आत्मा का स्वाभाविक सुख

#1

आत्मा का स्वाभाविक सुख जो किसी भी तरह की बाहरी चीजो के बिना मिल सकता है। वो कैसे अनुभव कर सकते है? इसके लिए कोई प्रयत्न किया हो तो अनुभव लिखे।

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#2

जैसे मिश्रि का गुण मिठास है उसी तरह आत्मा में सुख गुण जो कि बाहर से नही अंदर ही है।

सर्व प्रथम 6 द्रव्य का स्वरूप जान कर उसमें चिन्तन करना।

जैसे में ये शरीर नही हु उसके अंदर विराजमान जीव जो ज्ञानमय अरस अरुपी है वही में हु इस चिंतन करने से भेदविज्ञान होगा और प्रत्येक जीव जीव दिखेंगे पुद्गल पुद्गल दिखेंगे उसमे पर्याय दृष्टि मात्र व्यवहार से होगी एसा करने से रागादि भाव कम होकर वैराग्य बढेगा और प्रत्यक्ष आत्मा का श्रद्धान हो सकता है।इसमें ईच्छा का अभाव होनेसे निराकुलता मय सुख होता है।

विशेष अध्ययन के लिए आप रूपस्थ ध्यान और पिण्डस्थ ध्यान कर सकते है।

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#3

यहाँ 2 लेखक (:innocent:) अपना अनुभव बता रहे है -

दृस्टि का विषय (CA Jayesh Seth, Mumbai, 2014)

परमात्मा होने का विज्ञान (Babu Lal Jain, Delhi, 1990)

#4

रूपस्थ ध्यान और पिण्डस्थ ध्यान क्या है और कैसे किया जा सकता है? Please बताये।

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#5

रत्नकरंश्रावकाचार
षष्ठ सम्यकदर्शन अधिकार में
Page no- 406 and 411

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#6

आत्मा का स्वाभाविक सुख आत्मा ध्यान द्वारा प्रगट होता हैं। कोई सम्यक्त्व सन्मुख मिथ्यादृष्टि या सम्यक्त्वी स्वरुप ध्यान के लिए प्रयत्नरत हुआ, वहां:

(सविकल्प दशा)

  • प्रथम तो भेद विज्ञान स्वपर का करें। नोकर्म - द्रव्यकर्म - भावकर्म रहित केवल चैतन्य चमत्कार मात्र अपना स्वरुप जाने।
  • पश्चात् पर का तो विचार छूट जाये, केवल स्वात्म विचार ही रहता हैं। वहाँ अनेक विचारो द्वारा स्वयं में अहं बुद्धि धरता हैं।
  • चिदानंद हूँ, सिद्ध हूँ, शुद्ध हूँ - इत्यादि विचार होने पर सहज ही आनंद तरंगे उठती हैं and it create excitement.

(निर्विकल दशा)

  • तत्पश्चात ऐसा विचार तो छूट जाये, केवल चिन्मात्र स्वरुप भासने लगे। वहाँ सर्व परिणाम उस रूप में एकाग्र होकर प्रवर्तते हैं। दर्शन-ज्ञानादि तथा नय-प्रमाण आदि का विचार विलय हो जाता हैं।

Outsourced from रहस्य पूर्ण चिट्ठी। There is also a गाथा in समयसार where आचार्य अमृतचन्द्र explain the similar process. Can anyone point it out?


You can experience a similar kind of process in your day to day life like:

(सविकल्प दशा) We all spend time in deciding which smartphone to buy by going into details (company, specs, hardware, processor, RAM etc) - नयो द्वारा निर्णय करना। (निर्विकल्प दशा) And once decided & bought, we use it freely without any further thinking.

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#7

समयसार गाथा 144 की आत्मख्याति टीका (p. 226-27) -


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#8

No idea about that book

#9

you can get granth online.

#10

The PDF of Ratnakarand Shravakachar can be downloaded from this link.

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