निश्चय नय से अभव्य जीव

क्या अभव्य जीव में निश्चय नय से अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, आदि 8 गुण होते हैं ?

अभव्य जीव स्वभाव से ही अभव्य हैं या फिर केवली भगवान ने उनका भविष्य देखा कि वह अनंत काल तक मोक्ष नहीं जा रहे इसलिए अभव्य हैं ?

स्वभाव से अभव्य का मतलब क्या है ?

भव्य वह होता है जिसके 8 कर्मों का नाश कभी न कभी होगा।

अभव्य जीव के कर्म नष्ट नहीं होंगे।

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यद्यभव्यजीवे परमात्मा शक्तिरूपेण वर्त्तते तर्हि कथमभव्यत्वमिति चेत्‌ परमात्मशक्तेः केवलज्ञानादिरूपेण व्यक्तिर्न भविष्यतीत्यभव्यत्वं, शक्ति: पुन: शुद्धनयेनोभयत्र समाना। यदि पुन: शक्तिरूपेणाप्यभव्यजीवे केवलज्ञानं नास्ति तदा केवलज्ञानावरणं न घटते भव्याभव्यद्वयं पुनरशुद्धनयेनेति भावार्थः। एवं यथा मिथ्यादृष्टिसंज्ञे बहिरात्मनि नयविभागेन दर्शितमात्मत्रयं तथा शेषगुणस्थानेष्वपि। तद्यथा– बहिरात्मावस्थायामन्तरात्मपरमात्मद्वयं शक्तिरूपेण भाविनैगमनयेन व्यक्तिरूपेण च विज्ञेयम्‌ अन्तरात्मावस्थायां तु बहिरात्मा भूतपूर्वन्यायेन घृतघटवत्‌, परमात्मस्वरूपं तु शक्तिरूपेण भाविनैगमनयेन, व्यक्तिरूपेण च। परमात्मावस्थायां पुनरन्तरात्मबहिरात्मद्वंय भूतपूर्वनयेनेति।

प्रश्न– अभव्य जीव में परमात्मा शक्तिरूप से रहता है तो उसमें अभव्यत्व कैसे ?
उत्तर –अभव्य जीव में परमात्मा शक्ति की केवलज्ञान आदि रूप से व्यक्ति न होगी इसलिए उसमें अभव्यत्व है। शुद्ध नय की अपेक्षा परमात्मा की शक्ति तो मिथ्यादृष्टि भव्य और अभव्य इन दोनों में समान है। यदि अभव्य जीव में शक्तिरूप से भी केवलज्ञान न हो तो उसके केवलज्ञानावरण कर्म सिद्ध नहीं हो सकता। सारांश यह है कि भव्य व अभव्य ये दोनों अशुद्ध नय से हैं। इस प्रकार जैसे मिथ्यादृष्टि बहिरात्मा में नय विभाग से तीनों आत्माओं को बतलाया उसी प्रकार शेष तेरह गुणस्थानों में भी घटित करना चाहिए जैसे कि बहिरात्मा की दशा में अन्तरात्मा तथा परमात्मा ये दोनों शक्तिरूप से रहते हैं और भावि नैगमनय से व्यक्तिरूप से भी रहते हैं ऐसा समझना चाहिए। अन्तरात्मा की अवस्था में बहिरात्मा भूतपूर्वन्याय से घृत के घट के समान और परमात्मा का स्वरूप शक्तिरूप से तथा भावि नैगमनय की अपेक्षा व्यक्तिरूप से भी जानना चाहिए। परमात्म अवस्था में अन्तरात्मा तथा बहिरात्मा भूतपूर्व नय की अपेक्षा जानने चाहिए। (स.श./टी./४)।

प्रश्न –अभव्य जीव के मनःपर्ययज्ञानशक्ति और केवलज्ञानशक्ति होती है या नहीं होती। यदि होती है तो उसके अभव्यपना नहीं बनता। यदि नहीं होती है तो उसके उक्त दो आवरण-कर्मों की कल्पना करना व्यर्थ है।
उत्तर –आदेश वचन होने से कोई दोष नहीं है। अभव्य के द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है पर पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा उसके उसका अभाव है। …

प्रश्न –यदि ऐसा है तो भव्याभव्य विकल्प नहीं बन सकता है क्योंकि दोनों के मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है। उत्तर - शक्ति के सद्भाव और असद्भाव की अपेक्षा भव्याभव्य विकल्प नहीं कहा गया है। (अपितु व्‍यक्ति के सद्भाव और असद्भाव की अपेक्षा यह विकल्‍प कहा गया है।)

स्रोत- http://jainkosh.org/wiki/भव्य

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मतलब जीव अभव्य है या भव्य है यह सर्वज्ञ अपने केवल ज्ञान में उस जीव का भविष्य देख कर ही बताते होंगे । स्वभाव से जीव भव्य या अभव्य तो नहीं होता होगा ?

स्वभाव से तो प्रत्येक जीव अनंत दर्शन ज्ञान आदि गुणों से ही पूर्ण होगा ।

मैंने एक प्रवचन में सुना था कि अभव्य जीव स्वभाव से ही अभव्य हैं। ये गलत लग रहा है।

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जीव अभव्य है तभी तो केवली के ज्ञान में अभव्य रूप में आया है।
अभव्य पना पर्याय की अपेक्षा है, स्वभाव की अपेक्षा तो उसमें भी सभी गुण विद्यमान हैं।

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अभव्य की पर्याय में शक्ति व्यक्त नहीं होती बस इतनाही।
द्रव्य से सर्व जीव है सिद्ध सम।

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नीचे (cropped) प्रवचन में महाराज जी ने यह बताया है कि अभव्य जीव स्वभाव से ही अभव्य हैं।

(शायद) Since he does not agree with Kram baddh paryay (in other pravachans), or kevali knowing our entire future, he said that abhavya is by svabhav or else he would have to accept our predecided future.

37 second video -

भव्यपना और अभव्यपना पारिणामिक भाव है।
क्या शक्ति रूप भाव को पर्याय भाव कहा जा सकता है?
इसमें द्रव्य भाव या पर्याय भाव का division किस basis पर कर सकते है?
क्या individual जीव और जीव सामान्य की अपेक्षा से इसमें भेद पड़ेगा? (चूंकि भव्य और अभव्य भाव को सर्व जीवों का स्वीकार नहीं कर सकते है।)

क्या निश्चय व्यवहार नय इस विषय पर लागू हो सकते है?

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बात तो सही है।

लेकिन ये भी सही लग रहा -

कार्मण वर्गणा की वजह से जीव संसार में है। अभव्य जीव में ये कभी खत्म नहीं होंगी। इसके अलावा स्वभाव में अंतर क्यूं हुआ ?

द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा प्रत्येक द्रव्य सिद्ध समान शुद्ध है चाहे भव्य हो या अभव्य।

पर स्वभाव की अपेक्षा उसमे भव्यत्व नाम का पारिणामिक भाव नही पाया जाता।यानी उसमे रत्नत्रय प्राप्त करने की योग्यता नही है।

और अभव्य मे उनका अभाव करने की सामर्थ्य नही।इसलिये वह संसार मे है।यह उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय नही है, अपितु उसका स्वभाव है।

इसलिये ऐसा कहना भी सही नहीं होगा।

वह इसलिये अभव्य नहीं क्योंकि केवली ने ऐसा देखा।बल्कि अभव्य था इसलिये उनके ज्ञान में ऐसा आया।

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Actually, abhavya can be decided by 2 ways -

  1. Svabhav
  2. असंख्यात भव as kevali has seen brands it as abhavya.

I did not say that kevali has seen , so it will happen.

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Can this decide/define someone as Bhavya and Abhavya? Please look into this.
Do all Bhavya jeev attain Moksha?