जीव में दुःख है या नहीं?

एक जगह ऐसा पड़ने में आया है -
“जीव को दुःख का ज्ञाता भलेही कहो, पर जैसे सूर्य में अन्धकार नहीं है, वैसे जीव में दुःख नहीं है”

यहाँ सच में ऐसा है ? या दृस्टि कराने के लिए ऐसा कहा है ?

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जीव के क्षणिक स्वभाव (पर्याय) में दुःख का वेदन (विभाव) है
मूल स्वभाव की मुख्यता से पर्याय में विभाव को जीव का न कहेने पर जीव में दुःख नहि है, क्योंकि स्वभाव में दुःख नहि है।

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आ. बड़े प. जी साहब के शब्दों में - ‘भ्रम का दुःख है, परंतु दुःख वास्तविक है’ और इसीलिए उसके अभाव का मार्ग हमारे वीतरागी भगवंतों ने प्रशस्त किया है।
भ्रम का दुःख - स्वभाव तो सुख स्वरूप है उसकी ख़बर नहीं है और अन्य बाह्य पदार्थों से सुख का सम्बंध जोड़ना भ्रम है जिसके कारण दुःख है।

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जब एक नय किसी को मुख्य करता है तो अन्य की गौणता होती है नास्ति नहिं। और जो नय जिसकी गौणता करता है उसका विवेचन वह नय करता ही नही। उसके विवेचन के लिए दूसरा नय खड़ा होता है, और क्योंकि वह दूसरा नय जिसे प्रथम नय ने गौण किया था उसे मुख्य कर बात करता है तो वह उसकी नास्ति कैसे करेगा?

इसलिए स्वभाव दृस्टि दुःख को गौण कर उसका कोई विवेचन नही करते हुए, केवल सुख स्वभावी अपने को देखता है।

“दुःख है”, “नहिं है”, “पर्याय में है, मेरे में नही” - ऐसा दुःख के बारे में कोई विस्तार वह नय नहीं करेगा। क्योंकि उसका विस्तार करने के लिए उसको विषय करना पड़े, और यदि विषय किया तो वह नय ही बदल गया। और जिस नय को दुःख दिखता है वह उसकी नास्ति कैसे करे?

जिस समय सुख स्वभाव की मुख्यता है उस समय तो दुःखरूप परिणमन है ही नहिं। इसलिए जब पर्यायमें विभाव नहीं तो “पर्याय में विभाव है पर जीव का नहीं” ऐसे कथन की जरूर ही नहीं रही। उस समय तो पर्याय मे दुःख नही इसलिए कहते है दुःख नहीं।

Wrote the above message as an attempt to provide a model to depict how an answer from a jain philosopher is very precise and no loose sentences. May we all develop that habit of answering. Any improvisation on it is welcome.

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यहाँ पर पूरे जीव के परिपेक्ष में बात कही है
जीव में दुःख है या नहि, तब सभी नय की अपेक्षा लगेगी

जी। आप की बात सही है। परंतु क्या पर्याय पूरे जीव में नही? यदि है तो उत्तर में पूरे जीव से कथन होगा कि जीव सुखी दुःखी ऐसा अनेकांत मय है।

Please note: उत्तर आपके वाक्य रचना अनुसार है इसलिए पूरे जीव शब्द प्रयोग किया है। वैसे जीव पूरा और आधा ऐसा है नही। जीव अखंड पूरा ही होता है। दुःखरूप परिणमन भी पूरे जीव का ही है। केवल पर्याय का परिणमन और जीव का नही- ऐसा होता है क्या?

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जी…

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Your जी… is quite ambiguous! But i guess i am rightly taking it as congruent with my post.

I see this platform as a great resource for current as well as future generation for the true understanding of our jain philosophy, so I often get this urge to improvise the sentences so that it conveys the real meaning. So posted on your message too.

So far i feel everyone who is attempting to answer the queries are doing wonderful work. The efforts of this forum’s developer is paying off really well. And though i am not their team person, yet i feel pleased to see its success as a Jain.

I am only afraid that my improvisation is not perceived as offending someone. I did stop myself sometimes from posting on some messages out of that fear. But we are all almost the same age, and are keen learner… and so i guess contributing on this forum helps all of us.
I too have learn a lot from this forum’s various categories, which otherwise may be i wouldnt have read. So thanks to all for that.

Best wishes for all.

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