दिगम्बर मत की जय हुई या श्वेताम्बर मत की?

एक ही जगह से प्रकाशित दो Book

  1. आचार्य कुंद कुंद और उनके टीकाकार
  2. पंडित टोडरमल व्यक्तित्व और कर्तुत्व
    उपरोक्त दोनो books में गिरी गिरनार पर दिगम्बर और श्वेताम्बर के बीच हुए विवाद की बात बताई गई है परंतु आचार्य कुंद कुंद और उनके टीकाकार में बताया है कि देवी प्रगट हुई और कहा दिगम्बर सत्य है और
    पंडित टोडरमल व्यक्तित्व और कर्तुत्व में कहा है की देवी प्रगट हुई और कहा श्वेताम्बर मत सत्य है

वास्तविक सत्य क्या है ?

Text removed

मंत्र, लब्धि या दैवी मदद से सम्भव है
(निमित्त का कथन जानना चाहिए
क्योंकि चेतन के सैयोग होते हुए भी चेतन से नहि जड़ से ही आवाज़ निकलती है)

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See this ―

डॉ.हुकुमचंदजी भारिल्ल द्वारा लिखी गयी प्रस्तावना से लिया है।
Reference of ज्ञान-प्रबोध ग्रंथ।

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@Aniteshj रेफ़्रेन्स भी उपरोक्त जैसा ही है
कोई निष्कर्ष नहि निकलता

जी, reference देने का उद्देश्य यही था कि दिगम्बर मतानुसार यही कहानी प्रसिद्ध है कि ब्राह्मी देवी ने स्वीकार किया था कि दिगम्बर मार्ग ही सच्चा है।
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कुन्दकुन्द स्वामी ने अम्बिका देवी से बलात सत्य बुलवाया था आदि दिगम्बरा इसलिये मूल परम्परा में ब्लॉतगने लगाया जाता है और मूर्ति की प्रस्तति पर भी लिखा जाता है

I don’t think Jainism should rely on testimony of soul that is still bound in karma.

वस्तु स्वरूप के निरूपण को तर्क की कसौटी पर कसकर देखना ही योग्य है, साथ ही कथनों में प्रमाण से बाधा का अभाव और परस्पर कथनों में भी बाधा का अभाव उनके समीचीन होने के द्योतक है।
जैन दर्शन में व्यक्ति को नहीं, वस्तु को प्रमाणता का आधार कहा है।

ग्रंथ- आप्त मीमांसा
रचियता- आचार्य समंतभद्र

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