चतुर्थ गुणस्थान में शुद्धोपयोग और सम्यक्चारित्र

M not sure but I think this example doesn’t fit here. I might be wrong though.

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It depends upon your perception.
I think the example complete fits here.
The lady doctor has the knowledge of delivery. It’s procedure , what precautions to take etc. Similarly a आत्मानुभवि has the knowledge of the soul. The procedure to get it(via digambar monkhood, arihant and finally siddh), precautions to take(कषाय की मंदता, शील का पालन etc).

But the doctor hasn’t herself experienced what happens when a lady delivers, the pain , feelings etc.

Similarly, आत्मानुभवि don’t have hand on experience of the soul. How soul looks like. The feelings etc.

I think अनुभव it selfs means experience.

Does the example covers the aatma part of aatmanubhuti/aatmanubhav?
I don’t think so. Thus like most of the times trying to bring empirical example in the experiential realm leaves you doing a categorical mistake.

I’ll later try to explain this in simple language.

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Also with respect to shat-karak in Sanskrit language, between anubhav and anubhuti, there is a difference of karm and kriya.

Does this means anubhav and anubhuti happens at the same time? Coz karm and kriya does

चलो इससे यह तो सिद्ध होता है, की आत्मानुभव और आत्मानुभूति अलग अलग है।
अब मुझे कोई किन्ही आचार्य का शास्त्रीय प्रमाण दे दे की आत्मानुभव और शुद्धोपयोग एक ही समय होता है तो बहुत मदद होगी।

Please also try to understand the point of view of a person according to whom the realm doesn’t lie in the experiential domain of us.
Now lets move to some logical explanation.

Ques. क्या अनंतानुबंधी कषाये का अभाव शुद्धोपयोग है ?

@Sulabh
Even Br. Sumat Prasad Ji confirms that aatmanubhav and aatmanubhooti are 2 different things.
Watch the video from 49:57 onwards.

So I would request everyone to please revise your gained knowledge by putting “aatmanubhav” and “aatmanubhooti” differently.

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शुद्धोपयोग के होने पर और उसकी वृद्धि होने पर कषायों की श्रंखला टूटती है, चारों की ही- अनंतानुबंधी आदि सभी।

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Bhai, it came in another reference for another point. From samaysar ji gatha 17-18 tika. Please read it from the source.
It says that each and every jeev and at every moment is having anubhooti of himself. There the question of gunsthan itself is not applicable.

I think everyone of us will oblige to Aagam. But the particular viwaksha has to be taken in consideration and thus will be suitably applied.

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I am not saying to believe me, I am requesting to revise the concepts in the context of Agam only.

Pl check this once.

शुद्धोपयोग के अभाव में दर्शनमोह का अभाव नहीं होता । और यह तो सामान्य कथन है कि दर्शन मोहनीय के अभाव के साथ साथ सम्यक्त्व प्राप्ति के समय अनंतानुबंधी की चार प्रकृतियों का भी उपशमादिक होता ही है । और दोनों में समय भेद भी नहीं है ।
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प्रो.सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली द्वारा लिखित ये लेख भी इस विषय को काफ़ी स्पष्ट करेंगे।
लेख १
लेख २
लेख ३
लेख ४

Everyone who want to have a deeper understanding of this topic do read these lekh.

Links from WordPress website of @Sarvarth.Jain

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`pravachanasar gatha No.9

प्राभृतशास्त्र में तीन उपयोग किस प्रकार से कहे गये हैं? मिथ्यात्व सासादन और मिश्र इन तीन गुणस्थानों में तारतम्य से (घटता हुआ) अशुभोपयोग; इसके बाद असंयत सम्यग्दृष्टि, देशविरत और प्रमत्तसंयत- इन तीन गुणस्थानों में तारतम्य से (बढ़ता हुआ) शुभोपयोग इसके आगे अप्रमत्त संयत गुणस्थान से क्षीणकषाय पर्यन्त छह गुणस्थानों में तारतम्य से (बढ़ता हुआ) शुद्धोपयोग, इसके बाद सयोगीजिन और अयोगीजिन- ये दो गुणस्थान शुद्धोपयोग के फल हैं - यह भाव है ॥९॥

https://nikkyjain.github.io/jainDataBase/teeka/01_द्रव्यानुयोग/02_प्रवचनसार--कुन्दकुन्दाचार्य/html/index.html#gatha-009

यहाँ अन्य को डिलीवरी कराने का अनुभव है। स्वयं के द्वारा हुए डिलीवरी का तो अनुभव है नहिं। इसलिए अनुभव भी नहीं।

यदि अनुभव ज्ञान है तो अनुभूति भी ज्ञान की ही पर्याय है। शुद्धोपयोग भी ज्ञान की ही पर्याय है। साक्षात देखना या प्रत्यक्ष ज्ञान को अनुभव कहते हैं। “आत्मा होता है” ऐसा ज्ञान जिसे आप अनुभव कहते है वह बिना प्रत्यक्ष देखे कैसे अनुभव कहा जायेगा? अन्यथा तो सभी अस्ति मतों में यह ज्ञान है ही सो जैनधर्म के अलावा भी आत्मानुभव सम्भव है ऐसा सिद्ध हुआ।

साक्षात देखने को आपने अनुभूति कहकर अनुभव से भिन्न अर्थ बताया है। जिसमें पुनः विचार से सुधार करने की आवश्यकता दिखती है।

यदि आपके दृष्टांत अनुसार देखें तो चक्षुइन्द्रिय से हुआ ज्ञान अनुभव है और स्पर्शन-रस इन्द्रिय से हुआ ज्ञान अनुभूति है। किंतु स्वानुभव - स्वानुभूति में कोई इन्द्रियज्ञान नहीं।

हाँ आपकी व्याख्या से ऐसा लगता है की अनुभव वह आत्मा के अस्तित्व का निर्णय है और अनुभूति वह आत्मा का वेदन। किन्तु आत्मवेदनपूर्वक के आत्मा के अस्तित्व के निर्णय को ही आत्मानुभव कहते हैं। क्योंकि आत्मा, वेदन प्रत्यक्ष है इसलिए उसका निर्णय/अनुभव भी वेदन/अनुभूति से ही होगा। अन्यथा अनुभव भी नहीं।

संस्कृत dictionary में तो अनुभव और अनुभूति को समानार्थी लिखा है। यदि इनका अर्थ भिन्न है तो आप शास्त्र में “इनका भिन्न अर्थ होता है” - यह आधार बताइए।

आपका शास्त्र अभ्यास कम है, किन्तु जिज्ञासा तो तीव्र है। उसी के समाधान के लिए आप शास्त्रअभ्यासी बनेंगे। क्योंकि सत्संगी से चर्चा द्वारा निर्णय करने में भी शास्त्र आधार लगेगा।