तीर्थंकर को क्षायिक समकित

तीर्थंकर को क्षायिक समकित केवली के पादमूल में ही होगा या उनके निमित के बिना भी हो सकता है ?

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उनके पादमूल में ही होता है।

जो तीर्थंकर का जीव( 2- 3 कल्याणक वाले) जो क्षयोप्शमिक स्मयक्तद्रष्टि अथवा मिथ्यात्व में है वे स्वयं मुनि बनकर बादमे श्रुततकेवली हो कर स्वयं के पादमूल में अधः करण आदि तीन करण और दर्शन मोह की क्षपणा करके क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते है।
परंतु यह मात्र विदेह क्षेत्र में ही होता है।
भरत और ऐरावत क्ष्रेत्र में पूर्व भवसे क्षायिक सम्यक्त्व लेकर आते है।

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