आठ दोष सम्यग्दर्शन के, कभी न हों मेरे द्वारा

1008 भगवान श्री मल्लीनाथ स्वामी

      (सोरठा)

मोह मल्ल जय हेतु, मल्लिनाथ मुनि हो गए।
भव भावों से रीत, साक्षात शिव हो गए ॥
(ताटंक)
आठ दोष सम्यग्दर्शन के,
कभी न हों मेरे द्वारा।
निःशंकित श्रद्धान हृदय हो,
तो कट जाये भवकारा।।
निःकांक्षित भावना पूर्ण हो,
आकांक्षा का नाम नहीं।
निर्वचिकित्सा भाव हृदय हो,
सेवा विरहित काम नहीं।।
नहीं अमूढदृष्टि, मिथ्या जन
की जु प्रशंसा करूँ नहीं।
उपगूहन पर के दोषों को,
कभी प्रकाशित करूँ नहीं।।
स्थितिकरण करूँ साधर्मी,
कभी मार्ग से डिगूँ नहीं।
वत्सल भाव हृदय में धारूँ,
इससे पलभर चिगूँ नहीं।।
धर्ममार्ग की कर प्रभावना,
सबका ही कल्याण करूँ।
समकित के वसु गुण उर धारूँ,
प्रभु निज का उत्थान करूँ।।
कभी किसी भी प्राणी का,
निन्दा पुराण मैं पढ़ूँ नहीं।
अपनी ख्याति प्रशंसा का भी,
तो पुराण मैं गढू नहीं।।
दोनों कृत्य नीच गति दाता,
नर्क तिर्यंच कुगति के घर।
विनय भाव गति उच्च प्रदाता,
कल्पादिक साता के घर।।
अनियत कुल का गर्व न कर तू,
घृणा न कर छोटे कुल से।
आगामी भव जुड़ सकता है,
तू भी छोटे ही कुल से।।
कभी जाति का गर्व न करना,
तू निगोद से आया है।
करके भूल पुनः निगोद,
जाने का भाव सुहाया है।।
बल का गर्व किया रावण ने,
सप्तम नर्क दुक्ख पाया।
मान कषाय होकर छोड़े,
प्राण विनय को बिसराया।।
अगर ऋद्धि का मद है तो फिर,
द्वीपायन की देख दशा।
क्रोधपूर्वक मरा स्वयं ही,
जाकर नरक कुधाम फँसा।।
तप का मद भी दुखदायी है,
खोटी गति का करता बंध।
रुद्र आदि की कथा बताती,
मुनि भी हो जाता है अंध।।
राज्य आदि देह का मद भी,
नश्वर है दुखदायी है।
नरकादिक गतियों का दाता,
प्रतिक्षण पीडादायी है।।
पूजा का मद भूल बावरे,
मत घमंड कर पल भर भी।
मरकर जाने कहाँ जाएगा,
सोचा है क्या क्षण भी।।
नहीं ज्ञानमद करना पगले,
यह है ज्ञानभाव घातक।
ये आठों मद ले जाते है,
इस मानव को नरकों तक।।
षट् अनायतन से मैं दूर,
रहूँ ये अकल्याणकारी।
मिथ्यादेव शास्त्र गुरु हैं तो,
ये हैं भव-भव दुखकारी।।
देव मूढ़ता गुरु मूढ़ता,
लोक मूढ़ता तजूँ प्रभो।
देखा देखी नहीं करूँ मैं,
नमन किसी को कभी विभो।।
बिना परीक्षा देव मानना,
यह मिथ्या भ्रम वर्धक है।
बिना परीक्षा गुरु की आज्ञा,
पालन भी दुख सर्जक है।।
मल्लिनाथ के चरणाम्बुज की,
अनुकंपा से ज्ञान हुआ।
आत्मतत्त्व की प्रतीति पूर्वक,
उर में दृढ़ श्रद्धान हुआ।।
अब न कहीं कोई बाधक है,
सम्यग्दर्शन पाने में।
होगी देर नहीं होगा,
अंधेर मोक्ष के जाने में।।

कवि हृदय पं.राजमल पवैया जी ‘भोपाल’

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