यहाँ पर डॉ सुदीप जी दिल्ली के लेखों को प्रेषित किया जावेगा।
लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रतीतवंत,
परदोषकौ ढकैया पर-उपगारी है।
सौमदृष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकौं-इष्ट,
शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरघ-विचारी है।।
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य,
न दीन न अभिमानी मध्य-विवहारी है।
सहज-विनीत पापक्रियासौं अतीत ऐसौ,
श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है।।54।।
"जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी,
नमै बनारसि ताहि।
जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै।
सीस-नमाइ बनारसि बंदैं।।4।।
जिनबिम्ब के मर्मज्ञों की पहिचान
‘नाटक-समयसार’ में ही यह छंद देखिये–
"जाके उर-अंतर सुद्रिष्टि की लहर लसी,
विनसी-मिथ्यात मोहनिद्राकी ममारखी।
सैली जिनशासन की फैली जाके घट भयौ,
गरबकौ-त्यागी षट-दरब कौ पारखी।।
आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं,
हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी।
कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी,
सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी।।3।।
1.जिसके हृदय में सम्यग्दर्शन की प्रकटता एवं मिथ्यात्व का विनाश हुआ है,
2. जिनशासन की शैली जिसे भलीभाँति समझ में आयी है,
3. जिसके हृदय से दुरभिमान-रूपी अंधकार नष्ट हुआ है,
4. छह-द्रव्यों की परख अर्थात् जिनोपदिष्ट-वस्तु- व्यवस्था जिसे अच्छी तरह से समझ में आ गयी है,
5. जिसके कानों में जिनागम की अनुश्रुति हुई है,
6. जिसके हृदय में जिनेन्द्र देव की वाणी दर्पण की तरह सुस्पष्ट हुई है अर्थात् जिनवचनों में जिसे तनिक भी सन्देह नहीं है,
7. जिसकी संसार-सागर में स्थिति अत्यन्त अल्प रह गयी है अर्थात् जो आसन्न-भव्य है;
"ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर,
सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरनकौ न भै करे ,
करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है ,
परम-नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान ,
निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।।
–( नाटक-समयसार, उत्थानिका, पद्य 5)
प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
"माना कि तुम झट बेटा देते हो,
और डाकिनी-भूत तुरत ही हर लेते हो।
कभी-कभी तो तुमको भी कौतूहल आता,
सहज फेर देते सहसा ही जज का माथा।।
इसीलिये आवश्यकता भगवान् तुम्हारी,
ब्लैक-मार्केटिंग में रखते लाज हमारी।
और नहीं तो हमको तुमसे मतलब ही क्या?
दुनियाँ में बस इसीलिये भगवान् बच गया।।
तुम्हें जानकर जग तुमसे अनजान रह गया।। 1।।
करता है उपहास राग यों वीतराग से,
गाली सुनता वीतराग रे! अधम-राग से।… "
डॉ. सुदीप जी के अन्य भी बहुत सारे लेख इस website पर भी जरूर देखे-
https://sarvarth1803.wordpress.com/category/लेख-प्रो-सुदीप-कुमार-जैन/
।। “मैंने बोला हुआ है” – की सच्चाई ।।
(मननीय आलेख)
प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आजकल समाज में एक संक्रमण बहुत अधिक परिमाण में व्याप्त है और यह दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। यह ‘निदान’ एवं ‘मिथ्यात्व’ की विकट-जुगलबंदी के रूप में अमरबेल की तरह बढ़ता जा रहा है। वह है किसी भी भय/ आशंका के निवारण अथवा किसी लौकिक-आकांक्षा की पूर्ति-हेतु वीतरागी जिनेन्द्र देव से या उनके तीर्थों की वंदना आदि के माध्यम से, किसी भी पूजन-विधान/पाठ, जिनबिम्ब-स्थापना, जिनालय/धर्मायतन/जिनवेदी/जिन-चरणचिह्न का निर्माण का वचनात्मक-अनुबंध (एग्रीमेंट) किया जाता है। जैसे कि “हे भगवान्! यदि मेरी अमुक आकांक्षा पूर्ण हो गयी, तो मैं यह कार्य करूँगा /करूँगी।”
यह अनुबंध कार्य होने के पहले का भी होता है। अर्थात् “मैं यह कार्य करूँ, तो मेरी अमुक-आकांक्षा पूर्ण हो जाये।” ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवान् को अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिये प्रलोभन दिया जा रहा हो, या सौदेबाजी की जा रही हो।
चूँकि इन कार्यों का बाहरी-स्वरूप शुद्ध दिगम्बर जैन मूलाम्नाय की पद्धति से भिन्न नहीं दिखता है (अर्थात् इनमें किसी रागी देवी-देवता की पूजा-विधान, सचित्त-सामग्री से पूजन आदि करने, या वीतरागी-आम्नाय के विपरीत किसी अनुष्ठान का आयोजन करने जैसे कार्य नहीं दिखते हैं), इसलिये लोगों को ऐसा भ्रम रहता है कि यह कार्य तो वे जिनधर्म के अनुरूप ही कर रहे हैं और ऐसा करने से गृहीत-मिथ्यात्व के बंध जैसी कोई आशंका तक उन्हें नहीं लगती है।
किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि ऐसा करने से ‘निदान’ रूप ‘शल्य’ का दोष भी लगता है और ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ का बंध भी अनिवार्यरूप से होता है।
ऐसा कैसे संभव है? - - इसका स्पष्टीकरण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।–
1.किसी भी धार्मिक कार्य /अनुष्ठान को करने के बदले में जब कोई लौकिक आकांक्षा रखी जाती है, तो यह ‘निदान’ कहलाती है। इसे जिनवाणी में संसार-परिभ्रमण की कारणभूत ‘शल्यत्रय’ के अन्तर्गत माना गया है।
- सम्यग्दृष्टि-जीव ‘निःकांक्षित-अंग’ का धनी होता है। वह किसी भी ऐसे कार्य के बदले में किसी भी तरह की लौकिक-आकांक्षा कर ही नहीं सकता है।
3.वीतरागी जिनधर्म में किसी भी तरह की आकांक्षा या अनुबंध मन में रखकर कोई पूजा, अनुष्ठान या धर्मायतन-निर्माण आदि का संकल्प करना ‘वीतरागी’ को ‘रागी’ मानने रूप विपरीत-श्रद्धान का कार्य है। और इस कारण यह स्पष्टरूप से ‘मिथ्यात्व’ ही है। क्योंकि जिनवाणी में विपरीत-श्रद्धान को ही मिथ्यात्व कहा गया है।
4.मनुष्यगति और जैनकुल, जिनधर्म पाकर जो अनादि से फल रहे मिथ्यात्व को पुष्ट करनेवाले कार्य किये जाते हैं, उन्हें ही ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ कहा गया है। इसी रूप होने से यह ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ है-- यह स्पष्ट है। इसे सिद्ध करने के लिए किसी तर्क या अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
यह विषय क्यों लिया— आज अधिकांश जिनधर्मानुयायी, जो अपने को ‘सच्चा जैन’ मानते हैं और किसी भी प्रकार के गृहीत-मिथ्यात्व आदि के कार्यों से दूर रहकर शुद्धाम्नाय के अनुरूप सात्त्विक-चर्या करता हुआ अपने को मानते हैं। क्योंकि वे रागी-देवी-देवता को मानते-पूजते नहीं हैं, पंचामृत-अभिषेक व सचित्त-द्रव्यों से पूजन आदि जिनाम्नाय-विरुद्ध कार्य नहीं करते हैं। - - इत्याद कारणों से वे ऐसा मानते हैं कि वे तो गृहीत-मिथ्यात्व के बंध होने जैसा कोई कार्य ही नहीं करते हैं, अतः वे तो गृहीत-मिथ्यात्व से रहित ही हैं। किन्तु जब तक सम्यग्दर्शन नहीं हुआ, तब तक मिथ्यात्व का कार्य (फंक्शन) तो निरन्तर चालू ही है। और उसके उदय में तदनुरूप परिणाम भी होंगे और जब मिथ्यात्व के उदयरूप परिणाम होंगे, तो मिथ्यात्व का नवीनबंध भी होना स्वाभाविक ही है। इसतरह जब मिथ्यात्व की सन्तति निरन्तर चालू है, तो परिणाम भी मिथ्यात्व के कैसे नहीं होंगे? और देहादि में एकत्व-ममत्वबुद्धिरूप परिणाम भले ही ‘अगृहीत-मिथ्यात्व’ के कहे जायेंगे, परन्तु बुद्धिपूर्वकाः जो देव-गुरु-धर्म आदि के विषय में विपरीत-श्रद्धा करके जो अनादि-मिथ्यात्व को सबल बनाया जाता है, उसे तो ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ ही कहेंगे।
अतः देव-गुरु-धर्म के विषय में विपरीत-अभिनिवेश(अभिप्राय) के परिणामों को तो मिथ्यात्व ही कहा जायेगा, और मनुष्य भव, जैनकुल, जिनधर्म पाकर जो बुद्धिपूर्वक मिथ्यात्व बंधता है, उसे तो ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ ही कहा गया है न?
जो वीतरागी देव-गुरु-धर्म न तो किसी के कर्त्ता-हर्त्ता हैं, न किसी से राग-द्वेष करते हैं, उनसे लौकिक-प्रयोजनों की आशा व आकांक्षा करना क्या इनका विपरीत-श्रद्धान नहीं है? तो क्या यह इनके आयतनों के माध्यम से, इनकी पूजन-विधान-व्रतादि के माध्यम से जो मिथ्यात्व का पोषण किया जा रहा है, उसे गृहीत-मिथ्यात्व का कार्य नहीं कहा जाये, तो और क्या कहा जाये?
महाज्ञानी पंडित प्रवर टोडरमल जी का स्पष्ट-कथन है कि “इस मिथ्यात्व-बैरी का अंश भी बुरा है।”
यह सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के पहले अनेकों रूपों में हमारे परिणामों को छलता हुआ हमारे मन और जीवन में फलता रहता है।
आज अनेकों तत्त्वाभ्यासियों के द्वारा कराये जाने वाले ऐसे आयोजनों व कार्यों के पीछे निहित ऐसे अभिप्रायों से वे सब भलीभाँति परिचित हैं। जरूरत अपने गिरहबान में झाँकने की है। दूसरों से प्रमाणपत्र लेकर संतुष्ट मत बनिये। पंडितजन तो अपना प्रयोजन देखते हैं। वे तो आपके आयोजनों व कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे ही। उनकी प्रशंसा में संतुष्ट होने की जगह अपने परिणामों का स्वयं ईमानदार से मूल्यांकन व परीक्षण करिये; क्योंकि आपके मनुष्यभव का ही नहीं, बल्कि आगामी अनंतभवों की भवसन्तति का सवाल है। नरक-निगोदों में रुलने से ये पंडितजन बचाने नहीं आने वाले। अपना भला-बुरा तो अपने परिणामों से है, अतः जैसे अपना लोटा छानने की सावधानी रखते हो, वैसे ही अपने परिणाम छानने की सावधानी रखिये।
यह नरभव अत्यंत दुर्लभ है, और आयुकर्म का क्षणभर का भी भरोसा नहीं है। अतः ये पंक्तियाँ स्मरण रखिये कि–
" यदि अवसर चूका तो, भव-भव पछतायेगा।
फिर काल अनंत अरे! दुःख का घन छायेगा।।
जिया! कब तक उलझेगा, संसार-विजल्पों में?
कितने भव बीत चुके, संकल्प-विकल्पों में??"
अतः यह स्मरण रखना कि जिसने इस नरभव व जैनकुल को पाकर जिनायतनों का निर्माण, जिनबिम्ब-प्रतिष्ठा, पूजन-विधान-अनुष्ठान आदि नहीं कर सका, वह अपना उतना अहित नहीं करेगा; जितना कि इन परम-पवित्र कार्यों को करते हुये भी अभिप्राय में ऐसी आकांक्षाओं को रखकर निदानबंध और गृहीत-मिथ्यात्व का पोषण करनेवाले करेंगे। क्योंकि जिसे भवरोग-नाशक औषधि नहीं मिली, उसे तो अभागा कहा ही जायेगा ; किन्तु जो इस औषधि को पाकर भी उसका दुष्प्रयोग भवसन्तति को बढ़ाने में करेगा, वह अधिक दुर्भाग्यशाली है।
अतः धर्मप्रभावना के कार्य यथाशक्ति अवश्य करिये, किन्तु पहिचान कर करिये कि कहीं ये दूसरों के लिये धर्मप्रभावना के निमित्त बन रहे हों, और आपके लिए निदानबंध और गृहीत-मिथ्यात्व के कारण सिद्ध हो रहे हों??? अतः सर्वप्रथम अपने परिणाम छानिये, तब इन कार्यों में प्रवृत्त होइये। यह आपके दुर्लभ नरभव का सवाल है, आपके भविष्य का सवाल है।
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