उपशम रस ही क्यों? क्षायिक रस क्यों नहीं?

कई भजनों/ भक्तियों में ‘उपशम रस की धारा’ पद का प्रयोग हुआ है। तो क्षायिक रस की धारा क्यों नहीं होती, जबकि क्षायिक भाव तो उपशम भाव से भी श्रेष्ठ है?