कषाय एवं लेश्या में अंतर

#1

कषाय एवं लेश्या में क्या क्या अंतर हो सकते हैं?
लेश्या की संक्षिप्त जानकारी यहाँ संलग्न है, इसके अलावा इसका और विस्तार एवं कषाय से इसकी भिन्नता स्पष्ट करें।

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#2

●कषाय को नापने का का साधन लेश्या है। लेश्या के माध्यम से कषायो के तीव्रतम,तीव्रतर,तीव्र,मंद,मंदतर,मंदतम आदि स्थान नापे जाते हैं।
●कषाय के अभाव पर मोक्षमार्ग depend होता है
●लेश्या के आधार पर आयु के बंध की व्यवस्था होती है।

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#3

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क्या ऐसा नियम है ? क्योंकि जन्म तो सबका रोते-रोते ही होता है, पर उसी भव से वे सर्वार्थसिद्धि भी जाते है (शुक्ल ध्यान में मरण) फिर ऐसा नियम कैसे लागू होगा ?

#4

एक अंतर यह भी है की - योग (अभिप्राय) से प्रकृति प्रदेश बंध होता है और कसाय (लेश्या) से स्तिथि-अनुभाग बंध --Please correct if I’m wrong here .

शुभोपयोग (भले अभिप्राय) में अशुभ लेश्या हो सकती है (eg- मुनि की रक्षा के अभिप्राय से सूकर ने शेर से युद्ध किया) परन्तु अशुभोपयोग में शुभ लेश्या नहीं हो सकती ।

योग में भी मन (परिणाम) आजाते है और कसाय में भी - परन्तु योग में बस शुभ या अशुभ ही देखेंगे, तीव्रता या मंदता नहीं और कसाय में तीव्रता - मंदता को देखेंगे…as discussed with @jainsulabh during daily concall on Bhaav Deepika

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#6

यह कहाँ पर लिखा है।
जिस लेश्या में जन्म…
क्या आप बता सकते है?

#7

It is written in the last line of document.
One more thing,

सुमत प्रकाश जी के जो ६ लेश्या पर प्रवचन है उसमे उन्होंने कसाय को अभिप्राय से जोड़ा है और लेश्या को योग से, पर मैंने यहाँ उल्टा लिखा है (इसलिए ही सुधार करने को भी लिखा था) - क्योंकि प्रकृति प्रदेश बंध योग से ही होता है और स्तिथि अनुभाग बंध कसाय से । अब यदि लेश्या को योग मानेंगे तो प्रकृति प्रदेश बंध लेश्या से हुआ, पर योग में तो हम तीव्रता- मंदता लेते नहीं है और लेश्या तो तीव्रता मंदता पर ही आधारित है, फिर लेश्या को योग से कैसे जोड़ सकते है ?

#8

यह document किनका है।

#9

भाई
योग में भी तीव्रता और मंदता होती है।
लेश्या अर्थात योग की प्रवुति।
कषाय और लेश्या का कारण कार्य संबंध है।
कारण - कषाय
कार्य - योग

#10

जी योग में तीव्रता- मंदता नहीं लेते इसलिए ही तो योग से प्रकृति-प्रदेश बंध कहा क्योंकि प्रकृति-प्रदेश बंध में शुभ है या अशुभ बस इतना ही देखते है, कितनी तीव्रता या मंदता है ये नहीं ।
और स्तिथि-अनुभाग बंध कसाय से कहा क्योंकि उसमे तीव्रता-मंदता देखते है ।

परन्तु यह समझ नहीं आया की पंडित जी ने लेश्या को योग से क्यों जोड़ा ? चूँकि लेश्या भी तीव्रता-मंदता पर ही आधारित है इसलिए लेश्या को कसाय से जोड़ना था और योग को अभिप्राय से, क्योंकि अभिप्राय भी बस शुभ अशुभ या शुद्ध होता है उसमे भी कुछ तीव्रता- मंदता नहीं होती । पर पंडित जी ने कहा की लेश्या मतलब योग और कसाय मतलब अभिप्राय ।

#11

कृष्ण निल कपोत पीत पद्म और शुक्ल यहां कृष्ण को तिव्र शुक्ल को मंद लेश्या कहेंगे।
यहाँ तीव्र और मंद इस तरह देखने मे आता है।

#12

जी मैंने कहाँ कहा की लेश्या में तीव्रता मंदता नहीं होती ।
@jainsulabh इस विषय में आपको क्या लगता है ?

#13
कषाय रंजित योगों की प्रवृत्ति का नाम लेश्या है, जातें आत्मा के कर्म से लिप्त करें ऐसे योग अर कषाय; ताते उसका नाम लेश्या है । नाम कर्म के उदय तै द्रव्य मन, द्रव्य वचन, द्रव्य काय निपजें हैंतिनकी चेष्टा कहिये प्रवृत्ति होते संते आत्मा के प्रदेश चंचल होय हैं। प्रदेश चंचल होतें कर्म के ग्रहण की शक्ति निपजै है । ताकरि कर्म वर्गणानि का ग्रहण होय है। आत्मा के प्रदेशों से एक क्षेत्रावगाह संयोग होय है । तातै इनका नाम योग है। इन योगन की कषाय सहित प्रवृत्ति, ताकौं लेश्या कहिये। ऐसा लेश्या का स्वरूप है, सो ही शास्त्रनि विर्षे कह्या है।

बहुरि योग कषायनि की प्रवृत्ति तीव्र, मध्य, मंद, मंदतर इन चार प्रकार होय है। ताकै अनुसार आत्मा पंच पापरूप कार्य विषैं प्रवर्ते है। हिंसा, अनृत, (असत्य) स्तेय, अब्रह्म, परिग्रह - विषय-तृष्णा इन पंच पाप रूप जो तीव्र, मध्य, मंद, मंदतर, कार्य; ताके अनुसार कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, शुक्ल ऐसे दृष्टान्त पूर्वक लेश्या के छह नाम कहे हैं।

बहुरि कषाय चार प्रकार है - क्रोध, मान, माया, लोभ ।

भाव दीपिका जी, अधिकार ४(४)
यहां पर कहा है कि कषाय से रंजित योगों की प्रवृत्ति का नाम लेश्या है। परंतु लेश्या का ज्ञान कराने के लिए कषायों की प्रवृति का सहारा लिया जाता है। तरतमपना तो कषायों में पाया ही जाता है और लेश्याओं के भेद (कुल72 भेद- 24+24+12+12; अनंतानुबंधी और अप्रत्याख्यान के 24-24, और प्रत्याख्यान और संज्वलन के 12-12) देखने पर भी यह बात स्पष्ट हो जाती है।

मूल में तो कषाय का अभाव कराने का प्रयोजन है, परंतु वह सीधे सीधे दिखाई नहीं देती। दिखाई तो काय वचन और मन की प्रवृत्ति ही देती है, अतः इनके द्वारा ही स्व-पर की अंतरंग परिणति का ज्ञान कराते है। क्रिया से परिणाम तथा परिणाम से अभिप्राय का ज्ञान किया जाता है/पकड़ मे आता है और तब उनके मिथ्या और सम्यकपने का निर्णय होता है।
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