नोकर्म का स्वरूप

क्या पार्श्वनाथ पर उपसर्ग पाप कर्म के उदय से हुआ या कमठ के जीव के परिणामों के अतिरेक से? क्योंकि उन्हें तो पाप परिणाम हुए ही नहीं।

निहित-प्रश्न - क्या नोकर्म का बन्ध/उदय होता है?

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मैं अपनी अल्प/मंद बुद्धि से इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूँगा, अगर कही पर त्रुटि हुई तो क्षमाप्रार्थी हूँ।

अगर हम ८ में से ४ आघातिया कर्म देखे – नाम, गोत्र, आयु, वेदनीय तो ये सभी संयोग होने से नोकर्म ही है।

पार्श्वनाथ मुनि पर हम कमठ का उपसर्ग सोचे तो इस प्रकार ले सकते है:

पार्श्वनाथ भगवान की आयु कर्म का उदय निरंतर चल रहा था इसलिए घोर उपसर्ग के बावजूद उनका देह विलय नहीं हुआ। असाता वेदनीय के उदय से उनके शरीर (संयोग) पर वेदनाएँ आयी। और चूँकि वो स्वभाव में लीन थे इसलिए उन्होंने कोई भी नए घाती कर्म नहीं बांधे।

उपरोक्त में कुछ भी त्रुटि हो तो कृपया उसे सुधारे एवं इसके लिए क्षमा।

आरोप की दृष्टि से कहना उचित ही है।

लेकिन पहले नोकर्म के स्वरूप का निर्णय कर लेते हैं? उसका बन्ध/उदय/सत्ता कैसे होता है?
और यदि यह सब नहीं होता है, तो कब निर्धारित होता है किसी भी कर्म का नोकर्म।

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मैंने थोड़ा और सोचा, और मैंने ऊपर ग़लत लिखा। चार आघातिया कर्म भी द्रव्य-कर्म ही है, नोकर्म नहीं। नोकर्म तो बाहरी संयोग ही है, उनका उदय आदि नहीं होता है, क्यूँकि उदय द्रव्य कर्म का ही होता है। नोकर्म सामान्य पुद्गल द्रव्यों के स्कंध ही है।

में भी कुछ दिनों से यही प्रश्न पर अटका हूँ परंतु जैनेन्द्र सिद्धांत कोष से कुछ अंश मिले है |

पुदगल की कुल २३ वर्गाणाये है

अणुवर्गणा, संख्याताणुवर्गणा, असंख्याताणुवर्गणा, अनंताणुवर्गणा, आहारवर्गणा, अग्रहणवर्गणा, तेजस्वर्गणा, अग्रहणवर्गणा, भाषावर्गणा, अग्रहणवर्गणा, मनोवर्गणा, अग्रहणवर्गणा, कार्मणशरीरवर्गणा, ध्रुवस्कंधवर्गणा, सांतरनिरंतरवर्गणा, ध्रुवशून्यवर्गणा, प्रत्येकशरीरवर्गणा, ध्रुवशून्यवर्गणा, बादरनिगोदवर्गणा, ध्रुवशून्यवर्गणा, सूक्ष्मनिगोदवर्गणा, ध्रुवशून्यवर्गणा और महास्कंधवर्गणा । ये तेईस वर्गणाएँ हैं

धवला 14/5,6,71/52/6
सेस एक्कोणवीसवग्गणाओ णोकम्मवग्गणाओ।
= (कार्माण वर्गणा को छोड़कर) शेष उन्नीस प्रकार की वर्गणाएँ नोकर्म वर्गणाएँ हैं। (अर्थात् कुल 23 प्रकार की वर्गणाओं में-से कार्माण, भाषा, मनो व तैजस इन चार को छोड़कर शेष 19 वर्गणाएँ नोकर्म वर्गणाएँ हैं)।

इन पुद्गल वर्गणा का परिणमन कुछ वर्गणामें पुद्गल एवं जीव निमित्त है अन्य में मात्र पुद्गल निमित्त रूप में है

इन वर्गणा को जीव के साथ जोड़कर कहे तो अघाती लगा सकते है
अघाती में में किस तरह लग सकता है ?

  1. वेदनीय का कार्य बाह्य सामग्री संपादन है
    धवला 6/1, 9-1, 18/36/ पंक्ति-दुक्खुवसमहेउसुदव्वसंपादणे तस्स वावारादो ।1।…ण च सुहदुक्खहेउदव्वसंपादयमण्णं कम्ममत्थि त्ति अणुवलंभादो ।7 ।= दुःख उपशमने के कारणभूत सुद्रव्यों के संपादन में सातावेदनीय कर्म का व्यापार होता है । सुख और दुःख के कारणभूत द्रव्यों का संपादन करने वाला दूसरा कोई कर्म नहीं है ।

धवला 13/5, 5, 88/357/2दुक्खपडिकारहेदुदव्वसंपादयं… कम्मं सादावेदणीयं णाम ।… दुक्खसमणहेदुदव्वाणमव-सारयं च कम्ममसादावेदणीयं णाम ।= दुःख के प्रतीकार करने में कारणभूत सामग्री का मिलने वाला कर्म सातावेदनीय है और दुःख प्रशमन करने में कारणभूत द्रव्यों का अपसारक कर्म असातावेदनीय कहा जाता है ।

धवला 15/3/6/6दुक्खुवसमहेउदव्वादिसंपत्ती वा सुहं णाम । तत्थ वेयणीयं णिबद्धं, तदुप्पत्तिकारणत्तादो ।= दुःखोपशांति के कारणभूत द्रव्यादि की प्राप्ति होना, इसे सुख कहा जाता है । उनमें वेदनीय कर्म निबद्ध है, क्योंकि वह उनकी उत्पत्ति का कारण है ।
प. धवला/ पू./581 सद्वेद्योदयभावान् गृहधनधान्यं कलत्रपुत्रांश्च । स्वयमिह करोति जीवो भुनक्ति वा स एव जीवश्च ।581। = सातावेदनीय के उदय से प्राप्त होने वाले घर धनधान्य और स्त्री पुत्र वगैरह को जीव स्वयं ही करता है तथा स्वयं ही भोगता है ।

देखें प्रकृतिबंध - 3.3 (अघाती कर्मों का कार्य संसार की निमित्तभूत सामग्री का प्रस्तुत करना है ।)
वर्णव्यवस्था/1/4 (राज्यादि संपदा की प्राप्ति में साता वेदनीय का व्यापार है ।)

जीव के साथ समवाय संबंध को प्राप्त पुद्गलस्कंध ‘वेदनीय’ इस नाम से कहा जाता है ।

सातावेदनीय कथंचित् जीवपुद्गल विपाकी है

= [सुख के हेतुभूत बाह्य सामग्री संपादत् में सातावेदनीय का व्यापार होता है] इस व्यवस्था के मानने पर सातावेदनीय प्रकृति के पुद्गलविपाकित्व प्राप्त होगा, ऐसी भी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दुःख के उपशम से उत्पन्न हुए दुःख के अविनाभावी उपचार से ही सुख संज्ञा को प्राप्त और जीव से अपृथग्भूत ऐसे स्वास्थ्य के कण का हेतु होने से सूत्र में सातावेदनीय कर्म के जीवविपाकित्व का और सुख हेतुत्व का उपदेश दिया गया है । यदि कहा जाय कि उपर्युक्त व्यवस्थानुसार तो सातावेदनीय कर्म के जीवविपाकीपना और पुद्गलविपाकीपना प्राप्त होता है, सो भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह बात हमें इष्ट है । यदि कहा जाये कि उक्त प्रकार का उपदेश प्राप्त नहीं है, सो भी नहीं, क्योंकि जीव का अस्तित्व अन्यथा बन नहीं सकता है, इसलिए उस प्रकार के उपदेश की सिद्धि हो जाती है । सुख और दुःख के कारणभूत द्रव्यों का संपादन करने वाला दूसरा कोई कर्म नहीं है, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता ।
इसी तरह आयु, नाम, गोत्र को भी लगा सकते है

यहाँ पर हम अघाती का कोई एक कर्म को लेना कठिन है और अघाती के साथ साथ पुद्गल की सभी वर्गणा की भी महत्व पूर्ण भूमिका है

जैसे अकृत्रिम जिन चैत्यालय की रचना बनाये रहने में पुद्गल की वर्गणा करता रूप है यही रचना कोई जीव के साथ जोड़ दिया जाय तो अघाती एवं विशेष विचार करने पर घाटी कर्म में अनतराय की भी भूमिका है |

इस में कोई क्षति हो तो एवं विशेष जानकारी हो तो अवश्य प्रदान करे |

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सम्पूर्ण विषय में 8 कर्मों के नोकर्म का वर्णन नहीं आया।

ज्ञानावरण ,दर्शनावरण, मोहनीय - इनका नोकर्म संबंधित कोई कार्य देखने मे आना मुश्किल है।

अंतराय , आयु, नाम , गोत्र , वेदनीय ये सभी का कार्य नोकर्म मे बनता है।

इस post में मैने वेदनीय चर्चा की हुई है।अन्य प्रकृति में विचार करने पर आपको ख्याल में आजायेगा

गोम्मटसार कर्मकाण्ड की गाथा 70-85 तक आठों ही कर्मों के नोकर्मों की चर्चा आयी हुई है। वह विषय मूल से ही देखने योग्य है।

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भाई,

आपने धवला के अनुसार द्रव्य कर्म से असम्बद्ध वर्गणाओं को नोकर्म कहा है।

लेकिन अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं -

क्या है नोकर्म? परद्रव्य/शरीर/द्रव्य-कर्म से असम्बद्ध वर्गणाएँ।
कर्म के साथ उसका क्या सम्बन्ध है?
जीव के साथ उसका क्या सम्बन्ध है?
जैसे कर्म के 4 भेद हैं वैसे नोकर्म के क्यों नहीं?
नोकर्म का 19 पुद्गल वर्गणाओं से सम्बन्ध का आशय क्या है?
क्या कर्म के समान वे भी निश्चित ही होते हैं?
क्या नोकर्म, आसपास के आरोपित पुद्गलों को ही कहते हैं या वे मात्र क्रमबद्ध के अनुसार ही उपस्थित होते हैं?
कमठ ने पार्श्वनाथ पर जो उपसर्ग किया था, उसमें क्या कमठ नोकर्म था?
क्या नोकर्म का सम्बंध पूर्व कर्मोदय से है या बन्ध से?

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इन प्रश्नो के जवाब मैं भी कई दिनों से ढूंढ रहा हूँ । मेरा मूल प्रश्न हैं की क्या द्रव्य कर्म के अतिरिक्त भी कोई अन्य कारण (जैसे की संयोग मात्र कारण, coincidence) हैं जो की नोकर्मो (या चेतन/अचेतन पदार्थ) का सम्बद्ध कराता हैं जीव को?
मैं सोचता हूँ की जैसे की कई पुद्गलो का कई अन्य पुद्गलो से सम्बद्ध संयोग मात्र (coincidence) हैं, वैसे ही कई जीवो का कई अन्य जीवो और पुद्गलो (नोकर्म) से सम्बद्ध संयोग मात्र (coincidence) है।
यहाँ किसी अपेक्षा से, नोकर्म के संयोग मात्र (coincidence) मे ज्ञानावरणी कर्म के क्षयोपशम को भी कारण कह सकते हैं, क्योकि उन नोकर्मो का मात्र ज्ञान-ज्ञेय रूप सम्बद्ध हुआ हैं। अर्थात सभी नोकर्म मात्र अघाती कर्म के उदय से प्राप्त नहीं हुए हैं।
संसारी जीव का मूल निमित्त- नैमित्तिक सम्बद्ध तो भाव कर्म और द्रव्य कर्म के रूप में हैं। भाव कर्म और नोकर्म मे निमित्त- नैमित्तिक सम्बद्ध औपचारिक हैं, सर्वथा नहीं है, कथंचित हैं । सामान्य से कहा जा सकता हैं की कितने ही नोकर्म मुख्यतः पुण्य रूप ही हैं और कितने ही नोकर्म मुख्यतः पाप रूप ही है, कितने ही नोकर्म कभी पुण्य रूप हैं और कभी पाप कर्म रूप हैं।
अब, ८ द्रव्य कर्म और नो कर्म का सम्बद्ध भी किसी से अपेक्षा से कहा जा सकता है, यद्यपि ८ द्रव्य कर्म का उदय जीव के अनुजीवी गुण और प्रतिजीवी गुण का घात करता हैं, लेकिन जब जीव के इन गुणों का घात हो रहा हैं तभी वो द्रव्य कर्म का उदय उन सम्बंधित नोकर्म को भी उपस्थित करता है, जैसे की :-
ज्ञानावरणी कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के ज्ञान गुण का कथंचित घात (भाव कर्म) - कुछ पर पदार्थो का जानना (नो कर्म)
दर्शनावरणी कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के दर्शन गुण का कथंचित घात (भाव कर्म) - कुछ पर पदार्थो का देखना (नो कर्म)
अंतराय कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के वीर्य गुण का कथंचित घात (भाव कर्म) - कुछ पर पदार्थो का जानना की शक्ति का होना, दान, लाभ, भोग, उपभोग का होना (नो कर्म)
मोहनीय कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के श्रद्धा, चारित्र, सुख गुण का घात (भाव कर्म) - उपस्थित पर पदार्थो मे मोह/कषाय का होना (नो कर्म)
आयु कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के अवगाहनत्व गुण का घात (भाव कर्म) - पौद्गलिक स्थान / गति का संयोग (नो कर्म)
नाम कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के सूक्ष्मत्व गुण का घात (भाव कर्म) - शरीरो का संयोग (नो कर्म)
गोत्र कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के अगुरुलघुत्व गुण का घात (भाव कर्म) - कुल या जाती का संयोग (नो कर्म)
वेदनीय कर्म का उदय (द्रव्य कर्म) - जीव के अव्याबाध गुण का घात (भाव कर्म) - अचेतन पदार्थो का संयोग (नो कर्म)
संभव हैं की बहुत प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हो।

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यहाँ, भावकर्म और द्रव्य कर्म सूक्ष्म (कार्माण वर्गणा सूक्ष्म) हैं, इसलिए भावकर्म और द्रव्य कर्म के बीच में one to one mapping संभव हैं, पर नोकर्म स्थूल (आहार वर्गणा स्थूल) हैं, इसलिए द्रव्य कर्म और नो कर्म के बीच में one to one mapping शायद संभव नहीं हो।

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नोकर्म संबंधित टोडरमलजी के कुछ अंश
उनके अनुसार आघाती कर्म का उदय एवम उसके अनुभाग अनुसार नोकर्म के संयोग मिलते है।

I’m getting what you’re saying. But…

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परद्रव्य - जी हां
शरीर - जी हां मुख्य रूप से नाम कर्म की अपेक्षा
द्रव्य कर्म - द्रव्य कर्म का फल

अघाती के द्रव्यकर्म का और नोकर्म कर्ता कर्म सम्बंध रूप से जुड़े हुए है।नोकर्म को अच्छा या खराब अघाति के अनुभाग की अपेक्षा से कह सकते है।

अघाती के जितनेभेद है वह सब इसमे लगा सकते है।
जैसे शरीर की अपेक्षा नाम
बाहर के संयोग की अपेक्षा बाकी के 3 लगा सकते है।
जैसे मनुष्य का जन्म समुंदर के अंदर नही हो सकता।
आदि विचार करने पर …

वास्तव में यह स्वतंत्र रूप से पुद्गल का परिणमन है और पुद्गल और अघाती कर्मो का degree to degree match up जरूर होना चाहिए जिससे जीव particular संयोगो के बीच मे खड़ा कर देता है।
जैसे कोई अकृत्रिम जैन चैत्यालय की वंदना कर रहा है अकृत्रिम चैत्यालय का परिणमन स्वतंत्र रूप से हो रहा है परंतु इस जीव को उस जगह पर पहुंचे ऐसे सारे अघाती कर्म उदय में आ गए।सूक्ष्म रूप से अनुभाग की अपेक्षा कहने में समर्थ नही है।

जी हां।

शरीर और बाहर के संयोग सभी इसमे चेतन और अचेतन दोनो आ जाएंगे।
घाती अघाती सब क्रमबद्ध ही है।

कमठ को वेदनीय में डाल सकते है परंतु मोहनीय नही होने से वेदनीय की कुछ ताकत नही बन पाती।
जी बिल्कुल संबंध है।तभी तो तीर्थंकर के जन्म होते ही देव आदि उनकी सेवा में आते है।

इसमे विशेष आप कह सकते है।
आभार

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