ग्रहीत मिथ्यात्व

जिस प्रकार दवाई लेने से हमारी तकलीफ दूर हो जाती है इसलिए दवा पुण्य का योग होने पर तकलीफ दूर होने में निमित्त कही जाती है ।
जिस प्रकार बुखार के लिए पेरासिटामोल निमित्त रूप दवाई प्रसिद्ध है उसी प्रकार व्यंतर जनित बाधा के लिए लोक में प्रसिद्ध मंत्र तंत्र रूप दवाई प्रसिद्ध है जिससे अनेक लोग प्रत्यक्ष ठीक होते देखे जाते है ।
फिर पेरासिटामोल को लेने में कोई दोष नही जबकि मंत्र तंत्र को गृहीत मिथ्यात्व कह दिया जाता है ?
रावण आदि अनेक प्रसिद्द पुरुष भी शक्तियों के लिए जिनेंद्र देव की पूजा करते थे ?

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समर्थ शास्त्री का एक लेख है इसके संबंध में, उसे यथावत प्रेषित कर रहा हूँ।

“हम रोग मिटाने के लिए दवाइयाँ ही क्यों चुनते है, जब व्यंतर भी हमारे रोग दूर कर सकते है ?”

इस प्रश्न को समझने के लिए हमें कुछ प्रश्नो पर विचार करना आवश्यक है –

  1. यदि हमारे पास चुनने का समान अवसर हो, तो हम ज्यादातर चेतन को चुनते हैं या अचेतन को ?

  2. यदि व्यंतर (भूत-प्रेत) हमारे मित्र होते तो?

3.क्या हम रोग मिटाने के लिए व्यंतरो की सहायता ले सकते हैं?

1. यदि हमारे पास चुनने का समान अवसर हो तो हम ज्यादातर चेतन को चुनते है या अचेतन को ? – हम ज्यादातर अचेतन को ही चुनना पसंद करते है। कारण यह है कि – चेतन के पास, राग-द्वेष, सर्वजन पूजित रहने रूप लोभ करने की विशेष शक्ति है। तथा प्रत्येक प्राणी के पास जन्म-जात बडप्पन, अहंकार के परिणाम होते है। कोई भी किसी अन्य के सामने गिड़गिड़ाना नहीं चाहता, किसी के सामने भीख नहीं मांगना चाहता, अपने कार्य के लिए दूसरो पर निर्भर नही रहना चाहता, परंतु चेतन को चुनते समय यह दीनता रूप परिणाम हमारे अंदर आ सकते है, पर अचेतन वस्तु को चुनते समय ऐसे परिणाम नहीं आते। इसी कारण समान अवसर होने पर हम प्रायः अचेतन वस्तु को ही चुनेंगे, क्योंकि उसे चुनते समय हमारा आत्म- सम्मान ध्वस्त नही होता।

2. यदि व्यंतर हमारे मित्र होते तो? – ग्रंथों मे व्यंतरादिक को “पूजने” का निषेध है, उनकी सहायता लेने का तो निषेध नही है। व्यंतर का सहारा तो कुंदकुंदाचार्य ने भी विदेह गमन के लिए लिया था। प्राचीन काल में भी राजा-महाराजा युद्धादि मे अपनी शक्ति विकसित करने के लिए देवी- देवताओ का आह्वान भी करते थे, तथा उनसे अपना प्रयोजन भी सिद्ध करते थे। व्यंतरो को मात्र कुदेवो से ही जोड़कर क्यो देखा जाता है। उन्हे मात्र एक सामान्य प्राणी जिसके पास हमसे कुछ अधिक शक्तियाँ है, इस प्रकार, अपने मित्र के रूप में क्यो नही देखा जा सकता? यदि हम मंत्रो के प्रकाण्ड ज्ञाता बन जाए और उससे व्यंतरो को आह्वानित कर अपना रोग ठीक करा ले तो इसमे कैसे कोई गृहीत मिथ्यात्व हो सकता है ? ग्रहीत मिथ्यात्व तो तब खड़ा होगा जब हम इन्ही मित्र व्यंतरो को मोक्षमार्ग मे स्थान देकर अपनी श्रद्धा को भ्रष्ट करा लें।

जैसे1 . किसी प्रतिमा आदि के निमित्त से व्यंतरो का आगमन होने पर उन्ही कुलिंगी प्रतिमा को अतिशयकारी जान उनकी पूजादी करना। 2 . पाखंडी बाबाओं के कोरे पाखंड मे फंस जाना 3 . वास्तविक व्यंतर भी यदि हमे आधीन करके, अपनी पूजनादि करने को कहें अर्थात अपना दास बना, श्रद्धा भ्रष्ट करे तो वह भी ग्रहीत मिथ्यात्व है। सारांश रूप में कहा जाए तो- इन्ही को सर्वे- सर्वा अर्थात पंचम काल के भगवान मान लेना ही ग्रहीत मिथ्यात्व है।

3. यह सही है, इसका मतलब हम भी किसी विशेष तीर्थ पर जाकर व्यंतरो की सहायता ले सकते हैं ?- 1. वर्तमान में कोई सच्चे मंत्रादिक का ज्ञाता नहीं है। 2. कदाचित व्यंतरो की तीर्थादि पर सहज उपलब्धि हो भी जाए तो, उनसे मनचाहा कार्य, बिना उनके दास बने और बिना उनकी क्रीड़ाओं मे फँसे करा लेना, असंभव है।

हमारी श्रद्धा सही होते हुए भी यदि हमारे निमित्त से गलत परंपरा चले तो यह जैन धर्म का अपमान करना होगा। लोग तो खोटे पाखंड में ही फँस जाएंगे। उन्हें तो सच्ची बात की पकड़ नहीं है। हमे उससे क्या, हमारा तो रोग सही होगा ना?- सही है। हो सकता है रोग सही हो भी जाए। परंतु इस कार्य के कारण, आगामी काल में जो रोग संबंधी पाप बाँधोगे उसे दूर करने के लिए कोई व्यंतर भी समर्थ नहीं होगा। हमारा जीवन, हमारा रहन सहन, हमारी प्रत्येक चर्या जिनागम के पोषण के लिए ही होनी चाहिए शोषण के लिए नहीं।

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