शुद्ध द्रव्यार्थिक नय और परमभावग्राही द्रव्यार्थिक नय में अंतर?

डॉ भारिल्ल कृत परमभाव प्रकाशक नयचक्र में द्रव्यार्थिक नय के २ भेद में प्रश्न है

  • शुद्ध द्रव्यार्थिक नय: कर्मोपाधि, भेद-कल्पना, उत्पाद-व्यय से निरपेक्ष
  • परमभावभावग्राहि द्रव्यार्थिक नय: शुद्ध, अशुद्ध, उपचरित भाव से रहित

इन दोनो में क्या अंतर है? लेखक ने परमभावग्राहि द्रव्यार्थिक नय को परमशुद्ध निश्चय नय से equate किया है। तो क्या शुद्ध द्रव्यार्थिक नय शुद्धनिश्चय नय से similar है?

यद्यपि परमभावग्राहि में “शुद्ध” का भी निषेध है, लेकिन दोनो में अंतर तब भी समझ नहीं आया।

चूँकि यहाँ पर द्रव्यार्थिक नय की चर्चा है, इसलिए शुद्ध और परमभाव दोनो ही द्रव्य के अंश को ही ग्रहण कर रहे है। इसलिए दोनो में अंतर समझ नहीं आ रहा।

यह सूक्ष्म विषय पर उत्तर देने से पहेले, हमें नय सिखाने वाले हमारे गुरु का सहयोग और उपकार को हम याद करते है।

उत्तर:
शुद्ध द्रव्यार्थिक नय कर्म के उदयादिक की अपेक्षा से रहित अभेद नित्य द्रव्य (लक्ष्य) को देखता है।

परमभाव ग्राहक नय आत्मा को औदायिक आदि भावों के अगोचर सरागता वीतरागता को गौण करके परमभाव ज्ञायकभाव अर्थात ज्ञानलक्षण को देखता है।

परमभाव ग्राहक द्रव्यार्थिक नय का विषय भी ज्ञायकभाव है, और परमशुद्ध निश्चयनय का विषय भी ज्ञायकभाव है इसलिए its equated.

नयचक्रों में परमभाव ग्राहक द्रव्यार्थिक नय को तीनों शुद्धद्रव्यार्थिक नय से अलग लिया है परंतु जयसेन स्वामी ने इसके प्रयोग में परमभावग्राहक नय को भी परमभावग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिक नय भी लिखा है। क्योंकि जो परमभाव है वह आत्मा का शुद्ध स्वभाव है।

नयचक्रों ने इसे शुद्ध द्रव्यार्थिक में नहीं लिया है क्योंकि यह निरपेक्षता लक्षण से रहित है, इसलिए इसे शुद्ध में नहीं लिया।

परमशुद्ध निश्चयनय भी शुद्ध निश्चय का ही एक भेद है। जिसका विषय ज्ञायकभाव है वह परमशुद्ध है। आत्मा में शेष जो शुद्धता है वह परम शुद्धता नहीं कहलाती, इसलिए परम शुद्ध निश्चयनय का विषय जो ज्ञायकभाव है वह अन्य शुद्धनिश्चय नय का विषय नहीं है।

द्रव्यार्थिक नय का विषय द्रव्य का अंश नहीं होता, अंश पर्यायार्थिक नय का विषय होता है। शुद्ध द्रव्यार्थिक नय और परमभाव ग्राहक नय में लक्ष्य और लक्षण का अंतर है। शुद्ध द्रव्यार्थिक नय का विषय लक्ष्य है और परमभावग्राहक नय का विषय लक्षण है, इसप्रकार अंतर है।