आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कांजीस्वामी के प्रवचनों में बार-बार ये वाक्य आता है “पर्याय के षट्कारक भिन्न हैं”| इसकी अपेक्षा हमें समझ में आती है कि द्रव्य के अकर्ता स्वरूप का श्रद्धान करे| डॉ. उज्ज्वला शाह की किताब में इसका खुलासा है की “पर्याय के षट्कारक भिन्न हैं” इसका अर्थ दो पर्यायों के षट्कारक भिन्न हैं| हम असमंजस में हैं कि किस चीज़ का श्रद्धान करें - “पर्याय और उसके द्रव्य के षट्कारक भिन्न हैं” या “एक द्रव्य के दो पर्यायों के षट्कारक भिन्न हैं”?
दोनों ही सही है।
एक समय की पर्याय के षट्कारक उसमें ही है. द्रव्य के षट्कारक से भिन्न है. वैसे ही एक पर्याय में जो अनंत गुणों का परिणमन है, उनके भी षट्कारक स्वतंत्र है — अर्थात् दूसरे गुण से निरपेक्ष है.