समणसुत्तं ग्रंथ (जैन गीता)

समणसुत्तं क्या है ?

क्या आप जानते हैं समणसुत्तं क्या है ? यह जैन धर्म का एक अद्भुत व अप्रसिद्ध ग्रंथ है । यह जैनेन्द्र सिद्धांत कोष के संकलन कर्ता श्री जिनेन्द्र वर्णी जी द्वारा संकलित ग्रंथ है। भारतवर्ष में महाराष्ट्र प्रदेश के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे जी की प्रेरणा व आग्रह से यह संकलनग्रंथ आज हमारे हाथों में उपलब्ध है।

जिस प्रकार हिन्दुओं में गीता का , मुसलमानों में कुरान का , ईसाईयों में बाइबल का स्थान है उसप्रकार से जैन-धर्म का कोई प्रमुख ग्रंथ न होने की समस्या हमेशा से रही है।
जैन-धर्म द्वादशांगमयी है और प्रत्येक अंग अपनी अलग महत्वता लिए हुए है। अतः सम्पूर्ण द्वादशांग को एक ग्रंथ में लिखना असंभव है और सम्पूर्ण द्वादशांग आज उपलब्ध भी नहीं है । इस कारण से किसी एक ग्रंथ को प्रमुख नहीं कहा जा सकता है ।
यद्यपि जैन-धर्म के सभी मतों द्वारा मान्य होने पर तत्त्वार्थसूत्र जी ग्रंथ को प्रमुख उपाधि दी गई है परन्तु वह भी भगवान महावीर की साक्षात् वाणी न होने से , प्राकृत भाषा न होने से व गाथा शैली न होने इत्यादि कारणों से पूर्णतया प्रमुख नहीं है ।
इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए जैन-धर्म की सभी परंपराओं के सारभूत विषय , जो कि एक दूसरे की विरोधी नहीं हैं । उन सभी विषयों का समावेश कर समणसुत्तं ग्रंथ तैयार हुआ ।

समणसुत्तं ग्रंथ की विशेषताएं :-

  • ग्रंथ में जैनागम के मूल ग्रंथों की मूल गाथाओं का संकलन है ।
  • यह ग्रंथ श्वेताम्बर व दिगम्बर दोनों परम्पराओं द्वारा मान्य है ।
  • यह भगवान की मूल वाणी प्राकृत भाषा में है। अतः गेय व पारायण के योग्य भी है ।
  • ग्रंथ में उपदेशात्मक कथन भी है।
  • सर्वप्रथम ग्रंथ का नाम जिणधम्म हुआ , , ,बाद में संगीति में चर्चा के साथ-साथ नाम बदला रूप बदला सर्वानुमति से “श्रमणसूक्तम्” जिसे अर्धमाग्धी में “समणसुत्तं” कहते हैं ।
  • जैनपरम्परा में सूत्र शब्द प्रसिद्ध है , जैसे - आचारांगसुत्तं और कषायपाहुड सुत्तं । अतः ग्रंथ का नाम समणसुत्तं हुआ ।
  • यह ग्रंथ आगमवत् स्वत: प्रमाण को प्राप्त है ।
  • ग्रंथ में चारों अनुयोगों का समावेश है ।
  • ग्रंथ के कोई रचयिता नहीं मात्र संकलन कर्ता है ।
  • ग्रंथ में 4 खंड ,44 प्रकरण ,756 गाथाएं हैं ।
  • समाहित विषयों के कुछ नाम - जैन-धर्म, कर्म, अहिंसा, आत्मतत्त्व, मोक्षमार्ग, रत्नत्रय, श्रावकधर्म, व्रत, सल्लेखना, साततत्त्व, छह द्रव्य, अनेकान्त, प्रमाण, नय, स्याद्वाद इत्यादि ।
  • समणसुत्तं ग्रंथ के उपर 29-30 नवंबर 1974 को संगीति हुई , संगीति में सभी आम्नाओं के प्रमुख जैनाचार्य ,मुनिगण तथा विद्वान उपस्थित थे।
    -बा. ब्र. जिनेन्द्र वर्णी जी
    -आ. श्री धर्म सागर जी महाराज
  • मुनि श्री तुलसी जी
  • आ श्री विजय समुद्र सूरि जी
  • संगीति में इस ग्रंथ का पारायण किया गया। श्वेताम्बर व दिगम्बर आचार्यों , मुनियों और विद्वानों के परामर्श , समीक्षाएं समालोचात्मक दृष्टिकोण प्राप्त हुए। अंततः कार्य पूर्ण होने पर विनोबा भावे जी को प्रसन्नता पूर्वक पत्र भेजा गया।

आचार्य विनोबा भावे जी ने उपर्युक्त पत्र के समाधान पत्र में स्वयं लिखा है कि - " हमको सत्यग्राही बनना चाहिए, यह जो शिक्षा है महावीर की ,बाबा (विनोबा भावे) पर गीता के बाद उसी का असर है। गीता के बाद कहा , लेकिन जब देखता हूं तो मुझे दोनों में फर्क ही नहीं दिखता । "
हमारी अंतिम भावना बस यही है कि जैन-धर्म की ऐतिहासिक विरासत प्राचीन घटना पर आधारित यह ग्रंथ भारत ही नहीं पूरे विश्व के सभी जैनमन्दिरों , स्वाध्यायभवनों व जैन पुस्तकालयों में कम से कम एक प्रति अवश्य विराजमान होनी चाहिए।

  • आत्मार्थी श्रुति जैन
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