हिंसा अहिंसा को इतना महत्व क्यूं?

जब हम ऊपर देखते हुए चलते हैं और जीव मरते हैं तो वह जीव अपनी आयु खत्म होने से मरते हैं या हमारे मारने से ?

अगर हमारे मारने से उनका मरण होता है तो क्या संसार में अधिकतर जीव बिना आयु पूरी करे अकाल मरण से ही मरते हैं ?

और अगर जीव अपनी आयु पूरी कर के ही मरते हैं तो जब हम से गलती से जीव मर जाते हैं तब हम प्रायश्चित क्यों लेते हैं ? सिर्फ चरणानुयोग में लिखा है इसलिए ?

जैन दर्शन में अहिंसा को इतना महत्व क्यूं दिया गया है ? क्या हिंसा और क्या अहिंसा ? जिस काल में जैसा होना है वैसा ही उस द्रव्य के साथ होगा तो हिंसा शब्द ही गलत हुआ ?

एक महाराज जी के अनुसार -

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तत्वार्थ सूत्र अध्याय 2 सूत्र 53 के अनुसार ( ref.given by pt.sachinji manglayatan)
अकाल मरण - जैसे कोई आम को जीतने समय मे पकना था उससे पहले बाह्य निमितो से पका दिया जाय,अगर कोई गीले कपड़े को फैला दिया जाय तो जल्दी सुख जाता है इकठा रखा जाय तो सूखने में देर लगती है उसी प्रकार जीव को आयु कर्मा की उदीरणा जितने समय मे होने वाली थी उससे पहले हो जाये तो उसे अकाल मरण कहते है।
यह भी जीव ने पूर्व में अपने परिणामो से ही बांधा है।
अकाल मरण चरामशरीरि जैसे गजकुमार,गुरुदत्त को भी उदय में आते है।मात्र तीर्थंकर को उदय में नही आता।

प्रत्येक जीव अपनी आयु क्रमबद्ध के अनुस्सर ही पूर्ण होती है।

जिनागम में अहिँसा का प्रयोजन जीव को प्रमाद और कषाय से हटकर आत्मसन्मुख करने का प्रयोजन है।यहां पर जीव को कठोर परिणति से करुणामय बनाने का प्रयोजन है।लौकिक में मात्र मानवता को धर्म माना जाता है। जिनागम में प्रत्येक जीव मात्र को भगवान आत्मा माना जाता है , में उनकी हिंसा अपने विषयभोग भोगने के लिए , प्रमाद को वश हो कर, अपनी इच्छा को पुष्ट करने के लिए उनकी हत्या क्यो करु वो भी एक भगवान आत्मा है जैसा में हु । आजतक जीव इच्छा आदि को पूर्ण करके सुखी नही हुआ है।
इस जान कर हमें प्रत्येक जीवमात्र के ऊपर दया करनी चाहिए।

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