जैनों का नववर्ष- सबसे प्राचीन संवत् वीर निर्वाण संवत

जैनों का नववर्ष- सबसे प्राचीन संवत् वीर निर्वाण संवत
।।जयति जगति वीरः।।

⁃	लौकिक दृष्टि से दीपावली पर्व-

दीपावली पर्व जैनों के नये वर्ष स्वरूप आता है।
जैन नववर्ष दीपावली से अगले दिन शुरू होता है। भगवान महावीर स्वामी को दीपावली के दिन ही मोक्ष प्राप्ति हुई थी। इसके अगले दिन ही जैन धर्म के अनुयायी नया साल मनाते हैं। इसे ही वीर निर्वाण संवत कहते हैं।

इस दिन की महती उपयोगिता चारों वर्णों के लिए है अतः इस दिन से नया वर्ष मनाना पूर्णता युक्तियुक्त एवं लोक संगत है-

क्षत्रियादि वर्ण
भगवान् महावीर का जन्म इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ हुआ था। भगवान महावीर जन्म से ही क्षत्रिय थे जब उनको निर्वाण हुआ तभी यह दीपावली पर्व मनाया जाता है अतः क्षत्रिय वंशजों को
दीपावली पर्व की उपयोगिता बहुत अधिक है।

वैश्यों के लिए इस दिन की आवश्यकता तो बहुत पुराने समय से ही रही है।
गुजरात में तो नए साल का आरंभ दीपावली के दूसरे दिन से ही माना जाता है। व्यापारी भी इसी दिन से नए साल की शुरुआत मानते हैं। क्योंकि इस समय ठंड पढ़ने से लोग कपड़े खरीदते हैं कंबल रजाईया खरीदते हैं एवं धन्वंतरि देव का विशिष्टमहत्व भारतीय संस्कृति होने से सभी सुवर्ण-चांदी और कलशादि बर्तन लोग खरीदते है।

इस समय से ही लोक में शादी विवाह इत्यादि कार्य भी प्रारंभ हो जाते हैं अतः वस्तुओं का आदान प्रदान बहुत अधिक मात्रा में बढ़ जाता है तथा बहुत सारी दैनिक आवश्यकताओं की चीजें को भी खरीदते हैं अतः आपको बाजार में भी भीड़ भाड़ देखने को मिलती है।

प्राचीन मान्यता के अनुसार व्यापार में जो बही और खाता लिखने की परम्परा रही है, वह दीपावली के अगले दिन से ही नव वर्ष मानते हैं। आज भी यह परम्परा साकार है। लोग अपने प्रतिष्ठानों में पूजन करने के पश्चात स्वास्तिक बनाकर रखते हैं एवं इस दिन को ही नव वर्ष मानते हैं।

ब्राह्मणवंशजों के लिए दीपावली पर्व बहुत मायने रखता है क्योंकि हमें पता है कि गौतम गणधर जो कि मूलतः ब्राह्मण थे उनको इस दिन केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी अतः ब्राह्मणों के गुरु इस दिन अंतर्ध्यान हुए थे।

                  ब्राह्मणों के लिए इस पर्व का महत्व इसलिए भी है कि- अचेलखण्डधर तथा दिगम्बर मुनि आदि का चर्तुर्विधसंघ जो पिछले 4 महीने से चतुर्मास धारण कर एक स्थान पर निवास कर रहा था दीपावली पर्व का समय उसके लिए निष्ठापन का योग होता है।

बीते 4 माह से एक जगह के लोग उनसे धर्मलाभ ले रहे थे
अब इसके बाद वे मुनिराज अन्य जगह बिहार कर जाएंगे ठीक वैसे ही जैसे भगवान महावीर आज से अढाई हजार वर्ष पहले इस भारत भूमि को छोड़ कर के चले गए थे।

इससमय; जब वैश्य अपने व्यापार में तथा गृहादिक की सफाई में लगें रहते है तब उन्हें निश्चित रूप से सहयोगी के रूप में गृह तथा भवनों की अट्टालिकाओं पर सेटिका मलने के लिए तथा अन्य भी साफ़-सफ़ाई के लिए शूद्रों की आवश्यकता पडती हैं।

अतः चारों वर्णों के लिए दीपावली पर्व बहुत महत्व रखता है।

चारों प्रकार के वर्णों के लिए उत्साह का समय होने से सभी लोग इस समय धूम धाम से यह पर्व मनाते है।प्रकृति में भी बीते चार माह वर्षा होने से सम्पूर्ण वसुधा प्रक्षालित हो जाती है तब सभी ओर द्रव्यदीपों से सज़ी हुई यह पृथ्वी जगमगाती है और सभी लोग इस समय पूजन कर अपना अन्तःकरण शुद्ध करने निमित्त भावदीप प्रद्योतित करने का उद्यम करते है।

लोकोत्तर दृष्टि से दीपावली पर्व -

धर्म और दीपावली

हरिवंश पुराण के अनुसार भगवान् भव्य जीवों को उपदेश देते हैं और पावानगरी में पधारते हैं। यहां एक मनोहर उद्यान में चतुर्थ काल की समाप्ति में तीन वर्ष आढ़े आठ मास शेष रह गए थे, कार्तिक अमावस्या के प्रातः योग का निरोध करके कर्मों का नाश करके मुक्ति को प्राप्त हुए। देवताओं ने आकर उनकी पूजा की और दीपक जलाए। उस समय उन दीपकों के प्रकाश से सारा क्षेत्र आलोकित हो उठा। उसी समय से भक्तगण जिनेश्वर की पूजा करने के लिए प्रति वर्ष उनके निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में दीपावलि मानते हैं।

दूसरी ओर जिस समय भगवान् महावीर का निर्वाण हुआ उसी समय उनके प्रधान शिष्य गौतम गणधर को पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। गौतम जाति के ब्राह्मण थे मुक्ति और ज्ञान को जिनधर्म में सबसे बड़ी लक्ष्मी माना है और प्रायः मुक्तिलक्ष्मी और ज्ञानलक्ष्मी के नाम से ही शास्त्रों में उनका उल्लेख किया गया है। अतः सम्भव है कि आध्यात्मिक लक्ष्मी के पूजन की प्रथा ने धीरे-धीरे जन समुदाय में बाह्य लक्ष्मी के पूजन का रूप धारण कर लिया हो। बाह्यदृष्टिप्रधान मनुष्य समाज में ऐसा प्रायः देखा जाता है। लक्ष्मी पूजन के समय मिट्टी का घरौंदा और खेल-खिलौने भी रखे जाते हैं। दरअसल ये घरौंदा और खेल-खिलौने भगवान् महावीर और उनके शिष्य गौतम गणधर की उपदेश सभा की यादगार में हैं और चूंकि उनका उपदेश सुनने के लिए मनुष्य, पशु, पक्षी सभी जाते थे अतः उनकी यादगार में उनकी मूर्तियाँ-खिलीने रखते हैं।

मन्दिरमार्गी जिनधर्मी प्रातः लाडू चढ़ाते हैं जो भगवान् के समवशरण का ही प्रतीक है। प्रसन्नता होने के कारण समाजी परस्पर में मिष्ठान भेंट करते हैं, खाते हैं और खिलाते हैं।

दीपावली पर्व का दिन अन्य बहुत से धर्मों के लिए खास है -

सनातन धर्म में राम का अयोध्या वापिस लौटकर आना एक विशिष्ट किंवदंती है।

सिक्ख और दीपावली

  • मुगलों से बचकर ग्वालियर में विजय प्राप्त करके जिस दिन गुरु हरगोविंदसिंह जी अमृतसर वापिस आये थे, उस दिन दीपमाला का ही पुण्य दिवस था। अपने गुरु की विजय यात्रा की सफलता के उपलक्ष्य में उस दिन से यह पर्व (त्यौहार) सिक्ख लोग भी बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इस दिन अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर की सजावट देखने योग्य होती है।

स्वामी दयानन्द और दीपमाला

आर्य समाज आन्दोलन के जन्मदाता स्वामी दयानन्द जी
सरस्वती ने इस दीपमाला के पुण्य दिन पर 56 वर्ष की आयु में इस पार्थिव शरीर से किनारा किया था।

स्वामी रामतीर्थ और दीपमाला

वेदान्त दर्शन की साकार मूर्ति, परमहंस स्वामी रामतीर्थ उसी दीपमाला के पुण्य दिन गंगा की नीली लहरों में समाए थे ।

वास्तव में तो यह दीपावली तीन दिन का ही उत्सव मनाया जाता था कार्तिक मास की त्रयोदशी को (धनतेरस के दिन) भगवान धन्वंतरि का हाथ में भरा हुआ सुवर्ण कलश लेकर समुद्र से प्रगट होने का संबंध लक्ष्मी और कुबेर की पूजन से जोडा जाता है।उसके अगले रूपचौदस(नरक चतुर्दशी-भगवान महावीर के रूप के दर्शन मात्र हुए लेकिन उनकी दिव्यध्वनि नहीं खिरी अतः लोगों को नरक जैसी वेदना हुई)इसको छोटी दीपावली कहते हैं।
कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है अतः यह सम्पूर्ण जनों का नववर्ष है।

भगवान महावीर के उपदेश का मूल प्रतिपाद्य- एक भगवान आत्मा को हमें इस पर्व पर समझने का प्रयास करना चाहिए जो स्वयं भगवान महावीर ने किया।भगवान महावीर के द्वारा प्रतिपादित अहिंसा,अनेकांतवाद और अपरिग्रह उन्हें सभी धर्मों से पृथक करती है एवं वर्तमान में उनकी आवश्यकता द्योतित करती है जिसको हम दीप जलाकर उस केवल ज्ञान की प्रतिमूर्ति रूप भगवान महावीर को याद करते हैं।

यह तीनों ही सिद्धांत भगवान महावीर के बहुत ही महत्वपूर्ण है अहिंसा के संदर्भ में तो यहां तक कहा जाता है कि जहां सारे विश्व की अहिंसा खत्म होती है वहां से भगवान महावीर की अहिंसा प्रारंभ होती है।

         भगवान महावीर का मानना था कि आप शस्त्रों से दूसरे को हरा तो सकते हो पर दूसरों को जीत नहीं सकते यदि आपको दूसरों को जीतना है तो आपको स्याद्वाद शैली का प्रयोग करना चाहिए। आज के भौतिक-पुंजीवादी विश्व में हिंसा झूठ चोरी कुशील इन चार पापों को तो पाप माना जाता है किंतु परिग्रह को बड़प्पन का द्योतक माना जाता है इस को पाप कदापि नहीं माना जाता किंतु भगवान महावीर नहीं समझाया कि यह परिग्रह ही तो सबसे बड़ा पाप है।

जब भी यह बात सामने आती है कि-
वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता है
उनका आशय यह होता है कि- वर्धमान के सिद्धांतों की आज महती आवश्यकता है लेकिन मुझे यह एक बात भी ख्याल में आती है कि- हमारी वर्तमान पर्याय जो मोह राग देश में भटक रही है उस वर्तमान की पर्याय को अपने वर्धमान स्वरूप ब्रह्मनिजात्मा की आवश्यकता अवश्य है और यही मुक्ति की उपाय है और यही भगवान महावीर की दिव्यवाणी का प्रतिपाद्य है। वास्तव में
तीर्थंकर तो सादिसांत होये है लेकिन उनके सिद्धांत अनादिअनंत होते है।

इसप्रकार इस पर्व का अद्भुत महत्व हमारी संस्कृति में है ।

                                                       - आप्त जैन