जिनवाणी में बदलाव कहां तक उचित?

मैं ये नहीं कहा रहा कि पंचामृत अभिषेक सही है या गलत या वो आचार्य मूलसंगी थे या कस्ठा संगी ।

लेकिन अगर हम उनकी किताब पढ़ते है तो उसमें छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।

जैसे पद्मपुराण को आचार्य रविषेण ने संस्कृत में लिखा था , वे मूल्सांगी नहीं माने जाते। पंडित दौलतराम जी (छह ढाला लिखने वाले) ने ढुंढारी भाषा में उसे translate kia,usme पंचामृत का वर्णन को हटाया नहीं ।

Kundkund कहान पारमार्थिक ट्रस्ट वालो ने दौलतराम जी का (translated) पद्मपुराण से panchamrit ka पूरा para graph ही gayab kar dia.

Online book available है , uska page 362 पर।

(Section - 32)

May see photo below for comparison.

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Can you provide the publishing details of second book as well

All the publishers who publish unchanged version of Pandit Daulat Ram translated Padampuran, has the same content as 2nd book in which Panchamrit abhisekh is mentioned. The book is in temple, when I will go there, I will tell.

1 st book ( बदलाव सहित)

2nd book.

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Very interesting. I took the Gujarati translation of this same from atmadharma.org and did find the full text but with a footnote (which was probably added by the translator).

Can someone explain the footnote to me? But it is indeed not good that the entire section is omitted in the translation.

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But in general, I want to get more thoughts from people here. As per my understanding, Panchamrat is a strict no-no for our Murtis (the same is also mentioned in the footnote in the translation published by atmadharma.org). I didn’t know this was mentioned in Jinwani. Anyone care to comment on this section? Is there a context behind this passage in Jinwani? etc. etc.

@jinesh @Kishan_Shah @Sulabh @Sayyam

मूल संघ में पंचामृत अभिषेक का अभाव

यह लेख प. मिलापचंद्र जी कटारिया द्वारा लिखित है तथा उनके शोध खोज पूर्ण मौलिक निबन्धों का संकलन जैन निबन्ध रत्नावली भाग 1 pdf link में आपको प्राप्त होगा। (पुस्तक का अंतिम लेख है)

वहां विस्तार से इस बात पर मंथन किया गया है कि कैसे कुछ जैन ग्रंथों में पंचामृत की चर्चा आती है, उसका क्या कारण रहा है और अभी वर्तमान में हम सभी को किस प्रकार का अर्थ ग्रहण करना योग्य है।

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धन्यवाद। मैंने थोड़ा बहुत पढ़ा है अभी और यह निबंध काफी रोचक लग रहा है। इसका डिजिटल अनुवाद करने का प्रयत्न करना चाहिए।

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हमारे प्रथमानुयोग कुछ ग्रंथ श्वेताम्बर के ग्रंथ में से लिखे गए है।
आज हमारे पास जितने भी मूल ग्रंथ समयसार से लेकर षट्खंडागम तक सारे ग्रंथ भट्टारक से मीले है।उन्होंने ही जब मुगल, बौद्ध आदि का जोर पूरे भारत मे था तब उन्होंने हमारे ग्रंथो की रक्षा की थी ।
परंतु बाद में इन ग्रंथों का ताड़पत्र में से लेखन शुरू हुआ तब अपना पंथ को पुष्ट करने के लिए चरणानुयोग,और प्रथमानुयोग के ग्रंथों में कहीं कहीं सुधार कर दिया।

अनुवादक का नियम होता है वह ग्रंथ में कुछ भी निकाल नही सकता इसी लिए नहीतो श्रोता को ग्रंथ अनुवादक पर से भरोसा उठ जाएगा।

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परिवर्तन के 2 प्रकार हैं -

  1. विकास युक्त परिवर्तन
  2. विकार युक्त परिवर्तन

अपूर्ण सहित्य, दोषयुक्त साहित्य, विकार युक्त साहित्य में समय के अनुसार, विवेक के आधार से, आगमों की अनुकूलता से जो परिवर्तन होते हैं वे विकास युक्त परिवर्तन कहलाते हैं।

स्वच्छंदता, निज प्रचार, मिथ्यारीति, दुराग्रह, लोकेषणा आदि से युक्त साहित्य में होने वाला परिवर्तन विकार युक्त परिवर्तन कहलाता है।

पहला परिवर्तन हितकर और कल्याणकारी है जबकि दूसरा अहितकर एवं अमंगलप्रद।

जैन सहित्य में दोनों प्रकार के परिवर्तन हुए हैं, उनमें से विकास युक्त परिवर्तन को आदर की दृष्टि से देखना चाहिए और विकार युक्त परिवर्तन को दूर करना चाहिए।

पद्मपुराण के उक्त अंश में विकार युक्त परिवर्तन की झलक है अतः उसे विकास युक्त परिवर्तन के साँचे में ढालना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।

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बहुत उत्तम उत्तर है। लेकिन प्रश्न तब भी है कि स्वयं दौलतराम जी ने ऐसा क्यों नही किया? उन्होंने तो इसे अनुवादित किया था।

शायद इसलिए ही क्योंकि उन्हें मात्र अनुवाद करने की जिम्मेदारी दी गई हो।

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जैन निबंध रत्नावली के भाग २ के लेख क्र. २४ - ‘क्या पउम चरिय दिगम्बर ग्रंथ है?’ में इस प्रश्न के मूल श्रोत पर बहुत आवश्यक जानकारी मिलती है। पूरा लेख ही पठनीय है। फिर भी उसका कुछ अति महत्वपूर्ण अंश यहाँ पर प्रेषित कर रहा हूँ। Highlighted part पर विशेष ध्यान दें।

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आज हमारे पास जितने भी मूल ग्रंथ समयसार से लेकर षट्खंडागम तक सारे ग्रंथ भट्टारक से मीले है।उन्होंने ही जब मुगल, बौद्ध आदि का जोर पूरे भारत मे था तब उन्होंने हमारे ग्रंथो की रक्षा की थी ।

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आकाश सभी द्रव्यों को स्थान देने में निमित्त है। १ समय में हर जीव और पुद्गल द्रव्य किसी का किसी प्रदेश या प्रदेशों पर स्थित होगा। उस समय आकाश की पर्याय ऐसी होगी जो उन सभी द्रव्यों को उनके respective प्रदेशों पर स्थित होने पर निमित्त होगी। हर समय हर द्रव्य का प्रदेश बदलता रहेगा, उसी प्रकार आकाश की पर्याय भी उन बदलते प्रदेशो के साथ स्वयं बदलती रहेगी। ध्यान रहे आकाश की पर्याय केवल निमित्त है।

इसी प्रकार से बाकी तीन द्रव्यों का भी समझ लीजिये।

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