ज्ञान गुण के स्व - पर प्रकाशक में पर प्रकाशक सम्बन्धी प्रश्न


#1

ज्ञान गुण स्व-पर प्रकाशक है, उसमे पर प्रकाशक की व्यवस्था किस प्रकार है?
१, " जानने वाला ही जानने में आता है", पर भी स्व ही है - पर प्रत्यक्ष रूपसे जानने में नहीं आता।
परके सम्बन्धीका ज्ञान खुद से खुद में उत्पन्न होता है और वह खुद का ज्ञान जननेमे आता है।
२, ज्ञान पर को विषय बनता है - यानि, परको प्रत्यक्ष जनता है,
लेकिन उसमे तन्मय नहीं होता इसलिए ज्ञान ज्ञान को जनता है ऐसा कहते है

उपरोक्त दोनोमे ज्ञानकी वास्तविक परप्रकाशकता कैसे है ? कृपया अपने विचार बताये।


#2

पर प्रकाशक - परद्रव्याकार प्रकाशक
स्व प्रकाशक - स्वद्रव्याकार प्रकाशक
उदा. प्रदीप।

ज्ञान पर प्रकाशक है इसमें तो कोई आपत्ति नहीं हैं किन्तु स्व-प्रकाशकता के लिए अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं है - यह बताने हेतु ज्ञान को स्वपर प्रकाशक कहा गया है।

ज्ञान की सार्थकता और स्वभाव में अन्तर करते हुए ये कहा जाता है कि ज्ञान का स्वभाव तो स्व-पर प्रकाशक ही है किन्तु ज्ञान की सार्थकता तो स्व को जानने में ही है।

जब, ज्ञान स्व को जानता है तब -

पर प्रकाशक - आत्मद्रव्याकार रूप भेद प्रकाशक
स्वप्रकाशक - स्वज्ञानाकार रूप अभेद प्रकाशक।


#3

जिनागम में ज्ञान को स्व -पर कहा गया है ,और कही पर प्रकाशक कहा है।स्याद्वाद शैली से मात्र स्व प्रकाशक भी कहा जाता है ।
०ज्ञान अपने को जानता है यह उसकी स्व प्रकाशकता है
०ज्ञान पर निमित्तक ज्ञेयाकार को जानता है इसीलिए पर प्रकाशक है ।