🔥स्वयं के लिए...कविता।।

कहाँ वे राज पाट भोगते थे सुख के लिए।
कहाँ वे वीतराग हो गए स्वयं के लिए।-2…

ये पुण्य-पाप भासते विराट ज्वाला-से।-3
वे अब तो छोड़ चले इन्हें उम्र भर के लिए।।

ये सत्य है कि मोक्ष नाहिं काल पंचम में।-3
परन्तु हम हैं बेकरार रतन त्रय के लिए।।

असाता चाहे हो भले हो पुण्य रंजीदा*।-3
ये सन्त कितने शांत सहज इस भ्रमण के लिए।

अभूरि* ज्ञान हो, नहीं हो शक्ति धारणा की।-3
बस आत्मज्ञान ज़रूरी है केवली के लिए।।

भले अकाल, रोग, वेदना हो कंटक-सी।-3
ये मुनि कितने कटिबद्ध समाधि के लिए।।

न जाने कितने कष्ट, पीर, क्लेश आये थे।-3
वे जैन नाहिं चिगे व्रत से निज धरम के लिए।।

ये शीश कोई सड़े नारियल-सा भिक्षु नहिं।-3
ये सिर्फ झुकता वीतराग आतमा के लिए।।

जो आतमा का ज्ञान- ध्यान करके मोक्ष गए।-3
मैं नमता सिद्ध रूप निज में धारने के लिए।।

कहाँ वे राज पाट भोगते थे सुख के लिए।
कहाँ वे वीतराग हो गए स्वयं के लिए।-2…

*रंजीदा- नाराज़
अभूरि- अल्प, कम

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