चारित्र गुण की निर्मल पर्याय + अशुद्ध पर्याय

एक ही समय मे जीव के चारित्र गुण की निर्मल पर्याय और अशुद्ध पर्याय होना किस प्रकार संभव है ?

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चारित्र गुण में पर्याय में जितनी वीतरागता आ गयी है उनकी निर्मलता (शुद्धता) है. जितना राग बाकि है, उतनी अशुद्धता है। अगर कर्म के निमित्त से देखें तो जितनी कषाय चौकड़ी का अभाव हो गया है उतनी निर्मलता और जितनी कषाय बाकि है उतनी अशुद्धता।

और भी नज़रिये से देखे तो निर्मल इसलिए कहते है क्यूंकि सम्यग्चारित्र शुरू हो चूका है। अशुद्धता बताती है की जीव पूर्ण वीतरागी नहीं है।

दोनों ही कथन सही भी है गलत भी. जिस नय से देखो उसपर निर्भर करता है.

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एक गुण की एक समय मे एक ही पर्याय होति है परंतु यहां पर अपेक्षा से बात करी है।

निर्मल पर्याय को पूर्ण शुद्ध पर्याय कहते है।
सम्यक चारित्र आदि को एक देश शुद्ध पर्याय पर्याय कहेंगे उनको निर्मल पर्याय नही कह सकते।
यहां पर जो अपेक्षा है वह अरंहतो की अपेक्षा से है।उनको कषाय की अपेक्षा से निर्मल परिणमन शुभाशुभ भाव से रहित है परंतु योग की अपेक्षा से उनकी चारित्र गुण की अशुद्ध पर्याय है ।
ऐसा समजना ।

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इस विषय के लिए ब्र. आ. कल्पना दीदी एक उदाहरण देती है -
वस्त्र पर कोई दाग लग जाता है तो वह मात्र एक धुलाई में ही पूरा साफ़ नहीं हो जाता। हर धुलाई पर थोड़ा थोड़ा साफ होता है। साधक जीव की चारित्र गुण की पर्याय का स्वरूप भी उसी प्रकार उस एक-दो धुलाई वाले वस्त्र के समान है- जो बहुत कुछ तो साफ हो गया है, परन्तु अभी भी दाग हल्के रूप में अथवा निशान के रूप में विद्यमान है, और वह दोष भी कुछ और धुलाई में चले जाएंगे।
शुद्धता और अशुद्धता भी एक पर्याय में उसी तरह विद्यमान हैं।

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