जीव हिंसा में भेद क्यों?

Kya ekindriya jeev ki hinsa mai utna hi paap jitna panchindrya jeev ki hinsa mai?

नहीं, जैसे जैसे इन्द्रियाँ अधिक होती जाएगी, वैसे वैसे हिंसा का दोष भी अधिक होता जाता है।

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Par jab hum sabhi jeevon ko ek Nazar se dekhte. Sabko ek jaise samjhte koi bada nahi koi chota nahi. Toh phir aesa kyu

द्रव्य दृष्टि से सभी जीव समान है परन्तु सभी जीवो की वर्तमान पर्याय भिन्न भिन्न है। और यह पर्याय अपेक्षा छोटे-बड़े का अंतर तो है ही। जिस हिंसा का पाप रूप फल प्राप्त होता है, वह भी उनकी उस पर्याय के हनन के संकल्प-विकल्प का लगता है। यदि जीव की हिंसा नहीं भी होती है तब भी उन अशुभ परिणामों का फल प्राप्त होता ही है।

Main point तो यही था लेकिन अन्य रूप में भी विचार कर सकते है-

हिंसा में प्रमाद परिणती मूल है- अतः जहाँ प्रमाद की अधिकता होगी वहाँ दोष भी अधिक होगा और पाप का बंधन भी अधिक होगा। अधिक-अधिक इन्द्रिय वाले जीवों के प्राणो का हनन तीव्र-तीव्र कषाय का सूचक है, एवं फलस्वरूप हिंसा का पाप भी अधिक अधिक लगता है।
जिस जीव-विशेष की हिंसा हुई है(या जिसकी हिंसा का परिणाम हुआ है), उसको उसकी इंद्रियों की प्राप्ति की दुर्लभता भी एक हेतु है। जीव को एक इन्द्रिय से दो इन्द्रिय की प्राप्ति होना अधिक दुर्लभ है, इसीप्रकार दो से तीन, तीन से चार, चार से पाँच(असंज्ञी), पाँच(असंज्ञी)से संज्ञी, उसमें भी तिर्यंच से मनुष्य गति अधिक दुर्लभ है। किसी जीव विशेष की हिंसा उसकी इस प्राप्त दुर्लभता को उससे छीनने जैसा ही है।अतः अधिक दुर्लभता से प्राप्त पर्याय के हनन का अधिक पाप है।
इस तर्क के होने पर भी यदि अभिप्राय ही हिंसा करने का है तो अधिक पाप है। और इसीलिए आगम में संकल्पी, विरोधी, उद्योगी और आरंभी हिंसा के भेद से भी दोष में तरतमता होती है। समरम्भ-समारंभ-आरम्भ, मन-वचन-काय और कृत-कारित-अनुमोदन से भी अंतर की बात आती है।
हमारा भावनात्मक जुड़ाव भी ये बात प्रत्यक्ष बताता है, हम अधिक इन्द्रिय वाले जीव के प्रति ज़्यादा सम्वेदनशील होते ही है। उनके प्रति राग-द्वेष की वृत्ति भी अधिक होती है।
सभी प्रकार की हिंसा प्रवृत्ति पाप रूप ही है, अशुभ ही है, मोक्षमार्ग से अत्यंत विपरीत है। अतः विशुद्धता को बढ़ाते हुए अहिंसात्मक जीवन जीने का ही प्रयास करे। जितना पालन कर सकते है, उतना पालन करें; जितना पालन नहीं कर पा रहे है, उसकी भावना करें; और, जो पालन कर रहे हैं, उनकी अनुमोदना करें।
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