सिद्धांत और दृष्टि में अंतर

पहले सिद्धांत का अध्ययन करना आवश्यक है या पहले दृष्टि या भेदज्ञान समझना आवश्यक है ?

आध्यात्मिक शास्त्र जैसे समयसार जी का अध्ययन पहले करके, उसी में से सिद्धांत निकालना क्या उचित है ?

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जैसे समय सार जी के अनुसार - एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं करता, लेकिन अगर हम इसको सिद्धांत बना ले, और सारे सैद्धांतिक शास्त्रों का इसी नजरिए से अध्ययन करें, तो क्या यह उचित है ?

हो सकता है कि आचार्य भगवान कुंदकुंद ने इसलिए ऐसा लिखा हो ताकि हमारी दृष्टि पर पदार्थों से हट जाए। लेकिन हमने इसको सिद्धांत ही बना दिया और कर्म सिद्धांत को भी इसी के basis पर अध्ययन किया ।