विशुद्ध वंश वाला त्रैवर्णिक ही निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण कर सकता है।

दिगम्बर जैन शास्त्रों में कहा है कि विशुद्ध वंश वाला त्रैवर्णिक ही निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण कर सकता है।
आधार- चरित्र चक्रवर्ती पृष्ठ क्रमांक- 101

इसका आशय यदि किसी को ज्ञात हो तो अवश्य स्पष्टीकरण करें।
साथ ही साथ ग्रंथो में ऐसा वर्णन कहा आया है इसके संबंध में भी जानकारी प्रेषित करें।

1 Like

कृपया विशुद्ध वर्णवाले त्रिवार्णिक का अर्थ बताये।
अगर इसका मतलब यह है कि क्षुद्र या अन्य निम्न जाति के लोग दीक्षा नही ले सकते तो यह गलत है।
क्योंकि महावीर स्वामी के समय में मेतारज मुनि जन्म से क्षुद्र थे और उन्होंने केवलज्ञान भी प्राप्त किया था।

अर्थ मुझे भी ज्ञात नहीं है।

यदि इसका अर्थ ज्ञात हो जाये तो वाक्य को समझना स्वतः ही सरल हो जाएगा।

एक सुधार अवश्य कर लें।
वर्ण शूद्र है, क्षुद्र नहीं।

1 Like

As per my personal logic and opinion -

Meaning of the terms could be :

Vishuddh - Pure
Vansh - Lineage or Ancestry
Tray - 3
Varnik - Varna or caste

So in this context it could mean that only those who are born in a pure untainted lineage belonging to the 3 varnas i.e. Brahmin, Kshatriya and Vaishya are eligible to take Digambar Muni Diksha.

2 Likes

इस प्रकार का उत्तर अन्यत्र से प्राप्त हुआ है, जो कि संतुष्टिजनक है।

मुनि पद धारण करने के लिए सकल संयम धारण करने के लिए यह शर्त है कि वह तीन त्रिवर्णिक ही मुनि पद धारण कर सकते हैं शुद्र नहीं ।

स्पर्श शूद्र एलक -क्षुल्लक नहीं बन सकता तथा अस्पर्श शूद्र पंचम गुणस्थान में दूसरी प्रतिमा के आगे नहीं जा सकता।

जिसके छू जाने पर हमें नहाना पड़े वह अस्पृश्य शूद्र(चाण्डाल, नाई आदि) एवं जिसके छू जाने को हम नहाते नहीं है , मात्र शुद्धि से ही काम चल जाता है वह स्पृश्य शूद्र है ॰॰॰ - ज्ञानानंद श्रावकाचार तथा तत्वार्थ सार (टेक चंद जी कृत)

(आध्यात्मिक शंका समाधान, whatsapp group से संकलित)

5 Likes

अगर आप को पता हो तो जब महावीर प्रभु विचर रहे थे तब कुछ लोग उन्हें पसंद नही करते थे और उसका कारण यह था कि वे सभी जाति के लोगो को समान गिनते थे।
वो लोग उन्हें ज्ञातपुत्र कहके बुलाते थे।
और जैसे आगे बताया मेतारज मुनि शुद्र होते हुए भी न ही उनलो दीक्षा मिली आगे जाकर उनके केवलज्ञान भी हुआ।

नाई के छू जाने पर नहाना पड़ता है क्या??