निश्चय सम्यकदर्शन किस गुणस्थान से?

#1

निश्चय सम्यकदर्शन किस गुणस्थान से? कृपया किन्ही आचार्य के शास्त्र का reference देना ।

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#2

दर्शन मोहनीय का उपशम / क्षय होने से चतुर्थ गुणस्थान से निश्चय सम्यकदर्शन होता हैं।

गुणस्थान का नाम: अविरत सम्यक्त्व - यहाँ “सम्यक्त्व” आदि दीपक होने से सम्यक्त्व इस गुणस्थान से सिद्ध पर्यन्त पाया जाता हैं (तथा “अविरत” अंत दीपक होने से अविरत प्रथम से इसी गुणस्थान पर्यन्त पाया जाता हैं।)

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#3

करणानुयोग के अनुसार 4थे गुणस्थान वर्ति जो सम्यकदृष्टि है वही निश्चय सम्यकदर्शन होता है और यही परमार्थ है।सच्चा सम्यकदृष्टि वही है।परंतु स्मयक्तद्रष्टि है या नही वह जानना केवलज्ञान गोचर विषय है। छद्मस्त नही जान सकते।(दर्शन पाहुड गाथा 2 की जयचंदजी छाबड़ा की टीका,मोक्षमार्ग प्रकाशक page- 265,286)

व्यवहार सम्यकदर्शन की बात बाकी तीन अनुयोगों में बताई जाती है।परंतू व्यवहार सम्यकदर्शन के लक्षण मिथ्यादृष्टि में भी पाए जाते है।

निश्चय और व्यवहार सम्यकदर्शन की विशेष चर्चा मोक्षमार्ग प्रकाशक 9 वे अधिकार में सम्यक्त्व के भेद और उनके स्वरूप में की है।

:pray::pray::pray:

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#4

किन्ही आचार्य द्वारा इसका प्रमाण मिल सकता है?

#5

करणानुयोग में व्यवहार और निश्चय ऐसा मिलना मुश्किल है।
व्यवहार मतलब उपचार करणानुयोग में ऐसा नही है।
क्योंकि वहां तो अनंतानुबंधी का क्षय अथवा उपशम वही सम्यक्त्व है।

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#6

R u clear ??

#7

नहीं, हमारी मान्यता के अनुसार 4th गुणस्थान में सिर्फ व्यवहार सम्यक दर्शन होता है। निश्चत सम्यक्दर्शन तो 7th गुणस्थान में शुद्धोपयोगी मुनि के ही होता है।

#8

सम्यकदर्शन श्रद्धा गुण से सम्बदधित है।4 थे गुणस्थान वर्ति को श्रद्धा अपेक्षा मिथ्यात्व और समयकमिथ्यात्व दोनो का अनुदय है 7 वे गुणस्थान में भी श्रद्धा अपेक्षा ऐसा ही है।
श्रद्धा अपेक्षा दोनो कुछ भिन्नता नही है।
चरित्रमोह्निय की अपेक्षा से भिन्नता है।परंतु इससे श्रद्धा कुछ फर्क नही पड़ता।

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#10

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#11

इसमे निश्चय सम्यकदर्शन 7 वे गुणस्थान से होता है ऐसा कहाँ पर है?

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#12

(उदहारण) - cup दो नहीं हैं, cup का निरूपण दो प्रकार है। जहाँ काच के cup को काच का cup निरूपित किया जाय सो निश्चय cup है। और जहाँ जो cup तो है नहीं परन्तु cup का निमित्त है व सहचारी है उसे उपचारसे cup कहा जाय सो व्यवहार cup है - जैसे पानी का cup.

(सिद्धांत) - सम्यकदर्शन दो नहीं हैं, सम्यकदर्शन का निरूपण दो प्रकार है। जहाँ सच्चे सम्यकदर्शन को सम्यकदर्शन निरूपित किया जाय सो निश्चय सम्यकदर्शन है। और जहाँ जो सम्यकदर्शन तो है नहीं परन्तु सम्यकदर्शन का निमित्त है व सहचारी है उसे उपचारसे सम्यकदर्शन कहा जाय सो व्यवहार सम्यकदर्शन है - जैसे देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा सम्यकदर्शन हैं।

Conclusion: निरूपण में नय होते हैं, प्रवर्ति में नहीं तथा निश्चय नय के निरूपण बिना व्यवहार नय का भी निरूपण नहीं होगा।


निश्चय-व्यवहारका सर्वत्र ऐसा ही लक्षण है। सच्चा निरूपण सो निश्चय, उपचार निरूपण सो व्यवहार; इसलिये निरूपण-अपेक्षा दो प्रकार सम्यकदर्शन (या cup) जानना। (किन्तु) एक निश्चय सम्यकदर्शन (या काच का cup) है, एक व्यवहार सम्यकदर्शन (या पानी का cup) है - इसप्रकार दो मोक्षमार्ग (या कप) मानना मिथ्या है।

मोक्षमार्ग में प्रवर्ति के लिए निश्चय-व्यवहार का सटीक ज्ञान होने की अति अव्यश्कता हैं। जिनाज्ञा या गुरुआज्ञा मानकर निश्चय-व्यवहाररूप सम्यकदर्शन दो प्रकार मानने से उसका भाव भासन नहीं होगा, स्वयं अंतरंगमें निर्धार करके यथावत् निश्चय-व्यवहार सम्यकदर्शन को पहिचाना।

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#13

निश्चय सम्यग्दर्शन, निश्चय सम्यग्ज्ञान और निश्चय सम्यग्चारित्र हमेशा एक साथ ही होते है। जब कोई भावलिंगी मुनि परमसमाधि (निर्विकल्पसमाधि)(शुद्धोपयोग) में लीन होते है तब ही होते है।

#14

व्यव्हार सम्यक्दर्शन भी सम्यक्दर्शन है, निश्चय सम्यक दर्शन भी सम्यक दर्शन है, बस अंतर ये है की व्यवहार सम्यक दर्शन साधन है, और निश्चय सम्यक दर्शन साध्य है।

व्यवहार नय भी सही है। जो व्यवहार नय को गलत माने , वो जिनागम को कभी निष्पक्ष होकर समझ ही नहीं सकता। वो तो एकांतवादी है, दूसरा दृश्टिकोण देखता ही नहीं।

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#15

7 वे गुणस्थान में और 4 थे गुणस्थान में श्रद्धा अपेक्षा दोनो के दर्शनमोहनीय में क्या अंतर होगा?

व्यवहार सम्यकदर्शन और निश्चय सम्यकदर्शन के दर्शन मोहनीय में क्या अंतर होगा?

दोनो अवस्था मे दर्शनमोहनीय समान ही होंगे।फर्क मात्र चरित्रमोह्निय में ही पडेग़ा।
परंतु सम्यक्त्व तो श्रद्धा गुण की पर्याय है।

द्रवयानुयोग और करणानुयोग को mix करने पर जिनवाणी का यथार्थ भाव पकड़ में नही आएगा।

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#16

Parantu vyavahar aur nischay mai toh antar hoga na. Keval darshan mohniya ko hii kyu dekhna hai. Jaha hum nischay ki baat karte hai waha darshan, gyaan aur charitra teeno ki ekta chahiye. Waha sirf darshan aur gyaan hoga toh kaise chalega. Pravritti mai toh wah ekta banegi nahi.

4th Gunasthan mai charitra toh hai hii nahi. Vyavahar se 7 tattva aur 9 padarth ka yatharth shraddhaan hai kintu charitra mohini karma ke uday se charitra dasha abhi nahi hui hai.

Kyunki 5th Gunasthan se charitra prarambh hota hai. Par wah bhi anuvrat hii hai.

Vaastavik charitra toh 6th Gunasthan se hii hota hai. Acharya KundaKunda bhi kehte hai ki - “Naggo hii mokh maggo” matlab Nagnnata hii mokshamarg hai. Unhone toh moksha marg ka prarambh hii 6th Gunasthan se maana hai.

Nischay samyakdarshan toh mann, vachan aur kaay teeno ki ekta se jo vishuddh samyakdarshan utpann hota hai woh hua na.

Jab koi muni maharaj shuddhupyog mai hote hai tabhi aisi yogo ki ekta ho paati hai. Usme jo samyakdarshan ki vishuddhi hoti hai aur karm nirjara hoti hai wah alag hii hai. Usko hum 4th Gunasthan mai hii maan lenge to theek pratit nahi hota.

Kya 4th Gunasthan varti Samyakdrishti aur 7th Gunasthan varti Samyakdrishti ke parinaam ko aap ek saa maan sakte ho kya?

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#17

करणानुयोग में व्यवहार और निश्चय सम्यकदर्शन इस तरह का आता ही नही।

यहां पर चर्चा में दो अनुयोग mix हो रहे है।

विशेष अध्ययन के लिए नाटक समयसार में gunsthan अधिकार और तत्वज्ञान विवेचिका देख सकते है।

हम सभी जन जिनवाणी का यथार्थ भाव पकड़े ऐसी मंगल भावना है।

:pray::pray::pray:

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#18

They cannot be similar. Parinaam 6th gunasthan main jyada hoga…Natak Samaysar main acha explanation hai…4th gunasthan main prathomopshamik samyegdarshan…fir jeev ke pursharth se charitra main vriddhi, aatma dyan se parinamon main nirmalta, fir ek ek pratima lete jata hai…jab jeev muni dasha angikaar karta hai toh shraddha aur charitra goon ki nirmalta aur prabalta jyada hai 4th gunasthan wale jeev se …Muniraj sirf aatma dyan ke time par hi 7th gunasthan main jate hai…jab dhyan toot ta hai, muniraj firse 6th gunasthan main aate hain…

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#19

Just an addition to above discussion-
मुख्य रूप से जिनवाणी की कथन शैली-
नयों के निश्चय नय और व्यवहार नय, ये भेद अध्यात्म में कहे गए है।
आगम में नयों के द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक भेद माने हैं।
अतः नयो के प्रयोग में भी यही बात देखी जा सकती है। इसीकारण अन्य अनुयोगो में सम्यक दर्शन के कथनों में निश्चय व्यवहार भेद संबंधी कथन विरले ही होते हैं।

Note-

  • अध्यात्म द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत आता है।
  • अन्य तीन अनुयोग एवं द्रव्यानुयोग का भी बहुभाग आगम कहलाता है। आगम के सारभूत तत्व को अध्यात्म कहते हैं।
#20

Answer to this question has been answered above-

#21

4 Gunasthan varti avirati samyakdrishti ne jeev aadi 7 tattvo ko samjha toh hai par purnataya utaara nahi hai apne charitra ke andar jabki 7 gunasthan varti muni maharaj bahai tatha antarang parigrah se vimukh unn tattvo ko swikaar kar chuke hai aur nirantar unke manan chintan mai lage rehte hai.

Unke shraddhaan ki pavitrata nischay se ho gayi hai kyunki unhone unn tattvo ko sampuurn roop mai svikaara hai aur utaara hai apne charitra mai(conduct mai). Jab tak aap 7 tattva 9 padartho ka yatharta shraddhaan apne charitra mai na utaar paaye toh phir nischay se samyakdarshan kaise sambhav hai?

Agar 4th Gunasthan mai hii nischay samyakdarshan ho jaata hai toh phir toh vyavahaar samyakdarshan ki paribhasha ki zarurat hii nahi hai kyunki phir toh sab hii nischay se samyakdrishti ho gaye. Jo ki thoda theek pratit nahi hota.

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