डॉ. सुदीप जी दिल्ली के लेख

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श्रावक के इक्कीस गुण

(एक मननीय-लेख)

प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

लज्जावंत दयावंत प्रसंत प्रतीतवंत,
परदोषकौ ढकैया पर-उपगारी है।
सौमदृष्टी गुनग्राही गरिष्ट सबकौं-इष्ट,
शिष्टपक्षी मिष्टवादी दीरघ-विचारी है।।
विशेषग्य रसग्य कृतग्य तग्य धरमग्य,
न दीन न अभिमानी मध्य-विवहारी है।
सहज-विनीत पापक्रियासौं अतीत ऐसौ,
श्रावक पुनीत इकवीस-गुनधारी है।।54।।

इसके अनुसार तो श्रावक कहलाने योग्य वही है, जो

1. उद्दंड न होकर सांसारिक कार्यों के प्रति लज्जावंत तो हो ही, लौकिक-भाषा में उसकी ‘आँख का पानी नहीं मर गया’ होना चाहिये।
2. उसे स्वाभाविकरूप से ही दयालु होना चाहिये, क्रूरता के भाव उसके मन में कदापि नहीं आने चाहिये।
3. वह प्रशान्तचित्त होना चाहिये, न कि जरा सी प्रतिकूलता आते ही व्यग्र हो जाये।
4. वह संवेदनशील हो, ताकि संवेदनाओं को समझ सके व तदनुरूप-आचरण कर सके।
5. दूसरों के दोषों को जानते हुये भी उनसा प्रचार नहीं करे। विचार करें कि यदि हम सब यह गुण अपना लें, तो हमें आपस में बतियाने के लिये सारी मसालेदार-सामग्री ही गायब हो जायेगी और हम आपस में मात्र ‘जय जिनेन्द्र’ या संक्षिप्त-कुशलक्षेम ही पूछ सकेंगे।
6. परोपकारी-प्रवृत्ति का होना भी यहाँ श्रावक के लिये अनिवार्य-गुण बताया गया है, जबकि हममें से कई लोग दूसरों की कमजोरी या दुर्दशा को भाँपकर उसको सुनाकर या कुछ विपरीत करके कष्ट देकर आनन्दित होते हैं। यह आत्मालोचन का विषय है कि ऐसा करके भी हम अपने को ‘श्रावक’ कैसे कहला सकते हैं?
7. सौम्यतापूर्ण-दृष्टि जिसकी हो, अर्थात् दूसरों के दोषों को ग्रहण करने की मानसिकता जिसकी नहीं हो और न ही ऐसे काम-क्रोध आदि के विकार जिसकी नज़रों में हों कि भद्र-महिलायें व बच्चे जिसकी नज़रों से बचकर रहना चाहें।
8. जो दूसरों के गुणों को ही मात्र ग्रहण करता हो, दोषों को नहीं। यदि दोष जानने में आ जायें, तो वह उन्हें ग्रहण ही नहीं करे, बल्कि उनकी उपेक्षा कर दे।
9. जो गम्भीर व्यक्तित्व का धनी हो, ओछी-बातें जिसके मन में तक कभी भी नहीं आतीं हों और न ही संकुचित-सोच से जो कभी किसी के प्रति व्यवहार करता हो। विचार करें कि आज सेठों को गरीबों के प्रति, शास्त्रज्ञों को कम-जानकारों के प्रति, सुन्दर-देहवालों का सामान्यरूपवालों की कुरूपों के प्रति हेयता या तुच्छता की मनोवृत्ति एवं वैसा व्यवहार यदि है, तो इसके अनुसार हम ‘जैन-श्रावक’ कहे जाने योग्य नहीं हैं।
10. आपका व्यवहार सभी को अच्छा प्रतीत हो, अर्थात् हम ऐसा कोई व्यवहार ही नहीं करें कि जिससे किसी को पीड़ा पहुँचे।
11. शिष्टपक्षी यानि जो सभ्य/शिष्ट लोगों/बातों का ही समर्थन करे, कभी भी गलत-बात का समर्थन नहीं करे।
12. मिष्टवादी अर्थात् जो हित-मित-प्रिय-वचन ही बोले। “परवधकार कठोर निंद्य नहिं वचन उचारे” की मर्यादा का पालन करता हो।
13.दीरघ-विचारी अर्थात् अच्छी तरह से आगा-पीछा सोचकर ही जो कार्य करे। हड़बड़ी या अविवेकपूर्ण कार्य कदापि नहीं करे।
14. विशेषज्ञ हो अर्थात् हर कार्य के अच्छे एवं बुरे–दोनों पक्षों को जानता हो और तदनुरूप ही आचरण करता हो।
15. रसज्ञ हो अर्थात् अच्छे-संस्कारों एवं तत्त्वज्ञान की चर्चा में ही जिसे अच्छा लगता हो, बुराई एवं विषय-कषाय की चर्चा में जिसकी रुचि ही नहीं हो।
16.कृतज्ञ हो, दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये गये उपकारों को कभी भी नहीं भुलाये और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखे। नीतिज्ञों का कहना है कि हर पाप का कोई न कोई प्रायश्चित्त होता है, लेकिन कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित्त नहीं है, वह अक्षम्य-अपराध की श्रेणी में आता है।
17. जो तज्ञ हो, अर्थात् जैनकुल के अनुरूप सभी शिष्टाचारों व सदाचारों को जानता हो। विचार करें कि आज के शहरियों के घर में कोई सदाचारी-धार्मिक व्यक्ति आ जाये, तो कई लोगों को तो छानकर पानी देना तक नहीं आता है, वे प्लास्टिक की चाय-छन्नी से छानकर पानी दे देते हैं, तो जलगालन की विधि भला उन्हें कैसे पता होगी? बाकी धर्मचर्या के बारे में भी इसीतरह समझ लें।
18. धर्मज्ञ हो अर्थात् किसी भी स्थिति में जिनधर्म का क्या निर्देश है? – उससे परिचित हो व तदनुरूप ही व्यवहार करता हो।
19.जिसके व्यवहार में न तो अपने से कमजोरों के प्रति अभिमान की भावना हो और न ही अपने से अधिक सम्पन्नों के प्रति दीनता का भाव जगता हो। अनुकूल-प्रतिकूल – दोनों स्थितियों में जो समभावी हो व संतुलित-व्यवहार करता हो।
20. जो सहज ही विनयशील हो, शिष्टाचार का दिखावा जिसे नहीं करना पड़ता हो, कि सामने तो प्रशंसा करे और पीठ पीछे बुराई करे।
21.जो पापाचरण से रहित हो। हम प्रक्षाल के पाठ में भी पढ़ते हैं कि “पापाचरण तज न्हवन करता” अर्थात् पापमय-आचरण करनेवालों (चोरी, कुशील आदि स्थूल-पाप करनेवालों) को तो जिनेन्द्र देव के बिम्ब को स्पर्श करने या उनकी प्रक्षालन-विधि करने तक का अधिकार नहीं है। जबकि मैं प्रत्यक्षदर्शी हूँ कि कुछ लोग मंदिर जी में भी चोरी, कुशील आदि के पाप करते हैं और प्रक्षाल करने में अग्रणी बनते हैं।

इन इक्कीस-गुणों से जो रहित है, या ये इक्कीस-गुण जिसमें पूरे नहीं पाये जाते हैं, वह ‘श्रावक’ संज्ञा का पात्र नहीं है।

हम विचार करें कि इनके परिप्रेक्ष्य में हममें से कितने लोग ‘श्रावक’ कहलाने योग्य हैं?
[ कल दिन में जब मैंने मुनिराज की वंदना के लिये उनके व्यक्तित्व में विद्यमान अनिवार्य गुणों की चर्चा की थी, तो कई लोगों ने मुझे श्रावकों के लिये भी अनिवार्य ऐसे गुणों को स्पष्ट करने का अनुरोध किया था। संयोगवश नाटक-समयसार जी में ही यह पद्य मिला, तो मैंने इसे अर्थ सहित आपके मध्य प्रस्तुत करना आवश्यक समझा। यह भी नाटक-समयसार की दार्शनिक-समीक्षा का एक अंग बना है। और उसकी प्रस्तावना में इसकी भी चर्चा रहेगी। यदि इसकी विस्तार से समीक्षा प्रस्तुत की जाये, तो अविरति-श्रावकों के श्रावकाचार की लघु-पुस्तक बन सकती है, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत उपयोगी रहेगी।

– सुदीप कुमार जैन]

संपर्क दूरभाष : 8750332266

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नवदेवों में आगत जिन-प्रतिमा या जिनबिम्ब के दर्शन आदि की महिमा का विवेचन : कविवर पं. बनारसीदास जी के शब्दों में(मननीय-संक्षिप्त आलेख)
प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
जिन-प्रतिमा-महिमा > ‘नाटक-समयसार’ ग्रन्थ के ‘गुणस्थान-अधिकार’ के प्रारम्भ में वर्णित जिन-प्रतिमा की महिमा को देखिये–

"जिन-प्रतिमा जिन-सारिखी,
नमै बनारसि ताहि।
जिन-प्रतिमा जन-दोष निकंदै।
सीस-नमाइ बनारसि बंदैं।।4।।
जो जिन-प्रतिमा को नवदेवों में कल्पित बताकर उनकी पूज्यता सन्दिग्ध बता रहे हैं, उन्हें कविवर पं. बनारसीदास जी के इस विषय में स्पष्ट-मन्तव्य को (जो कि जिनाम्नाय का ही मन्तव्य है) असन्दिग्धरूप से समझ लेना चाहिये कि जिनाम्नाय में जिन-प्रतिमा या जिनबिम्ब की पूज्यता एवं आध्यात्मिक-प्रभाव किसतरह माना गया है। और इसका विरोध जिनशासन का विरोध है, तथा देव के अवर्णवाद का ही एक-रूप है। क्योंकि निमित्त-नैमित्तिक रूप में जिनप्रतिमा को संसारीजनों के परिणामों में संभावित या प्रवर्तमान-दोषों का निवारक बताया गया है।

जिनबिम्ब के मर्मज्ञों की पहिचान
‘नाटक-समयसार’ में ही यह छंद देखिये–

"जाके उर-अंतर सुद्रिष्टि की लहर लसी,
विनसी-मिथ्यात मोहनिद्राकी ममारखी।
सैली जिनशासन की फैली जाके घट भयौ,
गरबकौ-त्यागी षट-दरब कौ पारखी।।
आगमकै अच्छर परे हैं जाके श्रवनमैं,
हिरदै-भंडार मैं समानी वानी-आरखी।
कहत बनारसि अलप-भवथिति जाकी,
सोई जिन-प्रतिमा प्रवांनै जिन-सारिखी।।3।।

उपर्युक्त-विषय को ही और अधिक बहुआयामी-तरीके से स्पष्ट करते हुये कविवर पं. बनारसीदास जी इस पद्य में दो-टूक शब्दों में कहते हैं कि –

1.जिसके हृदय में सम्यग्दर्शन की प्रकटता एवं मिथ्यात्व का विनाश हुआ है,
2. जिनशासन की शैली जिसे भलीभाँति समझ में आयी है,
3. जिसके हृदय से दुरभिमान-रूपी अंधकार नष्ट हुआ है,
4. छह-द्रव्यों की परख अर्थात् जिनोपदिष्ट-वस्तु- व्यवस्था जिसे अच्छी तरह से समझ में आ गयी है,
5. जिसके कानों में जिनागम की अनुश्रुति हुई है,
6. जिसके हृदय में जिनेन्द्र देव की वाणी दर्पण की तरह सुस्पष्ट हुई है अर्थात् जिनवचनों में जिसे तनिक भी सन्देह नहीं है,
7. जिसकी संसार-सागर में स्थिति अत्यन्त अल्प रह गयी है अर्थात् जो आसन्न-भव्य है;
वही जीव जिन-प्रतिमा को साक्षात् जिनेन्द्र देव के समान प्रमाणित करता है।

यदि जिसे जिनबिम्ब की पूज्यता में और आत्महित में उनकी उपादेयता में तनिक भी सन्देह है अथवा ऐसा प्रतिपादन वह किसी भी लौकिक या निजी-स्वार्थवश करता है, तो उसका सीधा-अभिप्राय यही लेना चाहिये कि उसने उपर्युक्त सातों बातों को अभी तक आत्मसात् नहीं किया है, अर्थात् वह जीव स्पष्टरूप से मिथ्यादृष्टि व दीर्घ-संसारी है।

[यह पद्य एवं इसका यह विवेचन भी नाटक-समयसार जी की लिखी जा रही प्रस्तावना का ही अंगभूत है। आप सुधीजनों के रसास्वादन के लिये यहाँ अलग से प्रेषित किया जा रहा है – सुदीप कुमार जैन ]

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मुनिवरों में क्या देखकर उनकी वंदना की जानी चाहिये?
प्रस्तुति : प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
कविवर पं. बनारसीदास जी द्वारा प्रस्तुत 'साधु-स्तुति’

"ग्यान को उजागर, सहज-सुखसागर,
सुगुन-रत्नागर, विराग-रस भरयौ है।
सरन की रीति हरै, मरनकौ न भै करे ,
करनसौं पीठि दे, चरन अनुसरयौ है।।
धरम को मंडन, भरम को विहंडन है ,
परम-नरम ह्वै कै, करम सौ लरयौ है।
ऐसौ मुनिराज भुव-लोक में विराजमान ,
निरखि बनारसि नमस्कार करयौ है।।
–( नाटक-समयसार, उत्थानिका, पद्य 5)

इस एक ही पद्य में जिनाम्नाय में मुनिधर्म के स्वरूप का सारा रहस्य समाहित कर दिया है और सच्चे मुनिराजों की बाह्य-पहिचान भी सुतरां स्पष्ट कर दी है। कौन-से लक्षण देखकर मुनिराज को नमस्कार/वंदना करनी चाहिये-- यह असन्दिग्धरूप में यहाँ स्पष्ट कर दिया है।

आज जो मात्र बाह्य-नग्नमुद्रा देखकर ही वंदना करने का जोर आध्यात्मिक-विद्वज्जगत् भी देने लगा है, उन्हें तो कविवर पं. बनारसीदास जी कृत यह पद्य मानो पथ-प्रदर्शक की भाँति दिशाबोध कर रहा है।

इसके अनुसार जिनका

1. असन्दिग्ध-तत्त्वज्ञान स्पष्ट-परिलक्षित हो रहा हो,

2. जिनके जीवन में आनन्दमयता का उत्कर्ष साफ दिखायी देता हो अर्थात् दुःखों की झलक तक जिनके व्यक्तित्व में नहीं हो,

3. जिनशासन में मुनिधर्म के श्रेष्ठ-गुणों में से कोई एकाध नहीं, बल्कि अपार-गुणसमूह जिनके व्यक्तित्व में विद्यमान हो,

4. वैराग्य के रस में जिनका अन्तर्बाह्य-व्यक्तित्व रचा-बसा हो अर्थात् जिन्हें वैराग्य दिखाना नहीं पड़ता हो, बल्कि अनाड़ी को भी जिनके जीवन में सच्चा-वैराग्य बिना कहे ही समझ में आ सके,

5. जो अपने स्वरूप के अलावा अन्य किसी की भी शरण ग्रहण करने की मानसिकता तक कभी भी नहीं विचार तक में लाते हों अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में ही परम-तृप्त हों,

6. मरण का भय जिनके जीवन में कहीं दूर-दूर तक भी नहीं दिखायी देता हो (कोरोना जैसे वायरस का भी डर न तो जिन्हें सताये और न ही उससे बचने के टोटके जो बतायें),

7. इन्द्रियों की माँगों (गर्मी में ए. सी. व सर्दियों में हीटर, स्वादिष्ट रसों व पकवानों का आहार, विलासितापूर्ण भवन आदि) का भाव तक जिनके नहीं जागता हो, इन्द्रिय-विषयों से दो अत्यन्त-विरक्त हों,

8. जिनवाणी में निर्दिष्ट मुनिधर्म का बिना किसी बहाने के (कि ‘पंचमकाल है’ या ‘जैसे श्रावक, वैसे मुनि’ अथवा 'हमसे तो अच्छे ही हैं) निर्दोषरीति से शत-प्रतिशत पालन करते हों,

9. जिनकी चर्या एवं वचनों से धर्म सुशोभित होता हो,

10. जिन्हें देखने के बाद धर्म, धर्मात्मा एवं आत्महित के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाते हों,

11. जिनकी सम्पूर्ण-चर्या अत्यन्त अहिंसक एवं विनम्र हो (अर्थात् न तो ईर्या समिति के विपरीत चलें, न ही कठोर-वचन बोलें, न ही जोर-जोर से चीखकर भाषण दें, न ही किसी का अपमान करें और न ही अपने स्वरूप की विराधना करें),

12. जो कर्मों की निर्जरा करने में ही सदा तत्पर रहते हों (अर्थात् शेष विश्व में किसी भी व्यक्ति या वस्तु/संस्था/संगठन/सम्प्रदाय आदि से जिनके मन में स्वप्न में भी द्वेषभाव नहीं हो)

– ऐसे मुनिराज यदि इस लोक में कहीं भी मिल जायें, तो ही बनारसीदास जी कहते हैं कि उन्हें नमस्कार/वंदना करना चाहिये।

– कविवर पं. बनारसीदास जी का स्पष्ट-दिशानिर्देश हम सबके लिये इस विषय में प्रकाश-स्तम्भ (लाइट-हाउस) की तरह पथ-प्रदर्शन कर रहा है।

इसे पढ़ने के बाद भी जो बहानेबाजी करें और समाज को दिग्भ्रमित करें, तो बिना किसी आशंका के उनके कथन के असली-अभिप्राय को समझा जा सकता है।

[नाटक-समयसार जी के प्रकाश्य-संस्करण की प्रस्तावना लिखते समय दार्शनिक-समीक्षा के क्रम में यह पद्य आया, तो इसकी समीक्षा से आप सभी सुधीजनों को भी लाभान्वित करने की दृष्टि से इसे आपको प्रेषित कर रहा हूँ। इस प्रस्तावना में ऐसे कई बिन्दुओं की मीमांसा व समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है, जो आपको इस ग्रन्थ के प्रकाशित होने पर ही पढ़ने को मिल सकेंगीं।-- सुदीप कुमार जैन]

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वीतरागी जिनधर्म में रागी-देवताओं की उपासना-पद्धति?

(अनुकरणीय बड़ा-आलेख)

:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आजकल एक बड़ा-फैशन बनता जा रहा है कि “जिनेन्द्र देव की उपासना, पूजा, स्तुतियों में यदि कर्त्तावादी-प्ररूपण हैं, तो उन्हें स्वीकार्य माना जाये और उन पर आपत्ति नहीं प्रकट की जाये।” इसीतरह “प्रथमानुयोग एवं चरणानुयोग के ग्रन्थों में जो निमित्ताधीन-कथन हैं, उन पर भी कोई आपत्ति या स्पष्टीकरण दिये बिना उन्हें स्वीकार किया जाये, क्योंकि वे तो जिनवाणी में ही प्रतिपादित हैं।”
तो सबसे पहले यही जान लिया जाये कि जिनधर्म में आराध्य/पूज्य कौन हैं, जिनकी आराधना/भक्ति/पूजा की जाये?
सीधा व सरल उत्तर है कि जिनधर्म में एकमात्र वीतरागी जिनेन्द्र देव की, वीतरागता की पोषक जिनवाणी की और वीतरागता के मार्ग पर अग्रसर परम-वैराग्यरस के धनी भावलिंगी नग्न-दिगम्बर-जैन मुनिवरों की ही आराधना/भक्ति/पूजा की जाती है।

तो मेरा सरल प्रश्न है कि क्या सभी जैन इस तथ्य को जानते व मानते हैं? सामान्यतः उत्तर यही आयेगा कि “हाँ, जानते भी हैं और मानते भी हैं।”

यदि यह सत्य है, तो **वीतरागी देव, वीतरागता की पोषक जिनवाणी और वीतरागता के मार्ग पर चलनेवाले भावलिंगी-निर्ग्रन्थ-साधुओं की आराधना/पूजा/भक्ति करनेवाले उनके प्रति कर्त्तावादी-दृष्टिकोण कैसे रख सकते हैं? वे यह कैसे कह सकते हैं कि “तुम ही स्वामी हाथ बढ़ाकर, तारो तो तिर जायें”? वे यह कैसे कह सकते हैं कि “हे प्रभो! मेरे दुःख दूर करो। मेरे सब संकट मेट दो। मेरी हारी-बीमारी दूर कर दो। मुझे मुकदमे में जिता दो। मेरे शत्रुओं का नाश कर दो”… इत्यादि। क्योंकि वीतरागी कभी किसी का भला या बुरा कर ही नहीं सकते हैं, कारण कि भला या बुरा करने की भावना राग-द्वेष की परिणति है। राग-द्वेष के बिना कोई भी किसी का भला-बुरा करने की सोच भी नहीं सकता है, करना तो बहुत दूर की बात है।

अब तय करना आपका काम है कि आप रागी-द्वेषी की पूजा-अर्चना करने जाते हैं या वीतरागी की? कन्फर्म करिये, तब बोलिये। व्यर्थ की बहानेबाजी मत कीजिये।

इस विषय में आदरणीय बाबूजी ‘युगल’ जी की ये पंक्तियाँ मननीय हैं–

"माना कि तुम झट बेटा देते हो,
और डाकिनी-भूत तुरत ही हर लेते हो।
कभी-कभी तो तुमको भी कौतूहल आता,
सहज फेर देते सहसा ही जज का माथा।।
इसीलिये आवश्यकता भगवान् तुम्हारी,
ब्लैक-मार्केटिंग में रखते लाज हमारी।
और नहीं तो हमको तुमसे मतलब ही क्या?
दुनियाँ में बस इसीलिये भगवान् बच गया।।
तुम्हें जानकर जग तुमसे अनजान रह गया।। 1।।
करता है उपहास राग यों वीतराग से,
गाली सुनता वीतराग रे! अधम-राग से।… "
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि वीतरागी से अपने विषय-भोगों व सांसारिक-आकांक्षाओं की पूर्ति की अपेक्षा करना उनकी भक्ति नहीं है, बल्कि उनका अपमान करना है, गाली देने के समान है।

अब आप हृदय पर हाथ रखकर विचार कीजिये कि आप वीतरागी की भक्ति कर रहे हैं या अपमान कर रहे हैं? आप उनकी विनय कर रहे हैं या विनय-मिथ्यात्व बाँध रहे हैं।

तो भगवान् से अच्छी चीजें तो माँग सकते हैं न? मोक्ष माँगें, सम्यग्दर्शन माँगें, आत्महित माँगें–इनमें तो आपको कोई आपत्ति नहीं है न?

यह भी एकतरह का मजाक ही है और कुछ नहीं। जैसे किसी मौनव्रती से सांसारिक चर्चा करने की जगह प्रवचन करने की अपेक्षा की जाये। जब मौनव्रती है, तो कुछ भी कैसे बोल सकता है? इसीप्रकार जब वीतरागी हैं, तो किसी का भी कुछ भी भला या बुरा कैसे कर सकते हैं?-- क्या इतना भी विवेक आपको नहीं है, जो ऐसे बहाने करके भगवान् की वीतरागता का उपहास उड़ाना चाहते हो?
कुछ लोग कहते हैं कि “व्यवहारनय से ऐसे कथनों को उचित मानने में क्या हानि है?” उन्हें व्यवहारनय का स्वरूप ही नहीं पता है। व्यवहारनय निश्चयनय या वस्तुस्थिति का विरोध नहीं करता है। वह तो निश्चयनय के विषयभूत-कार्य के निमित्त व सहचारी-कारणों को ही मोक्ष का कारण कहता है।

जैसे वज्रवृषभनाराच संहनन, तीर्थंकर-नामकर्म-प्रकृति, कर्मों की निर्जरा आदि निमित्तभूत व सहचारी-कारणों को कार्य का नियामक कहना तो व्यवहारनय का कथन कहा जा सकता है ; परन्तु किसी के भाई होने या किसी नगर में जन्मने, किसी बाहरी-घटनाक्रम को निमित्तपने या सहचारीपने के अभाव में व्यवहारनय से भी मोक्षरूप-कार्य का नियामक-कारण नहीं कहा जा सकता है।

इसीप्रकार वीतरागी की विनय में लौकिक-शिष्टाचाररूप प्रासुक-अष्टद्रव्यों से पूजन, वचनात्मक-गुणानुवाद करना, वंदन करना, प्रदक्षिणा देना, साष्टांग या पंचांग-नमस्कार करना आदि बाहरी क्रियाओं को तो व्यवहारनय से वीतरागी जिनेन्द्र देव की विनय/भक्ति आदि कहा जा सकता है और निष्कामभाव से मात्र आदर्श के गुणानुवाद रूप में की गयी इन क्रियाओं को निमित्त व सहचारी होने से व्यवहार-भक्ति/पूजा/विनय आदि के रूप में लिया गया है। किन्तु जो बातें वीतरागी जिनेन्द्र देव के स्वरूप में ही शामिल नहीं हैं और जो जिनेन्द्र देव के द्वारा प्रतिपादित वस्तु-स्वरूप से ही विरुद्ध हैं (जैसे कि कर्तावादी मानकर उन्हें हमारे भले-बुरे का कर्त्ता मानना व अन्य गृहीत-मिथ्यात्व के रूप में वर्णित मान्यताओं और कार्यों को व्यवहार-जिनेन्द्र-भक्ति मानना असंगत है), उन्हें व्यवहार ले जिनेन्द्र-भक्ति आदि रूप मानना व्यवहार नहीं, मिथ्यात्व ही है।
जो प्राचीन कवियों ने ऐसी बातें पूजनों, पाठों, भक्तियों में लिखीं भी हैं, वे उस युग में मुगल-दासता और फिर अंग्रेजों की गुलामी से दमित-मानसिकता की प्रतीक हैं, न कि जैनदर्शन की मान्यता के अनुरूप हैं।
आचार्य कुन्दकुन्द देव ने ‘समयसार’ जैसे कालजयी-ग्रन्थ में व्यवहार से जिनेन्द्र देव के देहाश्रित-गुणों/विशेषताओं को लक्षित करके लिखी गयी स्तुति आदि को व्यवहारनय के कथन के रूप में बताया है ; क्योंकि उनके उस भव में संयोगस्थ-देह में वह वर्णादिक-वैशिष्ट्य विद्यमान तो हैं।

किन्तु पर का कर्त्तापना तो जिनेन्द्र देव के तीनकाल में कभी भी किसी भी रूप में संभव ही नहीं है। क्योंकि यह तो वस्तु-स्वरूप में ही कदापि संभव नहीं है। इसकी जन्मभूमि मात्र मिथ्यात्व और अज्ञान से जन्मी वासनायें ही हैं। इसलिये जितनी कर्त्तावादी-बातें हैं, वे जिनधर्म की परिधि से ही बाहर होने से उन्हें व्यवहारनय का प्रतिपादन कहकर भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।-- यह अकाट्य एवं ध्रुव-सत्य है।



दूसरी-बात कही गयी कि प्रथमानुयोग व चरणानुयोग के ग्रन्थों में निमित्त-नैमित्तिक की प्रधानता से कथन किये गये हैं, तो पहले निमित्त का स्वरूप तो निर्धारित कर लीजिये कि जिनाम्नाय में ‘निमित्त’ संज्ञा किसकी है और क्या निमित्त की संज्ञा ‘मात्र कहने के लिये’ एक ‘आरोपित-संज्ञा’ है या वह वास्तव में कुछ कर्त्ता भी है? कार्य उपादान में स्वयं की योग्यता से निष्पन्न होता है। जो बाहर में अनुकूल कही जाने योग्य सामग्री सहज-उपलब्ध होती है, उस पर ‘निमित्त’ होने का आरोप आ जाता है। यह संसारी छद्मस्थों द्वारा सीमित-ज्ञान के परिणामस्वरूप आरोपित की गयी संज्ञा है। जिनशासन में कोई भी वस्तु अपने आप में ‘निमित्त’ के रूप में संज्ञित नहीं है।

यह तो सीमित-ज्ञान से होने वाले आभास से किया गया प्रयोग है, वस्तु-स्वरूप नहीं है।
इसीलिये आज तक किसी भी केवली के केवलज्ञान में कोई भी वस्तु ‘निमित्त’ के रूप में नहीं देखी गयी है। केवली यह तो स्पष्ट जानते हैं कि संसारीजन अपने अनिर्मल/अविशद-परोक्षभूत ज्ञान से उत्पन्न आभासों में परवस्तुओं का निमित्तपना मानते हैं, किन्तु केवलज्ञान किसी भी वस्तु को किसी अन्य वस्तु के कार्य के निमित्तरूप में वस्तुतः नहीं जानता देखता है ; क्योंकि निमित्तपना वास्तव में वस्तु और उसके कार्य को स्वीकार्य ही नहीं है। उसमें को प्रत्येक वस्तु के एक-एक कार्य/परिणति की अनन्त-स्वाधीनता ही झलकती है।
’मोक्षमार्ग प्रकाशक’ नामक अनुपम-ग्रन्थ में इसीलिये जब पंडित प्रवर टोडरमल जी ने चारों अनुयोगों की कथन-पद्धतियों का मर्म उद्घाटित किया गया, तो प्रथमानुयोग और चरणानुयोग के ग्रन्थों की कथन-पद्धति में निमित्त-नैमित्तिक दृष्टि की प्रधानता कही है। जो कि पूर्णतः उपचार-कथन है, वास्तविक नहीं है। इसतरह के प्रतिपादनों को पंडित टोडरमल जी ने वहाँ कहीं भी उपादेय नहीं बताया है।
विचार कीजिये कि पाँचों महाव्रतों के नियम-उपनियम सीखकर भी किसी का छठवाँ-सातवाँ गुणस्थानरूप सच्ची-मुनिदशा होना संभव नहीं है, क्योंकि जो सीखते हैं, वह बाहरी क्रियारूप है, उससे सच्ची मुनिदशा का कोई निर्धारण संभव ही नहीं है। किन्तु जो आत्मस्वरूप में स्थिरता की वृद्धि करके छठवाँ-सातवाँ गुणस्थान प्राप्त करते हैं, उस समय एक भी महाव्रत का बाहरी-आचरण नहीं करते हुये भी वे सच्ची-मुनिदशा को ही प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट है कि जो व्यवहारनय की प्रधानता से चरणानुयोग के कथन हैं, वे वास्तविकता के नियामक नहीं हैं।

जबकि चरणानुयोग में ही जो निश्चयनय के अनुसार एक आत्मानुभूति है, उसमें सारा का सारा चरणानुयोग चरितार्थ हो जाता है। जबकि एड़ी-चोटी का जोर लगाकर किया गया बाह्याचरण कभी भी उसका नियामक नहीं बन सकता है। उसकी तो व्यवहार संज्ञा भी तभी हो सकती है, जब निश्चयरूप मुनिधर्म/चारित्र घटित हो रहा हो। यदि निश्चय-चारित्ररूप आत्मानुभूति नहीं है, तो कोरे बाह्याचरण की तो व्यवहार और निमित्त संज्ञा भी नहीं है। अतः किसने कह दिया कि चरणानुयोग में निमित्तपने की प्रधानता है?

रही बात प्रथमानुयोग की, तो उपादान में कार्य प्रतिफलित होने पर ही निमित्तों का उल्लेख यह अनुयोग करता है, न कि बिना उपादान में कार्य के प्रतिफलन के। महावीर के जीव ने मरीच के भव में प्रभु आदिनाथ के माध्यम से जान भले ही लिया था कि वह वर्तमान चौबीसी का चौबीसवाँ तीर्थंकर होगा; किन्तु उस तीर्थंकरत्व के प्रतिफलित हुये बिना वह प्रथमानुयोग का पात्र नहीं बना था। हम भविष्य काल के तीर्थंकरों की पूजा करते हैं, किन्तु उनके भविष्य के वीतरागी स्वरूप की ही करते हैं, न कि वर्तमान की उनकी पर्याय की। तब प्रथमानुयोग भी निमित्त-प्रधान कैसे हुआ? वह तो कार्य के बिना निमित्त संज्ञा तक किसी को नहीं देता। यदि केवली के वचनानुसार कार्य के पहले ऐसी कोई संज्ञा प्रयुक्त भी होती है, तो वह मात्र उस निश्चय-कार्य के घटित होने की स्थिति की विवक्षा में, न कि पहले से उसे निमित्त मानकर उसका कर्त्तापना घोषित करने के लिये।

यदि तीर्थंकर नेमिनाथ जी के द्वारा द्वारिका-दहन के निमित्त रूप में यादव-कुमारों एवं द्वीपायन-मुनि का निमित्त रूप में उल्लेख भी प्रथमानुयोग बतलाता है, तो उसमें वास्तविक-स्थिति मात्र इतनी ही है कि उस समय ऐसा संयोग होगा, न कि ये द्वारका-दहन के ‘कारक’ होंगे।

हमने कर्त्तावादी होकर प्रथमानुयोग के ग्रन्थों पर यह आरोप अपनी ओर से जड़े हैं, न कि जिनेन्द्र देव ने ऐसा कहीं कहा है। और इस तरह के निमित्तपरक-कथनों को जानकर जिन्होंने निमित्तभूत-सामग्रियों को हटा दिया था (शराब आदि को), तथा अपने को मात्र निमित्तरूप न मानकर कर्त्ता माननेवाला द्वीपायन-मुनि भी द्वारिका से बहुत दूर चला गया था, तो भी क्या निमित्तरूप कहे गये ये सब अपनी योजनाओं में सफल हो सके? द्वारिका-दहन तो तब भी हुआ न? रोकने की इनकी लाख कोशिशों के बाद भी हुआ। तो प्रथमानुयोग के कथनों में निमित्त कर्त्ता कैसे बन गया? जैसी की आपत्ति आज के विद्वद्गण प्रस्तुत कर रहे हैं।
मैं इन आपत्तियों को प्रस्तुत करनेवाले विद्वानों की ऐसे कथनों के पीछे निहित व्यावसायिक-विवशता को समझता हूँ। क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि वे भी जिनवाणी में कहीं भी निमित्त को कर्त्ता बताने वाले कथन नहीं निकाल सकते हैं। जो होगा, वह अज्ञानियों की मान्यतारूप ही होगा, सम्यग्ज्ञानी-जीव के कथन व आचरणरूप कदापि संभव नहीं है। और जब इन ग्रन्थों में वह बात अज्ञानियों की मानसिकता के रूप में वर्णित है, तो उसे इन अनुयोगों का या केवली/आचार्यों का कथन क्यों कहते हो?

एक जिज्ञासा यह भी प्रस्तुत की गयी कि “आयुर्वेद एवं प्राकृतिक-चिकित्सा में एक ‘स्वकल्प-भावना’ नामक चिकित्सा-विधि है। जिसके अनुसार भगवान की भक्ति ,नाम जाप, पूजन विधान, ध्यान आदि से रोगी शीघ्र निरोग होता है। अतः हर समय हर क्रिया को मिथ्यात्व-पोषक समझना कहाँ तक उचित है? विचार करें।”
तो इस विषय में मेरी यह जिज्ञासा है कि आयुर्वेद या प्राकृतिक-चिकित्सा की यह विधि दैहिक-उपचार के लिये बतायी गयी है, या आत्मिक-उपचार के लिये? यदि दैहिक-उपचार तक इनकी दृष्टि सीमित है और आत्मिक-उपचार की दृष्टि इन्हें प्राप्त ही नहीं है, तो मेरा कथन देह-दृष्टिवालों के लिये तो था ही नहीं। वह तो आत्मिक-दृष्टि में उत्पन्न विकृतियों के निवारणार्थ था। अतः आपकी यह आपत्ति मेरे प्रतिपादन पर लागू ही नहीं होती है।

साथ ही मेरा यह अनुरोध है कि कृपया यह स्पष्ट करें कि जिसमें से यह क्रिया का उल्लेख किया गया है, वह आयुर्वेद एवं प्राकृतिक-चिकित्सा का ग्रन्थ क्या जिनवाणी के अंगभूत है? यदि नहीं, तो उसके अनुसार जो प्रतिपादन है, वह जैनशासन के अनुरूप कैसे माना जा सकता है?

द्वादशांगी-श्रुत में ‘प्राणावाय’ नामक प्रकरण में मुनियों के लिये शारीरिक स्वास्थ्य-संबंधी जानकारी के लिये कई सूचनायें दीं गयीं हैं, जिन्हें जानकर मुनिराज अपने स्वास्थ्य एवं परिस्थितियों के अनुकूल भोजन ग्रहण कर लेते हैं, और उनका उद्दिष्ट-त्याग का नियम भी नहीं टूटता है तथा श्रावक के यहाँ जो भी आहार बना होता है, उसीमें से पथ्यरूप-पदार्थों का ग्रहण करके मुनिराज शारीरिक विषमता के बिना अपनी धर्मसाधना बिना किसी विघ्नबाधा के कर सकते हैं। यह मात्र मुनिधर्म के लिये होता है और उन्हीं की मर्यादा के अनुसार ही इसमें जानकारी होती है।

बाद में आचार्य समन्तभद्र स्वामी, आचार्य पूज्यपाद देवनन्दि, आचार्य उग्रादित्य आदि ने सामान्य-श्रावकों के लिये भी आरोग्य-परक मार्गदर्शन-वाले ग्रन्थ लिखे। इनमें से प्रथम दोनों आचार्यों के ग्रन्थ अनुपलब्ध हैं, मात्र आचार्य उग्रादित्य का ग्रन्थ ही उपलब्ध है। परन्तु यह भी कोई आयुर्वेद का ग्रन्थ नहीं है, हाँ तत्संबंधित कुछ सामग्री इसमें अवश्य है। प्राकृतिक-चिकित्सा के नाम पर कोई बाहरी-प्रक्रिया जिनवाणी में नहीं बतायी गयी है। हाँ, जो सामयिक, प्रतिक्रमण व आलोचना जैसी आध्यात्मिक-प्रक्रियायें जिनाम्नाय में नित्यकर्म के रूप में प्रचलित हैं, वे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को समुन्नत बनानेवाली अत्यन्त वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक प्रक्रियायें हैं। किन्तु वे तथाकथित आधुनिक प्राकृतिक-चिकित्सा के अन्तर्गत नहीं आ सकतीं हैं। और इनमें भी गृहीत-मिथ्यात्व की शैली में कहीं कुछ भी नहीं होता है। भक्तियाँ आदि इनके अंग हैं, किन्तु वे आधुनिक-कल्पनाओं से परे अत्यन्त आध्यात्मिक-भावभूमि की भूमिकायें हैं, जिनमें कर्तावाद एवं याचनाविधि को कोई स्थान नहीं होता है।

इनके अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक-अन्धविश्वास को बढ़ानेवाली कोई भी बात इसमें नहीं की गयी है और न ही जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना के निमित्त से स्वास्थ्य का इलाज बताकर इसमें कहीं भी गृहीत-मिथ्यात्व का पोषण है। जैनाचार्य ऐसा कर ही नहीं सकते हैं। और जो करें, वे जैनाचार्य नहीं हो सकते हैं।

तथा निष्कामभाव से की गयी जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि से पुण्यबंध हो और उसका उदय होने पर पापकर्मोदय से हुये रोगादि का निवारण हो-- इस पर तो मैंने कहीं भी कोई आपत्ति नहीं जतायी गयी है।

किन्तु जिनेन्द्र देव की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि को रोगादि को ठीक करने की वासना के साथ याची बनकर करना – इसे गृहीत-मिथ्यात्व जैन-दार्शनिक सिद्धांत के अन्तर्गत कहा गया है। यह अकाट्य एवं शाश्वत-सत्य है।
तथा इस तथ्य का आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा के किसी प्रकल्प से क्या संबंध है? जो इस सैद्धान्तिक-प्ररूपण को इससे प्रश्नचिह्नित किया गया है?
बात जिनवाणी के सिद्धांत के आधार पर प्रस्तुत की गयी है, तो उसका यदि कोई अन्यपक्ष के रूप में प्रस्तुतीकरण हो, तो वह जिनवाणी के सिद्धान्तों के आधार पर ही किया जाये, न कि अन्य किसी लौकिक-पद्धति के आधार पर भ्रामक-स्थिति उत्पन्न की जाये।
मैं 100% दृढ़ता के साथ पुनः यही कहूँगा कि जिनाम्नाय में वीतरागी देव-गुरु-धर्म की पूजा-अर्चना, स्तुति-पाठ आदि क्रियायें यदि किसी भी तरह की लौकिक-वासना/कामना आदि के रूप में की जातीं हैं, तो वह एकमात्र गृहीत-मिथ्यात्व की ही रूप हैं, भक्ति या विनय नहीं।

ज्ञातव्य है कि ‘विनय’ नाम का एक मिथ्यात्व-भेद भी है। इसके अन्तर्गत वीतरागी जिनेन्द्र देव की स्तुति आदि के बदले लौकिक-कामनायें की जातीं हैं, अतः इसे ‘विनय-मिथ्यात्व’ कहा गया है।
केवल विरोध के लिये कुछ भी विषयान्तरित-प्रमाण के रूप में कहना, यह उचित नहीं है। और गृहीत-मिथ्यात्व के रूप में जो कुछ जिनवाणी में स्पष्ट प्रतिपादित है, उसका विरोध करना या घुमा-फिराकर उसतरह की भावना का समर्थन करना अपनेआप में गृहीत-मिथ्यात्व का समर्थन एवं जिनशासन का विरोध करना है।
निष्कर्ष :– वीतरागी जिनाम्नाय में एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्त्ता-हर्त्ता नहीं है। हम वीतरागी जिनेन्द्र देव की स्तुति/भक्ति/विनय/पूजा-पाठ आदि जो भी करते हैं, वह तभी सार्थक है, जब उसे निष्कामभाव से मात्र गुणानुवाद के रूप में किया जाये, न कि याचक बनकर और भगवान् को रागी-द्वेषी और कर्त्ता मानकर। अन्यथा हमारी सारी स्तुति/भक्ति/विनय/पूजा-पाठ आदि गृहीत-मिथ्यात्व का ही पोषण करेगी, न कि मोक्षमार्ग की पूर्वभूमिका बन सकेंगीं।

(यह आलेख कुछ ज्यादा लंबा तो हो गया है, इसीलिये मैंने इसे बीच-बीच में दो जगह वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। परन्तु पूरी बात न कहने का दुष्परिणाम यह होता है कि लोग पूरी बात को समझने का धैर्य रखे बिना अनेकों भ्रामक बातें उपस्थित करते हैं। इसीलिये वर्ण्य-विषय को एकसाथ ही दिया है। कृपया धैर्य से पढ़ें।)

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नवीनतम-अनुसंधान : लौहगढ़ का शिलालेख
(सूचनात्मक-टिप्पणी)
:writing_hand:t2: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

महाराष्ट्र प्रान्त के पुणे-सम्भाग में दुर्गम-पहाड़ियों के बीच लगभग ढाई हजार (2500) वर्ष प्राचीन एक ऐतिहासिक किला है, जिसे ‘लौहगढ़-किला’ के नाम से सभी जानते हैं। यह किला छत्रपति शिवाजी महाराज के महत्त्वपूर्ण-किलों में गिने जाने के कारण ज्यादातर इतिहासविद् व गाइड्स इसे “छत्रपति शिवाजी महाराज का किला” कहकर ही परिचय देते हैं। जबकि वास्तव में अब जाकर ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ इस किले के वास्तविक इतिहास के बारे में सचेष्ट हुआ है कि यह किला वास्तव में किसने बनवाया था और इसका यथार्थ-परिचय क्या है? अभी इस विषय में अनुसंधान चल रहा है और व्यापक-अध्ययन के बाद प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर ही यह निर्णय किया जा सकेगा कि यह किला व यह शिलालेख किसने बनवाया था?

मेरे अक्तूबर 2019 माह में पुणे-प्रवास के दौरान जब मैं ‘कुम्भोज-बाहुबलि’ का तीर्थयात्रा के उपरान्त’ महाबलेश्वर’ नामक पर्वतीय-पर्यटक-स्थल पर गया, जो कि महाराष्ट्र का सघन-वनों के बीच में स्थित प्रसिद्ध पर्यटन-केन्द्र है। यहाँ पर एक ऊँचे पर्वत-शिखर से कुछ गाइड दूरबीनों द्वारा दुर्गम-पहाड़ियों में स्थित छत्रपति महाराज शिवाजी के कुछ किलों (फोर्ट्स) को दिखाते हैं, उन्हीं में वे लौहगढ़ के इस किले को भी दिखाते हैं। मैंने जब इस किले को देखा, तो स्थापत्य की दृष्टि से मुझे यह अन्य सभी किलों से बहुत प्राचीन एवं अलग हटकर प्रतीत हुआ। बहुत दूर से देख रहा था, किन्तु पुरातात्त्विक-स्थापत्य में बहुत पहले से ही अभिरुचि व कुछ अध्ययन होने के कारण मुझे इसकी महत्ता का अवबोध हो गया था। इसीकारण मेरे मन में इसके प्रति जिज्ञासा-विशेष उत्पन्न हुई। मुझे लगा कि इसके विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी हासिल करनी चाहिये।
तभी लगभग एक सप्ताह के बाद दिल्ली वापस लौटने पर मेरे एक विद्वान्-मित्र ने मुझे एक अखबार की कटिंग भेजी और कहा कि मैं इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी हासिल करूँ। वह कटिंग यद्यपि मराठी-अख़बार की थी, किन्तु मराठी का सामान्य ज्ञान होने से मुझे समझने में कोई असुविधा नहीं हुई। उसकी एक सूचना जानकर मैं रोमांचित हो गया, क्योंकि उसमें यह संकेत था कि इसी ‘लौहगढ़’ के किले में एक अतिदुर्गम-स्थान पर एक अतिप्राचीन, ईसापूर्वयुगीन-शिलालेख मिला है, जिसमें ऐसे संकेत निहित हैं कि यह एक जिनधर्मानुयायी के द्वारा लिखवाया गया शिलालेख है।
मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ चुकी थी, अतः मैंने महाराष्ट्र के पुरातत्त्व-विभाग के अपने मित्रों एवं पुणे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर्स से निरन्तर संपर्क साधा, तब मुझे इस शिलालेख के बारे में कुछ और जानकारियाँ मिलीं। अभी उन सूचनाओं के पोषक-तथ्यों का अनुसंधान कार्य चल रहा है और पुरातत्त्व-विभाग का प्रतिबंध है कि “जब तक वे इसे अधिकृतरूप से जारी न कर दें, इसके पाठ को या चित्र को कहीं भी किसी भी सूचना-माध्यम से प्रचारित नहीं किया जाये।” इसलिये अन्य तथ्य तो अभी मैं आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ, परन्तु इतना अवश्य सूचित कर रहा हूँ कि यह शिलालेख प्रामाणिक रूप से 2100 वर्ष से कुछ अधिक ही प्राचीन है अर्थात् ईसापूर्व प्रथम-द्वितीय शताब्दी का है और सुप्रसिद्ध जैन-सम्राट् खारवेल के विश्वविख्यात ‘हाथीगुम्फा-अभिलेख’ के निकट-उत्तर-कालवर्ती है। यह शिलालेख भी प्राकृतभाषा में ही निबद्ध है और इसकी लिपि भी सम्राट् खारवेल के हाथीगुम्फा-अभिलेख की भाँति ब्राह्मी-लिपि ही है।
आपको यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी कि इस शिलालेख की पहली पंक्ति का पहला-वाक्य णमो अरिहंताणं है। इसी के आधार पर पुरातत्त्व-विभाग ने इसक एक जैन-शिलालेख होना स्वीकार किया है।
इस पर मेरा प्रयास अनवरतरूप से जारी है। सरकारी अनुमति एवं अनुसंधान की अपेक्षित-प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने के बाद मैं इसके चित्र, मूलपाठ एवं उसके अनुवाद के साथ-साथ विशेष-परिचयात्मक विवरण भी प्रेषित करूँगा। तब तक आप आनंद लीजिये कि जैनधर्म के प्रसार-क्षेत्र में महाराष्ट्र का भी ईसापूर्व युग से ही महत्त्वपूर्ण योगदान व स्थान रहा है। और यहाँ पर भी जैन-आगमों की भाषा ‘प्राकृत’ में व तीर्थंकर ऋषभदेव की ज्येष्ठ पुत्री ब्राह्मी के नामाधारित लिपि ‘ब्राह्मी’ में पूरा विवरण दिया गया है और वह विवरण हमारे महान् मंगलपाठ ‘णमोकार-मंत्र’ की पहली-पंक्ति से प्रारम्भ हो रहा है।
विशेष-विवरण के लिये प्रतीक्षा कीजिये।
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