गंध हस्तिमहाभाष्य

गंध हस्ती महाभाष्य ग्रंथ 8000 श्लोक प्रमाण आचार्य समंतभद्र द्वारा रचित है।
किसी ने कहा है यह ग्रंथ strassberg (Germany)
के city लाइब्रेरी में देखा गया था। कोई वहां पर check करवा सके तो जिनवाणी की सेवा में योगदान दे।
कोई अन्य जानकारी हो तो देने की कृपा करें
:pray::pray::pray:

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You mean Strasburg Germany?

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Yes…

I heard somewhere that गंध हस्ती महाभाष्य is explanation of only manglacharan of Tatvarth sutra. Perhaps it is of much more shlokas than you mentioned. Apta Mimamsa is the manglacharan of गंध हस्ती महाभाष्य.

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Apta Mimansa is part of it, rest is lost.

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How the pages of shastra might have been preserved for so long time ?

what is the name of the museum, address? Is it publicly available to view?

I do not think it exists in its entirety. May be fragments…

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I will be going to germany next week.please contact me on whatsapp +91 9868382397

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Do you know which museum?

Best wishes and sincerely hope you get to the museum and let us know what happens.

Ya sure

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Whats the status?

Any updates on your visit to museum?

Kind regards,
Rushi.

I can go there, if anyone can assure me name of the city and museum, because there is also one city named strassburg in France. Looking forward for answers

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try Berlin museum

I went to some museums in Berlin but didn’t find anything, I will try for museum of Asian art and some libraries where I can find something about jainism

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कुछ समय पहले जर्मनी और फ्रांस की सीमा पर स्ट्रासबर्ग(गूगल मैप पर ये शहर - strassberg आप आराम से ढून्ढ सकते हैं) - जगह है वहां के सिटी ग्रंथालय में देखा गया था, उस ग्रंथालय में काफी रहस्यमयी जगह पर ये ग्रथ रखा गया था, वहां के ताड़पत्र सूचनापत्र पर यह ग्रन्थ अंकित भी है,

मुजे इसा लग रहा है कि ईतनी आसानी से नही मिलेगा वहाँ पर कोई नया आदमी बैठा होगा उसको यह बात पता भी नही होगी
वहाँ के कोई मुख्य व्यक्ति को शायद पता हो और भी कोई jainism का कुछ भी मिले तो बताना।
वहां पर संस्कृत या प्राकृत पढ़ाने वाला कोई अध्यापक या college या school के teacher को पता हो।

कुंद कुंद स्वामी का प्रवचन सार france में प्राकृत के सम्मेलन में प्राकृत के भारतीय विद्वान को मिला था।
संस्कृत प्राकृत के साहित्य भंडार में कुछ तो jainism का ज़रूर मिलेगा।
काम कठिन है परंतु हौसला बनाये रखना कुछ तो jainism का ज़रूर मिलेगा।

My num = +91 8000220293

If u find anything please tell me

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not all artefacts are displayed for public in museums …some are kept in temperature and moisture controlled environment so that it can last for longer time… you may have to talk to people and check if there is a formal process to access them… it will be very difficult…

गंधहस्ति महाभाष्य और आचार्य समन्तभद्र

-अनुभव शास्त्री, खनियाँधाना

आचार्य समंतभद्र का जीवन, विद्वत्ता, तार्किक बुद्धि, अद्भुत क्षयोपशम एवं साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान जैन आचार्य परम्परा को गौरवशाली बना देता है। आपके संबंध में बहुत सी प्रचलित घटनाएँ हैं जिनके सम्बंध में पर्याप्त उल्लेख प्राप्त होते हैं एवं बहुधा विद्वतसमाज उनसे परिचित भी है अतः उन्हें लक्ष्य करना प्रस्तुत लेख का उद्देश्य नहीं है। आपने जैन साहित्य के क्षेत्र में जो कार्य किया है एवं स्तोत्र साहित्य को जो एक नया आयाम दिया है वह आपको अन्य आचार्यों की अपेक्षा साहित्य के क्षेत्र में अवश्य ही विशेष स्थान प्रदान करता है।

कहा जाता है कि स्वामी समन्तभद्र ने उमास्वाति/उमस्वामी के ‘तत्वार्थसूत्र’ पर 'गंधहस्ति’ नाम का एक महाभाष्य लिखा है जो कि अप्राप्त है। इस ग्रंथ की वर्षों से तलाश हो रही है। मुंबई के सुप्रसिद्ध-दानवीर सेठ माणिकचंद हीराचंदजी जे० पी० ने इसके दर्शन मात्र करा देनेवाले के लिये पांच सौ रुपये नकद पारितोषिक भी निकाला था। जैन इतिहासकार श्री जुगलकिशोर मुख़्तार ‘युगवीर’ भी प्रस्तुत ग्रंथ की तलाश में थे, आपके द्वारा लिखा गया निम्न वाक्यांश आपकी गंधहस्तिमहाभाष्य के प्रति भक्ति को प्रदर्शित करता है- मैंने भी, ‘देवागम’ पर मोहित होकर, उस समय वह संकल्प किया था कि यदि यह ग्रंथ [गंधहस्तिमहाभाष्य] उपलब्ध हो जाय तो मैं इसके अध्ययन, मनन और प्रचार में अपना शेष जीवन व्यतीत करूँगा।

प्रश्न - कहा जाता है कि गंधहस्तिमहाभाष्य विदेश की किसी लाइब्रेरी में आज भी सुरक्षित है, क्या यह बात सत्य है?

उत्तर - आज तक किसी भी भण्डार से इस ग्रंथ का कोई पता नहीं चला। एक बार अखबारों में ऐसी खबर उड़ी थी कि यह ग्रंथ आस्ट्रिया देश के एक प्रसिद्ध नगर वियना की लाइब्रेरी में मौजूद है। और इसपर दो एक विद्वानों को वहाँ भेजकर ग्रंथ की कॉपी मंगाने के लिये कुछ चंदे वगैरह की योजना भी हुई थी; परंतु बाद में मालूम हुआ कि वह खबर गलत थी। अतः वह खबर बिना किसी प्रामाणिक जानकारी को एकत्रित किए बिना ही समाचार पत्रों की हिस्सा बन गयी।

प्रश्न - गंधहस्ति का क्या अर्थ है?

उत्तर - ‘गन्धहस्ति’ एक बड़ा ही महत्व सूचक विशेषण है। गन्धेभ, गन्धगज, और गन्धद्विप भी इसी के पर्यायवाची नाम हैं। जिस हाथी की गन्ध को पाकर दूसरे हाथी नहीं ठहरते-भाग जाते हैं अथवा निर्मद और निस्तेज हो जाते हैं-उसे ‘गंधहस्ती’ कहते हैं । इसी गुण के कारण कुछ खास खास विद्वान् भी इस पद से विभूषित रहे हैं।

  • समन्तभद्र के सामने प्रतिवादी नहीं ठहरते थे; इससे ‘गंधहस्ति’ अवश्य ही समन्तभद्र का विशेषण रहा होगा और इससे उनके महाभाष्य को गंधहस्ति-महाभाष्य कहते होंगे।
  • अथवा गंधहस्ति-तुल्य होनेसे ही वह गंधहस्ति महाभाष्य कहलाता होगा और इससे यह समझना चाहिये कि वह सर्वोत्तम भाष्य है, दूसरे भाष्य उसके सामने फीके, श्रीहीन और निस्तेज हैं।

प्रश्न - क्या देवागम स्तोत्र गंधहस्तिमहाभाष्य का मंगलाचरण है?

उत्तर - प्रस्तुत संदर्भ में दोनों ही प्रकार के उत्तर सम्भावित हैं। इतिहासकार श्री जुगलकिशोर मुख़्तार ‘युगवीर’ ने जिन साक्ष्यों के आधार से उक्त संदर्भ में खोज की है उसका सार कुछ इसप्रकार है -

  • कवि हस्तिमल्ल के ‘विक्रांत-कौरव’ नाटक की प्रशस्ति में एवं ‘जिनेन्द्रकल्याणाभ्युदय’ ग्रंथ की प्रशस्ति में एक पद्य निम्न प्रकार से पाया जाता है-

तत्त्वार्थसूत्रव्याख्यानगंधहस्तिप्रवर्तकः ।

स्वामी समन्तभद्रोऽभूद्देवागमनिदेशकः ।।

अर्थ - "स्वामी समन्तभद्र ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के ‘गंधहस्ति’ नामक व्याख्यान (भाष्य) के प्रवर्तक प्रथम विधायक-हुए हैं और साथ ही वे ‘देवागम’ के निदेशक-अथवा कवीश्वर भी थे।

इस उल्लेख से इतना तो स्पष्ट मालूम होता है कि समन्तभद्रने 'तत्त्वार्थसूत्र’ पर ‘गंधहस्ति’ नाम का कोई भाष्य अथवा महाभाष्य लिखा है, परंतु यह मालूम नहीं होता कि देवागम उस भाष्य का मंगलाचरण है। ‘देवागम’ यदि मंगलाचरणरूप से उस भाष्य का ही एक अंश होता तो उसका पृथकरूपसे नामोल्लेख करने की यहाँ कोई जरूरत नहीं थी।

  • देवागम (आप्तमीमांसा) की अंतिम कारिका भी इसी भाव को पुष्ट करती हुई नजर आती है और वह निम्न प्रकार है-

इतीयमाप्तमीमांसा विहिता हितमिच्छतां।

सम्यग्मिथ्योपदेशार्थविशेषप्रतिपत्तये।।

अर्थ - जो लोग अपना हित चाहते हैं उन्हें लक्ष्य करके, यह ‘आप्तमीमांसा’ सम्यक् और मिथ्या उपदेश के अर्थ विशेष की प्रतिपत्ति के लिये कही गई है।

  1. वसुनन्दी आचार्य ने अपनी टीका में इस कारिका को ‘शास्त्रार्थोपसंहारकारिका’ लिखा है। जिससे ज्ञात होता है कि आप्तमीमांसा एक स्वतंत्र ग्रंथ है।
  2. विद्यानंदाचार्य ने अष्टसहस्री में इस कारिका के द्वारा प्रारब्ध निर्वहण-प्रारंभ किये हुए कार्य की परिसमाप्ति - आदि को सूचित करते हुए, ‘देवागम’ को ‘स्वोक्तपरिच्छेदशास्त्र’ बताया है - अर्थात यह प्रतिपादन किया है कि इस शास्त्र में जो दश परिच्छेदों का विभाग पाया जाता है वह स्वयं स्वामी समन्तभद्र का किया हुआ है।
  3. अकलंकदेवने भी ऐसा ही प्रतिपादन किया है। “इति स्वोक्तपरिछेच्दविहितेयमाप्तमीमांसा सर्वज्ञविशेषपरीक्षा।”

अतः इन सब कथन से 'देवागम’ का एक स्वतंत्र शास्त्र होना पाया जाता है जिसकी समाप्ति उक्त कारिका के साथ हो जाती है, और यह प्रतीत नहीं होता कि वह किसी टीका अथवा भाष्य का आदिम मंगलाचरण है।

समीक्षा - प्रस्तुत तर्क देवागम के एक स्वतंत्र ग्रंथ होने की उद्घोषणा तो कर रहे हैं, किंतु सिर्फ़ इसके आधार से यह कह देना कि यह गंधहस्तिमहाभाष्य का मंगलाचरण नहीं है युक्तियुक्त नहीं है कारण कि -

  1. सम्भव है कि आचार्य समंतभद्र ने इसे बाद में गंधहस्तिमहाभाष्य के मंगलाचरण के रूप में जोड़ दिया हो, अन्यथा इस प्रकार का कथन उपलब्ध ही क्यों होता?
  2. यह बात तो स्पष्ट ही है कि आप्तमीमांसा तत्त्वार्थसूत्र के मंगलाचरण को आधार करके लिखी गयी है, जिससे यह ज्ञात होता है कि यदि तत्त्वार्थसूत्र के मंगलाचरण पर आचार्य समंतभद्र ने देवागम की रचना की तो उसे गंधहस्तिमहाभाष्य [जो कि इसी ग्रंथ की टीका/भाष्य है] के मंगलाचरण के रूप में प्रयोग करना उचित ही है क्योंकि वह मंगलाचरण का ही विस्तार है अतः उसे मंगलाचरण के रूप में प्रयोग करना युक्तियुक्त है।

प्रश्न - गंधहस्तिमहाभाष्य का परिमाण कितना है?

उत्तर - गंधहस्तिमहाभाष्य के परिमाण के सम्बंध में निम्न उल्लेख प्राप्त होते हैं-

  • प्रचलित परिमाण - 84 हज़ार श्लोक परिमाण संख्या
  • 96 हज़ार श्लोक परिमाण संख्या

प्रश्न - गंधहस्तिमहाभाष्य तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ की ही टीका है अथवा किसी और ग्रंथ की?

उत्तर - उपलब्ध प्रमाणों के आधार से तो बहुधा प्रमाण गंधहस्तिमहाभाष्य को तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ की ही टीका सिद्ध करते हैं, किंतु कुछ प्रमाण एवं अनुमान ऐसे भी हैं जिससे इससे विपरीत धारा होने की भी सम्भावना प्रतीत होती है, दोनों के सम्बंध में प्रस्तुत प्रमाण निम्नलिखित है -

तत्त्वार्थसूत्र का अर्थ ‘तत्त्वार्थविषयक शास्त्र’ होता है और इसी से उमास्वामी का तत्त्वार्थसूत्र ‘तत्त्वार्थशास्त्र’ और ‘तत्त्वार्थाधिगममोक्षशास्त्र’ कहलाता है। ‘सिद्धान्तशास्त्र’ और ‘राद्धान्तसूत्र’ भी तत्त्वार्थशास्त्र अथवा तत्त्वार्थसूत्र के नामान्तर हैं। पुष्पदंत, भूतबल्यादि आचार्य द्वारा विरचित सिद्धान्तशास्त्रको भी तत्त्वार्थशास्त्र या तत्त्वार्थमहाशास्त्र कहा जाता है। कर्म-प्राभृत तथा कषायप्राभृत ग्रन्थ ‘तत्त्वार्थ शास्त्र’ कहलाते थे। तत्त्वार्थ विषयक होने से उन्हें ‘तत्त्वार्थशास्त्र’ या ‘तत्त्वार्थसूत्र’ कहना कोई अनुचित भी प्रतीत नहीं होता। इन्हीं तत्त्वार्थशास्त्रों में से ‘कर्मप्राभृत’ सिद्धान्त पर समन्तभद्र ने भी एक विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है जिसका नाम कर्मप्राभृत टीका है।अनुमानित है कि समन्तभद्र को तत्त्वार्थसूत्र के जिस ‘गंधहस्ति’ नामक व्याख्यान का कर्ता सूचित किया है वह यही टीका अथवा भाष्य हो। गन्धहस्तिमहाभाष्य जिस ‘तत्त्वार्थ’ ग्रन्थ का व्याख्यान है वह उमास्वामी का ही ‘तत्त्वार्थसूत्र’ है या कोई दूसरा तत्त्वार्थशास्त्र? आप्तमीमांसा ( देवागम) की ‘अष्टसहस्री’ टीका पर लघु समन्तभद्रने 'विषमपदतात्पर्यटीका नामकी एक टिप्पणी लिखी है, जिसमें उन्होंने सूचित किया गया है कि स्वामी समन्तभद्र ने उमास्वामी के ‘तत्त्वार्थ-अधिगम-मोक्षशास्त्र’ पर ‘गन्धहस्ति’ नाम का एक महाभाष्य लिखा है, और उसकी रचना करते हुए उन्होंने उसमें परमआप्त के गुणातिशय की परीक्षा के अवसर पर ‘देवागम’ नामक प्रवचनतीर्थ की सृष्टि की है।

इन सभी प्रमाणों से दोनों ही प्रकार की सम्भावनाएँ सम्भावित प्रतीत होती हैं, जो कि शोध का विषय है। इतिहास में जो भी घटना हुई हो किंतु, यदि वास्तव में ‘गंधहस्तिमहाभाष्य’ आचार्य समंतभद्र द्वारा लिखा गया था और वह उमस्वामी के ‘तत्त्वार्थसूत्र’ की टीका थी तो उसका अप्राप्त होना जैन साहित्य की एक बहुत ही बड़ी हानि है, जिसकी क्षतिपूर्ति अन्य किसी कृति से सम्भव नहीं है।

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