ताड़पत्र संबंधी प्रश्न

ताड़पत्र जिन पर आचार्य और मुनिवर शास्त्र लिखते थे वो कैसे होते है?

क्या वे सूखे पत्ते ही होते है? अगर हां, तो वे 2000 साल तक कैसे सलामत है?

थोड़ा ऑनलाइन पढ़ा: https://mobi.bharatdiscovery.org/india/ताड़पत्र_(लेखन_सामग्री)

इसमें ताड़पत्र बनाने का complicated प्रोसेस है। ऐसे कौन बनाते थे? और आचार्य उन पर सूखी लकड़ियों से कैसे लिखते थे? क्योंकि इन ताड़पत्र पर तो मुख्यतः स्याही का उपयोग बताया है।

कृपया प्रकाश डालें। :pray:

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मुझे अधिक जानकारी तो नहीं है किन्तु यहां आचार्य कुंदकुंददेव की तपोभूमि पोन्नुर में ताड़पत्र ग्रंथों का संरक्षण का कार्य चल रहा है यहां काफी संख्या में ये ग्रन्थ है जिनमें जैन और अजैन कई प्रकार के ताड़पत्र ग्रन्थ है।

यहां पास में किसी संकुल में कोई भट्टारकजी है, जो बहुत समय से इन ताड़पत्र ग्रंथों का संरक्षण कर रहे है और उन्हें इन ताड़पत्रों की लिपि ग्रंथम् लिपि और भाषा जो की इनमें संस्कृत और तमिल और कुछ दोनों का समन्वय जिसे मणिप्रवाल कहा जाता है तो उस भाषा सम्बन्धी कुछ ज्ञान भी उन्हें है।

उन्होंने हमें बताया कि ये इतने प्राचीन आचार्यों के हस्तलिखित ताड़पत्र नहीं है , इन ताड़पत्रों की आयु अधिक से अधिक 200-300 वर्ष ही है, पहले के समय वृक्ष से ताड़पत्रों की प्राप्ति के पश्चात् गांव या नगर के श्रावक इन्हें पूर्णतः अहिंसक विधि द्वारा लिखने योग्य बनाकर वनों में दिगम्बर मुनि के समीप देते थे और मुनिराज इन पर कांटों से ही उसमें अक्षर ऐसे छिद्र कर करके उसमें लिखते थे और हर ताड़पत्र पर क्रमपूर्वक उसी लिपि में नंबर भी लिखा जाता था ताकि ग्रन्थ के पत्र (पेज) का क्रम ध्यान रहे , पश्चात् कुछ व्रती श्रावक वहां से ग्रन्थ ले जाते थे और शुद्धवस्त्र पहनकर उन ग्रन्थों को अन्य ताड़पत्र पर वैसा का वैसा किसी सुई जैसी नुकीली चीज से लिखते थे और पश्चात् उस समय उपलब्ध किसी स्याही को उसमें भर देते थे और कुछ वर्षों बाद पुन: अन्य प्रतिमाधारी व्रती श्रावक शुद्धवस्त्र पहनकर जिनवाणी संरक्षण की भावना से अन्य नवीन ताड़पत्रों पर पुराने ताड़पत्र जो जर्जरित होने को होते थे उन्हें वैसा का वैसा अक्षरश: उतार देते थे। और यही क्रम चलता रहा और हमारे पास आज भी प्राचीन ग्रंथ प्राचीन वाणी सुरक्षित है।

अभी इन ताड़पत्रों पर समय के साथ दीमक लग जाती है अन्य सूक्ष्म जीवों की भी उत्पत्ति होती है। उसे रोकने के लिए, उनसे संरक्षण के लिए ताड़पत्रों पर, लवंग, अरंडी, लेमन इत्यादि का अहिंसक तेल मिलाकर इन्हें ताड़पत्रों को अत्यन्त सावधानी पूर्वक हल्के हाथ से साफ करके इन पर लगाते है, ताकि जीवजन्तु वहां से हट जाए और उनकी हिंसा भी ना हो।

और इसी के साथ इन ताड़पत्रों को आचार्य कुंदकुंद पारमार्थिक ट्रस्ट, विलेपार्ले मुम्बई द्वारा आचार्य कुंदकुंद जैन संस्कृति सेन्टर, पोन्नुर में स्कैन करवाकर डिजिटलाइज्ड भी करवाया जा रहा है। जिसमें एक मुमुक्षु साधर्मी विजयभाई अहमदाबाद इस कार्य को अपने पूर्ण समर्पण भाव से कर रहे है।

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जानकारी के लिए बहुत बहुत आभार। :pray:

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