अनादि मिथ्यादृष्टि और सप्तम गुणस्थान

क्या अनादि मिथ्यादृष्टि को सीधा सप्तम गुणस्थान हो सकता है?

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जी, संभव है
जो जीव अनादि मिथ्यादृष्टि है वे बाह्य द्रव्यलिंग धारण करके मिथ्यात्व से सम्यकत्व प्राप्त कर लीनता करके उसी लीनता की धारा में भावलिंगी मुनि होकर सप्तम गुणस्थान प्राप्त कर सकते है।

मोक्षमार्ग प्रकाशक में ऐसे अनादि मिथ्यादृष्टि की बात आती है
जो पहली बार ही मनुष्यभव प्राप्त करके,
समकित प्राप्त करनेकी योग्यता होने पर प्रथम अन्तर्मुहूर्त में ही मिथ्यात्वी से समकीती हो कर, उसी लिनताकी धारा में लीन होकर केवलज्ञान प्राप्त कर उसी भव मोक्ष जाते है।

इसे मिथ्यात्वी से सीधा केवलज्ञान औऱ मोक्ष कह सकते है फिरभी,
ये लीनता धारा प्रवाह रूप होती है। प्रथम गुणस्थान से चतुर्थ, पंचम, सप्तम, श्रेणी और केवलज्ञान एक अन्तर्मुहूर्त में बिना अंतर होता है।

यह संभव नही की मिथ्यात्वी से बिना चतुर्थ और पंचम गुणस्थान आये सीधा ही Jump करके सातवें गुणस्थान जितनी लीनता हो।

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प्रथम गुणस्थान से सीधा सप्तम गुणस्थान तक गमन तो होता है, प्रश्न यह है कि अनादि मिथ्यादृष्टि के साथ भी यह नियम लागू पड़ता है या मात्र सादि मिथ्यादृष्टि?

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आधार - गुणस्थान विवेचन page - 168

अनादि मिथ्यादृष्टि सीधा सातवे में जा सकता है।

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शायद नहीं क्योंकि मेने सुना हैं की अनादि मिथ्यादृष्टि के सबसे पहले प्रथमोशम सम्यकदर्शन होता हैं, और वह छूटता हैं। अब वह सादी मिथ्यादृष्टि जीव हो गया। अब वह कोनसे गुणस्थान में सीधे आ सकता हैं , इसका जवाब मेरे पास अभी नहीं हैं।

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लीनता की एक धारा में ही मिथ्यात्वी से सातवा गुणस्थान आ जाता है मेरा ये कहना है, उसमे अंतर नही पड़ता लेकिन चतुर्थ और पंचम गुणस्थान बीचमे नही आते ऐसा कोई प्रमाण मिले तो कृपया बताएं, क्योकि क्रम का उलंघन कैसे हो!! ?

एक उदाहरण बताना चाहूंगा,

जीव सम्यक दर्शन से पहले तीव्र कषाय से मंद कषाय में जरूर आता है, तीव्र कषाय से सीधा निर्विकल्प नही हो सकता
वैसे ही चौथा और पांचवा गुणस्थान आता है और उसी लीनता में सातवा गुणस्थान मुनिपना आता है।

(कोई और स्पष्टीकरण हो तो जरूर बताएं)

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बिल्कुल संभव है।
एक प्रकरण आता है कि १४ गुणस्थानों में ऐसे कौन कौन से गुणस्थान है, जिनके हुए बिना (संपूर्ण अनादि-अनंत जीवन काल में) भी जीव को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
वहां गुणस्थान क्रमांक 2,3,4,5,11 गुणस्थान बताए है। अतः यह बात सिद्ध होती है कि पहले से सातवा होने में कोई बाधा नहीं है।

इसमें कोई बाधा नहीं है क्योंकि गुणस्थानो का ये क्रम उत्पत्ति के क्रम का नियामक नहीं है (गुणस्थानों का गमानागमन देखें), अपितु दोषों की अधिकता से हीनता तक की विद्धमानता का सूचक है।

निर्विकल्प होने के लिए यह बात बिल्कुल सही है परंतु यहां वह कारण के रूप में सही नहीं है। इन दोनों बातो का संबंध नहीं बैठेगा।

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जब अवरति जीव को प्रथमोशम सम्यकदर्शन होता है तब वह 1 ले से 4 थे में
अणुव्रती हो तो 1 से 5 वे में
मुनि हो तो 1 ले से 7 वे में जा सकता है।
क्योंकि 4 थे और 7 वे में सम्यकदर्शन(श्रद्धा गुन की अपेक्षा )कोई अंतर नही है ।मात्र चारित्र मोहनिय की उदय से फर्क है।
यहां तक कि क्षायिक सम्यकदर्शन 4 थे गुणस्थान वाला और सिद्ध भगवान की श्रद्धा गुन की पर्याय समान है।अंतर चारित्र मोहनीय में है।

अपने पुरुषार्थ की हीनता से प्रथमोपशम में सातवां गुणस्थान लेते है तो वह मुनिराज नियम से छठवे में जाते है वहां से गिरकर 1 से 5 गुणस्थान में जा सकते है।

अगर क्षयोप्शमिक सम्यकदृष्टि होंगे तो 2 गुणस्थान के अलावा 1 से 5 में जा सकते है।(क्षायोपक्षमिक सम्यकदर्शन में अनन्तानुबन्धी की विसंयोजन होने के कारण 2 में नही जा सकता)

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