गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के निर्ग्रन्थ मुनियों के प्रति उपकार स्वरुप वाक्य

गुरुदेवश्री
#1

निर्ग्रन्थ मुनिराजों के प्रति गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के उदगार/वाक्य/घटनाएं/संस्मरण इत्यादि हों तो अवश्य प्रेषित/प्रस्तुत करें।

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#2

दिगम्बर मुनिराज तो हालत चालता सिद्ध छे।

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#3

दिगम्बर संतो नी वाणी ,आनी सामे जगत भरे पानी।

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#4

અમે તો દિગમ્બર સંતોના દસાનુદાસ છીએ…

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#6

1)एक बार चारित्र चक्रवती श्री शांति सागर जी महाराज का 8 मुनिराज का संघ सोनगढ़ आये थे और 20 दिन वहां पर रुके थे।
गुरुदेव ने उनको बोहोत भक्तिभाव से उनको वे जहां पर रहते थे वहां पर ही उनको रखा था।

श्री शांतिसागरजी मुनिराज उनसे बहुत प्रभावित हुए थे।

2- अंतरिक्ष पार्श्वनाथ में गुरुदेव ने एक जिनालय बनाया है उसकी प्रतिष्ठा एक मुनिराज ने की है।

  1. गुरुदेव जब भी कोई यात्रा आदि पर जाते थे वहां पर कोई दिगम्बर मुनिराज मिले तो गाड़ी मेसे उतरकर जूते निकाल कर उनको प्रणाम करने जाते थे।वे मुनिराज को देखकर प्रसन्न हो जाते थे।
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#7

Exract from “चरित्र चक्रवर्ती” पुस्तक - आचार्य शांतिसागर जी की जीवनी by पंडित सुमेरू चंद्र दिवाकर

मतलब कानजी स्वामी मुनियों से वार्तालाप करते थे। उनको लेने भी जाते थे।

#17
  • सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के आराधक वीतरागता के पिण्ड, मुनि चले आ रहे हों, वह तो मानो साक्षात मोक्ष तत्त्व आया है। अहा ! ऐसो मुनिदशा रूप जिनमुद्रा जिसे नहीं रुचती, उसे आराधना का प्रेम ही नहीं है। ऐसी जिनमुद्राधारक मुनि के साक्षात् दर्शन होने पर मुमुक्षुजीव का हृदय आराधना के प्रति भक्ति से उछल पड़ता है।

    अरे ! स्वप्न में भी जिसे ऐसी मुनि दशा के प्रति अरुचि आये अथवा उसके प्रति अवज्ञा हो, वह जीव गहन भव वन में भटकता है, क्योंकि उसे आराधना के प्रति तिरस्कार हैं। धर्मी को तो स्वप्न में भु वीतरागी संत-धर्मात्मा का बहुमान आता है। स्वप्न में भी मुनि इत्यादि धर्मात्मा के दर्शन होने पर भक्ति से धर्मी का रोम-रोम उल्लसित हो जाता है।

    (-भाव पाहुड़ पर प्रवचन से)
  • अहो! मुनिवर तो आत्मा के परम आनन्द में झुलते-झुलते मोक्ष की साधना कर रहे हैं । आत्मा के अनुभव पूर्वक दिगम्बर चारित्र दशा द्वारा मोक्ष की सिद्धि होती है। दिगम्बर साधु; अर्थात्, साक्षात् मुक्ति का मार्ग। अहो! ये तो छोटे सिद्ध हैं ! अन्तर चिदानन्दस्वरूप में झूलते झूलते बारम्बार शुद्धोपयोग द्वारा निर्विकल्प आनन्द का अनुभव करते हैं। पंच परमेष्ठी की पंक्ति में जिनका स्थान है, ऐसे मुनिराज की महिमा की क्या वात ? ऐसे मुनिराज के दर्शन हों तो भी महान आनन्द की बात है। ऐसे मनिवरों के तो हम दासानुदास हैं। हम उनके चरणारविन्द को नमन करते हैं। धन्य मुनिदशा! हम भी इस दशा की भावना भाते हैं।

    (- गुरुदेव श्री के वचनामृत, 142, पृष्ठ 90)

Reference: Dhanya Munidasha

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#18

गुरूदेव श्री के मुनिराज के लिए वाक्य-
1.मुनिराज तो नग्न बादशाह हैं।
2.मुनि दशा माने केवलज्ञान की टलेती हैं।

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#19

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