कषाय की तीव्रता-मन्दता

कषाय की तीव्रता-मन्दता का राग की तीव्रता-मन्दता के साथ एवं द्वेष की तीव्रता-मन्दता के साथ क्या सम्बन्ध है?
कृपया विस्तार से प्रकाश डालें। सप्रमाण उत्तर देवें तो और भी अधिक अनुकम्पा होगी।:pray:

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आपके प्रश्न में राग द्वेष को कषाय के ही प्रकार नही देखते हुए, कषाय की राग-द्वेष से भिन्नता कर संबंध पूछा है। आप राग द्वेष को किस तरह से कषाय से भिन्न कर उनमें सम्बन्ध का प्रश्न पूछ रहे है यह सप्रमाण बताइएगा?

बहुत विचारणीय प्रश्न है।

कषाय की मन्दता- तीव्रता और राग द्वेष का निमित्त नैमित्तिक रूप में गहरा सम्बद्ध है।

कषाय = द्रव्य कर्म ( अन्नतानुबधि आदि चार)

राग द्वेष = भाव कर्म

सूक्ष्म रूप से तो इनके कई भेद हो सकते है।

जैसे संहनन,कोनसी गति में है,कोनसे काल मे है,कितनी इन्द्रिय जीव है

इसके एक एक भेद अनुसार कई भेद बन सकते है,
सभी लिखना बहुत विस्तृत हो जाएगा।
परंतु मात्र कर्म भूमि में चतुर्थ और पंचम काल के मनुष्य को ध्यान में रखकर चर्चा करे

कोनसी कषाय की उपस्थिति में Extreme level पर कितना राग द्वेष हो सकता है यह देखते है

अन्नतानुबधि कषाय = ये द्वी स्वभावी प्रकृति श्र्द्धा और चारित्र दोनो का घात करती है,इसके कारण विपरीत अभिप्राय के साथ परिणाम कितने ही तीव्र हो सकते है।
जैसे इंसान का खून पी कर उसमे आनंद मानना,राजा श्रेणिक( भाव लिंगी मुनिराज पर उपसर्ग बदला लेने का भाव)

अप्रत्याख्यानवरण कषाय - राग-द्वेष तीव्र रूप में हो सकता है परंतु अभिप्राय गलत नही होगा,तीव्रता इतनी की हजारों की हत्या भी हो सकती है जैसे राजा राम का युद्ध,मुनिराज को बचाने के लिए किसीकी हत्या करना,मंदिर आदि बंनाने के परिणाम,आदि… परंतु अन्याय,अनीति ,अभक्ष्य रूप राग द्वेष नहि होगा।

प्रत्याख्यानवरण कषाय = त्रस की हिंसा रूप राग द्वेष का अभाव हो जाएगा,विशेष प्रयोजन सहित त्रस हिंसा का परिणाम भी हो सकता है जैसे पुत्र प्राप्ति के अर्थ भोग करना,यह भी 6 ठवी प्रतिमा तक हो सकता है,
घर मे बलात्कार या हत्या के प्रयोजन कोई आवे तो बचने बचाने का पूरा प्रयास करेगा उनको मारने या सजा दिलाने का परिणाम नही होगा,परंतु जब वह सामायिक में होगा तब तो मुनिवन्त हो जाएगा, बचने बचाने का भी भाव नही होगा,घरमे आग लग जाये तो भी नही ही हिलेगा

संज्वलन कषाय = इसके ऊपर तो मूलाचार का दंड- प्रयाश्चित वाला प्रकरण पढ़ने योग्य है

यहाँ राग द्वेष की तीव्रता आचार्यो में विशेष देखने मे आती है
जैसे कोई मुनि को संघ से निकाल देने,जहां अन्य मुनिराज मल मूत्र विसर्जन करते हो वहां पर बैठने को कहना,उन मुनि कोई प्रतिवन्दना नही करेगा आदि…

यहाँ बचने का परिणाम होना कठिन है बचाने परिणाम अवश्य होगा जैसे भद्रबाहु आचार्य ने संघ को दक्षिण और ले गए,अन्य मुनिराज पर उपसर्घ न हो इसके अर्थ श्रुत सागर मुनिराज को संघ से दूर रखा,

ग्रंथ आदि लेखन से जैसे कुंद कुंद स्वामी का दिगम्बर आम्नाय को बचाने का तीव्र राग अष्टपाहुड में दिखाई दे रहा है,अन्य कुलिंगियो को मूढ़ आदी वचनों से सम्बोधित किया

कोई मुनि की समाधि के काल मे सभी आवष्यको को गौण कर उनकी वैयावृत्ति आदि में विशेष उपयोग लगाते है
विशेष अवस्था मे रिद्धि का प्रयोग करना जैसे रावण ने जब शिला पर बैठे हुए मुनिराज को शिला के साथ उठाया तब शिला पर स्थित जीवो की रक्षा के हेतु अंगूठे से शिला को दबाया।

इस विषय पर भेद इतने हो सकते है कि जितना कहा जाय उतना कम है,
चरणानुयोग करणानुयोग का समन्वय कर विशेष अपेक्षाएं बन सकती है।

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हज़ारों की हत्या के परिणाम और अभक्ष्य खाने का त्याग, ये दोनों कैसे सम्भव है? क्या अभक्ष्य खाने का परिणाम हज़ारों की हत्या के परिणाम (चाहे वह अनीति के विरुद्ध हुआ हो) से तीव्र है? अर्थात् ऐसा कैसे कि रामचंद्र जी युद्ध किया उससे समयक्तव का घात नहीं हुआ लेकिन अगर अभक्ष्य पदार्थ का सेवन करते तो ज़रूर हो जाता?

द्रव्यकर्म जो सत्ता में है उससे तो निमित नैमितिक नही है। किंतु उदयगत द्रव्यकर्म (पुद्गल भावकर्म)रूप कषाय का जीव के कषाय:- राग, द्वेष से निमित नैमितिक जरूर है।

यहाँ जीव के कषाय की या पुद्गल के कषाय की बात है यह स्पस्ट नही हुआ अभी।

और यदि पुद्गल के कषाय की तीव्रता-मंदता की बात है तो उसकी तीव्रता-मंदता का जीव के राग-द्वेष के तीव्र-मंदता से कैसे संबंध है? यह आपके उत्तर से स्पष्ट नही हो रहा। पुद्गल कषाय के उदय में किस प्रकार के तीव्र मंद राग द्वेषादि होते है यह आपने दर्शाया है।

जी,
जो उदय में होगा उनका ही बनेगा ,सत्ता का तो बनना सम्भव नही है

यहाँ प्रायोगिक रूप से देखना चाहिए,कुछ अन्याय का कार्य हुआ हो जैसे राज्य पर संकट आवे,पत्नी का अपहरण होवे, मुनिराज पर उपसर्ग कर रहा हो,कोई दुष्ट प्रजा को परेशान कर रहा हो, उस समय वे राजा की भूमिका में है और वे ठोस कदम न उठावे ऐसा नही हो सकता,
आप पुराण में देखना,पहले वे मामला बातचीत में ही पूर्ण हो जावे ऐसा ही प्रस्ताव रखेंगे,
राजा राम ने लगभग 8 बार शांन्तिपूर्ण रूप से प्रस्ताव भेजा था,फिर भी रावण नही माना,
क्या सीता को उनके हवाले छोड़ना उचित था?इससे लोक में धर्म की प्रभावना होगी?
जिस समय जो जीव जिस भूमिका में है उस भूमिका को न्याय देना उचित है,

अगर वे मुनि बन जाते तो कोन पत्नी और कौन भाई,

अभक्ष्य
अभक्ष्य का सेवन से अन्याय के ऊपर जीत नही मिलती,
और लोक में भी धर्म की अप्रभावना का कारण है

इसके सेवन के पीछे का कारण जीव का प्रमाद,रसना इन्द्रीय की लोलुपता,देह को विशेष रूप से पुष्ट करने का भाव,

कोई सम्यकदृष्टि गृहस्थ बाज़ार का भोजन,रात्रि भोजन का त्यागी हो,पानी भी मार्यदा वाला लेता हो,
उनके घरमे महिला के साथ कोई अन्य जबरदस्ति करे उस समय उनको सामना करना चाहिए या नही,यहां तक की इसमे सामने वाले कि हत्या भी हो जावे इनका सम्यक्त्व बना रह सकता है,

मूल में हमे प्रायोगिक रूप से विचार करने योग्य है

चतुर्थ गुणस्थान में अभिप्राय सही हुआ है,
वास्तव में 14 मे से चतुर्थ गुणस्थान को समझना सबसे कठिन है,क्योंकि सम्मान्य रूप से क्रियाए उनकी और मिथ्यादृष्टि की एक जैसी दिखती है।

कदाचित चतुर्थ गुणस्थान में कोई विपरीत कार्य पढ़ने में भी आवे तो समझना कि पूर्व के कई भवो का यह सम्बन्ध चलता आ रहा हो।

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धन्यवाद।