निश्चय व्रत, समिति, गुप्ति में अंतर?

व्यवहार से व्रत, समिति, गुप्ति में अंतर ख़याल आता है, जैसा मेरी समझ है वो इस प्रकार है:

  • व्रत: बाह्य विषयों से बचना
  • समिति: बाह्य विषयों की प्रवृत्ति के समय संयम
  • गुप्ति: व्यवहार के समय निश्चय में आने का पुरुषार्थ

(अगर उपरोक्त में गलती हो तो कृपया बताइए)।

प्रश्न: निश्चय समिति, गुप्ति, व्रत में कुछ अंतर है? पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीनो ही शुद्धोपयोग ही है। या फिर ऐसा की बाह्य समिति के समय होने वाली “शुद्ध परिणति” निश्चय समिति है आदि, ऐसा? कृपया समाधान कीजिए।

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‘निश्चय समिति’ ऐसा उल्लेख तो ध्यान में नहीं है, लेकिन ‘सच्ची गुप्ति’, ‘सच्ची समिति’ इत्यादि की चर्चा पण्डित टोडरमल जी ने मोक्षमार्ग प्रकाशक के सातवें अधिकार में ‘संवरतत्त्व का अन्यथा रूप’ इस प्रकरण में की है। वह पूरा प्रकरण ही मूलतः पठनीय है।
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