डॉ. सुदीप जी दिल्ली के लेख

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श्रावक के इक्कीस गुण

(एक मननीय-लेख)

प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रतीतवंत,
परदोषकौ ढकैया पर-उपगारी है।
सौमदृष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकौं-इष्ट,
शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरघ-विचारी है।।
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य,
न दीन न अभिमानी मध्य-विवहारी है।
सहज-विनीत पापक्रियासौं अतीत ऐसौ,
श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है।।54।।

इसके अनुसार तो श्रावक कहलाने योग्य वही है, जो

1. उद्दंड न होकर सांसारिक कार्यों के प्रति लज्जावंत तो हो ही, लौकिक-भाषा में उसकी ‘आँख का पानी नहीं मर गया’ होना चाहिये।
2. उसे स्वाभाविकरूप से ही दयालु होना चाहिये, क्रूरता के भाव उसके मन में कदापि नहीं आने चाहिये।
3. वह प्रशान्तचित्त होना चाहिये, न कि जरा सी प्रतिकूलता आते ही व्यग्र हो जाये।
4. वह संवेदनशील हो, ताकि संवेदनाओं को समझ सके व तदनुरूप-आचरण कर सके।
5. दूसरों के दोषों को जानते हुये भी उनसा प्रचार नहीं करे। विचार करें कि यदि हम सब यह गुण अपना लें, तो हमें आपस में बतियाने के लिये सारी मसालेदार-सामग्री ही गायब हो जायेगी और हम आपस में मात्र ‘जय जिनेन्द्र’ या संक्षिप्त-कुशलक्षेम ही पूछ सकेंगे।
6. परोपकारी-प्रवृत्ति का होना भी यहाँ श्रावक के लिये अनिवार्य-गुण बताया गया है, जबकि हममें से कई लोग दूसरों की कमजोरी या दुर्दशा को भाँपकर उसको सुनाकर या कुछ विपरीत करके कष्ट देकर आनन्दित होते हैं। यह आत्मालोचन का विषय है कि ऐसा करके भी हम अपने को ‘श्रावक’ कैसे कहला सकते हैं?
7. सौम्यतापूर्ण-दृष्टि जिसकी हो, अर्थात् दूसरों के दोषों को ग्रहण करने की मानसिकता जिसकी नहीं हो और न ही ऐसे काम-क्रोध आदि के विकार जिसकी नज़रों में हों कि भद्र-महिलायें व बच्चे जिसकी नज़रों से बचकर रहना चाहें।
8. जो दूसरों के गुणों को ही मात्र ग्रहण करता हो, दोषों को नहीं। यदि दोष जानने में आ जायें, तो वह उन्हें ग्रहण ही नहीं करे, बल्कि उनकी उपेक्षा कर दे।
9. जो गम्भीर व्यक्तित्व का धनी हो, ओछी-बातें जिसके मन में तक कभी भी नहीं आतीं हों और न ही संकुचित-सोच से जो कभी किसी के प्रति व्यवहार करता हो। विचार करें कि आज सेठों को गरीबों के प्रति, शास्त्रज्ञों को कम-जानकारों के प्रति, सुन्दर-देहवालों का सामान्यरूपवालों की कुरूपों के प्रति हेयता या तुच्छता की मनोवृत्ति एवं वैसा व्यवहार यदि है, तो इसके अनुसार हम ‘जैन-श्रावक’ कहे जाने योग्य नहीं हैं।
10. आपका व्यवहार सभी को अच्छा प्रतीत हो, अर्थात् हम ऐसा कोई व्यवहार ही नहीं करें कि जिससे किसी को पीड़ा पहुँचे।
11. शिष्टपक्षी यानि जो सभ्य/शिष्ट लोगों/बातों का ही समर्थन करे, कभी भी गलत-बात का समर्थन नहीं करे।
12. मिष्टवादी अर्थात् जो हित-मित-प्रिय-वचन ही बोले। “परवधकार कठोर निंद्य नहिं वचन उचारे” की मर्यादा का पालन करता हो।
13.दीरघ-विचारी अर्थात् अच्छी तरह से आगा-पीछा सोचकर ही जो कार्य करे। हड़बड़ी या अविवेकपूर्ण कार्य कदापि नहीं करे।
14. विशेषज्ञ हो अर्थात् हर कार्य के अच्छे एवं बुरे–दोनों पक्षों को जानता हो और तदनुरूप ही आचरण करता हो।
15. रसज्ञ हो अर्थात् अच्छे-संस्कारों एवं तत्त्वज्ञान की चर्चा में ही जिसे अच्छा लगता हो, बुराई एवं विषय-कषाय की चर्चा में जिसकी रुचि ही नहीं हो।
16.कृतज्ञ हो, दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये गये उपकारों को कभी भी नहीं भुलाये और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखे। नीतिज्ञों का कहना है कि हर पाप का कोई न कोई प्रायश्चित्त होता है, लेकिन कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित्त नहीं है, वह अक्षम्य-अपराध की श्रेणी में आता है।
17. जो तज्ञ हो, अर्थात् जैनकुल के अनुरूप सभी शिष्टाचारों व सदाचारों को जानता हो। विचार करें कि आज के शहरियों के घर में कोई सदाचारी-धार्मिक व्यक्ति आ जाये, तो कई लोगों को तो छानकर पानी देना तक नहीं आता है, वे प्लास्टिक की चाय-छन्नी से छानकर पानी दे देते हैं, तो जलगालन की विधि भला उन्हें कैसे पता होगी? बाकी धर्मचर्या के बारे में भी इसीतरह समझ लें।
18. धर्मज्ञ हो अर्थात् किसी भी स्थिति में जिनधर्म का क्या निर्देश है? – उससे परिचित हो व तदनुरूप ही व्यवहार करता हो।
19.जिसके व्यवहार में न तो अपने से कमजोरों के प्रति अभिमान की भावना हो और न ही अपने से अधिक सम्पन्नों के प्रति दीनता का भाव जगता हो। अनुकूल-प्रतिकूल – दोनों स्थितियों में जो समभावी हो व संतुलित-व्यवहार करता हो।
20. जो सहज ही विनयशील हो, शिष्टाचार का दिखावा जिसे नहीं करना पड़ता हो, कि सामने तो प्रशंसा करे और पीठ पीछे बुराई करे।
21.जो पापाचरण से रहित हो। हम प्रक्षाल के पाठ में भी पढ़ते हैं कि “पापाचरण तज न्हवन करता” अर्थात् पापमय-आचरण करनेवालों (चोरी, कुशील आदि स्थूल-पाप करनेवालों) को तो जिनेन्द्र देव के बिम्ब को स्पर्श करने या उनकी प्रक्षालन-विधि करने तक का अधिकार नहीं है। जबकि मैं प्रत्यक्षदर्शी हूँ कि कुछ लोग मंदिर जी में भी चोरी, कुशील आदि के पाप करते हैं और प्रक्षाल करने में अग्रणी बनते हैं।

इन इक्कीस-गुणों से जो रहित है, या ये इक्कीस-गुण जिसमें पूरे नहीं पाये जाते हैं, वह ‘श्रावक’ संज्ञा का पात्र नहीं है।

हम विचार करें कि इनके परिप्रेक्ष्य में हममें से कितने लोग ‘श्रावक’ कहलाने योग्य हैं?
[ कल दिन में जब मैंने मुनिराज की वंदना के लिये उनके व्यक्तित्व में विद्यमान अनिवार्य गुणों की चर्चा की थी, तो कई लोगों ने मुझे श्रावकों के लिये भी अनिवार्य ऐसे गुणों को स्पष्ट करने का अनुरोध किया था। संयोगवश नाटक-समयसार जी में ही यह पद्य मिला, तो मैंने इसे अर्थ सहित आपके मध्य प्रस्तुत करना आवश्यक समझा। यह भी नाटक-समयसार की दार्शनिक-समीक्षा का एक अंग बना है। और उसकी प्रस्तावना में इसकी भी चर्चा रहेगी। यदि इसकी विस्तार से समीक्षा प्रस्तुत की जाये, तो अविरति-श्रावकों के श्रावकाचार की लघु-पुस्तक बन सकती है, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत उपयोगी रहेगी।

– सुदीप कुमार जैन]

संपर्क दूरभाष : 8750332266

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नवदेवों में आगत जिन-प्रतिमा या जिनबिम्ब के दर्शन आदि की महिमा का विवेचन : कविवर पं. बनारसीदास जी के शब्दों में(मननीय-संक्षिप्त आलेख)
प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
जिन-प्रतिमा-महिमा > ‘नाटक-समयसार’ ग्रन्थ के ‘गुणस्थान-अधिकार’ के प्रारम्भ में वर्णित जिन-प्रतिमा की महिमा को देखिये–

"जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी,
नमै बनारसि ताहि।
जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै।
सीस-नमाइ बनारसि बंदैं।।4।।
जो जिन-प्रतिमा को नवदेवों में कल्पित बताकर उनकी पूज्यता सन्दिग्ध बता रहे हैं, उन्हें कविवर पं. बनारसीदास जी के इस विषय में स्पष्ट-मन्तव्य को (जो कि जिनाम्नाय का ही मन्तव्य है) असन्दिग्धरूप से समझ लेना चाहिये कि जिनाम्नाय में जिन-प्रतिमा या जिनबिम्ब की पूज्यता एवं आध्यात्मिक-प्रभाव किसतरह माना गया है। और इसका विरोध जिनशासन का विरोध है, तथा देव के अवर्णवाद का ही एक-रूप है। क्योंकि निमित्त-नैमित्तिक रूप में जिनप्रतिमा को संसारीजनों के परिणामों में संभावित या प्रवर्तमान-दोषों का निवारक बताया गया है।

जिनबिम्ब के मर्मज्ञों की पहिचान
‘नाटक-समयसार’ में ही यह छंद देखिये–

"जाके उर-अंतर सुद्रिष्टि की लहर लसी,
विनसी-मिथ्यात मोहनिद्राकी ममारखी।
सैली जिनशासन की फैली जाके घट भयौ,
गरबकौ-त्यागी षट-दरब कौ पारखी।।
आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं,
हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी।
कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी,
सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी।।3।।

उपर्युक्त-विषय को ही और अधिक बहुआयामी-तरीके से स्पष्ट करते हुये कविवर पं. बनारसीदास जी इस पद्य में दो-टूक शब्दों में कहते हैं कि –

1.जिसके हृदय में सम्यग्दर्शन की प्रकटता एवं मिथ्यात्व का विनाश हुआ है,
2. जिनशासन की शैली जिसे भलीभाँति समझ में आयी है,
3. जिसके हृदय से दुरभिमान-रूपी अंधकार नष्ट हुआ है,
4. छह-द्रव्यों की परख अर्थात् जिनोपदिष्ट-वस्तु- व्यवस्था जिसे अच्छी तरह से समझ में आ गयी है,
5. जिसके कानों में जिनागम की अनुश्रुति हुई है,
6. जिसके हृदय में जिनेन्द्र देव की वाणी दर्पण की तरह सुस्पष्ट हुई है अर्थात् जिनवचनों में जिसे तनिक भी सन्देह नहीं है,
7. जिसकी संसार-सागर में स्थिति अत्यन्त अल्प रह गयी है अर्थात् जो आसन्न-भव्य है;
वही जीव जिन-प्रतिमा को साक्षात् जिनेन्द्र देव के समान प्रमाणित करता है।

यदि जिसे जिनबिम्ब की पूज्यता में और आत्महित में उनकी उपादेयता में तनिक भी सन्देह है अथवा ऐसा प्रतिपादन वह किसी भी लौकिक या निजी-स्वार्थवश करता है, तो उसका सीधा-अभिप्राय यही लेना चाहिये कि उसने उपर्युक्त सातों बातों को अभी तक आत्मसात् नहीं किया है, अर्थात् वह जीव स्पष्टरूप से मिथ्यादृष्टि व दीर्घ-संसारी है।

[यह पद्य एवं इसका यह विवेचन भी नाटक-समयसार जी की लिखी जा रही प्रस्तावना का ही अंगभूत है। आप सुधीजनों के रसास्वादन के लिये यहाँ अलग से प्रेषित किया जा रहा है – सुदीप कुमार जैन ]

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मुनिवरों में क्या देखकर उनकी वंदना की जानी चाहिये?
प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
कविवर पं. बनारसीदास जी द्वारा प्रस्तुत 'साधु-स्तुति’

"ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर,
सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरनकौ न भै करे ,
करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है ,
परम-नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान ,
निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।।
–( नाटक-समयसार, उत्थानिका, पद्य 5)

इस एक ही पद्य में जिनाम्नाय में मुनिधर्म के स्वरूप का सारा रहस्य समाहित कर दिया है और सच्चे मुनिराजों की बाह्य-पहिचान भी सुतरां स्पष्ट कर दी है। कौन-से लक्षण देखकर मुनिराज को नमस्कार/वंदना करनी चाहिये-- यह असन्दिग्धरूप में यहाँ स्पष्ट कर दिया है।

आज जो मात्र बाह्य-नग्नमुद्रा देखकर ही वंदना करने का जोर आध्यात्मिक-विद्वज्जगत् भी देने लगा है, उन्हें तो कविवर पं. बनारसीदास जी कृत यह पद्य मानो पथ-प्रदर्शक की भाँति दिशाबोध कर रहा है।

इसके अनुसार जिनका

1. असन्दिग्ध-तत्त्वज्ञान स्पष्ट-परिलक्षित हो रहा हो,

2. जिनके जीवन में आनन्दमयता का उत्कर्ष साफ दिखायी देता हो अर्थात् दुःखों की झलक तक जिनके व्यक्तित्व में नहीं हो,

3. जिनशासन में मुनिधर्म के श्रेष्ठ-गुणों में से कोई एकाध नहीं, बल्कि अपार-गुणसमूह जिनके व्यक्तित्व में विद्यमान हो,

4. वैराग्य के रस में जिनका अन्तर्बाह्य-व्यक्तित्व रचा-बसा हो अर्थात् जिन्हें वैराग्य दिखाना नहीं पड़ता हो, बल्कि अनाड़ी को भी जिनके जीवन में सच्चा-वैराग्य बिना कहे ही समझ में आ सके,

5. जो अपने स्वरूप के अलावा अन्य किसी की भी शरण ग्रहण करने की मानसिकता तक कभी भी नहीं विचार तक में लाते हों अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में ही परम-तृप्त हों,

6. मरण का भय जिनके जीवन में कहीं दूर-दूर तक भी नहीं दिखायी देता हो (कोरोना जैसे वायरस का भी डर न तो जिन्हें सताये और न ही उससे बचने के टोटके जो बतायें),

7. इन्द्रियों की माँगों (गर्मी में ए. सी. व सर्दियों में हीटर, स्वादिष्ट रसों व पकवानों का आहार, विलासितापूर्ण भवन आदि) का भाव तक जिनके नहीं जागता हो, इन्द्रिय-विषयों से दो अत्यन्त-विरक्त हों,

8. जिनवाणी में निर्दिष्ट मुनिधर्म का बिना किसी बहाने के (कि ‘पंचमकाल है’ या ‘जैसे श्रावक, वैसे मुनि’ अथवा 'हमसे तो अच्छे ही हैं) निर्दोषरीति से शत-प्रतिशत पालन करते हों,

9. जिनकी चर्या एवं वचनों से धर्म सुशोभित होता हो,

10. जिन्हें देखने के बाद धर्म, धर्मात्मा एवं आत्महित के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाते हों,

11. जिनकी सम्पूर्ण-चर्या अत्यन्त अहिंसक एवं विनम्र हो (अर्थात् न तो ईर्या समिति के विपरीत चलें, न ही कठोर-वचन बोलें, न ही जोर-जोर से चीखकर भाषण दें, न ही किसी का अपमान करें और न ही अपने स्वरूप की विराधना करें),

12. जो कर्मों की निर्जरा करने में ही सदा तत्पर रहते हों (अर्थात् शेष विश्व में किसी भी व्यक्ति या वस्तु/संस्था/संगठन/सम्प्रदाय आदि से जिनके मन में स्वप्न में भी द्वेषभाव नहीं हो)

– ऐसे मुनिराज यदि इस लोक में कहीं भी मिल जायें, तो ही बनारसीदास जी कहते हैं कि उन्हें नमस्कार/वंदना करना चाहिये।

– कविवर पं. बनारसीदास जी का स्पष्ट-दिशानिर्देश हम सबके लिये इस विषय में प्रकाश-स्तम्भ (लाइट-हाउस) की तरह पथ-प्रदर्शन कर रहा है।

इसे पढ़ने के बाद भी जो बहानेबाजी करें और समाज को दिग्भ्रमित करें, तो बिना किसी आशंका के उनके कथन के असली-अभिप्राय को समझा जा सकता है।

[नाटक-समयसार जी के प्रकाश्य-संस्करण की प्रस्तावना लिखते समय दार्शनिक-समीक्षा के क्रम में यह पद्य आया, तो इसकी समीक्षा से आप सभी सुधीजनों को भी लाभान्वित करने की दृष्टि से इसे आपको प्रेषित कर रहा हूँ। इस प्रस्तावना में ऐसे कई बिन्दुओं की मीमांसा व समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है, जो आपको इस ग्रन्थ के प्रकाशित होने पर ही पढ़ने को मिल सकेंगीं।-- सुदीप कुमार जैन]

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वीतरागी जिनधर्म में रागी-देवताओं की उपासना-पद्धति?

(अनुकरणीय बड़ा-आलेख)

:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आजकल एक बड़ा-फैशन बनता जा रहा है कि “जिनेन्द्र देव की उपासना, पूजा, स्तुतियों में यदि कर्त्तावादी-प्ररूपण हैं, तो उन्हें स्वीकार्य माना जाये और उन पर आपत्ति नहीं प्रकट की जाये।” इसीतरह “प्रथमानुयोग एवं चरणानुयोग के ग्रन्थों में जो निमित्ताधीन-कथन हैं, उन पर भी कोई आपत्ति या स्पष्टीकरण दिये बिना उन्हें स्वीकार किया जाये, क्योंकि वे तो जिनवाणी में ही प्रतिपादित हैं।”
तो सबसे पहले यही जान लिया जाये कि जिनधर्म में आराध्य/पूज्य कौन हैं, जिनकी आराधना/भक्ति/पूजा की जाये?
सीधा व सरल उत्तर है कि जिनधर्म में एकमात्र वीतरागी जिनेन्द्र देव की, वीतरागता की पोषक जिनवाणी की और वीतरागता के मार्ग पर अग्रसर परम-वैराग्यरस के धनी भावलिंगी नग्न-दिगम्बर-जैन मुनिवरों की ही आराधना/भक्ति/पूजा की जाती है।

तो मेरा सरल प्रश्न है कि क्या सभी जैन इस तथ्य को जानते व मानते हैं? सामान्यतः उत्तर यही आयेगा कि “हाँ, जानते भी हैं और मानते भी हैं।”

यदि यह सत्य है, तो **वीतरागी देव, वीतरागता की पोषक जिनवाणी और वीतरागता के मार्ग पर चलनेवाले भावलिंगी-निर्ग्रन्थ-साधुओं की आराधना/पूजा/भक्ति करनेवाले उनके प्रति कर्त्तावादी-दृष्टिकोण कैसे रख सकते हैं? वे यह कैसे कह सकते हैं कि “तुम ही स्वामी हाथ बढ़ाकर, तारो तो तिर जायें”? वे यह कैसे कह सकते हैं कि “हे प्रभो! मेरे दुःख दूर करो। मेरे सब संकट मेट दो। मेरी हारी-बीमारी दूर कर दो। मुझे मुकदमे में जिता दो। मेरे शत्रुओं का नाश कर दो”… इत्यादि। क्योंकि वीतरागी कभी किसी का भला या बुरा कर ही नहीं सकते हैं, कारण कि भला या बुरा करने की भावना राग-द्वेष की परिणति है। राग-द्वेष के बिना कोई भी किसी का भला-बुरा करने की सोच भी नहीं सकता है, करना तो बहुत दूर की बात है।

अब तय करना आपका काम है कि आप रागी-द्वेषी की पूजा-अर्चना करने जाते हैं या वीतरागी की? कन्फर्म करिये, तब बोलिये। व्यर्थ की बहानेबाजी मत कीजिये।

इस विषय में आदरणीय बाबूजी ‘युगल’ जी की ये पंक्तियाँ मननीय हैं–

"माना कि तुम झट बेटा देते हो,
और डाकिनी-भूत तुरत ही हर लेते हो।
कभी-कभी तो तुमको भी कौतूहल आता,
सहज फेर देते सहसा ही जज का माथा।।
इसीलिये आवश्यकता भगवान् तुम्हारी,
ब्लैक-मार्केटिंग में रखते लाज हमारी।
और नहीं तो हमको तुमसे मतलब ही क्या?
दुनियाँ में बस इसीलिये भगवान् बच गया।।
तुम्हें जानकर जग तुमसे अनजान रह गया।। 1।।
करता है उपहास राग यों वीतराग से,
गाली सुनता वीतराग रे! अधम-राग से।… "
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि वीतरागी से अपने विषय-भोगों व सांसारिक-आकांक्षाओं की पूर्ति की अपेक्षा करना उनकी भक्ति नहीं है, बल्कि उनका अपमान करना है, गाली देने के समान है।

अब आप हृदय पर हाथ रखकर विचार कीजिये कि आप वीतरागी की भक्ति कर रहे हैं या अपमान कर रहे हैं? आप उनकी विनय कर रहे हैं या विनय-मिथ्यात्व बाँध रहे हैं।

तो भगवान् से अच्छी चीजें तो माँग सकते हैं न? मोक्ष माँगें, सम्यग्दर्शन माँगें, आत्महित माँगें–इनमें तो आपको कोई आपत्ति नहीं है न?

यह भी एकतरह का मजाक ही है और कुछ नहीं। जैसे किसी मौनव्रती से सांसारिक चर्चा करने की जगह प्रवचन करने की अपेक्षा की जाये। जब मौनव्रती है, तो कुछ भी कैसे बोल सकता है? इसीप्रकार जब वीतरागी हैं, तो किसी का भी कुछ भी भला या बुरा कैसे कर सकते हैं?-- क्या इतना भी विवेक आपको नहीं है, जो ऐसे बहाने करके भगवान् की वीतरागता का उपहास उड़ाना चाहते हो?
कुछ लोग कहते हैं कि “व्यवहारनय से ऐसे कथनों को उचित मानने में क्या हानि है?” उन्हें व्यवहारनय का स्वरूप ही नहीं पता है। व्यवहारनय निश्चयनय या वस्तुस्थिति का विरोध नहीं करता है। वह तो निश्चयनय के विषयभूत-कार्य के निमित्त व सहचारी-कारणों को ही मोक्ष का कारण कहता है।

जैसे वज्रवृषभनाराच संहनन, तीर्थंकर-नामकर्म-प्रकृति, कर्मों की निर्जरा आदि निमित्तभूत व सहचारी-कारणों को कार्य का नियामक कहना तो व्यवहारनय का कथन कहा जा सकता है ; परन्तु किसी के भाई होने या किसी नगर में जन्मने, किसी बाहरी-घटनाक्रम को निमित्तपने या सहचारीपने के अभाव में व्यवहारनय से भी मोक्षरूप-कार्य का नियामक-कारण नहीं कहा जा सकता है।

इसीप्रकार वीतरागी की विनय में लौकिक-शिष्टाचाररूप प्रासुक-अष्टद्रव्यों से पूजन, वचनात्मक-गुणानुवाद करना, वंदन करना, प्रदक्षिणा देना, साष्टांग या पंचांग-नमस्कार करना आदि बाहरी क्रियाओं को तो व्यवहारनय से वीतरागी जिनेन्द्र देव की विनय/भक्ति आदि कहा जा सकता है और निष्कामभाव से मात्र आदर्श के गुणानुवाद रूप में की गयी इन क्रियाओं को निमित्त व सहचारी होने से व्यवहार-भक्ति/पूजा/विनय आदि के रूप में लिया गया है। किन्तु जो बातें वीतरागी जिनेन्द्र देव के स्वरूप में ही शामिल नहीं हैं और जो जिनेन्द्र देव के द्वारा प्रतिपादित वस्तु-स्वरूप से ही विरुद्ध हैं (जैसे कि कर्तावादी मानकर उन्हें हमारे भले-बुरे का कर्त्ता मानना व अन्य गृहीत-मिथ्यात्व के रूप में वर्णित मान्यताओं और कार्यों को व्यवहार-जिनेन्द्र-भक्ति मानना असंगत है), उन्हें व्यवहार ले जिनेन्द्र-भक्ति आदि रूप मानना व्यवहार नहीं, मिथ्यात्व ही है।
जो प्राचीन कवियों ने ऐसी बातें पूजनों, पाठों, भक्तियों में लिखीं भी हैं, वे उस युग में मुगल-दासता और फिर अंग्रेजों की गुलामी से दमित-मानसिकता की प्रतीक हैं, न कि जैनदर्शन की मान्यता के अनुरूप हैं।
आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ जैसे कालजयी-ग्रन्थ में व्यवहार से जिनेन्द्र देव के देहाश्रित-गुणों/विशेषताओं को लक्षित करके लिखी गयी स्तुति आदि को व्यवहारनय के कथन के रूप में बताया है ; क्योंकि उनके उस भव में संयोगस्थ-देह में वह वर्णादिक-वैशिष्ट्य विद्यमान तो हैं।

किन्तु पर का कर्त्तापना तो जिनेन्द्र देव के तीनकाल में कभी भी किसी भी रूप में संभव ही नहीं है। क्योंकि यह तो वस्तु-स्वरूप में ही कदापि संभव नहीं है। इसकी जन्मभूमि मात्र मिथ्यात्व और अज्ञान से जन्मी वासनायें ही हैं। इसलिये जितनी कर्त्तावादी-बातें हैं, वे जिनधर्म की परिधि से ही बाहर होने से उन्हें व्यवहारनय का प्रतिपादन कहकर भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।-- यह अकाट्य एवं ध्रुव-सत्य है।



दूसरी-बात कही गयी कि प्रथमानुयोग व चरणानुयोग के ग्रन्थों में निमित्त-नैमित्तिक की प्रधानता से कथन किये गये हैं, तो पहले निमित्त का स्वरूप तो निर्धारित कर लीजिये कि जिनाम्नाय में ‘निमित्त’ संज्ञा किसकी है और क्या निमित्त की संज्ञा ‘मात्र कहने के लिये’ एक ‘आरोपित-संज्ञा’ है या वह वास्तव में कुछ कर्त्ता भी है? कार्य उपादान में स्वयं की योग्यता से निष्पन्न होता है। जो बाहर में अनुकूल कही जाने योग्य सामग्री सहज-उपलब्ध होती है, उस पर ‘निमित्त’ होने का आरोप आ जाता है। यह संसारी छद्मस्थों द्वारा सीमित-ज्ञान के परिणामस्वरूप आरोपित की गयी संज्ञा है। जिनशासन में कोई भी वस्तु अपने आप में ‘निमित्त’ के रूप में संज्ञित नहीं है।

यह तो सीमित-ज्ञान से होने वाले आभास से किया गया प्रयोग है, वस्तु-स्वरूप नहीं है।
इसीलिये आज तक किसी भी केवली के केवलज्ञान में कोई भी वस्तु ‘निमित्त’ के रूप में नहीं देखी गयी है। केवली यह तो स्पष्ट जानते हैं कि संसारीजन अपने अनिर्मल/अविशद-परोक्षभूत ज्ञान से उत्पन्न आभासों में परवस्तुओं का निमित्तपना मानते हैं, किन्तु केवलज्ञान किसी भी वस्तु को किसी अन्य वस्तु के कार्य के निमित्तरूप में वस्तुतः नहीं जानता देखता है ; क्योंकि निमित्तपना वास्तव में वस्तु और उसके कार्य को स्वीकार्य ही नहीं है। उसमें को प्रत्येक वस्तु के एक-एक कार्य/परिणति की अनन्त-स्वाधीनता ही झलकती है।
’मोक्षमार्ग प्रकाशक’ नामक अनुपम-ग्रन्थ में इसीलिये जब पंडित प्रवर टोडरमल जी ने चारों अनुयोगों की कथन-पद्धतियों का मर्म उद्घाटित किया गया, तो प्रथमानुयोग और चरणानुयोग के ग्रन्थों की कथन-पद्धति में निमित्त-नैमित्तिक दृष्टि की प्रधानता कही है। जो कि पूर्णतः उपचार-कथन है, वास्तविक नहीं है। इसतरह के प्रतिपादनों को पंडित टोडरमल जी ने वहाँ कहीं भी उपादेय नहीं बताया है।
विचार कीजिये कि पाँचों महाव्रतों के नियम-उपनियम सीखकर भी किसी का छठवाँ-सातवाँ गुणस्थानरूप सच्ची-मुनिदशा होना संभव नहीं है, क्योंकि जो सीखते हैं, वह बाहरी क्रियारूप है, उससे सच्ची मुनिदशा का कोई निर्धारण संभव ही नहीं है। किन्तु जो आत्मस्वरूप में स्थिरता की वृद्धि करके छठवाँ-सातवाँ गुणस्थान प्राप्त करते हैं, उस समय एक भी महाव्रत का बाहरी-आचरण नहीं करते हुये भी वे सच्ची-मुनिदशा को ही प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट है कि जो व्यवहारनय की प्रधानता से चरणानुयोग के कथन हैं, वे वास्तविकता के नियामक नहीं हैं।

जबकि चरणानुयोग में ही जो निश्चयनय के अनुसार एक आत्मानुभूति है, उसमें सारा का सारा चरणानुयोग चरितार्थ हो जाता है। जबकि एड़ी-चोटी का जोर लगाकर किया गया बाह्याचरण कभी भी उसका नियामक नहीं बन सकता है। उसकी तो व्यवहार संज्ञा भी तभी हो सकती है, जब निश्चयरूप मुनिधर्म/चारित्र घटित हो रहा हो। यदि निश्चय-चारित्ररूप आत्मानुभूति नहीं है, तो कोरे बाह्याचरण की तो व्यवहार और निमित्त संज्ञा भी नहीं है। अतः किसने कह दिया कि चरणानुयोग में निमित्तपने की प्रधानता है?

रही बात प्रथमानुयोग की, तो उपादान में कार्य प्रतिफलित होने पर ही निमित्तों का उल्लेख यह अनुयोग करता है, न कि बिना उपादान में कार्य के प्रतिफलन के। महावीर के जीव ने मरीच के भव में प्रभु आदिनाथ के माध्यम से जान भले ही लिया था कि वह वर्तमान चौबीसी का चौबीसवाँ तीर्थंकर होगा; किन्तु उस तीर्थंकरत्व के प्रतिफलित हुये बिना वह प्रथमानुयोग का पात्र नहीं बना था। हम भविष्य काल के तीर्थंकरों की पूजा करते हैं, किन्तु उनके भविष्य के वीतरागी स्वरूप की ही करते हैं, न कि वर्तमान की उनकी पर्याय की। तब प्रथमानुयोग भी निमित्त-प्रधान कैसे हुआ? वह तो कार्य के बिना निमित्त संज्ञा तक किसी को नहीं देता। यदि केवली के वचनानुसार कार्य के पहले ऐसी कोई संज्ञा प्रयुक्त भी होती है, तो वह मात्र उस निश्चय-कार्य के घटित होने की स्थिति की विवक्षा में, न कि पहले से उसे निमित्त मानकर उसका कर्त्तापना घोषित करने के लिये।

यदि तीर्थंकर नेमिनाथ जी के द्वारा द्वारिका-दहन के निमित्त रूप में यादव-कुमारों एवं द्वीपायन-मुनि का निमित्त रूप में उल्लेख भी प्रथमानुयोग बतलाता है, तो उसमें वास्तविक-स्थिति मात्र इतनी ही है कि उस समय ऐसा संयोग होगा, न कि ये द्वारका-दहन के ‘कारक’ होंगे।

हमने कर्त्तावादी होकर प्रथमानुयोग के ग्रन्थों पर यह आरोप अपनी ओर से जड़े हैं, न कि जिनेन्द्र देव ने ऐसा कहीं कहा है। और इस तरह के निमित्तपरक-कथनों को जानकर जिन्होंने निमित्तभूत-सामग्रियों को हटा दिया था (शराब आदि को), तथा अपने को मात्र निमित्तरूप न मानकर कर्त्ता माननेवाला द्वीपायन-मुनि भी द्वारिका से बहुत दूर चला गया था, तो भी क्या निमित्तरूप कहे गये ये सब अपनी योजनाओं में सफल हो सके? द्वारिका-दहन तो तब भी हुआ न? रोकने की इनकी लाख कोशिशों के बाद भी हुआ। तो प्रथमानुयोग के कथनों में निमित्त कर्त्ता कैसे बन गया? जैसी की आपत्ति आज के विद्वद्गण प्रस्तुत कर रहे हैं।
मैं इन आपत्तियों को प्रस्तुत करनेवाले विद्वानों की ऐसे कथनों के पीछे निहित व्यावसायिक-विवशता को समझता हूँ। क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि वे भी जिनवाणी में कहीं भी निमित्त को कर्त्ता बताने वाले कथन नहीं निकाल सकते हैं। जो होगा, वह अज्ञानियों की मान्यतारूप ही होगा, सम्यग्ज्ञानी-जीव के कथन व आचरणरूप कदापि संभव नहीं है। और जब इन ग्रन्थों में वह बात अज्ञानियों की मानसिकता के रूप में वर्णित है, तो उसे इन अनुयोगों का या केवली/आचार्यों का कथन क्यों कहते हो?

एक जिज्ञासा यह भी प्रस्तुत की गयी कि “आयुर्वेद एवं प्राकृतिक-चिकित्सा में एक ‘स्वकल्प-भावना’ नामक चिकित्सा-विधि है। जिसके अनुसार भगवान की भक्ति ,नाम जाप, पूजन विधान, ध्यान आदि से रोगी शीघ्र निरोग होता है। अतः हर समय हर क्रिया को मिथ्यात्व-पोषक समझना कहाँ तक उचित है? विचार करें।”
तो इस विषय में मेरी यह जिज्ञासा है कि आयुर्वेद या प्राकृतिक-चिकित्सा की यह विधि दैहिक-उपचार के लिये बतायी गयी है, या आत्मिक-उपचार के लिये? यदि दैहिक-उपचार तक इनकी दृष्टि सीमित है और आत्मिक-उपचार की दृष्टि इन्हें प्राप्त ही नहीं है, तो मेरा कथन देह-दृष्टिवालों के लिये तो था ही नहीं। वह तो आत्मिक-दृष्टि में उत्पन्न विकृतियों के निवारणार्थ था। अतः आपकी यह आपत्ति मेरे प्रतिपादन पर लागू ही नहीं होती है।

साथ ही मेरा यह अनुरोध है कि कृपया यह स्पष्ट करें कि जिसमें से यह क्रिया का उल्लेख किया गया है, वह आयुर्वेद एवं प्राकृतिक-चिकित्सा का ग्रन्थ क्या जिनवाणी के अंगभूत है? यदि नहीं, तो उसके अनुसार जो प्रतिपादन है, वह जैनशासन के अनुरूप कैसे माना जा सकता है?

द्वादशांगी-श्रुत में ‘प्राणावाय’ नामक प्रकरण में मुनियों के लिये शारीरिक स्वास्थ्य-संबंधी जानकारी के लिये कई सूचनायें दीं गयीं हैं, जिन्हें जानकर मुनिराज अपने स्वास्थ्य एवं परिस्थितियों के अनुकूल भोजन ग्रहण कर लेते हैं, और उनका उद्दिष्ट-त्याग का नियम भी नहीं टूटता है तथा श्रावक के यहाँ जो भी आहार बना होता है, उसीमें से पथ्यरूप-पदार्थों का ग्रहण करके मुनिराज शारीरिक विषमता के बिना अपनी धर्मसाधना बिना किसी विघ्नबाधा के कर सकते हैं। यह मात्र मुनिधर्म के लिये होता है और उन्हीं की मर्यादा के अनुसार ही इसमें जानकारी होती है।

बाद में आचार्य समन्तभद्र स्वामी, आचार्य पूज्यपाद देवनन्दि, आचार्य उग्रादित्य आदि ने सामान्य-श्रावकों के लिये भी आरोग्य-परक मार्गदर्शन-वाले ग्रन्थ लिखे। इनमें से प्रथम दोनों आचार्यों के ग्रन्थ अनुपलब्ध हैं, मात्र आचार्य उग्रादित्य का ग्रन्थ ही उपलब्ध है। परन्तु यह भी कोई आयुर्वेद का ग्रन्थ नहीं है, हाँ तत्संबंधित कुछ सामग्री इसमें अवश्य है। प्राकृतिक-चिकित्सा के नाम पर कोई बाहरी-प्रक्रिया जिनवाणी में नहीं बतायी गयी है। हाँ, जो सामयिक, प्रतिक्रमण व आलोचना जैसी आध्यात्मिक-प्रक्रियायें जिनाम्नाय में नित्यकर्म के रूप में प्रचलित हैं, वे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को समुन्नत बनानेवाली अत्यन्त वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक प्रक्रियायें हैं। किन्तु वे तथाकथित आधुनिक प्राकृतिक-चिकित्सा के अन्तर्गत नहीं आ सकतीं हैं। और इनमें भी गृहीत-मिथ्यात्व की शैली में कहीं कुछ भी नहीं होता है। भक्तियाँ आदि इनके अंग हैं, किन्तु वे आधुनिक-कल्पनाओं से परे अत्यन्त आध्यात्मिक-भावभूमि की भूमिकायें हैं, जिनमें कर्तावाद एवं याचनाविधि को कोई स्थान नहीं होता है।

इनके अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक-अन्धविश्वास को बढ़ानेवाली कोई भी बात इसमें नहीं की गयी है और न ही जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना के निमित्त से स्वास्थ्य का इलाज बताकर इसमें कहीं भी गृहीत-मिथ्यात्व का पोषण है। जैनाचार्य ऐसा कर ही नहीं सकते हैं। और जो करें, वे जैनाचार्य नहीं हो सकते हैं।

तथा निष्कामभाव से की गयी जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि से पुण्यबंध हो और उसका उदय होने पर पापकर्मोदय से हुये रोगादि का निवारण हो-- इस पर तो मैंने कहीं भी कोई आपत्ति नहीं जतायी गयी है।

किन्तु जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि को रोगादि को ठीक करने की वासना के साथ याची बनकर करना – इसे गृहीत-मिथ्यात्व जैन-दार्शनिक सिद्धांत के अन्तर्गत कहा गया है। यह अकाट्य एवं शाश्वत-सत्य है।
तथा इस तथ्य का आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा के किसी प्रकल्प से क्या संबंध है? जो इस सैद्धान्तिक-प्ररूपण को इससे प्रश्नचिह्नित किया गया है?
बात जिनवाणी के सिद्धांत के आधार पर प्रस्तुत की गयी है, तो उसका यदि कोई अन्यपक्ष के रूप में प्रस्तुतीकरण हो, तो वह जिनवाणी के सिद्धान्तों के आधार पर ही किया जाये, न कि अन्य किसी लौकिक-पद्धति के आधार पर भ्रामक-स्थिति उत्पन्न की जाये।
मैं 100% दृढ़ता के साथ पुनः यही कहूँगा कि जिनाम्नाय में वीतरागी देव-गुरु-धर्म की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि क्रियायें यदि किसी भी तरह की लौकिक-वासना/कामना आदि के रूप में की जातीं हैं, तो वह एकमात्र गृहीत-मिथ्यात्व की ही रूप हैं, भक्ति या विनय नहीं।

ज्ञातव्य है कि ‘विनय’ नाम का एक मिथ्यात्व-भेद भी है। इसके अन्तर्गत वीतरागी जिनेन्द्र देव की स्तुति आदि के बदले लौकिक-कामनायें की जातीं हैं, अतः इसे ‘विनय-मिथ्यात्व’ कहा गया है।
केवल विरोध के लिये कुछ भी विषयान्तरित-प्रमाण के रूप में कहना, यह उचित नहीं है। और गृहीत-मिथ्यात्व के रूप में जो कुछ जिनवाणी में स्पष्ट प्रतिपादित है, उसका विरोध करना या घुमा-फिराकर उसतरह की भावना का समर्थन करना अपनेआप में गृहीत-मिथ्यात्व का समर्थन एवं जिनशासन का विरोध करना है।
निष्कर्ष :– वीतरागी जिनाम्नाय में एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्त्ता-हर्त्ता नहीं है। हम वीतरागी जिनेन्द्र देव की स्तुति/भक्ति/विनय/पूजा-पाठ आदि जो भी करते हैं, वह तभी सार्थक है, जब उसे निष्कामभाव से मात्र गुणानुवाद के रूप में किया जाये, न कि याचक बनकर और भगवान् को रागी-द्वेषी और कर्त्ता मानकर। अन्यथा हमारी सारी स्तुति/भक्ति/विनय/पूजा-पाठ आदि गृहीत-मिथ्यात्व का ही पोषण करेगी, न कि मोक्षमार्ग की पूर्वभूमिका बन सकेंगीं।

(यह आलेख कुछ ज्यादा लंबा तो हो गया है, इसीलिये मैंने इसे बीच-बीच में दो जगह वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। परन्तु पूरी बात न कहने का दुष्परिणाम यह होता है कि लोग पूरी बात को समझने का धैर्य रखे बिना अनेकों भ्रामक बातें उपस्थित करते हैं। इसीलिये वर्ण्य-विषय को एकसाथ ही दिया है। कृपया धैर्य से पढ़ें।)

संपर्क दूरभाष :8750332266

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डॉ. सुदीप जी के अन्य भी बहुत सारे लेख इस website पर भी जरूर देखे-

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नवीनतम-अनुसंधान : लौहगढ़ का शिलालेख

(सूचनात्मक-टिप्पणी)

:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

महाराष्ट्र प्रान्त के पुणे-सम्भाग में दुर्गम-पहाड़ियों के बीच लगभग ढाई हजार (2500) वर्ष प्राचीन एक ऐतिहासिक किला है, जिसे ‘लौहगढ़-किला’ के नाम से सभी जानते हैं। यह किला छत्रपति शिवाजी महाराज के महत्त्वपूर्ण-किलों में गिने जाने के कारण ज्यादातर इतिहासविद् व गाइड्स इसे “छत्रपति शिवाजी महाराज का किला” कहकर ही परिचय देते हैं। जबकि वास्तव में अब जाकर ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ इस किले के वास्तविक इतिहास के बारे में सचेष्ट हुआ है कि यह किला वास्तव में किसने बनवाया था और इसका यथार्थ-परिचय क्या है? अभी इस विषय में अनुसंधान चल रहा है और व्यापक-अध्ययन के बाद प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर ही यह निर्णय किया जा सकेगा कि यह किला व यह शिलालेख किसने बनवाया था?

मेरे अक्तूबर 2019 माह में पुणे-प्रवास के दौरान जब मैं ‘कुम्भोज-बाहुबलि’ का तीर्थयात्रा के उपरान्त’ महाबलेश्वर’ नामक पर्वतीय-पर्यटक-स्थल पर गया, जो कि महाराष्ट्र का सघन-वनों के बीच में स्थित प्रसिद्ध पर्यटन-केन्द्र है। यहाँ पर एक ऊँचे पर्वत-शिखर से कुछ गाइड दूरबीनों द्वारा दुर्गम-पहाड़ियों में स्थित छत्रपति महाराज शिवाजी के कुछ किलों (फोर्ट्स) को दिखाते हैं, उन्हीं में वे लौहगढ़ के इस किले को भी दिखाते हैं। मैंने जब इस किले को देखा, तो स्थापत्य की दृष्टि से मुझे यह अन्य सभी किलों से बहुत प्राचीन एवं अलग हटकर प्रतीत हुआ। बहुत दूर से देख रहा था, किन्तु पुरातात्त्विक-स्थापत्य में बहुत पहले से ही अभिरुचि व कुछ अध्ययन होने के कारण मुझे इसकी महत्ता का अवबोध हो गया था। इसीकारण मेरे मन में इसके प्रति जिज्ञासा-विशेष उत्पन्न हुई। मुझे लगा कि इसके विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी हासिल करनी चाहिये।

तभी लगभग एक सप्ताह के बाद दिल्ली वापस लौटने पर मेरे एक विद्वान्-मित्र ने मुझे एक अखबार की कटिंग भेजी और कहा कि मैं इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी हासिल करूँ। वह कटिंग यद्यपि मराठी-अख़बार की थी, किन्तु मराठी का सामान्य ज्ञान होने से मुझे समझने में कोई असुविधा नहीं हुई। उसकी एक सूचना जानकर मैं रोमांचित हो गया, क्योंकि उसमें यह संकेत था कि इसी ‘लौहगढ़’ के किले में एक अतिदुर्गम-स्थान पर एक अतिप्राचीन, ईसापूर्वयुगीन-शिलालेख मिला है, जिसमें ऐसे संकेत निहित हैं कि यह एक जिनधर्मानुयायी के द्वारा लिखवाया गया शिलालेख है।

मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ चुकी थी, अतः मैंने महाराष्ट्र के पुरातत्त्व-विभाग के अपने मित्रों एवं पुणे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर्स से निरन्तर संपर्क साधा, तब मुझे इस शिलालेख के बारे में कुछ और जानकारियाँ मिलीं। अभी उन सूचनाओं के पोषक-तथ्यों का अनुसंधान कार्य चल रहा है और पुरातत्त्व-विभाग का प्रतिबंध है कि “जब तक वे इसे अधिकृतरूप से जारी न कर दें, इसके पाठ को या चित्र को कहीं भी किसी भी सूचना-माध्यम से प्रचारित नहीं किया जाये।” इसलिये अन्य तथ्य तो अभी मैं आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ, परन्तु इतना अवश्य सूचित कर रहा हूँ कि यह शिलालेख प्रामाणिक रूप से 2100 वर्ष से कुछ अधिक ही प्राचीन है अर्थात् ईसापूर्व प्रथम-द्वितीय शताब्दी का है और सुप्रसिद्ध जैन-सम्राट् खारवेल के विश्वविख्यात ‘हाथीगुम्फा-अभिलेख’ के निकट-उत्तर-कालवर्ती है। यह शिलालेख भी प्राकृतभाषा में ही निबद्ध है और इसकी लिपि भी सम्राट् खारवेल के हाथीगुम्फा-अभिलेख की भाँति ब्राह्मी-लिपि ही है।

आपको यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी कि इस शिलालेख की पहली पंक्ति का पहला-वाक्य णमो अरिहंताणं है। इसी के आधार पर पुरातत्त्व-विभाग ने इसक एक जैन-शिलालेख होना स्वीकार किया है।

इस पर मेरा प्रयास अनवरतरूप से जारी है। सरकारी अनुमति एवं अनुसंधान की अपेक्षित-प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने के बाद मैं इसके चित्र, मूलपाठ एवं उसके अनुवाद के साथ-साथ विशेष-परिचयात्मक विवरण भी प्रेषित करूँगा। तब तक आप आनंद लीजिये कि जैनधर्म के प्रसार-क्षेत्र में महाराष्ट्र का भी ईसापूर्व युग से ही महत्त्वपूर्ण योगदान व स्थान रहा है। और यहाँ पर भी जैन-आगमों की भाषा ‘प्राकृत’ में व तीर्थंकर ऋषभदेव की ज्येष्ठ पुत्री ब्राह्मी के नामाधारित लिपि ‘ब्राह्मी’ में पूरा विवरण दिया गया है और वह विवरण हमारे महान् मंगलपाठ ‘णमोकार-मंत्र’ की पहली-पंक्ति से प्रारम्भ हो रहा है।

विशेष-विवरण के लिये प्रतीक्षा कीजिये।

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।। “मैंने बोला हुआ है” – की सच्चाई ।।
(मननीय आलेख)
प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आजकल समाज में एक संक्रमण बहुत अधिक परिमाण में व्याप्त है और यह दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। यह ‘निदान’ एवं ‘मिथ्यात्व’ की विकट-जुगलबंदी के रूप में अमरबेल की तरह बढ़ता जा रहा है। वह है किसी भी भय/ आशंका के निवारण अथवा किसी लौकिक-आकांक्षा की पूर्ति-हेतु वीतरागी जिनेन्द्र देव से या उनके तीर्थों की वंदना आदि के माध्यम से, किसी भी पूजन-विधान/पाठ, जिनबिम्ब-स्थापना, जिनालय/धर्मायतन/जिनवेदी/जिन-चरणचिह्न का निर्माण का वचनात्मक-अनुबंध (एग्रीमेंट) किया जाता है। जैसे कि “हे भगवान्! यदि मेरी अमुक आकांक्षा पूर्ण हो गयी, तो मैं यह कार्य करूँगा /करूँगी।”
यह अनुबंध कार्य होने के पहले का भी होता है। अर्थात् “मैं यह कार्य करूँ, तो मेरी अमुक-आकांक्षा पूर्ण हो जाये।” ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवान् को अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिये प्रलोभन दिया जा रहा हो, या सौदेबाजी की जा रही हो।
चूँकि इन कार्यों का बाहरी-स्वरूप शुद्ध दिगम्बर जैन मूलाम्नाय की पद्धति से भिन्न नहीं दिखता है (अर्थात् इनमें किसी रागी देवी-देवता की पूजा-विधान, सचित्त-सामग्री से पूजन आदि करने, या वीतरागी-आम्नाय के विपरीत किसी अनुष्ठान का आयोजन करने जैसे कार्य नहीं दिखते हैं), इसलिये लोगों को ऐसा भ्रम रहता है कि यह कार्य तो वे जिनधर्म के अनुरूप ही कर रहे हैं और ऐसा करने से गृहीत-मिथ्यात्व के बंध जैसी कोई आशंका तक उन्हें नहीं लगती है।
किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि ऐसा करने से ‘निदान’ रूप ‘शल्य’ का दोष भी लगता है और ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ का बंध भी अनिवार्यरूप से होता है।
ऐसा कैसे संभव है? - - इसका स्पष्टीकरण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।–

1.किसी भी धार्मिक कार्य /अनुष्ठान को करने के बदले में जब कोई लौकिक आकांक्षा रखी जाती है, तो यह ‘निदान’ कहलाती है। इसे जिनवाणी में संसार-परिभ्रमण की कारणभूत ‘शल्यत्रय’ के अन्तर्गत माना गया है।

  1. सम्यग्दृष्टि-जीव ‘निःकांक्षित-अंग’ का धनी होता है। वह किसी भी ऐसे कार्य के बदले में किसी भी तरह की लौकिक-आकांक्षा कर ही नहीं सकता है।

3.वीतरागी जिनधर्म में किसी भी तरह की आकांक्षा या अनुबंध मन में रखकर कोई पूजा, अनुष्ठान या धर्मायतन-निर्माण आदि का संकल्प करना ‘वीतरागी’ को ‘रागी’ मानने रूप विपरीत-श्रद्धान का कार्य है। और इस कारण यह स्पष्टरूप से ‘मिथ्यात्व’ ही है। क्योंकि जिनवाणी में विपरीत-श्रद्धान को ही मिथ्यात्व कहा गया है।

4.मनुष्यगति और जैनकुल, जिनधर्म पाकर जो अनादि से फल रहे मिथ्यात्व को पुष्ट करनेवाले कार्य किये जाते हैं, उन्हें ही ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ कहा गया है। इसी रूप होने से यह ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ है-- यह स्पष्ट है। इसे सिद्ध करने के लिए किसी तर्क या अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

यह विषय क्यों लिया— आज अधिकांश जिनधर्मानुयायी, जो अपने को ‘सच्चा जैन’ मानते हैं और किसी भी प्रकार के गृहीत-मिथ्यात्व आदि के कार्यों से दूर रहकर शुद्धाम्नाय के अनुरूप सात्त्विक-चर्या करता हुआ अपने को मानते हैं। क्योंकि वे रागी-देवी-देवता को मानते-पूजते नहीं हैं, पंचामृत-अभिषेक व सचित्त-द्रव्यों से पूजन आदि जिनाम्नाय-विरुद्ध कार्य नहीं करते हैं। - - इत्याद कारणों से वे ऐसा मानते हैं कि वे तो गृहीत-मिथ्यात्व के बंध होने जैसा कोई कार्य ही नहीं करते हैं, अतः वे तो गृहीत-मिथ्यात्व से रहित ही हैं। किन्तु जब तक सम्यग्दर्शन नहीं हुआ, तब तक मिथ्यात्व का कार्य (फंक्शन) तो निरन्तर चालू ही है। और उसके उदय में तदनुरूप परिणाम भी होंगे और जब मिथ्यात्व के उदयरूप परिणाम होंगे, तो मिथ्यात्व का नवीनबंध भी होना स्वाभाविक ही है। इसतरह जब मिथ्यात्व की सन्तति निरन्तर चालू है, तो परिणाम भी मिथ्यात्व के कैसे नहीं होंगे? और देहादि में एकत्व-ममत्वबुद्धिरूप परिणाम भले ही ‘अगृहीत-मिथ्यात्व’ के कहे जायेंगे, परन्तु बुद्धिपूर्वकाः जो देव-गुरु-धर्म आदि के विषय में विपरीत-श्रद्धा करके जो अनादि-मिथ्यात्व को सबल बनाया जाता है, उसे तो ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ ही कहेंगे।
अतः देव-गुरु-धर्म के विषय में विपरीत-अभिनिवेश(अभिप्राय) के परिणामों को तो मिथ्यात्व ही कहा जायेगा, और मनुष्य भव, जैनकुल, जिनधर्म पाकर जो बुद्धिपूर्वक मिथ्यात्व बंधता है, उसे तो ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ ही कहा गया है न?
जो वीतरागी देव-गुरु-धर्म न तो किसी के कर्त्ता-हर्त्ता हैं, न किसी से राग-द्वेष करते हैं, उनसे लौकिक-प्रयोजनों की आशा व आकांक्षा करना क्या इनका विपरीत-श्रद्धान नहीं है? तो क्या यह इनके आयतनों के माध्यम से, इनकी पूजन-विधान-व्रतादि के माध्यम से जो मिथ्यात्व का पोषण किया जा रहा है, उसे गृहीत-मिथ्यात्व का कार्य नहीं कहा जाये, तो और क्या कहा जाये?
महाज्ञानी पंडित प्रवर टोडरमल जी का स्पष्ट-कथन है कि “इस मिथ्यात्व-बैरी का अंश भी बुरा है।”
यह सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के पहले अनेकों रूपों में हमारे परिणामों को छलता हुआ हमारे मन और जीवन में फलता रहता है।
आज अनेकों तत्त्वाभ्यासियों के द्वारा कराये जाने वाले ऐसे आयोजनों व कार्यों के पीछे निहित ऐसे अभिप्रायों से वे सब भलीभाँति परिचित हैं। जरूरत अपने गिरहबान में झाँकने की है। दूसरों से प्रमाणपत्र लेकर संतुष्ट मत बनिये। पंडितजन तो अपना प्रयोजन देखते हैं। वे तो आपके आयोजनों व कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे ही। उनकी प्रशंसा में संतुष्ट होने की जगह अपने परिणामों का स्वयं ईमानदार से मूल्यांकन व परीक्षण करिये; क्योंकि आपके मनुष्यभव का ही नहीं, बल्कि आगामी अनंतभवों की भवसन्तति का सवाल है। नरक-निगोदों में रुलने से ये पंडितजन बचाने नहीं आने वाले। अपना भला-बुरा तो अपने परिणामों से है, अतः जैसे अपना लोटा छानने की सावधानी रखते हो, वैसे ही अपने परिणाम छानने की सावधानी रखिये।
यह नरभव अत्यंत दुर्लभ है, और आयुकर्म का क्षणभर का भी भरोसा नहीं है। अतः ये पंक्तियाँ स्मरण रखिये कि–
" यदि अवसर चूका तो, भव-भव पछतायेगा।
फिर काल अनंत अरे! दुःख का घन छायेगा।।
जिया! कब तक उलझेगा, संसार-विजल्पों में?
कितने भव बीत चुके, संकल्प-विकल्पों में??"
अतः यह स्मरण रखना कि जिसने इस नरभव व जैनकुल को पाकर जिनायतनों का निर्माण, जिनबिम्ब-प्रतिष्ठा, पूजन-विधान-अनुष्ठान आदि नहीं कर सका, वह अपना उतना अहित नहीं करेगा; जितना कि इन परम-पवित्र कार्यों को करते हुये भी अभिप्राय में ऐसी आकांक्षाओं को रखकर निदानबंध और गृहीत-मिथ्यात्व का पोषण करनेवाले करेंगे। क्योंकि जिसे भवरोग-नाशक औषधि नहीं मिली, उसे तो अभागा कहा ही जायेगा ; किन्तु जो इस औषधि को पाकर भी उसका दुष्प्रयोग भवसन्तति को बढ़ाने में करेगा, वह अधिक दुर्भाग्यशाली है।
अतः धर्मप्रभावना के कार्य यथाशक्ति अवश्य करिये, किन्तु पहिचान कर करिये कि कहीं ये दूसरों के लिये धर्मप्रभावना के निमित्त बन रहे हों, और आपके लिए निदानबंध और गृहीत-मिथ्यात्व के कारण सिद्ध हो रहे हों??? अतः सर्वप्रथम अपने परिणाम छानिये, तब इन कार्यों में प्रवृत्त होइये। यह आपके दुर्लभ नरभव का सवाल है, आपके भविष्य का सवाल है।
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क्या ‘गुरु-पूर्णिमा’ पर्व जिनाम्नाय-सम्मत है?

:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

आज ‘गुरु-पूर्णिमा’ की बधाईयों की सिलसिला सुबह से जैनों में भी चल रहा है, तो मुझे अपेक्षित लगा कि इसके बारे में कुछ तथ्यात्मकरूप से जानकारियाँ दे दूँ |
यह पर्व कुछ विद्वानों की मान्यता के अनुसार इन्द्रभूति गौतम स्वामी के गणधर-पद पर आरूढ होने के कारण " वीर हिमाचलतैं निकसी, गुरु गौतम ने मुख धारी "-- के अनुसार उनके कारण ‘गुरु-पूर्णिमा’ नाम को सार्थक करता है |
यह सच हो सकता था, यदि महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि आज खिरी होती, और ‘वीरशासन-जयंती’ की तिथि आज की होती |
पर मैंने विचार किया कि ‘वीरशासन-जयंती’ तो कल अर्थात् ‘श्रावणी प्रतिपदा’ की है | अर्थात् गौतमस्वामी का गणधर-पदारोहण कल हुआ था, तो आज उनके नाम पर जिनाम्नाय में ‘गुरु-पूर्णिमा’ कैसे मनायी जा सकती है?*
तब मुझे एकदम से स्मरण आया कि यह पर्व जिनाम्नाय में किसी व्यक्ति-विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है |
यह तो ‘आषाढ-शुक्ल-चतुर्दशी’ की रात्रि के प्रथम-प्रहर में ‘वर्षायोग’ या ‘चातुर्मास’ की स्थापना कर चुकने पर अगले दिन श्रावकों को गुरुदेव साक्षात् अपने बीच पूरीतरह से मिल जाते हैं, तो वह ‘आषाढी- पूर्णिमा’ की तिथि उनके लिये ‘गुरु-पूर्णिमा’ बन जाती है |
परन्तु यह कार्य भी आजकल अलग-अलग तिथियों में सुविधानुसार होने लगे हैं, अतः यह आधार भी नहीं कहा जा सकता है। निष्कर्षतः ‘गुरु-पूर्णिमा’ जिनाम्नाय का पर्व ही नहीं है और इसका जिनशासन से कोई सीधा संबंध नहीं है।
आज के दिन जो गुरु-वंदन, अभिनन्दन, वर्धापन और शिष्टाचार का प्रचलन जैनसमाज में होता जा रहा है, वह वास्तव में जिनाम्नाय के अनुरूप है ही नहीं। – यह तथ्य सभी के संज्ञान में रहे–एतदर्थ यह संक्षिप्त-टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूँ।

संपर्क दूरभाष : 8750332266
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[(वीरशासन-जयन्ती के प्रसंग पर विशेष-प्रस्तुति]
महाज्ञानी-अप्रतिबुद्ध से अद्वितीय-प्रतिबुद्धता के अद्भुत-यात्री : इन्द्रभूति गौतम
(महत्त्वपूर्ण-शोध-आलेख)
:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

यह शीर्षक किसी बड़े-विरोधाभास का प्रतीक है, परन्तु विशिष्ट-सन्दर्भों को परिलक्षित रखें, तो इससे दृष्टिपटल से तिरोहित रहे कई महनीय-विषयों का रहस्योद्घाटन होता है। आइये, उन विशिष्ट-सन्दर्भों के साथ-साथ उन अदृष्ट-तथ्यों की मीमांसा भी समझें, जो हमारे विचारपटलों से ओझल रहे हैं।
[इस विषय का विवेचन प्रारम्भ करूँ, उसके पहले कुछ तथ्यों को जान लेना अपेक्षित है। यह सही है कि आप में से कई सज्जन इन तथ्यों से परिचित होंगे, किन्तु मैं यह भी अच्छी तरह से जानता हूँ कि मेरा यह आलेख अन्य इसतरह के कई आलेखों की भाँति मेरे ब्रॉडकास्ट-ग्रुपों के सदस्यों के अलावा विश्वस्तर अन्य विचारकों एवं मनीषियों तक पहुँचेगा, जिनमें से कई पाठक इनसे अपरिचित हो सकते हैं, अतः यह प्रस्तुति अपेक्षित है।]
तथ्य-क्रमांक 1:–
चौबीसवें तीर्थंकर भगवान् श्री महावीर स्वामी के काल में वैदिक-परम्परा के भी कई बड़े पंडित थे, जिनमें सर्वश्रेष्ठ विद्वान् का नाम इन्द्रभूति गौतम था।
उस समय इनके पांडित्य एवं कर्मकांड की लोक में इतनी प्रतिष्ठा थी, कि बड़े-बड़े राजा व सामन्त इनकी विद्वत्ता का लाभ लेते थे व इनका सन्मान करके इन्हें प्रभूत-दक्षिणा देते थे। इनके साथ उस समय के 500 श्रेष्ठ एवं मेधावी-वेदाभ्यासी इनके शिष्यों के रूप में चौबीसों घंटे इनकी सेवा में तत्पर रहते थे। ये बहुत बड़े वाग्मी, भाषाविद्, कर्मकांड के विशेषज्ञ एवं वादी विद्वान् थे। अतः इन्हें मैंने ‘महाज्ञानी’ विशेषण प्रयोग किया है।
तथ्य-क्रमांक 2:–
जिनाम्नाय के अनुसार जिसे जिनेन्द्र-प्रज्ञप्त वस्तु-व्यवस्था का ज्ञान न हो एवं आत्मतत्त्व की निर्मल-अनुभूतिरूप सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं हुई हो, वह ‘अप्रतिबुद्ध’ अर्थात् अज्ञानी ही कहा गया है। क्योंकि जैनदर्शन में मात्र क्षयोपशमज्ञान पर आधारित पांडित्य को ‘प्रज्ञा-परीषह’ कहकर उपेक्षित किया गया है। ‘आत्महित जिसने नहीं साधा, वह लोकहित भी वास्तव में नहीं कर सकता है’-- इस सिद्धान्त के आधार पर उसके समस्त पांडित्य को जैनदर्शन ‘अज्ञान’ ही मानता है।
जैनदर्शन की स्पष्ट-मान्यता है कि “आत्मज्ञान ही ज्ञान है, शेष सभी अज्ञान”। इसीकारण अन्य सब बातों के प्रकांड-पंडित होते हुये भी इन्द्रभूति गौतम आत्मज्ञान एवं जिनेन्द्र-कथित तत्त्वज्ञान से नितान्त-अनभिज्ञ थे, अतएव उन्हें ‘महाज्ञानी’ के साथ ‘अप्रतिबुद्ध’ विशेषण भी शीर्षक में सुविचारित रूप से प्रयोग किया गया है।
तथ्य-क्रमांक 3:–
‘अद्वितीय-प्रतिबुद्धता’ का अभिप्राय बहुत गहरा है। यह लौकिक-पांडित्य की मानसिकता में समझ में नहीं आ सकता है। इसके लिये हमें एक ओर ‘केवली’ और ‘केवलज्ञान’ को समझना होगा और दूसरी ओर हमें ‘द्वादशांगी-श्रुत’ को समझना होगा। इन दोनों के मध्यवर्ती जो होते हैं, उन्हें ‘गणधर’ कहा जाता है।
यहाँ महत्त्वपूर्ण-बात यह भी है कि इन दोनों के बारे में सामान्यजनों को मात्र टटोलकर जानने जितनी मोटी-जानकारी ही पता है, इनकी वास्तविकता का तो अनुमान लगाना भी सामान्यजनों को अत्यन्त-कठिन ही नहीं, असंभवप्रायः है। अतः इन दोनों पक्षों का संक्षिप्त, किन्तु सटीक-प्रतिपादन करने के बाद इनके मध्यवर्ती गणधरदेव के स्वरूप का स्पष्ट-आभास कराऊँगा, ताकि इस विशेषण का अर्थ स्पष्ट हो सके।
पहला-पक्ष ‘केवलज्ञान’ का है। ‘केवलज्ञान’ अर्थात् आत्मा के ज्ञानगुण की वह परिणति, जो विश्व के अनन्त-जीवों, अनन्तानन्त-पुद्गलों, जीवों और पुद्गलों के क्षेत्र से क्षेत्रान्तरण के गमन एवं स्थिति के निर्धारक लोकाकाश-व्यापी धर्म और अधर्म-द्रव्यों, लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर विद्यमान सम्पूर्ण-परिणमनों के निर्धारक असंख्य-कालाणुओं, समस्त द्रव्यों के अवगाहनत्व के निर्धारक लोकालोक-व्यापी आकाश-द्रव्य के एक-एक प्रदेश को, उनमें से प्रत्येक के अनन्त-गुणों को, उन अनन्तानन्त-गुणों में प्रत्येक गुण के सर्वकालवर्ती-अनन्तानन्त-परिणमनों को युगपत् अत्यन्त निर्मलता/स्पष्टता के साथ प्रत्यक्ष जानने में समर्थ चैतन्य-परिणति का नाम ‘केवलज्ञान’ है। इतना ही नहीं, ऐसे अनन्त लोकालोक आ जायें, तो उन सबको भी केवलज्ञान की एक पर्याय बिना किसी अस्पष्टता के सहजतापूर्वक एक ही समय में प्रत्यक्ष जानने की सामर्थ्य रखती है।-- ऐसा तो केवलज्ञान का स्वरूप है।
इस केवलज्ञान के धनी होते हैं केवली-परमात्मा। ऐसी केवलज्ञान की अनन्तानन्त-पर्यायें जिसमें से प्रतिसमय परिणत हों, तब भी जिसकी स्वाभाविक-सामर्थ्य में रंचमात्र भी न्यूनता/कमी न हो-- ऐसा ‘ज्ञान’ नामक गुण आत्मा का प्रतिनिधि-गुण है। और इस ज्ञान जैसे अनन्त-गुणों का निधान यह चैतन्य-तत्त्व आत्मा है। इस केवलज्ञानरूप-परिणति से परिणत आत्मा को ही केवली कहा गया है।
इन केवलियों में जो सर्वजीवों के हित का करुणा-भावना से दिव्यध्वनि द्वारा वस्तु-स्वरूप का प्ररूपण करते हैं, उन्हें ‘तीर्थंकर’ कहा जाता है।
इन तीर्थंकरों की ‘दिव्यध्वनि’ में समस्त-श्रोताओं की जिज्ञासाओं को अधिगत करके उन्हीं की भाषाओं में समाधान देने की अनिर्वचनीय-क्षमता विद्यमान होती है, तथापि यह जितना केवलज्ञान जानता है, दिव्यध्वनि उसका अनन्तवाँ-भाग ही प्रतिपादित कर पाती है।
क्योंकि ज्ञान की जानन-सामर्थ्य तो अनन्त है, परन्तु ध्वनि की अभिव्यंजन-सामर्थ्य केवलज्ञान की तुलना में अनन्तवाँ-भाग मात्र है।
चूँकि केवलज्ञान ‘निरावरण’ या ‘क्षायिकज्ञान’ है, अतः वह अपरिमित जान सकता है; किन्तु जो दिव्यध्वनि के श्रोतागण होते हैं, वे मुख्यतः सभी सावरण-क्षयोपशमज्ञान के धनी होते हैं; अतः केवली की अनन्तवाँ-भाग-सामर्थ्यवाली दिव्यध्वनि जितना प्रतिपादित कर पाती है, उसे कोई भी सावरण-ज्ञान यानि क्षयोपशम-ज्ञान का धनी जीव पूरा तो क्या, उसका एक-अंश भी ग्रहण नहीं कर पाता है।
किन्तु क्षयोपशमज्ञान के धनियों में सर्वश्रेष्ठ-क्षमता के धनी तीर्थंकर-परमात्मा के प्रधान-शिष्य अर्थात् ‘गणधर’ ही होते हैं। वे मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्यय-- इन चार ज्ञानों के सर्वोत्कृष्ट-स्तर के धनी होते हैं। और वे भी तीर्थंकर-परमात्मा की दिव्यध्वनि का अनन्तवाँ-अंश ही ग्रहण कर पाते हैं-- यह एक तथ्य है।
दूसरे-पक्ष पर विचार करें, तो हम पाते हैं कि गणधरदेव दिव्यध्वनि के जितने अंश को ग्रहण करते हैं, उसको जब वे शब्दायित करके वर्गीकृत करते हैं, तो उन्हें प्राप्त दिव्यध्वनि के अंश का भी अनन्तवाँ-भाग ही वे उसरूप में व्यवस्थित कर पाते हैं, जिसे हम ‘द्वादशांगी-श्रुत’ के रूप में जानते हैं। जबकि जिनवाणी के ग्रन्थों में जो द्वादशांगी-श्रुत का परिमाण एवं विस्तार वर्णित है, वह सामान्यजनों की कल्पना एवं गणना से परे प्रतीत होता है। इसी द्वादशांगी-श्रुत का अन्तर्मुहूर्त में पारायण ‘श्रुतकेवली’ करते हैं। अर्थात् श्रुतकेवली जितना द्वादशांगी-श्रुत के रूप में जानते हैं, गणधरदेव को उनसे अनन्तगुना-अधिकज्ञान दिव्यध्वनि के माध्यम से होता है।
यह सब सत्य एवं तथ्यात्मकरूप से प्रमाणित है और इस विषय में आप प्रायः जानते हैं। किन्तु इस आलेख का उद्देश्य मात्र यह जानकारी देना नहीं है, बल्कि उन तथ्यों की ओर ध्यानाकर्षण कराना है, जिन पर प्रायः हम लोग विचार ही नहीं करते हैं। उन तथ्यों का संक्षिप्त-विवरण निम्नानुसार है–
1. विचार करिये कि जब भगवान् श्री महावीर स्वामी जी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था, तभी से उनका समवसरण लग रहा था और उसकी बारह-सभाओं में कई श्रुतकेवली, चतुर्विध भावलिंगी-मुनिराज, आर्यिकायें, देशव्रती श्रावक-श्राविकायें, चतुर्निकाय-देवगण, सौ इन्द्र, अनेकविध सामान्य-श्रावक आदि विद्यमान रहते थे; जो कि भगवान् श्री महावीर स्वामी के न केवल अनुगामी-शिष्य थे, बल्कि विशुद्ध-आत्महित की भावना से उस समवसरण में उपस्थित थे।
और इस स्थिति में एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 66 दिन बीत गये थे। किन्तु उन अनन्य-भक्तों में किसी की ऐसी पात्रता नहीं पकी कि वे तीर्थंकर-प्रभु के ‘गणधर’ बन सकते।
दूसरी-ओर भगवान् श्री महावीर स्वामी के समवसरण में आने तक इन्द्रभूति गौतम को न तो जैन-तत्त्वज्ञान की पकड़ या जानकारी थी और न ही उन्होंने एक भी जैन-सिद्धांत समझा या स्वीकार किया था। तब उन्होंने ऐसा कौन-सा चमत्कार कर दिया था, जो वे श्रुतकेवलियों से भी कई गुना श्रेष्ठ-योग्यता के धनी ‘गणधर’ बन गये थे और वह भी तत्काल?
न तो उन्होंने जैन-सिद्धांतों को पढ़ने, सीखने या समझने में एक क्षण का भी समय लगाया और न ही किसी से जिनशासन के सिद्धांतों का अध्ययन किया था। तब उन्होंने बिना किसी शिक्षण या प्रशिक्षण के सर्वज्ञ-परमात्मा की दिव्यध्वनि सुनकर उसे आत्मसात् करने की क्षमता कब और कैसे विकसित की थी? कैसे क्षण भर में उनकी वैचारिक एवं श्रद्धानगत-पवित्रता इतनी अधिक हो गयी थी कि समवसरण की बारहों सभाओं में विद्यमान अभ्यासी-साधकों से कई गुना श्रेष्ठ बनकर ‘गणधर’ पद पर विभूषित हो गये थे?– यह प्रश्न बहुत ही गम्भीर है।
2. क्या जैन-तत्त्वज्ञान के अध्ययन एवं प्रशिक्षण के बिना भी जैन-तत्त्वज्ञान के सर्वोत्तम-वक्ता ‘तीर्थंकर-परमात्मा’ की परम-अतिशय-रूप ‘दिव्यध्वनि’ के निमित्त बन गये, जो दिव्यध्वनि पिछले 66 दिनों से गणधर के अभाव में नहीं खिर रही थी, वह इन्द्रभूति गौतम जैसे जैन-तत्त्वज्ञान से अनभिज्ञ एवं अप्रशिक्षित-व्यक्ति के आते ही खिरने लगी थी। क्या क्षण भर पहले तक का गृहीत-मिथ्यात्वी जीव मात्र क्षयोपशम के उघाड़ के बल पर इतनी महती-योग्यता अर्जित कर सकता है? जैन-सिद्धांत क्या इससे सहमति प्रदान करता है?– यह बहुत बड़ा-प्रश्न है।
3. क्या कुछ क्षण पहले का गृहीत-मिथ्यादृष्टि जीव कुछ ही पलों में निर्ग्रन्थ-मुद्रा अंगीकार करते हुये क्षायिक-सम्यग्दर्शन लेकर चार-ज्ञानों के सर्वोच्च-स्तर को प्राप्त करके तीर्थंकर-परमात्मा की धर्मसभा का नायक ‘गणधर’ बन सकता है? एकसाथ इतनी सारी योग्यतायें बिना किसी पूर्वाभ्यास या प्रशिक्षण के क्षण भर में प्रकट होनी संभव हैं?
– ये सभी बेहद-गम्भीर प्रश्न हैं और इनका तथ्यात्मक-समाधान अपेक्षित है, कोरे भावावेश के उत्तर यहाँ अपेक्षित ही नहीं हैं। मैं अतिसंक्षेप में, किन्तु पूरीतरह से निर्भ्रान्तरूप से इन सभी का आगम-युक्त-सम्मत-समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास यहाँ करूँगा।
समाधान-क्रमांक 1 :–
जैनदर्शन का मूलभूत-सिद्धांत है कि आत्मा परिपूर्ण ज्ञानस्वभावी है, क्षयोपशमज्ञान उसका स्वभाव नहीं है। निरावरण-ज्ञान ही उसका स्वभाव है। और निरावरण-ज्ञान हमेशा परिपूर्ण ही होता है, कभी अपूर्ण नहीं होता है। भले ही पर्याय में उसकी अभिव्यक्ति सीमित दिखे, किन्तु वह पर्याय में दिखने की ही बात है, आत्मा का स्वभाव वैसा सीमित नहीं है।
जैसे आकाश में सूर्य हमेशा पूरा ही प्रकाशित और प्रतापित रहता है। किन्तु हम तक कभी उसका प्रकाश और प्रताप प्रचंड रूप में मिलता है, तो कभी मेघाच्छन्न-दिशाओं या दक्षिणायन के कारण ये क्षीण रूप में मिलते हैं। किन्तु यह सूर्य का दोष नहीं है और न ही वह कभी धुँधला होता है। यह तो हमारी स्थिति जिस क्षेत्र में है, वहाँ के प्रकृति और पर्यावरण के प्रभाव से ऐसा होता है।
जब आत्मा का ज्ञानस्वभाव सदा एकसमान है, तो उसे पहिचानने व अपनाने में कितना समय लगना है? यह तो दृष्टि के फेर की बात है। इसलिये अप्रतिबुद्ध से प्रतिबुद्ध होना कोई समय-सापेक्षता की विवशता नहीं रखता है। जिस क्षण उस स्वभाव के सन्मुख हुये, उसी क्षण वह प्रकट है।
समाधान-क्रमांक 2 :– आत्मा को आत्मा के स्वरूप को अपनाने में समय नहीं लगता है और न ही इसके लिये कोई ग्रन्थों से परिभाषायें रटनी पड़तीं हैं। वह तो स्वसंवेदन से मिलनेवाली उपलब्धि है, जो कि दृष्टि बदलने के साथ ही तत्क्षण प्राप्त होती है। इसमें न तो समय की पराधीनता होती है और न ही संयोगों को जुटाने की कोई अपेक्षा रहती है।
इसीलिये जिस क्षण इन्द्रभूति गौतम ने मोह की दृष्टि त्यागी और स्वरूप की दृष्टि अपनायी, उसी क्षण उन्हें अपना स्वरूप साक्षात्कृत हो गया था। अब महत्त्व था स्थिरता का एवं समर्पण का, तो इन्द्रभूति गौतम का उपयोग उत्कृष्ट-पुरुषार्थ के साथ अन्य पूर्व-उपस्थित तथाकथित-वरिष्ठजनों की तुलना में अधिक समर्पण के साथ बेहतर स्थिरता को प्राप्त हुआ था, इसीलिये वे उनसे बेहतर-उपलब्धि (गणधर-पद की पात्रता) को प्राप्त कर सके थे। इसमें समय-आधारित वरिष्ठता (सीनियरटी) का प्रश्न ही कहाँ उठता है।
क्या भरत चक्रवर्ती को अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान हुआ था और उनके पिताश्री तीर्थंकर ऋषभदेव को एक हजार वर्षों में, तो क्या इससे केवलज्ञान के स्वरूप में कुछ अन्तर पड़ा या कम या ज्यादा समय लगने से चक्रवर्ती भरत का केवलज्ञान श्रेष्ठ व तीर्थंकर ऋषभदेव स्वामी का कमतर रह गया था?-- जिनदर्शन का मर्म जिन्होंने समझा है और जिनाभिमत-वस्तु-व्यवस्था की समझ जिन्हें हैं, उन्हें ऐसी आशंका कभी भी नहीं हो सकती है।
समाधान क्रमांक 3:–
क्रमबद्ध-पर्याय और केवलज्ञान के स्वरूप की समझ व श्रद्धान जिन्हें है, उन्हें किसी भी पर्याय की स्वतन्त्र-अभिव्यक्ति में कभी कोई आशंका या आश्चर्य नहीं होता है। तो इन्द्रभूति गौतम स्वामी की पूर्वक्षणवर्ती-पर्याय एवं उत्तरक्षणवर्ती-पर्याय में जो स्वतंत्रता दिखी, उस पर आश्चर्य क्यों है?
क्या आपने क्षणभर पहले के शरीर भिन्न है और आत्मा भिन्न है – इतने से वाक्य को स्मरण रखने में असफल रहे शिवभूति-मुनिराज के तुस-मासं घोसंतो वाले घटनाक्रम से उड़द की दाल उसके छिलके से भिन्न होती देखकर अपने स्वरूप में स्थिर होकर केवलज्ञानी होने में किसी को कोई आशंका है? वे भी तो क्षयोपशमज्ञान की दृष्टि से न्यूनतर-उघाड़वाले थे, तो अन्तर्मुहूर्त मात्र में केवलज्ञानी कैसे हो गये थे? स्वभाव की सामर्थ्य से या ज्ञानावरण का क्षयोपशम करके? अथवा शास्त्रों के सूत्र रटकर? –ऐसी आशंकायें कभी जिनधर्म का मर्मज्ञ कर ही नहीं सकता है और जिसे आशंका हो, वह अभी जिनदर्शन को समझ ही नहीं सका है।
जिनदर्शन ‘समयापेक्षी-दर्शन’ नहीं है, बल्कि ‘स्वभावापेक्षी-दर्शन’ है।
इन्द्रभूति गौतम ने तब तक स्वभाव की आराधना की ही नहीं थी, इसलिये क्षयोपशम का उघाड़ बेहतर होते हुये भी वह आत्महित की दृष्टि से नितान्त-अप्रतिबुद्ध बने हुये थे और जिस क्षण स्वभाव का समर्पण जागा, तो गणधर की योग्यता उनकी सेवा में उपस्थित हो चुकी थी।
तब भी गणधर-पद पर क्यों अटके? सीधे केवली व सिद्ध क्यों नहीं बने? – यह आप आपत्ति करते, तो समझ में आता। उस स्थिति में उनका आत्म-स्वभाव तो तब भी परिपूर्ण ही था, किन्तु उनकी तन्मयता उतनी परिपूर्ण नहीं हो सकी थी, इसीलिये गणधर-पद पर तक ही आसीन हो सके थे।
किन्तु उनकी वह तन्मयता अन्य पूर्वस्थ-साधकों की तुलना में बहुत-बेहतर थी, इसलिये वे तो गणधर बन गये, किन्तु अन्यजन नहीं बन सके।-- यह वस्तुस्भाव को आत्मसात् करने, पुरुषार्थ की प्रबलता एवं क्रमबद्धता की अद्भुत-युति का परिणाम था, जो कैवल्य से न्यून-स्थिति रही तथा अन्य साधकों की तुलना में बेहतर ‘गणधर’ पद की अर्हता उन्हें मिली।
इन्द्रभूति गौतम स्वामी के इस घटनाक्रम से हमें जैनदर्शन और तत्त्वज्ञान के मर्म का उद्घाटन, उसका दृढ-श्रद्धान एवं प्रत्येक परिणति की अनन्त-स्वतंत्रता का अवबोध होना चाहिये था, न कि ऐसी आशंकायें। ये आशंकायें हमें जैन होते हुये भी जिनाभिमत-वस्तु-व्यवस्था की समझ एवं तत्त्वज्ञान की दृष्टि की कमी को प्रकट करती हैं।
कोई बात नहीं, इस प्रकरण के निमित्त से यदि हम जिनाभिमत-वस्तु-व्यवस्था एवं तत्त्वज्ञान के इन रहस्यों को समझ सके एवं निमित्ताधीन-दृष्टि को सुधार सके, तो इसे अप्रतिम-उपलब्धि मानिये। यही समझ हमें व आपको आत्मिक-पुरुषार्थ की न्यूनता दूर करने तथा क्रमबद्ध-पर्याय की दृढ़-निष्ठा जगाने का वह युगान्तरकारी-कार्य करेगी, जो हम अनादिकाल से आज तक नहीं कर सके हैं। परन्तु इसमें कर्तृत्वभाव के बिना सहज-स्वभाव की समझ ही सार्थक होगी-- यह स्मरण रखना चाहिये।
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