संकीर्ण पंथ-मत से परे मेरा मोक्ष पथ

  • आचार्य कनकनंदी द्वारा रचित
    संकीर्ण पंथ-मत से परे मेरा मोक्ष पथ

(चाल :- छोटी-छोटी गैया)

मुझे तो चाहिए मोक्ष/( आत्म,सत्य) पथ, जो सर्वज्ञ वीतरागी द्वारा ज्ञात है।
मुझे न चाहिए संकीर्ण पंथ-मत/( अनात्म, असत्य), जो राग द्वेष से सहित है।।
सर्वज्ञ बीतरागी ही हो सकते हैं, यथार्थ मोक्ष मार्ग के उपदेशक।
सर्वज्ञ होने से जानते सभी है, वीतरागी होने से यथार्थ उपदेशक ।। (1)

अन्य के उपदेश न होगा यथार्थ, जो जानते नहीं है संपूर्ण सत्य
बीतरागी पूर्णतः नहीं होने से, पक्षपात रहित न बोलेंगे सत्य।
सर्वज्ञ वीतरागी होते हैं, अनंत ज्ञान-दर्श-सुख-बीर्य सम्पन्ना
क्षुधा-तृषा-आधि-व्याधि से लेकर, अठारह दोषों से होते शून्य॥(2)

इन्होंने बताया है मोक्ष पथ, आत्मा से प्रारंभ होकर आत्मा में स्थिता।
आत्मा में ही होता विकास, आत्मा में ही होता समाप्त॥
आत्मविश्वास से होता प्रारंभ, जिससे ज्ञान भी होता सम्यक्‌।
राग-द्वेष-मोह दूर करना चारित्र, तीनों मय ही है मोक्षपथ ॥ (3)

इस का ही विस्तार है क्षमा-सहिष्णुता, उदारता-शुचिता व समता।
सरल-सहजता व निस्पृह-निराडम्बर व आत्मा में स्थिरता।
अहंकार व ममकार शून्यता, भेदभाव रिक्त होती साम्यावस्था।
परनिंदा अपमान रहित, वैर-विरोध दूंद्रादि रहित अवस्था॥(4)

इससे ही श्रद्धा प्रज्ञा व अनुभव से, स्वयं का वेदन होता यथार्थ।
स्वयं में ही स्वयं का मोक्ष पथ है, स्वयं की उपलब्धि यथार्थ मोक्ष।।
स्वयं का अनुभव होता है, सच्चिदानंदमय जो अमूर्तिक अव्याबाध।
इसकी प्राप्ति हेतु ही होती साधना, जिससे नष्ट होते सभी विभाव ॥(5)

इस हेतु ही पालन होते ब्रत नियम, तप-त्याग व ध्यान-अध्ययन।
यथायोग्य गृहस्थ से लेकर, सर्व-सन्यासमय श्रमण धर्म।।
इससे विपरीत सभी न होते, मोक्षपथ सभी होते संसार पथ।
मोक्षपथ को पूर्ण करने हेतु, ‘कनकनंदी’ भाव से साधना रत॥ (6)