अवधि ज्ञान से सम्बंधित


यँहा एक देश से क्या तात्पर्य है

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इसका अभिप्राय ये लेना है कि शेष जीव शरीरके एकदेश और सब अवयवोसे भी है. देखिये षठखण्डागम परिशीलन

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अवधिज्ञान ३ प्रकार का भी है :- देशावधि, परमावधि और सर्वावधि। नारकी और देवों का अवधिज्ञान मध्यम देशावधि कहलाता है। मनुष्यों व तिर्यन्चों में ४थे व ५वे गुणस्थान में होता है। द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव के आधार से देशावधि ज्ञान जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट होता है। उत्कृष्ट देशावधि ज्ञान मनुष्य पर्याय में संयत मुनिराजों को होता है अन्य जीवों को नहीं और अन्य गतियों में भी नहीं। देशावधि भी दर्शनविशुद्धि आदि लक्षण व सम्यक्दर्शन आदि भाव से ही होते हैं। परमावधि और सर्वावधि उन्ही मुनिराजों को होते हैं जिन्हें नियम से उसी भव में निर्वाण की प्राप्ति करनी हो अर्थात यह चरमशरीरी सम्यक्त्व के होता है।
परम का मतलब है कि असंख्यात लोक मात्र संयम भेद ही जिस ज्ञान की मर्यादा है वह परमावधि ज्ञान है। परम का अर्थ श्रेष्ट है।
सर्वावधि ज्ञान किसे कहते हैं?
सर्व शब्द समस्त द्रव्य का वाचक ग्रहण नहीं करना चाहिए। सर्व है मर्यादा जिस की, ऐसा ज्ञान सर्वावधि ज्ञान है। अवधिज्ञान का सम्बन्ध रुपियों में है। परमाणु में एक ही रूप है। स्कन्ध में अनेकों रूप होते है। जैसे गन्ध को जानता है। कुछ आचार्य कहते हैं कि सर्वावधि ज्ञान परमाणु को ही जानता है। कोई आचार्य कहते हैं कि परमाणु को नहीं स्कन्ध को जानता है। अन्य द्रव्यों को नहीं जानता है। सर्वावधि में भेद नहीं है। वह १००% है। इनके अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम में हीन-अधिकता नहीं पाई जाती है अर्थात उत्कृष्ट अवधिज्ञान होता है। परमावधि ज्ञान के क्षयोपशम में हीन-अधिकता पाई जाती है।
परमावधिज्ञान देशावधिज्ञान की अपेक्षा श्रेष्ठ है और सर्वावधिज्ञान परमावधिज्ञान की अपेक्षा से श्रेष्ट है।

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