निगोदिया जीव का पुण्य

क्या जब जीव निगोद में जाता है तो उसका पूरा पुण्य क्षीण हो जाता है फिर ही गति बंध होता है ?
निगोद से जीव बाहर कैसे आता है?

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There is one story -

एक भावलिंगी मुनिराज ध्यानमग्न थे, उन्हें देख राजा नमस्कार कर आगे केवली भगवान् के दर्शन को गए। वहां पूछा के वे मुनि बहुत अच्छे से ध्यान मग्न है, वे कब मोक्ष जायेंगे ? भगवान् बोले वे जिस इमली के वृक्ष के निचे बैठकर ध्यानमग्न है, उस पेड़ पर जितने पत्ते है अभी उन मुनि के संसार में इतने ही जन्म और बाकी है। यह सुन राजा को बहुत आश्चर्य हुआ - कि इतने सारे भव !!! क्या इमली के पेड़ के पत्तो को भी कोई गिन सकता है ? लौटते समय राजा ने मुनि को देखकर कहा - कि रे ढोंगी क्या तप करता है ? तेरे तो अभी बहुत भव बाकि है। मुनि कुछ न बोले।

वे मुनि किसी कारन वश सम्यक्त्व से च्युत हो मरकर निगोद चले गए। और एक हफ्ते में ही उनके उतने भव complete हो गए। हफ्ते भर बाद वे फिर से उसी नगर में मनुष्य बने और कम उम्र में ही दीक्षा लेकर मुनि हुए और पुनः उसी इमली के पेड़ के निचे बैठकर ध्यानमग्न हुए और मोक्ष को प्राप्त हुए।

तो अब ये तो नहीं कहा जा सकता कि सर्व पुण्य समाप्त होने पर ही निगोद होता है। हाँ कुछ अवधि के लिए पुण्य का उदय नहीं होता। जैसे इस case में एक सप्ताह के लिए पुण्य उदय नहीं था। ऐसे ही नरक जाते है तो उतनी अवधि में कोई पुण्य का उदय नहीं होता जैसे श्रेणिक महाराज के पास पुण्य तो है पर ८४,००० वर्षों तक उसका उदय नहीं होगा, वह बस सत्ता में पड़ा रहेगा।

Luck by chance !!

अनंत जीव अभव्य है, उनका क्या दोष है ?
अनंत जीव कभी निगोद से बहार ही नहीं आएंगे, अब इनका क्या दोष है ?
अनंत जीव भव्य होने पर भी कभी मोक्ष नहीं जायेंगे, क्यों ?

Ideally, निगोद से बहार आने पर जीव जल, थल, अग्नि काय आदि एकेन्द्रिय फिर २ इन्द्रिय ४ इन्द्रिय आदि विकलत्रय फिर तिर्यंच फिर नरकादि ऐसे अशंख्यात भव करता है फिर मनुष्य होता है। ऐसे अशंख्यात भवों में जाके उसे जिनधर्म मिलता है। पर भरत चक्रवर्ती के पुत्र वे नित्य निगोद से निकलकर १ भव विकलत्रय में और फिर सीधा चक्रवर्ती पिता तीर्थंकर दादा और राजकुमार, अब इतना पुण्य आया कहाँ से ? वे तो पहली बार निगोद से निकले थे। और पुण्य तो पुण्य बचपन से ही इतने मंद कसायी, भला कैसे ? हम तो बचपन से ही रागी, द्वेषी, कामी, क्रोधी, लोभी पैदा हुए है। So just luck by chance.

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