ध्यान किया है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ९. आलोचना श्लोक १, PDF पृष्ठ १९७ (पढ़ें)

    …आनन्द के निधान आपको अवगाहन (आश्रयण) करता है और यदि उनके मन में आपके नाम का स्मरणरूप अनंतप्रभा का धारी महामंत्र मौजूद है तथा आपसे प्रकट किए हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी मोक्षमार्ग में यदि उनका गमन है तो उन सज्जनों को अभीष्ट की प्राप्ति में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आ सकता।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ९. आलोचना श्लोक १९, PDF पृष्ठ २०४ (पढ़ें)

    …नपुंसकलिंग भी नहीं है और न भारी है और न हल्का है तथा जो तेज कर्म, स्पर्श, शरीर, गंध, संख्या, वचन, वर्ण से रहित है और जो निर्मल है तथा सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन स्वरूप है मूर्ति जिसकी ऐसा है उसी उत्कृष्ट तेजस्वरूप मैं हूँ किन्तु आत्मस्वरूप उत्कृष्ट तेज से भिन्न नहीं हूँ।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ९. आलोचना श्लोक ३१, PDF पृष्ठ २०९ (पढ़ें)

    इस संसार में भ्रमणकर मैंने इन्द्रपना, निगोदपना और बीच में अन्य भी समस्त प्रकार की योनि अनंत बार प्राप्त की हैं इसलिए इन पदवियों में से कोई भी पदवी मेरे लिए अपूर्व नहीं है किन्तु मोक्षपद को देने वाली सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की पदवी अभी तक नहीं मिली है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १०. सद्बोधचन्द्रोदय श्लोक २२, PDF पृष्ठ २१९ (पढ़ें)

    सूर्य के समान योगियों के मन की गति यदि निरालंब मार्ग में ही हो, तो कभी भी उनके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान की प्रभा को रोकने वाले अंधकार की निकटता न होवे।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १०. सद्बोधचन्द्रोदय श्लोक ३०, PDF पृष्ठ २२२ (पढ़ें)

    परमात्मा में जो निश्चय तथा ज्ञान और स्थिति हैं उन्हीं को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र कहते हैं। और केवली भगवान् की दृष्टि में ये तीनों निश्चयनय से आत्मस्वरूप ही हैं अर्थात् आत्मा से भिन्न सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र कोई पदार्थ नहीं है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १०. सद्बोधचन्द्रोदय श्लोक ३१, PDF पृष्ठ २२२ (पढ़ें)

    उसी प्रकार चैतन्यरूपी संग्राम में शास्त्ररूपी प्रत्यंचा सहित बुद्धिरूपी धनुष से प्रेरित तथा बाह्य पदार्थों के वेधन करने में तत्पर जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी बाण हैं वे समस्त कर्मरूपी बैरियों को नष्ट करते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १०. सद्बोधचन्द्रोदय श्लोक ४२, PDF पृष्ठ २२६ (पढ़ें)

    परमात्मा के नाममात्र के कथन से ही अनेक जन्मों में संचय किया हुआ पापों का समूह पलभर में नष्ट हो जाता है और उस आत्मा में विद्यमान जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूपी रत्नत्रय है वह तो मनुष्य को जगत् का पति ही बना देता है अर्थात् परमात्म पद को प्राप्त करा देता है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ११. निश्चयपञ्चाशत श्लोक १२, PDF पृष्ठ २३५ (पढ़ें)

    आत्मा में जो निश्चय बोध स्थितिरूप रत्नत्रय हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय है वह संसार के नाश के लिए होता है और वह रत्नत्रय कोई जुदा पदार्थ नहीं हैं, किन्तु जिन भव्यजीवों की बुद्धि भूतार्थमार्ग में स्थित है अर्थात् शुद्ध निश्चयनय को आश्रय करने वाली है उन भव्यजीवों की आत्मा ही सम्यग्दर्शन…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ११. निश्चयपञ्चाशत श्लोक १३, PDF पृष्ठ २३६ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ये तीनों आत्मा के अखंडरूप हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि जो पुरुष परमात्मा में लीन हैं अर्थात् परमात्मा के आराधक हैं उनको सम्यग्दर्शन आदि की प्राप्ति होती है और वे कृतकृत्य हो जाते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ११. निश्चयपञ्चाशत श्लोक १९, PDF पृष्ठ २३८ (पढ़ें)

    जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर रात्रि का अंधकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार सम्यक्चारित्र से शुद्ध जिस समय सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान होते हैं उस समय जन्म कदापि नहीं हो सकता।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १२. ब्रह्मचर्यरक्षावर्ती श्लोक १८, PDF पृष्ठ २६५ (पढ़ें)

    …है ऐसा गृहस्थ भी मनुष्य, यदि पर धन तथा परस्त्री में निस्पृह है तो वह भी जब देव कहा जाता है तब जिस मुनि के न तो स्त्री है और न सर्वथा धन ही है और जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय से शोभित है वह तो देवों का भी देव है ही और उस मुनि की सब ही प्रतिष्ठा करते हैं।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १३. ऋषभस्तोत्र श्लोक ३७, PDF पृष्ठ २८३ (पढ़ें)

    हे प्रभुओं के प्रभु जिनेन्द्र! आपने उस समय मोहरूपी चोर से रहित उत्तम मार्ग का प्रकाशन किया था इसलिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के धारी भव्यजीव इस समय भी उस मार्ग से, बिना ही क्लेश के मोक्ष को चले जाते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १५. श्रुतदेवता स्तुति श्लोक ५, PDF पृष्ठ ३०९ (पढ़ें)

    हे सरस्वति माता ! आप तीन लोक रूपी घर में स्थित सम्यग्ज्ञानमय उत्कृष्ट दीपक हैं जिस दीपक की कृपा से सम्यग्दृष्टि जीव उन तीनों लोकों के भीतर रहने वाले जीवाजीवादि पदार्थों को भली-भाँति देखते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १६. चतुर्विंशतितीर्थंकरस्तोत्र स्वयंभूस्तोत्र श्लोक २, PDF पृष्ठ ३२१ (पढ़ें)

    जीवों का संसार ही एक बैरी है और दूसरा कोई भी बैरी नहीं है तथा मित्र सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय ही हैं और कोई दूसरा मित्र नहीं है और वह संसाररूपी बैरी अत्यन्त दुर्जय है किन्तु जिन

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १६. चतुर्विंशतितीर्थंकरस्तोत्र स्वयंभूस्तोत्र श्लोक २०, PDF पृष्ठ ३२९ (पढ़ें)

    जो मुनिसुव्रतनाथ मुनि, समस्त पदार्थों को निश्चय से तृण के समान छोड़कर व्रतों को धारण करने से ‘मुनिसुव्रत’ नाम को धारण करते हुए और जो नाश से रहित (अविनाशी) मोक्षपद को प्राप्त हुए तथा जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के धारी हैं ऐसे वे मुनिसुव्रतनाथ भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हों।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १७. सुप्रभातष्टक स्तोत्र श्लोक १, PDF पृष्ठ ३३१ (पढ़ें)

    … पर तथा अंतराय कर्म के क्षय से प्रकाश होने पर और मोहनीय कर्म के द्वारा किए हुए निद्रा के भार को शीघ्र ही दूर होने पर जिस सुप्रभात में सम्यग्ज्ञान तथा सम्यग्दर्शनरूप दोनों नेत्र उन्मीलित हुए (खुले) उस अचल सुप्रभात को जिन यतियों ने प्राप्त कर लिया है उन यतियों के लिए नमस्कार है।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २१. क्रियाकाण्डचूलिका श्लोक ८, PDF पृष्ठ ३४९ (पढ़ें)

    हे प्रभो ! इस संसार में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी जो त्रयी है वह मेरे होवे तथा मेरे समस्त पाप नष्ट हो जावें बस यही मैं आपसे याचना करता हूँ किन्तु इससे भिन्न दूसरी वस्तु, मैं नहीं माँगता क्योंकि संसार में इनसे भिन्न ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त न हो गई हो।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २१. क्रियाकाण्डचूलिका श्लोक १०, PDF पृष्ठ ३५० (पढ़ें)

    हे प्रभो जिनेश ! सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय में, तप में, दश प्रकार के धर्म में तथा मूलगुण और उत्तर गुणों में और तीन प्रकार की गुप्तियों में जो कुछ अभिमान से अथवा प्रमाद से मुझे अपराध लगा हो सो हे जिनदेव ! हे नाथ ! आपके प्रसाद से वह मेरा अपराध सर्वथा मिथ्या हो ऐसी प्रार्थना है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २३. परमार्थविंशतिः श्लोक ७, PDF पृष्ठ ३६१ (पढ़ें)

    नाना प्रकार के विद्यमान जो कर्म उनकी एकता होने पर भी मैं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान स्वरूप और परमानंदस्वरूप तथा उत्कृष्ट तेज के धारी आत्मा को छोड़कर भिन्न नहीं हूँ अर्थात् आत्मस्वरूप ही हूँ क्योंकि काले पदार्थ के सम्बन्ध से स्फटिकमणि के काले होने पर भी वह कृष्णता उससे भिन्न ही है और विकार जो संसार में होता है वह दो …

  • नीतिवाक्यामृत, PDF पृष्ठ ३२ (पढ़ें)

    …से हो जाता है उसी प्रकार मुमुक्षु प्राणी में भी सांसारिक व्याधियों के कारणों (मिथ्यात्व, अज्ञान और असंयम) का ध्वंस भी उनकी औषधि के सेवन से-अर्थात् सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र की सामर्थ्य से हो जाता है।…

  • नीतिवाक्यामृत, (२४) राजरक्षा-समुद्देशः, PDF पृष्ठ ३३८ (पढ़ें)

    उसकी प्राप्ति होने से कुलीन पुरुष को बिना प्रयत्न किये प्राप्त होने वाले सद्गुणों (शिक्षा व सदाचार-आदि) के साथ साथ मोक्ष के कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय की प्राप्ति सुलभता से हो जाती है।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ ९८ (पढ़ें)

    मोक्ष की इच्छा करने वाले मुनियों को तप और ध्यान की सिद्धि के लिए ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिससे कि संसार, शरीर और इन्द्रियों के सुख से वैराग्य उत्पन्न हो जाये, सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र और कषाय शमन आदि अपने या अन्य लोगों के गुणों की वृद्धि हो जाये तथा सर्वोत्तम धीरता की प्राप्ति हो जाए।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १५७ (पढ़ें)

    ये पाँचों इन्द्रियाँ बड़ी ठग हैं और इस जीव की अंतरंग शत्रु हैं तथा मनुष्यों के सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी रत्नों को चुरा लेती हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १६४ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक् तपश्चरण के साथ-साथ आत्मा की एकता हो जाना आत्मा में अत्यन्त लीन हो जाना सर्वोत्कृष्ट सामायिक कहलाता है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १५९५ से १५९८, PDF पृष्ठ ३०४ (पढ़ें)

    इसलिए कहना चाहिए कि बिना सम्यग्दर्शन के ज्ञान अज्ञान है, चारित्र मिथ्या चारित्र है और समस्त तप कुतप हैं। … जिस प्रकार बिना बीज के किसी भी खेत में कभी भी उत्तम फल उत्पन्न नहीं हो सकते, उसी प्रकार बिना सम्यग्दर्शन के केवल चारित्र से कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती।

  • मूलाचार प्रदीप, नवमोऽधिकारः श्लोक २५१० से २५१२, PDF पृष्ठ ४४८ (पढ़ें)

    देखो सम्यग्दर्शन से सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होती है, सम्यग्ज्ञान से समस्त पदार्थों को दिखलाने वाली स्वकीय और परकीय समस्त पदार्थों की उपलब्धि प्राप्त होती है। … अतएव कहना चाहिए कि सम्यग्ज्ञान और व्रतादिकों के लिए सम्यग्दर्शन ही मूल कारण है।

  • श्रेणिक चरित्र, नवमः सर्गः श्लोक १, PDF पृष्ठ १३० (पढ़ें)

    कृतकृत्य समस्त कर्मों से रहित होने के कारण परम पूजनीय सम्यग्दर्शनादि तीनों रत्नत्रय से भूषित श्रीसिद्ध भगवान् हमारी रक्षा करें ॥१॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १६ (पढ़ें)

    श्रोता-उपदेश सुनने वाला-वह अच्छा है जो शील से विभूषित और सम्यक्त्व से युक्त हो, सुन्दर हो, दाता हो, भोक्ता और नाना लक्षणों वाला हो, व्रतों का धारक, धर्मात्मा पुरुषों को आश्रय देने वाला और परिपूर्ण इंद्रियों वाला हो, उदार और पवित्र चित्त हो, हेय-उपादेय का जानने वाला हो, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण और स्मरण इनमें प्रवीण …

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १७ (पढ़ें)

    इसको कहने या सुनने से ज्ञान का विकास होता है और जिसमें रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र) का निरूपण और मिथ्यात्व आदि का खण्डन किया गया हो वह विक्षेपिनी कथा है।


६. सम्यग्दर्शन की महिमा एवं फल

  • समयसार, गाथा १७७ (पढ़ें)

    राग-द्वेष-मोहरूप आस्रवभाव सम्यग्दृष्टियों के नहीं होते; इसलिए उन्हें आस्रवभाव के बिना द्रव्यप्रत्यय कर्मबंध के कारण नहीं होते ।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १३, PDF पृष्ठ २४ (पढ़ें)

    …से दान दिया जाता है और जहाँ पर निरन्तर जीवादि तत्त्वों का अभ्यास होता रहता है तथा अपने-अपने व्रतों में प्रीति रहती है और जिस गृहस्थाश्रम में निर्मल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है वह गृहस्थाश्रम विद्वानों के द्वारा पूजनीय होता है किन्तु उससे विपरीत इस संसार में केवल दुख का देने वाला है तथा मोह का जाल है।…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक ७७, PDF पृष्ठ ४८ (पढ़ें)

    जिस सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान कहलाता है, चरित्र मिथ्याचरित्र कहलाता है प्राप्त हुआ भी मनुष्य जन्म न पाया हुआ सा कहलाता है। ऐसा सुखस्वरूप तथा मोक्ष रूपी सुख का देने वाला और निर्मल सम्यग्दर्शनरूपी रत्न सदा इस लोक में जयवंत है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १. धर्मोपदेशामृत श्लोक १३२, PDF पृष्ठ ६९ (पढ़ें)

    मोहरूपी गाढ़े अंधकार से व्याप्त इस तीनलोकरूपी मकान को प्रकाश करने वाला यदि यह भगवान् की वाणीरूप दीपक न होता तो इष्ट की प्राप्ति तथा अनिष्ट का त्याग तो दूर रहे मनुष्यों को पदार्थों का भी ज्ञान न होता।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक १४, PDF पृष्ठ १०५ (पढ़ें)

    …नदी निकलती है वहाँ पर यद्यपि नदी की धार पतली होती है परन्तु समुद्र पर्यन्त जिस प्रकार फेन सहित वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली जाती है उसी प्रकार यद्यपि सम्यग्दृष्टि के पहले लक्ष्मी थोड़ी होती है परन्तु मुनीश्वरों के लिए दिये हुए दान के प्रभाव से कीर्ति के साथ मोक्ष पर्यन्त वह इन्द्र, अहमिन्द्र, चक्रवर्ती, तीर्थंकरादि रूप…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक १५, PDF पृष्ठ १०५ (पढ़ें)

    जिस परमात्मा के ज्ञान से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चार पुरुषार्थों की सिद्धि होती है उस परमात्मा का ज्ञान, सम्यग्दृष्टि को घर में रहकर कदापि नहीं हो सकता परन्तु उन पुरुषार्थों की सिद्धि, उत्तमादि पात्रों को आहार, औषधि, अभय, शास्त्र रूप चार प्रकार के दान देने से पल भर में हो जाती है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक ४९, PDF पृष्ठ ११५ (पढ़ें)

    उत्तम पात्र को निर्मल भाव से दिया हुआ दान सम्यग्दृष्टि को तो स्वर्ग मोक्ष आदि उत्तम फल का देने वाला है तथा वही दान मिथ्यादृष्टि को उत्तम भोगभूमि के सुख को देने वाला है तथा मध्यम पात्र में दिया हुआ दान सम्यग्दृष्टि को तो स्वर्ग फल का देने वाला है और मिथ्यादृष्टि को मध्यम भोगभूमि के सुख का देने वाला है तथा जघन्य पात्र को…

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ७. देशव्रतोद्योतन श्लोक ४, PDF पृष्ठ १७३ (पढ़ें)

    अनंत काल के बीत जाने पर इस संसार में बड़ी कठिनता से मनुष्य जन्म के मिलने पर तथा सम्यग्दर्शन के प्राप्त होने पर उत्तम पुरुषों को मोक्ष को देने वाला तप अवश्य करना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, १०. सद्बोधचन्द्रोदय श्लोक २९, PDF पृष्ठ २२१ (पढ़ें)

    आचार्य कहते हैं कि जो पुरुष बड़े उत्साह के साथ चैतन्यरूपी समुद्र के तीर की भली-भाँति सेवा करते हैं क्या उनको सम्यग्दर्शन आदि रत्नों की प्राप्ति नहीं होती है?

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ११. निश्चयपञ्चाशत श्लोक १५, PDF पृष्ठ २३६ (पढ़ें)

    बाह्य पदार्थ वे ही हुए बेध्य (निशान) उनके सम्बन्ध से किया गया है अभ्यास जिनका ऐसे जो सम्यग्दर्शन आदिक बाण हैं वे शुद्धात्मारूपी संग्राम में समस्त कर्मरूपी बैरियों को नाश करने में सफल होते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २१. क्रियाकाण्डचूलिका श्लोक १, PDF पृष्ठ ३४७ (पढ़ें)

    निविड जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, समता, शील और क्षमा आदिक समस्त गुण हैं। उन्होंने संकेत के घर के समान आपका आश्रय किया है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २५. स्नानाष्टक श्लोक ८, PDF पृष्ठ ३७९ (पढ़ें)

    …गया है ऐसा जो प्रबल दर्शनमोहरूपी महा सर्प उसके काटने से तमाम शरीर में फैला हुआ जो मिथ्यात्वरूपी विष उसके सम्बन्ध से जो अत्यन्त दु:खित हैं तथा जिनका सम्यग्दर्शन मंद हो गया है ऐसे जो मनुष्य हैं वे श्रीमान् पद्मनंदि आचार्य के मुख रूपी चन्द्रमा से निकला हुआ जो यह स्नानाष्टकरूपी अमृत है उसको अपने कानों से पीकर सुखी होवें।…

  • नीतिवाक्यामृत, १. धर्मसमुद्देश:, PDF पृष्ठ २३ (पढ़ें)

    जिस मनुष्य में सम्यग्दर्शन नहीं है उसका शास्त्र ज्ञान केवल उस के मुख की खुजली को दूर करता है-अर्थात् वाद-विवाद करने में ही समर्थ होता है; क्योंकि उसमें आत्मदृष्टि नहीं होती एवं जिसमें ज्ञान नहीं है उसका चरित्र धारण करना विधवा स्त्री के आभूषण धारण करने के समान निरर्थक हैं ॥५॥

  • पञ्चस्तोत्र संग्रह, श्रीमद्वादिराजसूरि कृत एकीभावस्तोत्रम् श्लोक १३, PDF पृष्ठ ११५ (पढ़ें)

    भगवन्! आपकी भक्ति ही तो सम्यग्दर्शन है जो कि अनन्त सुखों का कारण है और मुक्तिमन्दिर के द्वार पर लगे हुए मिथ्यात्व रूपी ताले को खोलने के लिए कुंजी-चाबी की तरह है। जब-तक यह भक्तिरूप सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं होता तब तक ज्ञान और चारित्र के रहते हुए भी मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता।

  • कर्मप्रकृति, PDF पृष्ठ १३१ (पढ़ें)

    अब देवायु के बन्ध के कारणों को बतलाते हैं-जो जीव अणुव्रत या महाव्रत से संयुक्त है, बालतप और अकामनिर्जरा करने वाला है वह जीव देवायु का बन्ध करता है तथा सम्यग्दृष्टि जीव भी देवायु को बाँधता है।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १४१ (पढ़ें)

    …की जननी हैं, समस्त व्रतों की माता है, कल्याण करने वाली है, तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि की उत्तम विभूतियों को देने वाली हैं, समस्त पापों से रहित हैं, सम्यग्दर्शनादिक रत्नों की खानि हैं और संसाररूपी शत्रुओं को नाश करने वाली हैं, यही समझकर बुद्धिमान् मुनियों को स्वर्ग-मोक्ष की सिद्धि करने के लिए और करुणा आदि गुणों को …

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १६१ (पढ़ें)

    इस संसार में जो मुनिराज अत्यन्त विषम ऐसे चारित्ररूपी रणांगण में ठहरकर तथा उग्र-उग्र श्रेष्ठ तपश्चरणरूपी प्रत्यंचा सहित धनुष को चढ़ाकर सम्यग्दर्शन आदि तीक्ष्ण बाणों से अत्यन्त दुष्ट और तीनों लोकों को जीतने वाले ऐसे पाँचों इन्द्रियरूपी शत्रुओं को शीघ्र ही मार डालते हैं वश में कर लेते हैं वे ही मुनि धन्य हैं, तीनों लोकों …

  • मूलाचार प्रदीप, तृतीयोऽधिकारः श्लोक ८६०, PDF पृष्ठ १८६ (पढ़ें)

    इस प्रकार सम्यग्दर्शन का विनय करने से चन्द्रमा के समान निर्मल और मुक्तिलक्ष्मी के राजभवन की पहली सीढ़ी ऐसा महान् सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ ३०४ (पढ़ें)

    …जो सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हो जाते हैं, वे चारित्र के होने पर भी तथा ज्ञान के होने पर भी तीनों लोकों में कहीं भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः, PDF पृष्ठ ३०५ (पढ़ें)

    यदि चांडाल भी सम्यग्दर्शन से सुशोभित हो तो गणधरादिक देव उसको होनहार मुक्तिरूपी स्त्री का स्वामी और देव कहते हैं। … सज्जन पुरुषों को इस सम्यग्दर्शन के साथ-साथ नरक में रहना भी अच्छा है परंतु सम्यग्दर्शन के बिना स्वर्ग में निवास करना भी सुशोभित नहीं होता।

  • मूलाचार प्रदीप, पञ्चमोऽधिकारः श्लोक १६०९ से १६११, PDF पृष्ठ ३०६ (पढ़ें)

    जो पुरुष सम्यग्दर्शन से सुशोभित हैं वे चाहे अव्रती ही क्यों न हों तथापि वे नरक गति में, तिर्यंचगति में, कुगति में, निंदित कुल में, स्त्री पर्याय में, नपुंसक पर्याय में उत्पन्न नहीं होते। वे विकल वा अंगभंग शरीर को भी धारण नहीं करते…

  • मूलाचार प्रदीप, दशमोऽधिकारः श्लोक २६९८, PDF पृष्ठ ४७८ (पढ़ें)

    इस लोक में रत्नत्रय और सम्यक्त्व का प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है, करोड़ों भवों में भी प्राप्त नहीं होता।

  • जिनदत्त चरित्रम्, चतुर्थ सर्गः श्लोक ८१, PDF पृष्ठ १२६ (पढ़ें)

    एक दिन कुमार समझाने लगा, हे कृशांगी ! तुम मिथ्यात्व का त्याग करो, यह मिथ्यात्व संसाररूपी सागर में डुबोने वाला है । सम्यग्दर्शन समस्त अभीष्टों की सिद्धि कराने वाला, मोक्ष का कारण है, तुम इसे धारण करो ॥८१॥


७. सम्यग्दृष्टि का स्वरूप एवं आचरण

  • समयसार, गाथा ११ (पढ़ें)

    ‘व्यवहारनय अभूतार्थ है, शुद्धनय भूतार्थ है’ - ऐसा कहा गया है। जो जीव भूतार्थ का आश्रय लेता है, वह जीव निश्चय से सम्यग्दृष्टि होता है।

  • समयसार, गाथा १६६ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि के आस्रव जिसका निमित्त है - ऐसा बंध नहीं होता; क्योंकि उसके आस्रवों का निरोध है। नवीन कर्मों को नहीं बाँधता हुआ वह सम्यग्दृष्टि सत्ता में रहे हुए पूर्वकर्मों को मात्र जानता है।

  • समयसार, गाथा १७३ से १७६ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टिजीव के पूर्वबद्ध समस्त प्रत्यय (द्रव्यास्रव) सत्तारूप में विद्यमान हैं। वे उपयोग के प्रयोगानुसार कर्मभाव (रागादि) के द्वारा नवीन बंध करते हैं।

  • समयसार, गाथा २०० (पढ़ें)

    इसप्रकार सम्यग्दृष्टि अपने आत्मा को ज्ञायकस्वभाव जानता है और तत्त्व (वस्तु के वास्तविक स्वरूप) को जानता हुआ कर्म के विपाकरूप उदय को छोड़ता है।

  • समयसार, गाथा २०२ (पढ़ें)

    आत्मा को नहीं जाननेवाले वे लोग अनात्मा को भी नहीं जानते। इसप्रकार जो जीव और अजीव (आत्मा और अनात्मा) दोनों को ही नहीं जानते; वे सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकते हैं ?

  • समयसार, गाथा २२४ से २२७ (पढ़ें)

    जिसप्रकार वही पुरुष आजीविका के लिए राजा की सेवा नहीं करता तो वह राजा भी उसे अनेकप्रकार की सुखोत्पादक भोगसामग्री नहीं देता है; उसीप्रकार सम्यग्दृष्टि विषयभोगों के लिए कर्मरज का सेवन नहीं करता तो वह कर्म भी उसे अनेकप्रकार की सुखोत्पादक भोगसामग्री नहीं देता।

  • समयसार, गाथा २४२ से २४६ (पढ़ें)

    इसप्रकार बहुतप्रकार के योगों में वर्तता हुआ सम्यग्दृष्टि उपयोग में रागादि को न करता हुआ कर्मरज से लिप्त नहीं होता।

  • समयसार, गाथा ३२४ से ३२७ (पढ़ें)

    इसलिए परद्रव्य मेरे नहीं हैं - यह जानकर तत्त्वज्ञानीजन लोक और श्रमण - दोनों के परद्रव्य में कर्तृत्व के व्यवसाय को सम्यग्दर्शन रहित पुरुषों का व्यवसाय ही जानते हैं।

  • समयसार, गाथा ३७० (पढ़ें)

    इसप्रकार जो जीव के गुण हैं; वे वस्तुतः परद्रव्य में नहीं हैं; इसलिए सम्यग्दृष्टि का विषयों के प्रति राग नहीं होता।

  • समयसार, गाथा ४०४ (पढ़ें)

    बुधजन (ज्ञानीजन) ज्ञान को ही सम्यग्दृष्टि, संयम, अंगपूर्वगत सूत्र, धर्म-अधर्म (पुण्य-पाप) और दीक्षा मानते हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक ३३, PDF पृष्ठ ११० (पढ़ें)

    मुनि आदि उत्तम पात्रदान में मिथ्यादृष्टि पशु को केवल की हुई रुचि (अनुमोदना) ही जब उसको उत्तम भोगभूमि आदि के सुखों को देने वाली होती है तब साक्षात् दान को देने वाले सम्यग्दृष्टि के तो वह दान क्या-क्या इष्ट तथा उत्तम चीजों को न देगा। अर्थात् अवश्य स्वर्ग, मोक्ष आदि के सुख को देगा।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, २. दानोपदेश श्लोक ४८, PDF पृष्ठ ११४ (पढ़ें)

    उत्तमपात्र तो महाव्रती (मुनि) हैं तथा अणुव्रती (श्रावक) मध्यमपात्र हैं और व्रतरहित सम्यग्दृष्टि जघन्यपात्र हैं तथा व्रतसहित मिथ्यादृष्टि कुपात्र हैं तथा अव्रती मिथ्यादृष्टि अपात्र हैं ऐसा जानना चाहिए।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ४. एकत्वसप्तति श्लोक २७, PDF पृष्ठ १४२ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि इस प्रकार का चिंतन करता रहता है कि जो वस्तु संयोग से उत्पन्न हुई है वे सब मुझसे जुदी है तथा मुझे इस बात का ज्ञान है कि उन संयोग से पैदा हुई समस्त वस्तुओं के त्याग से मैं मुक्त हूँ। मेरी आत्मा में किसी प्रकार के कर्म का सम्बन्ध नहीं है।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक २३, PDF पृष्ठ १६२ (पढ़ें)

    श्रावकों को मद्य, मांस, मधु का तथा पाँच उदुम्बरों का अवश्य त्याग कर देना चाहिए और सम्यग्दर्शनपूर्वक इन आठों का त्याग ही गृहस्थों के आठ मूलगुण हैं।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ६. उपासक संस्कार श्लोक २६, PDF पृष्ठ १६३ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि श्रावक ऐसे देश को तथा ऐसे पुरुष को और ऐसे धन को तथा ऐसी क्रिया को कदापि आश्रयण नहीं करते जहाँ पर उनका सम्यग्दर्शन मलिन होवे तथा व्रतों का खंडन होवे।

  • पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, ७. देशव्रतोद्योतन श्लोक ५, PDF पृष्ठ १७४ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शनपूर्वक आठ मूलगुणों का पालना तथा अहिंसादि पाँच अणुव्रतों का धारण करना और दिग्व्रत आदि तीन गुणव्रत तथा देशावकाशिक आदि चार प्रकार के शिक्षाव्रत इस प्रकार इन सात शील व्रतों को पालना और रात में खाद्य, स्वाद्य आदि आहारों का त्याग करना और स्वच्छ कपड़े से छाने हुए जल का पीना तथा शक्ति के अनुकूल मौन आदि व्रतों का …

  • नीतिवाक्यामृत, (२४) राजरक्षा-समुद्देशः, PDF पृष्ठ ३४१ (पढ़ें)

    अतएव सम्यक्त्व और सदाचार को सुरक्षित रखते हुए पुत्रों को अपने पिता की

  • कर्मप्रकृति, श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः, PDF पृष्ठ १९९ (पढ़ें)

    असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चौथा गुणस्थान औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व अथवा वेदकसम्यक्त्व में वर्तमान जीव अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया तथा लोभ कषाय के उदय के कारण बारह प्रकार के असंयम में प्रवृत्त रहने से असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होता है।

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १२७ (पढ़ें)

    …हुए भंडागार में (भंडारे में) अग्नि के लग जाने पर तथा उसकी ज्वाला बढ़ जाने पर शीघ्र शुद्ध वा अशुद्ध पानी से उसे बुझा देता है, उसी प्रकार मुनिराज भी सम्यग्दर्शन आदि रत्नों की रक्षा करने के लिए अपने पेट में बढ़ी हुई क्षुधारूपी वह्नि को सरस वा नीरस आहार लेकर, शीघ्र ही बुझा देते हैं इसको ‘उदराग्निप्रशमन’ वृत्ति कहते हैं।…

  • मूलाचार प्रदीप, PDF पृष्ठ १४६ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि पुरुष शृंगार, युद्ध, हास्य आदि को पुष्ट करने वाले तथा कलियुग का कौतूहल बढ़ाने वाले (परस्पर युद्ध कराने वाले) अनेक प्रकार के शास्त्रों को कभी नहीं सुनते हैं। जो शास्त्र मिथ्यामतरूपी पाप से भरे हुए हैं, जो महा पाप उत्पन्न करने वाले हैं और धूर्तों के द्वारा बनाये गये हैं ऐसे शास्त्र भी कभी नहीं सुनते हैं।

  • मूलाचार प्रदीप, दशमोऽधिकारः श्लोक २६८२, PDF पृष्ठ ४७६ (पढ़ें)

    सम्यग्दृष्टि पुरुष सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के रहते हुए भी अणुव्रत वा महाव्रतों के बिना बच्चे के समान जो मृत्यु को प्राप्त होते हैं उसको बालमरण कहते हैं।


८. पुराण एवं चरित्र ग्रंथों में सम्यक्त्व के प्रसंग

  • श्रेणिक चरित्र, नवमः सर्गः श्लोक २०२ से २०४, PDF पृष्ठ १५१ (पढ़ें)

    मुनि के दुःख से दुःखित किन्तु उनके ध्यान की अचलता से हर्षित चित्त एवं प्रशम, संवेग आदि सम्यक्त्व गुणों से

  • श्रेणिक चरित्र, दशमः सर्गः श्लोक ५९ से ७०, PDF पृष्ठ १६० (पढ़ें)

    अन्त में सम्यग्दर्शनादि गुणों से भूषित, विद्वान् आहार के न मिलने पर भी प्रसन्न चित्त, मुनि सुषेण जूरा प्रमाण भूमि को निरखते राजमन्दिर की ओर आहारार्थ चल दिये।

  • श्रेणिक चरित्र, दशमः सर्गः श्लोक १६८, PDF पृष्ठ १७१ (पढ़ें)

    कदाचित् विहार करता-करता उस समय मैं भी कौशांबी में आ पहुँचा। मैंने जो वन किले के बिलकुल पास था। उसी में स्थित हो ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया। वहाँ ध्यान करते माली ने मुझे देखा। वह तत्काल राजा प्रजापाल के पास भागता-भागता पहुँचा और मेरे आगमन का सारा समाचार राजा से कह सुनाया। सुनते ही राजा प्रजापाल तत्काल मेरे दर्शन के लिए…

  • श्रेणिक चरित्र, एकादशः सर्गः श्लोक १३५, PDF पृष्ठ १८९ (पढ़ें)

    आप निश्चय समझिए यह धर्मरूपी वृक्ष सम्यग्दर्शनरूपी जड़ का धारक, शास्त्ररूपी पीड़ कर युक्त, दानरूपी शाखाओं से शोभित, अनेक प्रकार के गुणरूपी पत्तों से व्याप्त, कीर्तिरूपी पुष्पों से सुसज्जित, व्रतरूपी उत्तम आल-बाल से मनोहर, मोक्षरूपी फल का देने वाला, क्षमारूपी जल से बढ़ा हुआ परम पवित्र है।

  • श्रेणिक चरित्र, एकादशः सर्गः श्लोक ३५३, PDF पृष्ठ २१२ (पढ़ें)

    प्रभो! अकारण दीनबन्धो! मेरे इन पापों का छुटकारा कैसे होगा ? मैं अब कैसे इन पापों से बचूँगा? कृपाकर मुझे कोई ऐसा उपाय बतावें जिससे मेरा कल्याण हो। मुनिराज परम दयालु थे उन्होंने वानर को पंच अणुव्रत का उपदेश दिया और भी अनेक उपदेश दिये। वानर ने भी मुनिराज की आज्ञानुसार पंच अणुव्रत पालने स्वीकार कर लिए। अहंकार क्रोध आदि जो …

  • श्रेणिक चरित्र, एकादशः सर्गः श्लोक ३५९ से ३६८, PDF पृष्ठ २१४ (पढ़ें)

    राजमन्दिर में जाकर सम्यग्दर्शनपूर्वक जैन-धर्म धारण कर मुनिराजों के उत्तमोत्तम गुणों का निरन्तर स्मरण करते हुए रानी चेलना और चतुरंग सेना के साथ आनन्दपूर्वक राजमन्दिर में रहने लगे ॥३५९-३६८॥

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक २२ से २७, PDF पृष्ठ २१७ (पढ़ें)

    कुमार वारिषेण अनेक ज्ञान-विज्ञानों का पारगामी, मनोहर रूप का धारक सम्यग्दर्शन से भूषित और मोक्षगामी था। वारिषेण के अनंतर-रानी चेलना के हल्ल-हल्ल के पीछे विदल-विदल के पीछे जितशत्रु ये तीन पुत्र और भी उत्पन्न हुए और ये तीनों ही कुमार माता-पिता को आनंदित करने वाले हुए।

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक १२३, PDF पृष्ठ २२६ (पढ़ें)

    राजन्भव्योत्तमाधीश शृणु तत्वानि पूर्वतः। सम्यग्दर्शन हेतूनि मोक्षसद्धामसत्पदम् ॥१२३॥

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक १६५, PDF पृष्ठ २२९ (पढ़ें)

    अंतर्मुहूर्त्ततश्चोर्द्धवं सम्यक्त्वोदयतो नृप। क्षायोपशमिकं राजन्नासादि च त्वया परं ॥१६५॥

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक १७१ से १७२, PDF पृष्ठ २२९ (पढ़ें)

    राजन्! इस सम्यग्दर्शन की कृपा से जीवों के कुव्रत भी सुव्रत कहलाते हैं और उसके बिना योगियों के सुव्रत भी कुव्रत हो जाते हैं। भव्योत्तम! तू अब किसी बात का भय मत कर। सम्यग्दर्शन की कृपा से आगे उत्सर्पिणी काल में तू इसी भरत क्षेत्र में पद्मनाभ नाम का धारक तीर्थंकर होगा।

  • श्रेणिक चरित्र, द्वादशः सर्गः श्लोक १७४, PDF पृष्ठ २३० (पढ़ें)

    समस्त दोषसंत्यक्तं सम्यग्दर्शनमाश्रितम्। विनयो विधिना राजंस्त्वयाऽसादि स्वभावतः ॥१७४॥

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक १३, PDF पृष्ठ २३३ (पढ़ें)

    प्रातस्तद्धाम्नि संभुज्य गंगायां पशिवकेन सः। जैनेनामा चचालाशु सम्यक्त्वव्रतभासिना ॥१३॥

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ५२, PDF पृष्ठ २३६ (पढ़ें)

    समस्तदोषनिर्मुक्ते देवे देवेंद्रवंदिते। निश्चिकाय निजं चित्तं ससम्यक्त्वं धरासुर ॥५२॥

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ५४ से ६२, PDF पृष्ठ २३६ (पढ़ें)

    कदाचित् श्रावक व्रतों से युक्त सम्यक्त्व के धारी आपस में परम स्नेही वे दोनों तत्त्व चर्चा करते हुए मार्ग में जा रहे थे पूर्व पाप के उदय से उन्हें दिशा भूल हो गई।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ६६ से ७३, PDF पृष्ठ २३७ (पढ़ें)

    देव के उपदेश से हाथी ने सम्यग्दर्शन के साथ शीघ्र ही श्रावकव्रत धारण किये। देव वहाँ से चला गया। हाथी भी प्रासुक जल और पक्व फलाहारों से श्रावक व्रत पालन करने लगा।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ५३ से ८५, PDF पृष्ठ २३८ (पढ़ें)

    दृढ़सम्यक्त्वकथा से पूर्ण जिन शासन को स्मरण करते हुए भगवान् के गुणों में दत्तचित्त वे सब प्रीतिपूर्वक नगर में आ गये और बड़े-बड़े महाराजों को वश में कर महाराज श्रेणिक ने महामंडलेश्वर पद प्राप्त कर लिया ॥५३-८५॥

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ८६, PDF पृष्ठ २३८ (पढ़ें)

    अपने वचनों से सम्यक्त्व की महिमा गान करते हुए वे कहने लगे कि-भरत क्षेत्र में महाराज श्रेणिक सम्यग्दर्शन से अतिशय शोभित हैं।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ९० से १०१, PDF पृष्ठ २३९ (पढ़ें)

    उसका सम्यक्त्वरूपी वृक्ष शास्त्ररूपी जल से सिंचित है और उस सम्यग्दर्शन का दृढ़ भावरूपी महामूल छिन्न नहीं किया जा सकता। महाराज इन्द्र द्वारा श्रेणिक के सम्यग्दृष्टिपने की इस प्रकार प्रशंसा सुन सभा में स्थित समस्त देव आश्चर्य करने लगे एवं अति प्रीति युक्त किन्तु मन में अति आश्चर्य युक्त दो देव शीघ्र ही महाराज श्रेणिक की …

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ९१, PDF पृष्ठ २३९ (पढ़ें)

    इति संशयतस्तस्य सम्यक्त्वं च शचीपतेः। श्रुत्वा सर्वे दधुश्चित्ते विस्मयं धर्ममानसाः ॥९१॥

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः, PDF पृष्ठ २४० (पढ़ें)

    तेरे सम्यग्दर्शन भी नहीं मालूम होता। श्रेणिक के ऐसे वचन सुन देव ने जवाब दिया-राजन्! जो मैंने कहा है सो बिलकुल ठीक कहा है।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक १०७ से ११०, PDF पृष्ठ २४० (पढ़ें)

    संवेगादि गुणों के अभाव से तो तेरे सम्यग्दर्शन नहीं है और दया बिना चरित्र नहीं है। ऐसे दुष्कर्म करने से तू बुद्धिमान् भी नहीं है, नीतिमान्, योगी और शास्त्रवेत्ता भी नहीं।

  • श्रेणिक चरित्र, त्रयोदशः सर्गः श्लोक ११४ से ११९, PDF पृष्ठ २४१ (पढ़ें)

    अनेक अन्याय गुण और सम्यग्दर्शन से शोभित उन दोनों दंपती को नमस्कार कर आकाश में पुष्प-वर्षा के साथ वाद्यनादों को कर अतिशय हर्षित और राजा रानी के गुणों में दत्तचित्त वे दोनों देव कीर्ति भाजन बने।

  • श्रेणिक चरित्र, चतुर्दशः सर्गः श्लोक १३८ से १४८, PDF पृष्ठ २५४ (पढ़ें)

    आयु के अन्त में संन्यास लेकर और ध्यान बल से प्राण परित्याग कर निर्मल सम्यग्दर्शन की कृपा से स्त्रीवेद का त्याग किया और महान् ऋद्धि धारक अनेक देवों से पूजित देव हो गया।

  • श्रेणिक चरित्र, पंचदशः सर्गः श्लोक १२४, PDF पृष्ठ २७१ (पढ़ें)

    इस चरित्र को पढ़ने वाले मोक्षफल की तथा सुनने वाले को पद्मेश्वर के समान आगामी संसार की मनुष्य पर्याय और देव पर्याय का सुख भोगकर सम्यक्त्व के फल की प्राप्ति होती है।

  • जिनदत्त चरित्रम्, प्रथमः सर्गः श्लोक ४२, PDF पृष्ठ २९ (पढ़ें)

    इसके हृदय में जिस प्रकार निर्मल बहुमूल्य मोतियों का गुंफित हार शोभित होता था उसी प्रकार इसके चित्त में मुक्त स्वरूप में स्थित आत्माओं के ध्यान से निर्मल गुणों से विशिष्ट सम्यग्दर्शन व सुन्दर नेत्रों से भी शोभित होती थी ॥४२॥

  • जिनदत्त चरित्रम्, पञ्चमः सर्गः श्लोक ११९, PDF पृष्ठ १६४ (पढ़ें)

    …मुनिदान, जैनशास्त्रों के अध्ययन और अभ्यास से विशेष सम्यग्ज्ञान में आसक्त तथा जितेन्द्रिय, मुक्तावलि आदि अनेक व्रतोपवासों की विधि में लवलीन, सम्यक्त्वरूपी मोतियों के शुभ आभूषणों से सुन्दर प्रसन्नमुख वाली, काम की इच्छा रहित हो दिन बिताने लगीं एवं पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई कीर्ति और लक्ष्मी के समान उन दोनों को देखकर…

  • जिनदत्त चरित्रम्, षष्ठः सर्गः श्लोक ९०, PDF पृष्ठ १८५ (पढ़ें)

    मन इन्द्रियों को लगाकर, श्रम/थकान को लाकर, अपनी शिक्षा के बल से लघुता को अच्छी तरह दिखलाते हुए शक्ति सामर्थ्य से चारों तरफ घुमाने आदि के द्वारा उस हाथी पर सवार हो गए ॥९०॥

  • जिनदत्त चरित्रम्, नवम सर्गः श्लोक ४९, PDF पृष्ठ २३४ (पढ़ें)

    गृहस्थ धर्म भी परम्परा से स्वर्ग व मोक्ष का कारण है, इसलिए तुम गृहस्थ धर्म को, सम्यग्दर्शन की प्रीतिपूर्वक पालन करो ॥४९॥

  • जिनदत्त चरित्रम्, नवम सर्गः श्लोक ९५ से ९६, PDF पृष्ठ २४५ (पढ़ें)

    उस समय उन्होंने सारभूत चार आराधनाओं की आराधना की और कठिन-कठिन तपों से कृश हुए शरीर को छोड़कर, सम्यग्दर्शनरूपी रत्न से सुशोभित वह जिनदत्त का जीव बड़े भारी सुख के खजानेरूप आठवें स्वर्ग में देवाङ्गनाओं के मनरूपी मणि को चुराने वाला देव हुआ ॥९५,९६॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १३ (पढ़ें)

    उन जिनसेन यति की जय हो, जो वास्तव में जिनसेन हैं अर्थात् सम्यग्दृष्टि आदि में मुख्य हैं तथा सरस्वती के मन्दिर हैं और जिन्होंने पुण्य-पुरुषों के चरितों को गूँथकर अथाह पुराण-समुद्र को जन्म दिया ॥१८॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १६ (पढ़ें)

    विशिष्टोऽनिष्टनिर्मुक्तः सम्यग्दृष्टिः सुमृष्टवाक्। सर्वैष्टस्पष्टगमको गरिष्ठो हृष्टमानसः ॥५०॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ २१ (पढ़ें)

    वे उत्तम श्रेणी के पुरुष थे, गुणों के भण्डार और सम्यग्दृष्टि थे। उदार-चित्त थे, प्रतापी और भारी ऐश्वर्य वाले थे। उनकी महारानी का नाम चेलिनी था।

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ३५ (पढ़ें)

    आपने मगध देश के बहुत से शत्रुओं की जीत लिया है, आप सम्यग्दर्शन से युक्त और मिष्टभाषी हैं तथा भावी तीर्थंकर हैं। आपके प्रश्नों को सुनकर हमें बहुत खुशी हुई और हमारे पुण्योदय की भी उद्भूति हुई।

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ५५ (पढ़ें)

    वह देव सम्यग्दृष्टि था, बुद्धिमान् और शुद्ध-चित्त था। उसने जितना कुछ काम किया था वह सब हर्ष के साथ और उत्तम रीति से किया था।

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ७९ (पढ़ें)

    वन्दित्वा धर्ममाकर्ण्य सम्यग्दर्शनमाददे । चारणौ स पुनर्नत्वा प्रत्येत्य प्राविशत्पुरम् ॥१५॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ९५ (पढ़ें)

    उन्होंने सम्यग्दर्शन व्रत और तत्त्वों का व्याख्यान किया। उसे सुनकर अमिततेज ने पूछा कि भगवन्! यह बताइए कि अशनिघोष ने मेरी बहिन सुतारा को क्यों हरा ?

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ ९८ (पढ़ें)

    दद्दानं सुपात्रेभ्यः शृण्वन्धर्मकथां पराम्। निर्दोषं निर्मलं शान्तं सम्यक्त्वं श्रितवाञ्छमी ॥२२७॥

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १०४ (पढ़ें)

    …प्रभाव से वह अच्युत स्वर्ग का स्वामी इन्द्र हुआ और वह अनंतवीर्य का जीव जो कि पहले नरक में नारकी हुआ था, पूर्वभव के पिता धरणेन्द्र के सम्बोधने से सम्यग्दृष्टि हो गया।…

  • पाण्डव पुराण, PDF पृष्ठ १०५ (पढ़ें)

    एक दिन दूसरे स्वर्ग के इन्द्र ने अपनी सभा में वज्रायुध के दृढ़ सम्यक्त्व की खूब ही प्रशंसा की और कहा कि वज्रायुध गुणों का आधार है।

  • पाण्डव पुराण, पञ्चमं पर्व श्लोक ७२ से ७४, PDF पृष्ठ १११ (पढ़ें)

    यह सुन इन्द्र ने उत्तर में कहा कि शुद्ध सम्यग्दृष्टि मेघरथ राजा प्रतिमायोग में लीन हो रहा है। वह ज्ञानी उत्तम गुणों का भण्डार होने से पूज्य है।

  • पाण्डव पुराण, द्वाविंशं पर्व श्लोक ५२ से ५९, PDF पृष्ठ ४६१ (पढ़ें)

    …दर्शनमोहनीय कर्म की तीन और चारित्रमोहनीय कर्म की चार अनन्तानुबन्धी कषाय इस प्रकार सात प्रकृतियों को, जो कि आत्मा के सम्यक्त्व गुण को घातती हैं, आत्मा से नष्ट कर दिया।

  • पाण्डव पुराण, पञ्चविंशतितमं पर्व श्लोक १३८ से १४६, PDF पृष्ठ ४९७ (पढ़ें)

    इसी प्रकार राजीमती, कुन्ती, सुभद्रा और द्रौपदी ने भी धर्म-साधन के लिए तत्पर होकर सम्यक्त्व के साथ-साथ व्रत धारण किये और चिरकाल तक शुद्ध भावों के साथ उनका पालन किया।

सम्यग्दर्शन संकलन, भाग २: अन्य ग्रंथों से उद्धरण

मोक्षमार्ग प्रकाशक, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, योगसार, परमात्मप्रकाश, न्यायदीपिका और न्याय मन्दिर से सम्यग्दर्शन सम्बन्धी उद्धरण, उन्हीं आठ विषयों में जो भाग १ (ऊपर पहली पोस्ट) में हैं। समयसार के उद्धरण भाग १ में हैं।

संदर्भ कैसे पढ़ें: श्लोक, गाथा, दोहा संख्या ग्रंथ की अपनी है। “PDF पृष्ठ” उस ग्रंथ के फोरम टॉपिक में लगी PDF का पृष्ठ है (केवल वहाँ दिया है जहाँ पृष्ठ से मिलान हो गया)। मोक्षमार्ग प्रकाशक का पृष्ठ टीकमगढ़ संस्करण (सं. पं. जवाहरलाल शास्त्री आदि) का छपा पृष्ठ है; “स्कैन देखें” पर वह पृष्ठ खुलता है। अर्थ फोरम पोस्ट से ज्यों का त्यों लिया है।

ग्रंथ: मोक्षमार्ग प्रकाशक · रत्नकरण्ड श्रावकाचार · प्रवचनसार · पंचास्तिकाय · नियमसार · योगसार · परमात्मप्रकाश प्रश्नोत्तरी · न्यायदीपिका · न्याय मन्दिर


१. सम्यग्दर्शन का स्वरूप एवं लक्षण

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७३ (स्कैन देखें)

    विपरीताभिनिवेश रहित जीवादिक तत्त्वार्थश्रद्धान सो सम्यग्दर्शनका लक्षण है।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७५ (स्कैन देखें)

    … ‘दर्शन’ शब्द का अर्थ भी यहाँ श्रद्धान मात्र ही ग्रहण करना।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७५ (स्कैन देखें)

    अभिनिवेश नाम अभिप्रायका है। सो जैसा तत्त्वार्थश्रद्धान का अभिप्राय है तैसा न होय, अन्यथा अभिप्राय होय, ताका नाम विपरीताभिनिवेश है।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७९ (स्कैन देखें)

    ऐसे अव्याप्ति अतिव्याप्ति असम्भविपनाकरि रहित सर्व सम्यग्दृष्टीनिविषै तो पाईए अर कोई मिथ्यादृष्टिविषे न पाइए ऐसा सम्यग्दर्शन का सांचा लक्षण तत्त्वार्थश्रद्धान है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ४ (पढ़ें)

    श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥4॥

    अर्थ: जो सत्यार्थ आप्त, आगम और तपोभृत् हैं उनके श्रद्धान से सम्यग्दर्शन होता है। आप्त तो समस्त पदार्थों को जानकर उनका सत्यार्थ स्वरूप प्रगट करनेवाले हैं; आगम - आप्त के द्वारा रचित रचनारूप शास्त्र हैं; आप्त द्वारा प्ररूपित शास्त्र के अनुसार आचरण को आचरने वाले तपोधन अर्थात् गुरु हैं। यहां सच्चे आप्त, सच्चे शास्त्र और सच्चे गुरु का श्रद्धान वह सम्यग्दर्शन कहा है; किन्तु असत्य आप्त, आगम और गुरु का श्रद्धान वह सम्यग्दर्शन नहीं है। वह सम्यग्दर्शन तीन मूढ़ताओं से रहित, अपने अष्ट अंगों सहित और अष्टमद रहित होता है।

  • पंचास्तिकाय, नवपदार्थ एवं मोक्षमार्ग प्रपंच, गाथा १०७ (पढ़ें)

    सम्मत्तं सद्दहणं भावाणं तेसिमधिगमो णाणं । चारित्तं समभावो विसएसु विरूढमग्गाणं ॥107॥

    अर्थ: भावों का अर्थात् नव-पदार्थों का श्रद्धान ही सम्यक्त्व है, उनका अवबोध सम्यग्ज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन ज्ञान पूर्वक विषयों के प्रति वर्तता हुआ समभाव ही चारित्र है।

  • पंचास्तिकाय, मोक्षमार्ग प्रपंच चूलिका, गाथा १६० (पढ़ें)

    धम्मादीसद्दहणं सम्मत्तं णाणमंगपुव्वगदं । चेट्ठा तवम्हि चरिया ववहारो मोक्खमग्गो त्ति ॥160॥

    अर्थ: धर्मास्तिकायादि का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है, अंगपूर्व सम्बन्धी ज्ञान सम्यग्ज्ञान एवं तप में चेष्टा सम्यक्चारित्र है। यह व्यवहार मोक्षमार्ग है।

  • नियमसार, जीव अधिकार, गाथा ५, PDF पृष्ठ ३८ (पढ़ें)

    अत्तागमतच्चाणं सद्दहणादो हवेइ सम्मत्तं । ववगयअसेसदोसो सयलगुणप्पा हवे अत्तो ॥5॥

    अर्थ: [ आप्तागमतत्त्वानां ] आप्त, आगम और तत्त्वोंकी [ श्रद्धानात् ] श्रद्धासे [ सम्यक्त्वम् ] सम्यक्त्व [ भवति ] होता है ; [ व्यपगताशेषदोषः ] जिसके अशेष [ समस्त ] दोष दूर हुए हैं ऐसा जो [ सकलगुणात्मा ] सकलगुणमय पुरुष [ आप्तः भवेत् ] वह आप्त है।

  • नियमसार, शुद्धभाव अधिकार, गाथा ५१, PDF पृष्ठ १३० (पढ़ें)

    विवरीयाभिणिवेसविवज्जियसद्दहणमेव सम्मत्तं । संसयविमोहविब्भमविवज्जियं होदि सण्णाणं ॥51॥

    अर्थ: [ विपरीताभिनिवेशविवर्जितश्रद्धानम् एव ] विपरीत अभिनिवेश रहित श्रद्धान ही [ सम्यक्त्वम् ] सम्यक्त्व है; [ संशयविमोहविभ्रमविवर्जितम् ] संशय, विमोह और विभ्रम रहित ( ज्ञान ) वह [ संज्ञानम् भवति ] सम्यग्ज्ञान है।

  • नियमसार, शुद्धभाव अधिकार, गाथा ५२, PDF पृष्ठ १३० (पढ़ें)

    चलमलिणमगाढत्तविवज्जियसद्दहणमेव सम्मत्तं । अधिगमभावो णाणं हेयोवादेयतच्चाणं ॥52॥

    अर्थ: [ चलमलिनमगाढत्वविवर्जितश्रद्धानम् एव ] चलता, मलिनता और अगाढ़ता रहित श्रद्धान ही [ सम्यक्त्वम् ] सम्यक्त्व है; [ हेयोपादेयतत्त्वानाम् ] हेय और उपादेय तत्त्वोंको [ अधिगमभावः ] जाननेरूप भाव वह [ ज्ञानम् ] [ सम्यक् ] ज्ञान है।

  • परमात्मप्रकाश, दूसरा महाधिकार, दूहा १५ के आधार पर (प्रो. वीरसागर जैन कृत संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी, पढ़ें)

    प्रश्न-10. सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं?
    उत्तर- परमार्थ से निज शुद्धात्मा का श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है तथा व्यवहार से षड्द्रव्यों के यथार्थ श्रद्धान का नाम सम्यग्दर्शन है। (देखिए दूहा- 15)

  • न्यायदीपिका, तृतीय परोक्ष प्रकाश, § ६० (पढ़ें)

    § ६० प्रतिषेधरूपोऽपि हेतुर्द्विविधः-विधिसाधकः प्रतिषेधसाधकश्चेति। तत्राद्यो यथा, अस्त्यत्र प्राणिनि सम्यक्त्वं विपरीताभिनिवेशाभावात्। अत्र विपरीताभिनिवेशाभावः प्रतिषेधरूपः सम्यक्त्वसद्भावं साधयतीति प्रतिषेधरूपो विधिसाधको हेतुः।

    अर्थ: (1) विधिसाधकप्रतिषेधरूप हेतु →जैसे-यहाँ ‘ इस जीव में सम्यक्त्व है, क्योंकि विपरीत अभिनिवेश का अभाव है ।’ ऐसे यहाँ ‘विपरीत अभिनिवेश का अभाव है’ यह हेतु प्रतिषेधरूप है, वह हेतु सम्यक्त्व के सद्भाव की सिद्धि करता है । इसलिये यह हेतु विधिसाधकप्रतिषेधरूप हेतु है ।


२. सम्यग्दर्शन के आठ अंग

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ११ (पढ़ें)

    इदमेवेदृशं चैव तत्वं नान्यन्नचान्यथा । इत्यकम्पाऽऽयसाम्भोवत् सन्मार्गेऽसंशया रुचिः ॥11॥

    अर्थ: यहां तत्त्वभूत आप्त, आगम और गुरु का जो लक्षण बताया है, वह ही सत्यार्थ स्वरूप है। ईदृशं चैव अर्थात् इसी प्रकार है, अन्य प्रकार नहीं है; ऐसा तलवार की धार के पानी की तरह सन्मार्ग में संशय रहित अकम्प रुचि अर्थात् श्रद्धान होना, वह निःशंकित अंग नाम का गुण है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १२, PDF पृष्ठ ६७ (पढ़ें)

    कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोदये । पापबीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकांक्षणा स्मृता ॥12॥

    अर्थ: इन्द्रियजनित सुख में सुखपने की आस्था रहित जो श्रद्धान भाव वह अनाकांक्षा नाम का सम्यक्त्व का गुण भगवान् ने कहा है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १३, PDF पृष्ठ ७१ (पढ़ें)

    स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रते । निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिः मता निर्विचिकित्सिता ॥13॥

    अर्थ: यह मनुष्य पर्याय का जो शरीर है वह स्वभाव से ही अपवित्र है। यहाँ किसी उत्तम मनुष्य के यदि रत्नत्रय प्रगट हो जाय तो उसकी अशुचि देह भी पवित्र है। इसलिये व्रतियों का शरीर रोगादि से मलिन देखकर भी उसमें ग्लानि का अभाव तथा रत्नत्रय में प्रीति होना उसका नाम निर्विचिकित्सा अंग है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १४, PDF पृष्ठ ७२ (पढ़ें)

    कापथे पथि दुःखांना कापथस्थेऽप्यसंमतिः । असंपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढ़ा दृष्टिरुच्यते ॥14॥

    अर्थ: नरक - तिर्यंच - कुमनुष्यादि गतियों का घोर दुखों का मार्ग ऐसा जो मिथ्यामार्ग उसकी, तथा कुमार्गी अर्थात् मिथ्यामार्ग पर चलनेवाले पुरुषों की जो मन से प्रशंसा नहीं करता, वचनों से स्तवन नहीं करता तथा काय से हाथ की अंगुलियां नखादि मिलाकर सराहना नहीं करता वह अमूढ़दृष्टि है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १५, PDF पृष्ठ ७३ (पढ़ें)

    स्वयंशुद्धस्य मार्गस्य, बालाशक्तजनाश्रयाम् । वाच्यतां यत्प्रमार्जन्ति, तद्वदन्त्युपगूहनम् ॥15॥

    अर्थ: यह जो जिनेन्द्र भगवान् का कहा हुआ रत्नत्रयरूप मार्ग है वह स्वयमेव शुद्ध है, निर्दोष है। इस रत्नत्रय मार्ग की किसी अज्ञानी तथा असक्त मनुष्य द्वारा आश्रय किये जाने से जो निंद्यता प्रकट हुई हो उसे दूर कर देना, शुद्ध निर्दोष कर देने को उपगूहन कहते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १६, PDF पृष्ठ ७४ (पढ़ें)

    दर्शनाच्चरणाद्वापि चलितां धर्मवत्सलैः । प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञैः स्थितिकरणमुच्यते ॥16॥

    अर्थ: कोई पुरुष पहले सम्यग्दर्शन सहित श्रद्धानी था तथा व्रत - संयम सहित चारित्र धारक था। पश्चात् किसी प्रबल कषाय के उदय से, खोटी संगति से, रोग की तीव्र वेदना से, दरिद्रता से, मिथ्या उपदेश से, तथा मिथ्यादृष्टियों के मंत्र - तंत्रादि चमत्कार देखकर सत्य श्रद्धान व आचारण से चलायमान होता हो तो उसे विचलित होता हो तो उसे विचलित जानकर जिनका धर्म में वात्सल्य है ऐसे धर्मात्मा प्रवीण पुरुष उसे उपदेशादि देकर पुन: सच्चे श्रद्धान व आचरण में स्थापित कर दें, उसे स्थितिकरण कहते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १७, PDF पृष्ठ ७६ (पढ़ें)

    स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव - सनाथापेतकैतवा । प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥17॥

    अर्थ: सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चारित्ररूप धर्म धारण करनेवालों का जो यूथ अर्थात् समूह वह धर्मात्मा का अपना समूह है। …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १८, PDF पृष्ठ ७८ (पढ़ें)

    अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् । जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः स्यात्प्रभावन ॥18॥

    अर्थ: संसारी जीवों के हृदय में अज्ञानरूपी अंधेरा फैला हुआ है, उसे सच्चे स्वरूप के प्रकाश से दूर करके जिनेन्द्र के शासन का माहात्म्य बतलाना - प्रकाश करना वही प्रभावना नाम का सम्यक्त्व का आठवां अंग है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २१, PDF पृष्ठ ७९ (पढ़ें)

    नाङ्गहीनं मलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसन्ततिम् । न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥21॥

    अर्थ: अंगों से हीन सम्यग्दर्शन संसार की परिपाटी - जन्मपरम्परा छेदने में समर्थ नहीं होता है; जैसे हीनाक्षर - मन्त्र विष की वेदना को नष्ट नहीं कर सकता है। जिसके भावों में निःशंकितादि अंग प्रकट होते हैं वही सम्यग्दृष्टि संसार परिभ्रमण का नाश करता है। जिसका आठ अंगों में से यदि एक अंग भी कम हे - प्रकट नहीं हो पाया है, उसके संसार का अभाव उसी प्रकार नहीं होता है, जिस प्रकार अक्षरहीन - मंत्र सर्पादि का विष दूर नहीं कर सकता है।


३. सम्यग्दर्शन के बाधक: मिथ्यात्व एवं दोष

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २२, PDF पृष्ठ ८० (पढ़ें)

    आपगा सागरस्नानमुच्चयः सिकताश्मनाम् । गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥22॥

    अर्थ: जो लौकिक - मिथ्याधर्मी लोग हैं उनका आचरण देखकर जो नदी में स्थान करने में धर्म मानते हैं, समुद्र में स्नान करने में धर्म मानते हैं, रेत का ढेर - पाषाण का ढेर करने में धर्म मानते हैं, पर्वत से गिर पड़ने में धर्म मानते हैं, अग्नि में गिर पड़ने धर्म मानते हैं उसे लोकमूढ़ता कहते हैं। सम्यग्दर्शन लोकमूढ़ता रहित ही होता है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २३ (पढ़ें)

    वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेषमलीमसाः । देवता यदुपासीत देवतामूढ़मुच्यते ॥23॥

    अर्थ: जो अपने को अच्छा लगता है उसे वर कहते हैं। वर की इच्छा करके आशावान होकर के जो रागद्वेष से मलिन देवताओं का सेवन करता है - पूजन करता है उसे देवतामूढ़ कहते हैं और उसका कार्य देवमूढ़ता कहलाती है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २४, PDF पृष्ठ ९१ (पढ़ें)

    सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनाम् । पाखण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाखण्डिमोहनम् ॥24॥

    अर्थ: परिग्रह, आरंभ और हिंसा सहित संसाररूप भंवरों में प्रवर्तन करनेवाले पाखण्डियों को प्रधान मानकर उनके वचनों में आदरपूर्वक प्रवर्तन करना पाखण्डमूढ़ता है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २५, PDF पृष्ठ ९१ (पढ़ें)

    ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः । अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः ॥25॥

    अर्थ: जिनका मद नष्ट हो गया है ऐसे गणधर देव हैं उन्होने मद आठ प्रकार का कहा है। ज्ञान १, पूजा २, कुल ३, जाति ४, बल ५, ऋद्धि ६, तप ७, शरीर ८ - इन आठ का आश्रयकर के जो मानीपना होता है उसे स्मय ( मद ) कहते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २६, PDF पृष्ठ ९७ (पढ़ें)

    स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थानगर्विताशयः । सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकै बिना ॥26॥

    अर्थ: जो कोई पुरुष गर्व करके धर्म के धारक अन्य धर्मात्मा पुरुषों का तिरस्कार करता है वह अपने धर्म का ही तिरस्कार करता है, क्योंकि धर्मात्मा पुरुषों के बिना धर्म नहीं पाया जाता है। इसलिये जो ज्ञान, पूजा, धन, तप, ऐश्वर्य, रूप आदि का मद करके धर्मात्माओं का तिरस्कार करता है वह अपने ही धर्म का तिरस्कार करता है, क्योंकि धर्म तो किसी पुरुष के आधार से ही रहता है, बिना पुरुष के धर्म तो रहता नहीं है।

  • नियमसार, परमार्थ प्रतिक्रमण अधिकार, गाथा ९१, PDF पृष्ठ १९६ (पढ़ें)

    मिच्छादंसणणाणचरित्तं चइऊण णिरवसेसेण । सम्मत्तणाणचरणं जो भावइ सो पडिक्कमणं ॥91॥

    अर्थ: [ मिथ्यादर्शनज्ञानचरित्रं ] मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रको [ निरवशेषेण ] निरवशेषरूपसे [ त्यक्त्वा ] छोड़कर [ सम्यक्त्वज्ञानचरणं ] सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका [ यः ] जो ( जीव ) [ भावयति ] भाता है, [ सः ] वह ( जीव ) [ प्रतिक्रमणम् ] प्रतिक्रमण है।


४. सम्यक्त्व के भेद, उत्पत्ति एवं कर्मसिद्धान्त

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २८३ (स्कैन देखें)

    सम्यक्त्व के उपाय: १. पहले तो आज्ञादिकरि वा कोई परीक्षाकरि कुदेवादिक का मानना छोड़ि अरहंतदेवादिक का श्रद्धान करना।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २८४ (स्कैन देखें)

    ऐसे अभ्यासतें दर्शनमोह मन्द होता जाय तब कदाचित् सांचा सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होय …

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २८५ (स्कैन देखें)

    विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धानरूप आत्मा का परिणाम सो तो निश्चय सम्यक्त्व है … बहुरि विपरीताभिनिवेश रहित श्रद्धान को कारणभूत श्रद्धान सो व्यवहार सम्यक्त्व है …

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २८७ (स्कैन देखें)

    विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धान भया सो आत्मा ही का स्वरूप है …

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २८८ (स्कैन देखें)

    तहाँ मिथ्यात्वगुणस्थानविषै करणकरि दर्शनमोहको उपशमाय सम्यक्त्व उपजै, ताको प्रथमोपशमसम्यक्त्व कहिए है।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २९१ (स्कैन देखें)

    बहुरि इस क्षयोपशमसम्यक्त्व ही का नाम वेदकसम्यक्त्व है।

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २९७ (स्कैन देखें)

    सम्यक्त्व के तो भेद तीन ही हैं।

  • पंचास्तिकाय, जीव द्रव्यास्तिकाय, गाथा ७० (पढ़ें)

    उवसंतखीणमोहो मग्गं जिणभासिदेण समुवगदो । णाणाणुमग्गचारी णिव्वाणपुरं वजदि धीरो ॥70॥

    अर्थ: जिस पुरुष ने जिन वचनों द्वारा मोक्षमार्ग को प्राप्त करके तथा दर्शनमोह के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम को प्राप्त करके सम्यग्ज्ञान प्रगट किया है, वह पुरुष शीघ्र निर्वाण को प्राप्त करता है।

  • नियमसार, शुद्धभाव अधिकार, गाथा ५३, PDF पृष्ठ १३० (पढ़ें)

    सम्मत्तस्स णिमित्तं जिणसुतं तस्स जाणया पुरिसा । अंतरहेऊ भणिदा दंसणमोहस्स खयपहुदी ॥53॥

    अर्थ: [ सम्यक्त्वस्य निमित्तं ] सम्यक्त्वका निमित्त [ जिनसूत्रं ] जिनसूत्र है; [ तस्य ज्ञायका: पुरुषा: ] जिनसूत्रके जाननेवाले पुरुषोंको [ अन्तर्हेतव: ] [ सम्यक्त्वना ] अंतरंग हेतु [ भणिता: ] कहे हैं, [ दर्शनमोहस्य क्षयप्रभृते: ] क्योंकि उनको दर्शनमोहके क्षयादिक हैं।


५. रत्नत्रय और मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७१ (स्कैन देखें)

    इन सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रनिविषै एक भी न होय तो मोक्षमार्ग न होय।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३, PDF पृष्ठ ४५ (पढ़ें)

    सदृष्टिज्ञानवृतानि धर्मं धर्मेश्वराः विदुः । यदीयप्रत्यनीकानि भवन्ति भवपद्धतिः ॥3॥

    अर्थ: धर्म के ईश्वर भगवान् तीर्थंकर परमदेव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र इन तीनों को धर्म कहते हैं; और इन तीनों से प्रतिकूल जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र हैं वे संसार परिभ्रमण की परिपाटी होते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३३ (पढ़ें)

    गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान् । अनगारो गृही श्रेयान् निर्मोही मोहिनो मुनेः ॥33॥

    अर्थ: जिसे दर्शनमोह नहीं ऐसा गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है; तथा मोही अनगार अर्थात् मोह सहित गृहरहित मुनि मोक्षमार्गी नहीं है। इसी कारण से मोहवान मुनि से निर्मोही - दर्शनमोह रहित गृहस्थ श्रेयान् अर्थात् उत्कृष्ट है।

  • प्रवचनसार, चरणानुयोगसूचक चूलिका: मोक्षमार्ग-प्रज्ञापन, गाथा २३७ (पढ़ें)

    ण हि आगमेण सिज्झदि सद्दहणं जदि वि णत्थि अत्थेसु । सद्दहमाणो अत्थे असंजदो वा ण णिव्वादि ॥237॥

    अर्थ: आगम से, यदि पदार्थों का श्रद्धान न हो तो, सिद्धि (मुक्ति) नहीं होती; पदार्थों का श्रद्धान करनेवाला भी यदि असंयत हो तो निर्वाण को प्राप्त नहीं होता।

  • पंचास्तिकाय, नवपदार्थ एवं मोक्षमार्ग प्रपंच, गाथा १०६ (पढ़ें)

    सम्मत्तणाणजुत्तं चारित्तं रागदोसपरिहीणं । मोक्खस्स हवदि मग्गो भव्वाणं लद्धबुद्धीणं ॥106॥

    अर्थ: सम्यक्त्व और ज्ञान से सहित एवं राग-द्वेष रहित चारित्रवंत भव्य जीवों को मोक्ष का मार्ग होता है।

  • पंचास्तिकाय, मोक्षमार्ग प्रपंच चूलिका, गाथा १६१ (पढ़ें)

    णिच्छयणएण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा । ण कुणदि किंचि वि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गो त्ति ॥161॥

    अर्थ: जो आत्मा सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ह्न इन तीनों में एकाग्र (अभेद) होता हुआ अन्य कुछ भी करता नहीं तथा छोड़ता भी नहीं है, वह निश्चयनय से मोक्षमार्ग कहा गया है।

  • पंचास्तिकाय, मोक्षमार्ग प्रपंच चूलिका, गाथा १६४ (पढ़ें)

    दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गो त्ति सेविदव्वाणि । साधूहि इदं भणिदं तेहिं दु बंधो व मोक्खो वा ॥164॥

    अर्थ: दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग हैं। इसलिए वे सेवन योग्य हैं; परन्तु उनसे बंध भी होता है और मोक्ष भी होता है।

  • नियमसार, जीव अधिकार, गाथा ४, PDF पृष्ठ ३६ (पढ़ें)

    णियमं मोक्खउवायो तस्स फलं हवति परमणिव्वाणं । एदेसिं तिण्हं पि य पत्तेयपरूवणा होइ ॥4॥

    अर्थ: [ नियमः ] ( रत्नत्रयरूप ) नियम [ मोक्षोपायः ] मोक्षका उपाय है; [ तस्य फलं ] उसका फल [ परमनिर्वाणं भवति ] परम निर्वाण है। [ अपि च ] पुनश्च ( भेदकथन द्वारा अभेद समझानेके हेतु ) [ एतेषां त्रयाणां ] इन तीनोंका [ प्रत्येकप्ररूपणा ] भेद करके भिन्न - भिन्न निरूपण [ भवति ] होता है।

  • नियमसार, शुद्धभाव अधिकार, गाथा ५४, PDF पृष्ठ १३० (पढ़ें)

    सम्मत्तं सण्णाणं विज्जुदि मोक्खस्स होदि सुण चरणं । ववहारणिच्छएण दु तम्हा चरणं पवक्खामि ॥54॥

    अर्थ: [ शृणु ] सुन, [ मोक्षस्य ] मोक्षके लिये [ सम्यक्त्वं ] सम्यक्त्व होता है, [ संज्ञानं ] सम्यग्ज्ञान [ विद्यते ] होता है, [ चरणम् ] चारित्र (भी) [ भवति ] होता है; [ तस्मात् ] इसलिये [ व्यवहारनिश्चयेन तु ] मैं व्यवहार और निश्चयसे [ चरणं प्रवक्ष्यामि ] चारित्र कहूँगा।

  • नियमसार, परम भक्ति अधिकार, गाथा १३४ (पढ़ें)

    जो दु धम्मं च सुक्कं च झाणं झाएदि णिच्चसो । तस्स सामाइगं ठाइ इदि केवलिसासणे ॥133॥

    अर्थ: [ यः तु ] जो [ धर्मं च ] धर्मध्यान [ शुक्लं च ध्यानं ] और शुक्लध्यानको [ नित्यशः ] नित्य [ ध्यायति ] ध्याता है, [ तस्य ] उसे [ सामायिकं ] सामायिक [ स्थायि ] स्थायी है [ इति केवलिशासने ] ऐसा केवलीके शासनमें कहा है।

  • योगसार, दोहा ८३ (पढ़ें)

    रयणत्तय-संजुत्त जिउ, उत्तिमु तित्थु पवित्तु। मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥83॥

    अर्थ: हे योगी ! रत्नत्रय से संयुक्त जीव ही उत्तम पवित्र तीर्थ है और वही मोक्ष का कारण है। अन्य कोई मंत्र-तंत्र आदि मोक्ष का कारण नहीं है।

  • योगसार, दोहा १०२ (पढ़ें)

    मिच्छादिउ जो परिहरणु, सम्मद्दंसण-सुद्धि। सो परिहार-विसुद्धि मुणि, लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥102॥

    अर्थ: मिथ्यात्वादिक के परिहार (त्याग) से जो सम्यग्दर्शन की शुद्धि होती है, उसे परिहारविशुद्धि नामक तीसरा चारित्र जानो। इससे जीव शीघ्र मोक्षसिद्धि को प्राप्त करता है।

  • परमात्मप्रकाश, दूसरा महाधिकार (प्रो. वीरसागर जैन कृत संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी, पढ़ें)

    प्रश्न-9. रत्नत्रय किसे कहते हैं?
    उत्तर- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का सामूहिक नाम रत्नत्रय है।

  • परमात्मप्रकाश, दूसरा महाधिकार, दूहा ३० के आधार पर (प्रो. वीरसागर जैन कृत संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी, पढ़ें)

    प्रश्न-20. सम्यक्चारित्र किसे कहते हैं?
    उत्तर- सम्यग्दर्शन से स्व और पर की यथार्थ प्रतीति करके तथा सम्यग्ज्ञान से स्व और पर को यथार्थ जानकर जो परभाव का त्याग किया जाता है और निजभाव का ग्रहण किया जाता है वही सम्यक्चारित्र है। (देखिए दूहा- 30)

  • परमात्मप्रकाश, दूसरा महाधिकार, दूहा ७२ के आधार पर (प्रो. वीरसागर जैन कृत संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी, पढ़ें)

    प्रश्न-38. वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान का क्या अभिप्राय है?
    उत्तर- श्रेष्ठ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का ही अपर नाम वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान है। (देखिए दूहा- 72)


६. सम्यग्दर्शन की महिमा एवं फल

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २८, PDF पृष्ठ १०८ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहजम् । देवादेवं विदुर्भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसम् ॥28॥

    अर्थ: सम्यग्दर्शन सहित, चांडाली के शरीर से उत्पन्न हुआ जो चांडाल है उसे भी गणधरदेव देव कहते हैं, जैसे भस्म से दबे हुए अंगार को अग्नि ही कहते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २९, PDF पृष्ठ १०९ (पढ़ें)

    श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्विषात् । कापि नाम भवेदन्या संपद्धर्माच्छरीरिणाम् ॥29॥

    अर्थ: धर्म ( पुण्य ) के प्रभाव से कुत्ता भी स्वर्ग में जाकर देवों में उत्पन्न हो जाता है, और पाप के प्रभाव से स्वर्गलोक का महान् ऋद्धिधारी देव भी यहाँ आकर कुत्ते के रूप में उत्पन्न हो जाता है। प्राणियों को, वचनों से जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है ऐसी अहमिंद्रों की सम्पदा तथा अविनाशी मुक्ति संपदा धर्म के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३१ (पढ़ें)

    दर्शनं ज्ञानचारित्रात् साधिमानमुपाश्नुते । दर्शनं कर्णधारं तन्मोक्षमार्गे प्रचक्षते ॥31॥

    अर्थ: ज्ञान और चारित्र से सम्यदर्शन अधिक उच्च अर्थात् साधिमान - सर्वोत्कृष्ट है, ऐसा जानकर उसे प्राप्त करने का पुरूषार्थ करना चाहिये। इसी कारण से मोक्ष के मार्ग में सम्यग्दर्शन को कर्णधार कहा है। जैसे समुद्र में जहाज को खेवटिया पार करता है उसी प्रकार अपार संसारसमुद्र में रत्नत्रयरूप जहाज को पार करने में सम्यग्दर्शन खेवटिया है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३२, PDF पृष्ठ ११२ (पढ़ें)

    विद्यावृत्तस्य संभूतिस्थितिवृद्धिफलोदयाः । न सन्त्यसति सम्यक्त्वे बीजाभावे तरोरिव ॥32॥

    अर्थ: जैसे बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलोदय नहीं होता है, उसी प्रकार ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलोदय सम्यक्त्व के अभाव में नहीं होता है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३४ (पढ़ें)

    न सम्यक्त्व समं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि । श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥

    अर्थ: जीवों का सम्यग्दर्शन के समान तीनों काल और तीनों लोकों में अन्य कोई कल्याण करनेवाला नहीं है; तथा मिथ्यात्व के समान तीनों कालों और तीनों लोकों में अन्य कोई अकल्याण करनेवाला नहीं है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३५, PDF पृष्ठ ११६ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शनशुद्धाः नारकतिर्यङ्नपुंसकस्त्रीत्वानि । दुष्कुलविकृताल्पायुः दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यव्रतिकाः ॥35॥

    अर्थ: जो जीव सम्यग्दर्शन से शुद्ध हैं, वे व्रत रहित होने पर भी नारकी, तिर्यंच, नपुंसक व स्त्रीपने को प्राप्त नहीं होते हैं; नीचकुल में जन्म, विकृत अर्थात् अंधा, काना, बहरा, टूंटा, लूला, लंगड़ा, गूंगा, कुबड़ा, बौना - ठिगना, हीन अंग, अधिक अंग, मांजरा - कंजा, विड्रूप - अभद्र नहीं होते हैं, तथा अल्प ? आयु के धारक व दरिद्रपने को प्राप्त नहीं होते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३६, PDF पृष्ठ ११७ (पढ़ें)

    ओजस्तेजो-विद्या-वीर्य-वृद्धि-विजय-सनाथाः । महाकुला महार्था मानवतिलका भवन्ति दर्शनपूताः ॥36॥

    अर्थ: जो पुरुष सम्यग्दर्शन से पवित्र हैं, वे मनुष्यों के तिलक अर्थात् समस्त मनुष्यों को शोभित करनेवाले, समस्त मनुष्यों के मस्तक के ऊपर धारण किये जाने योग्य, ऐसे मनुष्यों के तिलक होते हैं। और कैसे होते हैं? ओज अर्थात् पराक्रम, तेज अर्थात् प्रताप, विद्या अर्थात् समस्त लोक में अतिशय रूप ज्ञान,वीर्य अर्थात् अतिशयरूप शक्ति, उज्ज्वल यश, वृद्धि अर्थात् दिन प्रतिदिन गुणों की और सुख की वृद्धि, विजय अर्थात् सब प्रकार से जीत, अतिशयरूप वैभव - इस प्रकार ओज, तेज, विद्या, वीर्य, यश, वृद्धि, विजय, वैभव इन सभी गुणों के स्वामी होते हैं। …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३७ (पढ़ें)

    अष्टगुणपुष्टितुष्टाः दृष्टिविशिष्टाः प्रकृष्टशोभाजुष्टाः । अमराप्सरसां परिषदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ताः स्वर्गे ॥37॥

    अर्थ: जिनेन्द्र के भक्त सम्यग्दृष्टि देवों में जन्म लेकर अप्सराओं के समूह के बीच में चिरकाल तक रमते हैं - सुख भोगते हैं। कैसे होकर रमते हैं? अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व - जो ये आठ गुण है, उनकी पुष्टता अर्थात् जो अन्य असंख्यात देवों में नहीं पाई जावे ऐसी अधिकता से संतुष्ट होकर रमते हैं; तथा सब देवों से उत्कृष्ट ऐसी कांति, तेज, यश से शोभायमान होकर स्वर्गलोक में आनंदपूर्वक निवास करते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३८, PDF पृष्ठ ११८ (पढ़ें)

    नवनिधिसप्तद्वयरत्नाधीशाः सर्वभूमिपतयश्चक्रम् । वर्तयितुं प्रभवन्ति स्पष्टदृशाः क्षत्रमौलिशेखरचरणाः ॥38॥

    अर्थ: जिनके उज्ज्वल सम्यग्दर्शन है वे जीव स्वर्गलोक में आयु पूर्व व्यतीत करके, यहाँ मनुष्यलोक में आकर, नवनिधि चौदह रत्नों के स्वामी, समस्त भरतक्षेत्र के बत्तीस हजार देशों के मालिक, बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं के मस्तक के ऊपर मुकुटरूप हैं चरण जिनके, ऐसे चक्र को प्रवर्तन करने की सामर्थ्य वाले चक्रवर्ती होते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३९, PDF पृष्ठ ११९ (पढ़ें)

    अमरासुरनरपतिभिर्यमधरपतिभिश्च नूत पादाम्भोजाः । दृष्ट्या सुनिश्चितार्थाः वृषचक्रधराः भवन्ति लोकशरण्याः ॥39॥

    अर्थ: जिन पुरुषों ने सम्यग्दर्शन पूर्वक पदार्थों का सच्चा निर्णय किया है, वे अमरपति, असुरपति, नरपति, संयमियों के पति गणधरादि के द्वारा वन्दनीक हैं चरणकमल जिनके तथा लोगों को उत्कृष्ट शरणभूत हैं, ऐसे धर्मचक्र के धारक तीर्थंकररूप से उत्पन्न होते हैं।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ४० (पढ़ें)

    शिवमजरमरूजमक्षयमव्याबाधं विशोकभयशंकम् । काष्ठागतसुखविद्याविभवं विमलं भजन्ति दर्शनशरणाः ॥40॥

    अर्थ: जिनको सम्यग्दर्शन ही शरण है, वे पुरुष शिव अर्थात् निराकुलता लक्षण रूप जो मोक्ष है उसका अनुभव करते हैं। कैसा है शिव ? …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, द्वितीय सम्यग्ज्ञान अधिकार, श्लोक ४१, PDF पृष्ठ ११९ (पढ़ें)

    देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानं राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोर्चनीयम् । धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकं लब्ध्वा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्याः ॥41॥

    अर्थ: जिनेन्द्र परमात्मा के स्वरूप में भक्तिरूप अनुराग जिसे होता है, वह भव्य सम्यग्दृष्टि है। वह सम्यग्दृष्टि इस मनुष्यभव से जाकर स्वर्गलोक में अप्रमाण - अमाप ऋद्धि सुख वैभव के प्रभाव वाले देवेन्द्रों के समूह की महिमा प्राप्त करके, पश्चात् इसी पृथ्वी पर आकर बत्तीस हजार राजाओं के मस्तक द्वारा पूज्य राजेन्द्र चक्रवर्ती के चक्र को प्राप्त करके, फिर अहमिन्द्रलोक की महिमा को भी पाकर समस्त लोक को अपने आधीन किया जिसने, ऐसे भगवान् तीर्थंकर का धर्मचक्र प्राप्त करके निर्वाण को प्राप्त होता है। …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, अष्टम प्रतिमा अधिकार, श्लोक १५०, PDF पृष्ठ ५१८ (पढ़ें)

    सुखयतु सुखभूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिव जननी मां शुद्धशीला भुनक्तु । कुलमिव गुणभूषा कन्यका संपुनीताज्जिनपतिपद पद्मप्रेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मीः ॥150॥

    अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् के चरण कमलों का अवलोकन करनेवाली सम्यग्दर्शनरुप लक्ष्मी मुझे उसी प्रकार सुखी कर दे, जिस प्रकार कामिनी (स्त्री) कामी पुरुष को सुखी कर देती है; जैसे शुद्धशीला अर्थात् शुद्ध स्वभाव की धारक माता अपने पुत्र का पालन करती है, वैसा ही मेरा पालन करो; तथा जैसे शीलादि गुण ही हैं आभूषण जिसके ऐसी कन्या कुल को पवित्र करती है, उसी प्रकार हे सम्यग्दर्शन! मुझे भी पवित्र करो, उज्ज्वल करो।

  • योगसार, दोहा २५ (पढ़ें)

    चउरासी लक्खहिँ फिरिउ, कालु अणाइ अणंतु। पर सम्मत्तु ण लद्धु जिय, एहउ जाणि णिभंतु ॥25॥

    अर्थ: अहो ! इस जीव ने अनादि - अनन्त काल से चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण किया है और सब कुछ प्राप्त किया है, परन्तु निश्चित समझो कि कभी सम्यक्त्व को प्राप्त नहीं किया।

  • योगसार, दोहा ९० (पढ़ें)

    जो सम्मत्त-पहाण बुहु, सो तइलोय-पहाणु। केवल-णाण वि लहु लहइ, सासय-सुक्ख-णिहाणु ॥90॥

    अर्थ: जो सम्यक्त्व-प्रधान ज्ञान है, वही तीन लोक में श्रेष्ठ है। उसी से शीघ्र केवलज्ञान एवं शाश्वत सुख के निधान को प्राप्त किया जा सकता है।


७. सम्यग्दृष्टि का स्वरूप एवं आचरण

  • मोक्षमार्ग प्रकाशक, नवमा अधिकार, पृष्ठ २७६ (स्कैन देखें)

    जीव अजीवादिकका नामादिक जानो वा मति जानो वा अन्यथा जानो, उनका स्वरूप यथार्थ पहचानि श्रद्धान किए सम्यक्त्व हो है।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक २७, PDF पृष्ठ ९९ (पढ़ें)

    यदि पापनिरोधोऽन्यसंपदा किं प्रयोजनम् । अथ पापस्त्रवोऽस्त्यन्यसंपदा किं प्रयोजनम् ॥27॥

    अर्थ: सम्यग्दृष्टि विचार करता है - यदि मेरे ज्ञानावरणादि अशुभ पाप प्रकृतियों का आस्त्रव होना रुक गया है तो अब मेरे पास जितनी संपत्ति है उससे अधिक संपत्ति प्राप्त हो जाने से मुझे क्या प्रयोजन है? यदि मेरे उन अशुभ पाप प्रकृतियों का आस्त्रव होना चालू ही है तथा संपत्ति भी आ रही है, तो इस नई आनेवाली संपत्ति से मुझे क्या प्रयोजन है, कितना लाभ है?

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक ३०, PDF पृष्ठ १०९ (पढ़ें)

    भयाशास्नेहलोभाच्च कुदेवागलिङ्गनाम् । प्रमाणं विनयं चैव न कुर्युः शुद्धदृष्टयः ॥30॥

    अर्थ: जो शुद्ध सम्यग्दृष्टि हैं वे भय से, आशा से, स्नेह से, लोभ से, कुदेव, कुआगम और कुलिंगधारी को प्रणाम नहीं करते हैं। विनय नहीं करते हैं। जो काम, क्रोध, भय, इच्छा, क्षुधा, तृषा, राग, द्वेष, मद, मोह, निद्रा, हर्ष, विषाद, जन्म, मरण आदि दोषों सहित हैं वे सब कुदेव हैं। उनका फैलाव इस जगत् में पंचमकाल के प्रभाव से बहुत है। अकेले एक सर्वज्ञ अन्तराग के सिवाय शेष सब कुदेव हैं। …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, सप्तम सल्लेखना अधिकार, श्लोक १३० (पढ़ें)

    निःश्रेयसमभ्युदयं निस्तीरं दुस्तरं सुखाम्बुनिधिम् । निःपिबति पीतधर्मा सर्वै र्दुःखैरनालीढः ॥130॥

    अर्थ: इस प्रकार समाधिमरण धारण करनेवाला सम्यग्दृष्टि अंत समय में सल्लेखना सहित बारह व्रतों को धारण कर लेता है; वह जिनेन्द्र के धर्मरुप अमृत का पानकर तृप्त हो जाता है। पीतधर्मा अर्थात् जिसने धर्म का आचरण पिया है ऐसा धर्मात्मा श्रावक अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग का महद्धिक देवपना असंख्यात काल तक भोगकर, फिर मनुष्यों में उत्तम राज्यादि वैभव पाकर, फिर संसार - शरीर - भोगों से विरक्तहोकर, शुद्ध संयम अंगीकार करके निःश्रेयस जो निर्वाण है, उसे निःपिबति अर्थात् आस्वादन करता है, अनुभव करता है। कैसा है निःश्रेयस ? …

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, अष्टम प्रतिमा अधिकार, श्लोक १३७, PDF पृष्ठ ५१२ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शनशुद्धः संसारशरीरभोगनिर्विण्णः । पंचगुरुचरणशरणो दार्शनिकस्तत्त्वपथगृह्यः ॥137॥

    अर्थ: जो सम्यग्दर्शन के पच्चीस मल दोषों से रहित हो; निरन्तर संसार - वास से, शरीर के साथ से, इन्द्रियों के भोगों से विरक्त हो; पंच परमेष्ठी ही जिसको शरणभूत हों; सर्वज्ञभाषित जीवादि तत्त्वों का श्रद्धान करनेवाला हो; वह सत्यार्थ मार्ग में ग्रहण करने योग्य दार्शनिक श्रावक प्रथम पद का धारक होता है।

  • प्रवचनसार, चरणानुयोगसूचक चूलिका: शुभोपयोग-प्रज्ञापन, गाथा २६४ (पढ़ें)

    ण हवदि समणो त्ति मदो संजमतवसुत्तसंपजुत्तो वि । जदि सद्दहदि ण अत्थे आदपधाणे जिणक्खादे ॥264॥

    अर्थ: सूत्र, संयम और तप से संयुक्त होने पर भी यदि (वह जीव) जिनोक्त आत्मप्रधान पदार्थों का श्रद्धान नहीं करता तो वह श्रमण नहीं है - ऐसा (आगम में) कहा है।

  • नियमसार, निश्चय परमावश्यक अधिकार, गाथा १५४, PDF पृष्ठ ३२९ (पढ़ें)

    जदि सक्कदि कादुं जे पडिकमणादिं करेज्ज झाणमयं । सत्तिविहीणो जा जइ सद्दहणं चेव कायव्वं ॥154॥

    अर्थ: [ यदि ] यदि [ कर्तुम् शक्यते ] किया जा सके तो [ अहो ] अहो! [ ध्यानमयम् ] ध्यानमय [ प्रतिक्रमणादिकं ] प्रतिक्रमणादि [ करोषि ] कर; [ यदि ] यदि [ शक्तिविहीन: ] तू शक्तिविहीन हो तो [ यावत् ] तबतक [ श्रद्धानं च एव ] श्रद्धान ही [ कर्तव्यम् ] कर्तव्य है।

  • योगसार, दोहा ८८ (पढ़ें)

    सम्माइट्ठी-जीवडहँ, दुग्गइ-गमणु ण होइ। जइ जाइ वि तो दोसु णवि, पुव्वक्किउ खवणेइ ॥88॥

    अर्थ: सम्यग्दृष्टि जीव का दुर्गति में गमन नहीं होता। यदि कदाचित् होता भी है तो कोई दोष नहीं है, क्योंकि उससे वह पूर्वकृत कर्मों का क्षय ही करता है।

  • योगसार, दोहा ८९ (पढ़ें)

    अप्प-सरूवइँ जो रमइ, छंडिवि सहु ववहारु। सो सम्माइट्ठी हवइ, लहु पावइ भवपारु ॥89॥

    अर्थ: जो जीव सर्व व्यवहार को छोड़कर आत्मस्वरूप में रमण करता है, वह सम्यग्दृष्टि है और वह शीघ्र ही संसार से पार हो जाता है।

  • परमात्मप्रकाश, दूसरा महाधिकार, दूहा ३५ के आधार पर (प्रो. वीरसागर जैन कृत संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी, पढ़ें)

    प्रश्न-21. क्या व्यवहारसम्यग्दर्शनादि अभव्य जीव के हो सकते हैं?
    उत्तर- नहीं, व्यवहारसम्यग्दर्शनादि अभव्य जीव के नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवहारसम्यग्दर्शनादि परम्परा से मुक्ति के कारण हैं और अभव्य जीव मुक्ति का पात्र नहीं है। (देखिए दूहा- 35)

  • न्याय मन्दिर (डॉ. वीरसागर जैन), सप्तम द्वार (पढ़ें)

    उत्तर- वस्तु अनन्तधर्मात्मक है, अतः उसका विशेष स्वरूप हम (कोई भी अल्पज्ञानी) नयों द्वारा ही जान (समझ-समझा) सकते हैं, अन्यथा नहीं। कहा भी है कि जिनके नयदृष्टि नहीं है उन्हें वस्तुस्वभाव की उपलब्धि (जानकारी) नहीं हो सकती है और वस्तुस्वभाव की उपलब्धि हुए बिना वे सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकते हैं?


८. पुराण एवं चरित्र ग्रंथों में सम्यक्त्व के प्रसंग

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार, प्रथम सम्यग्दर्शन अधिकार, श्लोक १९, २०, PDF पृष्ठ ७९ (पढ़ें)

    तावदञ्जन चौराऽङ्गे ततोऽनन्तमती स्मृता । उद्दायनस्तृतीयेऽपि तुरीये रेवती मता ॥19॥ ततो जिनेन्द्रभक्तोऽन्यो वारिषेणस्ततः परः । विष्णुश्च वज्रनामा च शेषयोर्लक्ष्यतां गतौ ॥20॥

    अर्थ: प्रथम अंग में राजपुत्र अंजनचोर, द्वितीय अंग में अनन्तमती नाम की सेठ की पुत्री, तृतीय अंग में उद्दायन राजा, चतुर्थ अंग में रेवती रानी, पंचम अंग में जिनेन्द्रभक्त सेठ, छठा अंग में राजपुत्र वारिषेण मुनि, सप्तम अंग में राजपुत्र विष्णुकुमार मुनि, और अष्टम अंग में राजपुत्र वज्रकुमार मुनि - ये आठ नाम आगम में सम्यक्त्व के अंगों में प्रसिद्ध होनेवालों के क्रम से दृष्टांतरूप में आये हैं। इनकी विस्तृत कथायें प्रथमानुयोग के शास्त्रों में प्रसिद्ध हैं, वहां से जान लेना।

सम्यग्दर्शन संकलन, भाग ३: परिभाषा एवं स्वरूप

ग्रंथ: छहढाला · अष्टपाहुड · पुरुषार्थसिद्ध्युपाय · ज्ञानार्णव · पञ्चाध्यायी · सर्वार्थसिद्धि · राजवार्तिक


१. सम्यग्दर्शन की परिभाषा एवं स्वरूप

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १ (पढ़ें)

    आतम को हित है सुख, सो सुख आकुलता बिन कहिये।
    आकुलता शिवमाँहि न तातैं, शिव-मग लाग्यो चहिये॥
    सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चरन शिवमग सो दुविध विचारो।
    जो सत्यारथरूप सु निश्चय, कारन सो व्यवहारो॥(1)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द २ (पढ़ें)

    पर-द्रव्यनतैं भिन्न आप में, रुचि सम्यक्त्व भला है।
    आप रूप को जानपनो, सो सम्यग्ज्ञान कला है॥
    आप रूप में लीन रहे थिर, सम्यक्चारित्र सोई।
    अब व्यवहार मोक्ष मग सुनिये, हेतु नियत को होई॥(2)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द ३ (पढ़ें)

    जीव-अजीव तत्त्व अरु आस्रव, बन्धरु संवर जानो।
    निर्जर मोक्ष कहे जिन तिनको, ज्यौं का त्यौं सरधानो॥
    है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप बखानो।
    तिनको सुनि सामान्य-विशेषै, दृढ प्रतीति उर आनो॥(3)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १० (पढ़ें)

    सकल-करमतैं रहित अवस्था, सो शिव, थिर सुखकारी।
    इहिविधि जो सरधा तत्त्वन की, सो समकित व्यवहारी।
    देव जिनेन्द्र गुरु परिग्रह बिन, धर्म दयाजुत सारो।
    येहू मान समकित को कारन, अष्ट अंग-जुत धारो॥(10)

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा १९, PDF पृष्ठ ६१ (पढ़ें)

    छह दव्व णव पयत्था पंचत्थी सत्त तच्च णिद्दिट्ठा । सद्दहइ ताण रूवं सो सद्दिट्ठी मुणेयव्वो ॥19॥

    अर्थ: छह द्रव्य, नव पदार्थ, पाँच अस्तिकाय, सात तत्त्व - यह जिनवचन में कहे हैं, उनके स्वरूप का जो श्रद्धान करे उसे सम्यग्दृष्टि जानना।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा २० (पढ़ें)

    जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं जिणवरेहिं पण्णत्तं । ववहारा णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्मत्तं ॥20॥

    अर्थ: जिन भगवान् ने जीव आदि पदार्थों के श्रद्धान को व्यवहार सम्यक्त्व कहा है और अपने आत्मा के ही श्रद्धान को निश्चय सम्यक्त्व कहा है।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २२ (पढ़ें)

    जीवाजीवादीनां तत्त्वार्थानां सदैव कर्त्तव्यम् । श्रद्धानं विपरीताभिनिवेश विविक्तमात्मरूपं तत् ॥२२॥

    अर्थ: (जीवाजीवादीनां) जीव - अजीवादि (तत्त्वार्थानां) तत्त्वार्थोंका (विपरीताभिनिवेशविविक्तं) विपरीत अभिनिवेश (आग्रह) रहित अर्थात् अन्यको अन्यरूप समझने रूप जो मिथ्याज्ञान है उससे रहित (श्रद्धानं) श्रद्धान् अर्थात् दृढ़विश्वास (सदैव) निरन्तर ही (कर्त्तव्यं) करना चाहिये । कारण कि (तत् ) वह श्रद्धान ही (आत्मरूपं) आत्माका स्वरूप है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५ (पढ़ें)

    तत्त्वरुचिः सम्यक्त्वं तत्त्वप्रख्यापकं भवेज्ज्ञानम् । पापक्रियानिवृत्तिश्चरित्रमुक्तं जिनेन्द्रेण ॥5॥

    अर्थ: जिनेन्द्र भगवानने तत्त्वोंकी रुचि अर्थात् श्रद्धाप्रतीतिको सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन), तत्त्वोंको प्रकर्षरूप कहने अर्थात् जाननेको सम्यग्ज्ञान और पापक्रियाओंसे निवृत्त होनेको सम्यक्चारित्र कहा है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ६ (पढ़ें)

    यज्जीवादिपदार्थानां श्रद्धानं तद्धि दर्शनम् । निसर्गेणाधिगत्या वा तद्भव्यस्यैव जायते ॥6॥

    अर्थ: जो जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना है वही नियमसे दर्शन है। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे (स्वभावसे) अथवा अधिगमसे (परोपदेशसे) भव्य जीवोंके ही उत्पन्न होता है, अभव्यके नहीं होता ।

  • पञ्चाध्यायी, उत्तरार्द्ध, श्लोक १८७ (पढ़ें)

    अतस्तत्त्वार्थश्रद्धानं सूत्रे सद्दर्शनं मतम । तत्तत्त्वं नव जीवाद्या यथोद्देश्याः क्रमादपि ॥187॥

    अर्थ: श्रीमद्वान् उमास्वामीने " तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् " इस सूत्रद्वारा तत्त्वार्थश्रद्धानको सम्यग्दर्शन बतलाया है, वही सूत्रका आशय उपर्युक्त कथनसे सिद्ध होता है । अब उन्ही जीवादिक नव तत्त्वों (पदार्थों) को क्रमसे बतलाते हैं -

  • पञ्चाध्यायी, उत्तरार्द्ध, श्लोक ४२३ (पढ़ें)

    ततोऽस्ति यौगिकी रूढिः श्रद्धा सम्यक्त्वलक्षणम् । अर्थादप्यविरुद्धं स्यात्सूक्तं स्वात्मानुभूतिवत् ॥423॥

    अर्थ: इसलिये यौगिक रीतिसे भी श्रद्धा सम्यक्त्वका लक्षण है और रूढिसे भी सम्यक्त्वका लक्षण है। पहलेका यह कथन कि जो स्वानुभूति सहित है वही श्रद्धा कहलाती है, सर्वथा ठीक और अविरोधी है।

  • पञ्चाध्यायी, उत्तरार्द्ध, श्लोक ४५९ (पढ़ें)

    सम्यक्त्वेनाविनाभूतस्वानुभूत्यैकलक्षणम् । आस्तिक्यं नाम सम्यक्त्वं मिथ्यास्तिक्यं ततोऽन्यथा ॥459॥

    अर्थ: सम्यग्दर्शनकी अविनाभाविनी स्वानुभूतिके साथ होनेवाला जो आस्तिक्य है वही सम्यक् आस्तिक्य है अथवा सम्यक्त्व है। उससे विपरीत ( स्वानुभूतिके अभावमें होनेवाला ) जो आस्तिक्य है वह मिथ्या - आस्तिक्य है अथवा मिथ्यात्त्व है।


२. सम्यग्दर्शन के आठ अंग

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १२ (पढ़ें)

    जिन-वच में शंका न, धारि वृष, भव-सुख-वांछा भानै।
    मुनि-तन मलिन न देख घिनावै, तत्त्व कुतत्त्व पिछानै॥
    निज-गुन अरु पर औगुन ढाकै, वा निज-धर्म-बढ़ावै।
    कामादिक कर वृषतैं चिगते, निज-पर को सु दृढ़ावै॥(12)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १३ (पढ़ें)

    धर्मीसों गउ-वच्छ-प्रीति-सम, कर जिन-धर्म दिपावै।
    इन गुनतैं विपरीत दोष वसु, तिनकों सतत खिपावै॥
    पिता भूप वा मातुल नृप जो, होय न तो मद ठानै।
    मद न रूप को, मद न ज्ञान को, धन बल को मद भानै॥(13)

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २३ (पढ़ें)

    सकलमनेकान्तात्मकमिदयुक्तं वस्तुजातमखिलज्ञैः । किमु सत्यमसत्यं वा न जातु शंकेति कर्त्तव्या ॥२३॥

    अर्थ: (अखिलज्ञैः) सर्वज्ञदेव द्वारा (उक्तं) कहा गया (इदं) यह (सकलं) समस्त (वस्तुजातं) वस्तुसमूह (अनेकान्तात्मकं) अनेकान्तस्वभावरूप है वह (किमु सत्यं) क्या सत्य है ? (वा असत्यं) अथवा असत्य है (इती) ऐसी (शंका) शंका (जातु) कभी भी (न) नहीं (कर्त्तव्या) करना चाहिये ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २४ (पढ़ें)

    इह जन्मनि विभवादीन्यमुत्र चक्रित्वकेशवत्वादीन् । एकान्तवाददूषित परसमयानपि च नाकांक्षेत् ॥२४॥

    अर्थ: (इह) इस (जन्मनि) लोकमें (विभवादीनि) ऐश्वर्य, सम्पदा आदि, (अमुत्र) परलोकमें (चक्रित्वकेशवत्वादीन्) चक्रवर्त्ती, नारायण आदि पदोंको (च) और (एकान्तवाद - दूषित परसमयान्) एकान्तवादसे दूषित अन्य धर्मोंको (अपि) भी (न आकांक्षेत् ) न चाहे ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २५ (पढ़ें)

    क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु नानाविधेषु भावेषु । द्रव्येषु पुरिषादिषु विचिकित्सा नैव करणीया ॥२५॥

    अर्थ: (क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु) भूख, प्यास, सरदी, गरमी इत्यादि (नानाविधेषु) नाना प्रकारके (भावेषु) भावोंमें और (पुरीषादिषु) विष्टा आदि (द्रव्येषु) पदार्थोंमें (विचिकित्सा) ग्लानि (नैव) नहीं (करणीया) करना चाहिये ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २६ (पढ़ें)

    लोके शास्त्राभासे समयाभासे च देवताभासे । नित्यमपि तत्त्वरुचिना कर्त्तव्यममूढदृष्टित्वम् ॥२६॥

    अर्थ: (लोके) लोकमें (शास्त्राभासे) शास्त्राभासमें (समयाभासे) धर्माभासमें (च) और (देवताभासे) देवाभासमें (तत्वरुचिना) तत्त्वोंमें रुचिवान सम्यग्दृष्टि पुरुषको (नित्यमपि) सदा ही (अमूढदृष्टित्वं) मूढ़तारहित श्रद्धान (कर्त्तव्यं) करना चाहिए ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २७ (पढ़ें)

    धर्मोऽभिवर्द्धनीयः सदात्मनो मार्दवादिभावनया । परदोषनिगूहनमपि विधेयमुपबृंहणगुणार्थम् ॥२७॥

    अर्थ: (उपबृंहणगुणार्थं) उपबृंहण नामक गुणके लिये (मार्दवादिभावनया) मार्दव, क्षमा, सन्तोषादि भावनाओंसे (सदा) निरन्तर (आत्मनो धर्मः) अपने आत्माके धर्मकी अर्थात् शुद्धस्वभावकी (अभिवर्द्धनीयः) वृद्धि करनी चाहिये और (परदोषनिगूहनमपि) दूसरेके दोषोंको गुप्त भी रखना (विधेयम् ) चाहिए (यह भी कर्त्तव्य है) ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २८ (पढ़ें)

    कामक्रोधमदादिषु चलयितुमुदितेषु वर्त्मनो न्यायात् । श्रुतमात्मनः परस्य च युक्त्या स्थितिकरणमपि कार्यम् ॥२८॥

    अर्थ: (कामक्रोधमदादिषु) काम, क्रोध, मद, लोभादि विकार (न्यायात् वर्त्मनः) न्यायमार्गसे अर्थात् धर्ममार्गसे (चलयितुम् ) विचलित करवानेके लिए (उदितेषु) प्रगट हुआ हो तब (श्रुतं) शास्त्र अनुसार (आत्मनः परस्य च) अपनी और परकी (स्थितिकरणं) स्थिरता (अपि) भी (कार्यम् ) करनी चाहिये ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २९ (पढ़ें)

    अनवरतमहिंसायां शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने धर्मे । सर्वेष्वपि च सधर्मिषु परमं वात्सल्यमालम्ब्यम् ॥२९॥

    अर्थ: (शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने) मोक्षसुखस्वरूप सम्पदाके कारणभूत (धर्मे) धर्ममें (अहिंसायां) अहिंसामें (च) और (सर्वेष्वपि) सभी (सधर्मिषु) साधर्मीजनोंमें (अनवरतं) निरन्तर (परमं) उत्कृष्ट (वात्सल्यं) वात्सल्य अथवा प्रीतिका (आलम्ब्यम् ) आलम्बन करना चाहिये ।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक ३० (पढ़ें)

    आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव । दान तपोजिनपूजाविद्यातिशयैश्च जिनधर्मः ॥३०॥

    अर्थ: (सततमेव) निरंतर (रत्नत्रयतेजसा) रत्नत्रयके तेजसे (आत्मा) अपनी आत्माको (प्रभावनीयः) प्रभावनायुक्त करना चाहिए (च) और (दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयैः) दान, तप, जिनपूजन और विद्याके अतिशयसे अर्थात् इनकी वृद्धि करके (जिनधर्मः) जैनधर्मकी प्रभावना करना चाहिए ।

  • पञ्चाध्यायी, उत्तरार्द्ध, श्लोक ४७८ (पढ़ें)

    सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमस्ति सिद्धं जगत्त्रये । लक्षणं च गुणश्चाङ्गं शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥478॥

    अर्थ: सम्यग्दर्शनके सब जगह आठ अंग प्रसिद्ध हैं। तथा लक्षण, गुण, अंग ये सभी शब्द एक अर्थके ही कहने वाले हैं।


३. सम्यग्दर्शन के दोष

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द ११ (पढ़ें)

    वसु मद टारि निवारि त्रिशठता, षट् अनायतन त्यागो।
    शंकादिक वसु दोष बिना संवेगादिक चित पागो॥
    अष्ट अंग अरु दोष पचीसों, तिन संक्षेप हु कहिये।
    विन जानेतैं दोष-गुनन को, कैसे तजिये गहिये॥(11)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १४ (पढ़ें)

    तप को मद, न मद जु प्रभुता को, करै न सो निज जानै।
    मद धारै तो यही दोष वसु, समकित को मल ठानै॥
    कुगुरु-कुदेव-कुवृष-सेवक की, नहिं प्रशंस उचरै है।
    जिनमुनि जिनश्रुत बिन, कुगुरादिक तिन्हैं न नमन करै है॥(14)

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ८ (पढ़ें)

    द्रव्यादिकमथासाद्य तज्जीवैः प्राप्यते क्वचित् । पञ्चविंशतिमुत्सृज्य दोषांस्तच्छक्तिघातकम् ॥8॥

    अर्थ: अथवा यह सम्यग्दर्शन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सामग्रीको प्राप्त होकर तथा सम्यक्दर्शनकी शक्तिके घात करनेवाले पच्चीस दोषोंको छोडनेसे क्वचित् प्राप्त होता है ।


४. सम्यक्त्व की उत्पत्ति एवं भेद

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ७ (पढ़ें)

    क्षीणप्रशान्तमिश्रासु मोहप्रकृतिषु क्रमात् । तत् स्याद्द्रव्यादिसामग्र्या पुंसां सद्दर्शनं त्रिधा ॥7॥

    अर्थ: यह सम्यग्दर्शन पुरुषोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सामग्रीसे दर्शनमोह कर्मकी तीन प्रकृतियोंके क्षय, उपशम तथा क्षयोपशमरूप होनेसे क्रमशः तीन प्रकारका है- १ क्षायिकसम्यक्त्व, २ उपशमसम्यक्त्व, और ३ क्षयोपशमसम्यक्त्व ।

  • पञ्चाध्यायी, उत्तरार्द्ध, श्लोक १००६ (पढ़ें)

    एवं च सति सम्यक्त्वे गुणे जीवस्य सर्वतः तं मोहयति यत्कर्म दृङ्मोहाख्यं तदुच्यते ॥1006॥

    अर्थ: ज्ञान, दर्शनके समान आत्माका सम्यग्दर्शन गुण भी है, और उस सम्यग्दर्शन गुणको मूर्छित करनेवाला कर्म भी दर्शनमोहनीय कहलाता है।


५. रत्नत्रय और मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा २ (पढ़ें)

    दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवरेहिं सिस्साणं । तं सोऊण सकण्णे दंसणहीणो ण वंदिव्वो ॥2॥

    अर्थ: जिनवर जो सर्वज्ञदेव हैं, उन्होंने शिष्य जो गणधर आदिक को धर्म का उपदेश दिया है; कैसा उपदेश दिया है ? कि दर्शन जिसका मूल है। मूल कहाँ होता है कि जैसे मन्दिर की नींव और वृक्ष की जड़ होती है, उसीप्रकार धर्म का मूल दर्शन है। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि हे सकर्ण अर्थात् सत्पुरुषो ! सर्वज्ञ के कहे हुए उस दर्शनमूलरूप धर्म को अपने कानों से सुनकर जो दर्शन से रहित हैं, वे वंदन योग्य नहीं हैं; इसलिए दर्शनहीन की वंदना मत करो। …

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ३, PDF पृष्ठ ५० (पढ़ें)

    दंसणभट्ठा भट्ठा दंसणभट्ठस्स णत्थि णिव्वाणं । सिज्झंति चरियभट्ठा दंसणभट्ठा ण सिज्झंति ॥3॥

    अर्थ: जो पुरुष दर्शन से भ्रष्ट हैं वे भ्रष्ट हैं; जो दर्शन से भ्रष्ट हैं उनको निर्वाण नहीं होता; क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि जो चारित्र से भ्रष्ट हैं, वे तो सिद्धि को प्राप्त होते हैं, परन्तु जो दर्शन से भ्रष्ट हैं, वे सिद्धि को प्राप्त नहीं होते।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ११, PDF पृष्ठ ५५ (पढ़ें)

    जह मूलाओ खंधो साहापरिवार बहुगुणो होइ । तह जिणदंसण मूलो णिद्दिट्ठो मोक्खमग्गस्स ॥11॥

    अर्थ: जिसप्रकार वृक्ष के मूल से स्कंध होते हैं; कैसे स्कंध होते हैं कि जिनके शाखा आदि परिवार बहुत गुण हैं। यहाँ गुण शब्द बहुत का वाचक है; उसीप्रकार गणधर देवादिक ने जिनदर्शन को मोक्षमार्ग का मूल कहा है।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा १५, PDF पृष्ठ ५९ (पढ़ें)

    सम्मत्तादो णाणं णाणादो सव्वभावउवलद्धी । उवलद्धपयत्थे पुण सेयासेयं वियाणेदि ॥15॥

    अर्थ: सम्यक्त्व से तो ज्ञान सम्यक् होता है तथा सम्यक्ज्ञान से सर्व पदार्थों की उपलब्धि अर्थात् प्राप्ति अर्थात् जानना होता है तथा पदार्थों की उपलब्धि होने से श्रेय अर्थात् कल्याण और अश्रेय अर्थात् अकल्याण इन दोनों को जाना जाता है।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा २१, PDF पृष्ठ ६२ (पढ़ें)

    एवं जिणपण्णत्तं दंसणरयणं धरेह भावेण । सारं गुणरयणत्तय सोवाणं पढम मोक्खस्स ॥21॥

    अर्थ: ऐसे पूर्वोक्त प्रकार जिनेश्वर देव का कहा हुआ दर्शन है सो गुणों में और दर्शन-ज्ञान-चारित्र इन तीन रत्नों में सार है-उत्तम है और मोक्षमन्दिर में चढ़ने के लिए पहली सीढ़ी है, इसलिए आचार्य कहते हैं कि हे भव्यजीवो ! तुम इसको अंतरंग भाव से धारण करो, बाह्य क्रियादिक से धारण करना तो परमार्थ नहीं है, अंतरंग की रुचि से धारण करना मोक्ष का कारण है ।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ३१, PDF पृष्ठ ६८ (पढ़ें)

    णाणं णरस्स सारो सारो वि णरस्स होइ सम्मत्तं । सम्मत्ताओ चरणं चरणाओ होइ णिव्वाणं ॥31॥

    अर्थ: पहिले तो इस पुरुष के लिए ज्ञान सार है, क्योंकि ज्ञान से सब हेय-उपादेय जाने जाते हैं, फिर उस पुरुष के लिए सम्यक्त्व निश्चय से सार है, क्योंकि सम्यक्त्व बिना ज्ञान मिथ्या नाम पाता है, सम्यक्त्व से चारित्र होता है, क्योंकि सम्यक्त्व बिना चारित्र भी मिथ्या है, चारित्र से निर्वाण होता है।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ४ (पढ़ें)

    रत्नत्रयमनासाद्य यः साक्षाद्ध्यातुमिच्छति । खपुष्पैः कुरुते मूढः स वन्ध्यासुतशेखरम् ॥4॥

    अर्थ: जो पुरुष साक्षात् रत्नत्रयको (सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रको) प्राप्त न होकर ध्यान करना चाहता है, वह मूर्ख आकाशके फूलोंसे वन्ध्याके पुत्रके लिये सेहरा (मौर) बनाना चाहता है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५४ (पढ़ें)

    चरणज्ञानयोर्बीजं यमप्रशमजीवितम् । तपःश्रुताद्यधिष्टानं सद्भिः सद्दर्शनं मतम् ॥54॥

    अर्थ: इस सम्यग्दर्शनको सत्पुरुषोंने चारित्र और ज्ञानका बीज अर्थात् उत्पन्न करनेका कारण माना है। क्योंकि इसके बिना सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र होता ही नहीं, तथा यम (महाव्रतादि) और प्रशम (विशुद्धभाव) का यह जीवनस्वरूप है। इस सम्यग्दर्शनके बिना यम व प्रशम निर्जीवके समान हैं। इसी प्रकार यह तप और स्वाध्यायका आश्रय है। इसके बिना ये निराश्रय हैं। इस प्रकार जितने शमदमबोधव्रततपादि कहे हैं, उनको यह सफल करता है। इसके बिना वे मोक्षफलके दाता नहीं हो सकते ।


६. सम्यग्दर्शन की महिमा एवं फल

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १६ (पढ़ें)

    प्रथम नरक बिन षट् भू ज्योतिष, वान भवन षंढ नारी।
    थावर विकलत्रय पशु में नहिं, उपजत समकितधारी॥
    तीन लोक तिहुँ काल माँहि नहिं, दर्शनसो सुखकारी।
    सकल धरम को मूल यही इस, बिन करनी दुखकारी॥(16)

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १७ (पढ़ें)

    मोक्ष-महल की परथम सीढ़ी, या बिन ज्ञान चरित्रा।
    सम्यकता न लहै सो दर्शन, धारो भव्य पवित्रा॥
    ‘दौल’ समझ सुन चेत सयाने, काल वृथा मत खोवै।
    यह नर-भव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक् नहिं होवै॥(17)

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ४ (पढ़ें)

    सम्मत्तरयणभट्ठा जाणंता बहुविहाइं सत्थाइं । आराहणाविरहिया भमंति तत्थेव तत्थेव ॥4॥

    अर्थ: जो पुरुष सम्यक्त्वरूप रत्न से भ्रष्ट है तथा अनेक प्रकार के शास्त्रों को जानते हैं, तथापि वह आराधना से रहित होते हुए संसार में ही भ्रमण करते हैं करते हैं। दो बार कहकर बहुत परिभ्रमण बतलाया है।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ५, PDF पृष्ठ ५२ (पढ़ें)

    सम्मत्तविरहिया णं सुठ्ठू वि उग्गं तवं चरंता णं । ण लहंति बोहिलाहं अवि वाससहस्सकोडीहिं ॥5॥

    अर्थ: जो पुरुष सम्यक्त्व से रहित हैं, वे सुष्ठु अर्थात् भलीभांति उग्र तप का आचरण करते हैं, तथापि वे बोधि अर्थात् सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रमय जो अपना स्वरूप है उसका लाभ प्राप्त नहीं करते; यदि हजार कोटि वर्ष तक तप करते रहें, तब भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती। यहाँ गाथा में दो स्थानों पर ‘णं’ शब्द है, वह प्राकृत में अव्यय है, उसका अर्थ वाक्य का अलंकार है।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ७ (पढ़ें)

    सम्मत्तसलिलपवहो णिच्चं हियए पवट्टुए जस्स । कम्मं वालुयवरणं बन्धुच्चिय णासए तस्स ॥7॥

    अर्थ: जिस पुरुष के हृदय में सम्यक्त्वरूपी जल का प्रवाह निरंतर प्रवर्त्तमान है, उसके कर्मरूपी रज-धूल का आवरण नहीं लगता तथा पूर्वकाल में जो कर्मबंध हुआ हो वह भी नाश को प्राप्त होता है।

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा ३३, PDF पृष्ठ ६९ (पढ़ें)

    कल्लाणपरंपरया लहंति जीवा विसुद्धसम्मत्तं । सम्मद्दंसणरयणं अग्घेदि सुरासुरे लोए ॥33॥

    अर्थ: जीव विशुद्ध सम्यक्त्व को कल्याण की परम्परा सहित पाते हैं, इसलिए सम्यग्दर्शन रत्न है वह इस सुर-असुरों से भरे हुए लोक में पूज्य है।

  • पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लोक २१ (पढ़ें)

    तत्रादौ सम्यक्त्वं समुपाश्रयणीयमखिलयत्नेन । तस्मिन् सत्येव यतो भवति ज्ञानं चरित्रं च ॥२१॥

    अर्थ: (तत्रादौ) इन तीनोंमें प्रथम (अखिलयत्नेन) समस्त प्रकार सावधानतापूर्वक यत्नसे (सम्यक्त्वं) सम्यग्दर्शनको (समुपाश्रेणीयम् ) भले प्रकार अंगीकार करना चाहिये (यतः) क्योंकि (तस्मिन् सति एव) उसके होने पर ही (ज्ञानं) सम्यग्ज्ञान (च) और (चारित्रं) सम्यक्चारित्र (भवति) होता है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५३ (पढ़ें)

    सद्दर्शनमहारत्नं विश्वलोकैकभूषणम् । मुक्तिपर्यन्तकल्याणदानदक्षं प्रकीर्तितम् ॥53॥

    अर्थ: यह सम्यग्दर्शन महारत्न समस्त लोकका आभूषण है और मोक्ष होने पर्यन्त आत्माको कल्याण देनेवालोंमें चतुर है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५५ (पढ़ें)

    अप्येकं दर्शनं श्लाघ्यं चरणज्ञानविच्युतम् । न पुनः संयमज्ञाने मिथ्यात्वविषदूषिते ॥55॥

    अर्थ: यह सम्यग्दर्शन चारित्रज्ञानके न होने पर भी प्रशंसनीय कहलाता है और इसके बिना संयम (चारित्र) और ज्ञान मिथ्यात्वरूपी विषसे दूषित होते हैं अर्थात् सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिके बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान और चारित्र कुचारित्र कहाता है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५७ (पढ़ें)

    मन्ये मुक्तः स पुण्यात्मा विशुद्धं यस्य दर्शनं । यतस्तदेव मुक्त्यङ्गमग्रिमं परिकीर्तितम् ॥57॥

    अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जिसको निर्मल अतिचाररहित सम्यग्दर्शन है, वही पुण्यात्मा वा महाभाग्य मुक्त है, ऐसा मैं मानता हूँ। क्योंकि सम्यग्दर्शन ही मोक्षका मुख्य अंग कहा गया है। मोक्षमार्गके प्रकरणमें सम्यग्दर्शन ही मुख्य कहा गया है ।

  • ज्ञानार्णव, सर्ग ६ (सम्यग्दर्शन), श्लोक ५८ (पढ़ें)

    प्राप्नुवन्ति शिवं शश्वच्चरणज्ञानविश्रुताः । अपि जीवा जगत्यस्मिन्न पुनर्दर्शनं विना ॥58॥

    अर्थ: इस जगतमें जो जीव चारित्र और ज्ञानके कारण सदा जगतमें प्रसिद्ध है, वे भी सम्यग्दर्शनके बिना मोक्षको नहीं पाते ।


७. सम्यग्दृष्टि का स्वरूप

  • छहढाला (पं. दौलतराम), तीसरी ढाल, छन्द १५ (पढ़ें)

    दोषरहित गुनसहित सुधी जे, सम्यक्दर्श सजै हैं।
    चरितमोहवश लेश न संजम, पै सुरनाथ जजै हैं॥
    गेही पै गृह में न रचै ज्यों, जलतैं भिन्न कमल है।
    नगरनारि को प्यार यथा, कादे में हेम अमल है॥(15)

  • अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड, गाथा २२ (पढ़ें)

    जं सक्कइ तं कीरइ जं च ण सक्केइ तं च सद्दहणं । केवलिजिणेहिं भणियं सद्दमाणस्स सम्मत्तं ॥22॥

    अर्थ: जो करने को समर्थ हो वह तो करे और जो करने को समर्थ नहीं हो उसका श्रद्धान करे, क्योंकि केवली भगवान् ने श्रद्धान करने को सम्यक्त्व कहा है ।

८. सर्वार्थसिद्धि (आचार्य पूज्यपाद), तत्त्वार्थसूत्र प्रथम अध्याय

  • सर्वार्थसिद्धि, प्रथम अध्याय, सूत्र २, पृष्ठ ६ (स्कैन देखें)

    तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥

  • सर्वार्थसिद्धि, प्रथम अध्याय, सूत्र २, पृष्ठ ७ (स्कैन देखें)

    तत्त्वार्थश्रद्धानं ह्यात्मपरिणामो मोक्षसाधनं युज्यते, भव्यजीवविषयत्वात्। आलोकस्तु चक्षुरादिनिमित्तः सर्वसंसारिजीवसाधारणत्वान्न मोक्षमार्गो युक्तः।

    अर्थ: श्रद्धानरूप जो आत्मा का परिणाम होता है वह तो मोक्षका साधन बन जाता है, क्योंकि वह भव्यों के ही पाया जाता है, किन्तु आलोक चक्षु आदिके निमित्तसे होता है जो साधारण रूपसे सब संसारी जीवोंके पाया जाता है अतः उसे मोक्षमार्ग मानना युक्त नहीं।

  • सर्वार्थसिद्धि, प्रथम अध्याय, सूत्र २, पृष्ठ ७ (स्कैन देखें)

    तद् द्विविधं, सरागवीतरागविषयभेदात् प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम्। आत्मविशुद्धिमात्रमितरत्।

    अर्थ: सम्यग्दर्शन दो प्रकार का है-सराग सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन। प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य आदि की अभिव्यक्ति लक्षणवाला सराग सम्यग्दर्शन है और आत्माकी विशुद्धिमात्र वीतराग सम्यग्दर्शन है।

  • सर्वार्थसिद्धि, प्रथम अध्याय, सूत्र ३, पृष्ठ ९ (स्कैन देखें)

    तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥ निसर्गः स्वभाव इत्यर्थः। अधिगमोऽर्थावबोधः। तयोर्हेतुत्वेन निर्देशः। कस्याः? क्रियायाः। का च क्रिया? उत्पद्यत इत्यध्याह्रियते, सोपस्कारत्वात् सूत्राणाम्। तदेतत्सम्यग्दर्शनं निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति।

    अर्थ: वह (सम्यग्दर्शन) निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है ॥३॥ निसर्गका अर्थ स्वभाव है और अधिगमका अर्थ पदार्थका ज्ञान है। सूत्रमें इन दोनोंका हेतुरूपसे निर्देश किया है। शंका-इन दोनोंका किसके हेतुरूपसे निर्देश किया है? समाधान-क्रियाके। शंका-वह कौन सी क्रिया है? समाधान-‘उत्पन्न होता है’ यह क्रिया है। यद्यपि इसका उल्लेख सूत्रमें नहीं किया है तथापि इसका अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि सूत्र उपस्कार सहित होते हैं। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है।

  • सर्वार्थसिद्धि, प्रथम अध्याय, सूत्र ७, पृष्ठ १९ (स्कैन देखें)

    साधनं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च। अभ्यन्तरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा। बाह्यं नारकाणां प्राक्चतुर्थ्याः सम्यग्दर्शनस्य साधनं केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिद्वेदनाभिभवः। चतुर्थीमारभ्य आ सप्तम्या नारकाणां जातिस्मरणं वेदनाभिभवश्च। तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनबिम्बदर्शनम्। मनुष्याणामपि तथैव।

९. राजवार्तिक (तत्त्वार्थवार्तिक, आचार्य अकलंकदेव), तत्त्वार्थसूत्र प्रथम अध्याय

  • राजवार्तिक, प्रथम अध्याय, सूत्र २, वार्तिक २८, पृष्ठ २२ (स्कैन देखें)

    … यथाभूतमर्थं गृह्णात्यात्मा तत् सम्यग्दर्शनमिति प्रत्येतव्यम्।

  • राजवार्तिक, प्रथम अध्याय, सूत्र २, वार्तिक २९, ३० एवं ३१, पृष्ठ २२ (स्कैन देखें)

    तद् द्विविधं सरागवीतरागविकल्पात् ।२९। … प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तलक्षणं प्रथमम् ।३०। … आत्मविशुद्धिमात्रमितरत् ।३१।