जीव और कर्म में निमित्त नैमित्तिक संबंध

Recently I hear that Karma particles are merely indication of soul’s behaviour. “जीव और कर्म दोनों ही एक ही समय में अपने अपने में - स्वयं में - परिणमित होते हैं । जीव के जिन परिणामों के समय कर्म की जो अवस्था नियम से होती ही होती है उस अवस्था के नामानुरूप जीव के भावों को भी वैसे ही नाम बताए गए हैं।”

If karmas do nothing then what is difference between Siddh, kevali and sansari jivas ?

Why does raag, dvesh comes to us when mohaniya karma does not affect us ? Is raag dvesh swabhav of jeev ? But that is impossible because Arihant & Siddh bhagwan lacks raag & dvesh.

Then the meaning of अनंत चतुष्टय will be invalid. Why Arihant Bhagwan has infinite knowledge and why we lacking it ?

Also I hear, “कर्म का और जीव का निमित्त नैमित्तिक संबंध है कर्ता कर्म संबंध नहीं।”

Why does it happen that in spite of being independent, Karma particles behave in exactly the same way as the भाव & action of jeev ?

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You are underestimating Karma philopsophy. Karma and jeev are having संस्लेश संबंध (एक क्षेत्रावगाह होकर संबंध होता है कि दोनों के प्रदेश आपस में मिलते हैं, आत्मा के प्रत्येक प्रदेश में कर्म का बंध होता है)। केवल ऊपर ऊपर से नहीं होता है।

गाय के गले में रस्सी बंधी है ऐसा संबंध नहीं होता है।
कर्म बंध की प्रक्रिया को ही समझाने में बड़े-बड़े आचार्य जैसे पुष्पदंत, भूतबली ने षटखंडागम आदि ग्रंथ लिखे , उनमें महाबंध के सूत्र, पूरी की पूरी कर्म बंध की प्रक्रिया के ऊपर है।

सांख्य दर्शन says that soul is pure and prakrati (karma) is only from superficial aspect (ऊपर ऊपर से ही) | आत्मा न बंधती है, न मुक्त होती है, आत्मा तो हमेशा अपने स्वभाव में ही शुद्ध रहती है।

लेकिन जैन धर्म के अनुसार आत्मा त्रैकालिक शुद्ध है, लेकिन वह एक नय की अपेक्षा से है, सर्वथा नहीं।

You can see below video from 6:53 to 16 :11 minutes by Muni shree Pranamya Sagar in which he descibes how karma philosophy is being ignored today in the name of adhyatma.

इसके लिए मोक्षमार्ग प्रकाशक जी का दूसरा अध्याय पढ़ना चाहिए |

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Very nice… I would add a bit to this. A form of clarification…
ज्ञान में किसी भी प्रकार का एकांत अच्छा नहीं है, वह सर्वांग वस्तु स्वरूप को समझने में बाधा ही उत्पन्न करता है।
नयों के सम्यक प्रयोग से यथार्थ वस्तु स्थिति समझना ही योग्य है।
ना ही कर्म philosophy के प्रकाश में अध्यात्म का लोप करना योग्य है, और ना ही अध्यात्म के जोर में कर्म व्यवस्था का। अध्यात्म को ignore करने में कितनी हानि हो सकती है, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
अध्यात्म और कर्म व्यवस्था का ज्ञान- दोनों का सम्यक सुमेल होना योग्य है। चारों ही अनुयोग वीतरागता का पोषण करते है, ना कि स्वचछंदता का, इसीलिए सम्यक अर्थ का ही ग्रहण करना चाहिए।

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@jainsulabh अच्छा कहा।
ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे तहां समजवूं तेह;
त्यां त्यां ते ते आचरे आत्मार्थी जन ऐह ।

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Chapter 2 in moksh marg prakashak

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Also,

Points I can gather from this video -

  1. निमित्त कुछ करता या कराता नहीं है , वह बस उस टाइम present रहता है ।

  2. जब अपना उपादान हो तब निमित्त को आना ही पड़ता है।

  3. उपादान और निमित्त दोनों का परिणमन इंडिपेंडेंट है ।

एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं करता। क्या एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से खुद प्रभावित हो सकता है ? लेकिन उनका परिणमन इंडिपेंडेंट कैसे होगा फिर ?
मतलब प्रभावित नहीं हो सकता। जीव भी कर्म से प्रभावित नहीं हो सकता।

अगर कर्म भी केवल present ही रहता है, जीव के रागादिक भाव‌ स्वयमेव होते हैं, तो फिर ये रागादिक विभाव भाव जीव के स्वभाव होने चाहिए। पर वे सिद्ध भगवान में तो होते नहीं। इसलिए रागादिक जीव के स्वभाव नहीं हो सकते।

How is independence of jeev & karma valid when ?

Can we not compare karma particles with a chip used in Robot movie which itself does nothing but Chitti (robot) performs destructive work when chip is fitted in him ?

At 1:05 minutes -

But, this comparison, if accepted, hinders independence of jeev and karma.

What is right among 2 statements below-

  1. Jeev does रागादिक भाव‌ itself when karma is present (like a coincidence - 2 things happening at same time)

  2. Jeev does रागादिक भाव‌ itself by influence of karma.

If 1st statement is accepted, रागादिक भाव‌ has to be स्वभाव of jeev which is impossible.

If 2nd statement is accepted, independece of 2 dravyas is affected.

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1 st Statement is right & 2nd Statement is false because एक द्रव्य का परिणमन ऐसे होता है, जैसे दूसरा द्रव्य उपस्थित ही ना हो, सभी independent होते हैं ।

संसारी जीवो का और सिद्ध भगवान का , दोनों का ही द्रव्य शुद्ध है । अंतर इतना है कि संसारी जीवों की पर्याय अशुद्ध है और सिद्ध भगवान की पर्याय शुद्ध है।

For more info, see screenshots below -