पंचकल्याणक संबंधी

पंचकल्याणक
#1

क्या पंचकल्याणक आदि में हाथी, घोड़ा आदि का प्रयोग करना
उचित है? हम तो उन्हें स्वयं पालते नही है,हमे कैसे पता कि महावत आदि ने उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया होगा? क्या इस युग मे जब हमारे पास कार आदि अनेक साधन हैं वो उपयोग नही किये जा सकते?

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#2

अब खेतो में बैल की जगह ट्रैक्टर use होता है इससे बैल बेरोजगार हो गए इसलिए अब अधिकतर बैल को जन्म होते ही कत्तलखानो में भेज दिया जाता है, ऐसे ही भैस तो दूध देने के काम आती है पर भैसे का ज्यादा use नहीं है इसलिए ज्यादातर भैसो को जन्म होते ही मार दिया जाता है,

जब टाँगे पर बैठते है तो घोड़े को बहुत मार पड़ती है, इससे दया आती है , तब कहते है की अब घोडा गाडी पर नहीं बैठेंगे, पर नहीं बैठोगे तो घोडा बेरोजगार हो जाएगा और फिर उसे सिर्फ मार ही नहीं बल्कि उसकी जान ही खतरे में पड़ जाएगी I पंचकल्याणक में हाथी आया था, रोड बहुत गरम थी तो लोगो ने कपडे वाली चप्पल पहन ली पर अब हाथी को क्या पहनाए? तब लोगो को बहुत दया आयी, उन्होंने कहा अब हाथी को नहीं बुलाएँगे , पर इससे हाथी बेरोजगार हो जाएगा फिर महावत इतने बड़े हाथी का पालन पोषण कैसे करेगा ?फिर तो महावत उसे खाना भी नहीं देगा I

मार पड़ती है, गर्मी सहनी पड़ती है , अब क्या करे तिर्यंच गति का स्वरुप ही ऐसा है , हम पंचकल्याणक में नहीं बुलाकर उनपे दया करेंगे पर इनसे उनका और बुरा हो जायेगा बस इतना कर सकते है कि अगर हमारे सामने कोई मारे तो उसे मना करे उसपे extra load नहीं डाले

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#3
  • पशुओं का प्रयोग न हो तो अच्छा ही है । पण्डित टोडरमल स्मारक भवन, जयपुर की प्रतिष्ठा (Feb '12) में पशुओं का प्रयोग नहीं किया गया था ।

  • Animal rights’ activists में से भी कोई आकर इसे issue बना सकता है । सल्लेखना के साथ जो हुआ, वह पंचकल्याणकों के साथ नहीं होना चाहिए. Unnecessary glorification will attract undue attention.

  • यदि उनके लालन-पालन की वास्तव में चिंता है, तो वह कार्य अलग से किया जा सकता है । उसके लिए पंचकल्याणकों को involve क्यों करना ?

  • एक कहावत है - चींटी को कणभर और हाथी को मनभर मिल ही जाता है (भाग्य प्रमाण).

  • समस्त कार्य अपने लिए (सम्प्रदान) ही किये जाते है, दूसरों पर उपचार किया जाता है ।

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#5

इस टाइम में जब, हमारे पास इतने latest vehicle available है, किसी भी कार्य के लिए पशुओ का इस्तेमाल करना as a vehicle बिलकुल गलत है. मैंने मुनिराज ऐसे भी देखे है जो इस शरत पे पंचकल्याणक पे जाते है की किसी पशु का इस्तेमाल नहीं होगा. पशु का मालिक कितना भी दयालु हो, पर पशु को तो कष्ट सहना ही पड़ता है.

घोड़े को नाल पहननी ही पड़ती है. नाल पहनाने के लिए उसके पैर में कील ठोकनी ही पड़ेगी. हाथी पे पेंट करते है उससे उसे बहुत दर्द होता है. जानवर ऐसा अपने मालिक का कहना क्यों मानते ह पता है? क्योकि उन्हें पिटाई का डर होता है.

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#6

हर जीव को अपने करम का फल भोगना ही पड़ता है, चाहे वो घोडा हो, हाथी हो या बैल.
अगर खेतो में बैल काम भी करते तो भी उन्हें मारा ही जाता जब वो किसी काम के नहीं रहते. गाय, भैस की भी चमड़ी उधेड़ के leather products बनाए जाते ह जब वो दूध देना बंद करती है.

मेरी नजर में अगर पशु का मालिक उन्हें खाना न दे और घर से निकाल दे तो वो ज्यादा बेटर है. क्योकि उन्हें घास तो मिल ही जाएगी खाने के लिए.

Please do search for “vegan” and see their views for all these.

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#7

@Chinmay आपके इन सब examples से क्या ये अर्थ निकाला जा सकता है कि आप चोरी डकेती हत्याओं के भी समर्थक हैं। क्योंकि अगर ये सब चीज़े न हुई तो police stations बंद हो जायँगे। आर्म्स बनना बंद हो जायँगे ओर ये सब बंद हुए तो जिन्हे इनसे रोजगार मिलता हैं उनका क्या होगा।
मनुष्य ये समझने लगे है कि उनमें बल अधिक है ज्ञान अधिक है तो पृथ्वि की सब प्रजातियों पर उनका अधिकार है सब जीवो की ज़िम्मेदारी हम पर है। तिर्यंच गति में दुःख बताये हैं पर इसका ये मतलब नही है कि हम वह दुःख देने में निमित्त बने। जंगलों में रहने वाले जानवर भी तो जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जिन्हें हमने पालतू बना दिया हम उनके लिए ये विचार लाते हैं। प्राचीन समय मे जब साधन नही थे और पशुओं का प्रयोग हुआ वो अभी तक चलाना सही नही है।
ये सब तर्क देकर उनके वेदना अत्याचार का कारण हमें नहीं बनना चाहिए।

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#8

@Labdhi_Shah आपने कुछ ज्यादा ही गलत समझ लिया, कोई भी जैन अशुभ कार्यो की अनुमोदना नहीं करेगा । शास्त्रों में जो ४ प्रकार के धन कहे है उनमे पशुधन भी है । पर इस पंचम काल में लोग भोले पशु - हाथी, घोडा, गाय, बैल, ऊँट को तो बायकाट करते है और क्रूर पशु जैसे स्वान, बिल्ली, मूसा आदि को क्यूट मानकर पालते है । जबकि शास्त्रों में इन क्रूर पसुओ से तो दूर रहने को कहा है और भोले पसुओ को पशुधन कहा है । सो इस काल के लोग पशुधन से रहित निर्धन हुए है । दशानन भी त्रिलोकमंडल हाथी के साथ मस्ती करते थे, पवनंजय का भी प्रिय हाथी था अंजना के विरह में पवनंजय अपने हाथी के साथ अकेले में रहते थे, वह हाथी सूंड पर तलवार लिए पवनजय की रक्षा करता । मुरारी के पास १००० कामधेनु गाय थी और चौथे काल के बड़े बड़े सामंत हाथी, घोडा, ऑस्ट्रिच पर बैठकर युद्ध लड़ने जाते थे ।

और यदि दया के भाव है भी तो ट्रेक्टर आदि में बिना शोदा हुआ ईंधन प्रयोग होता है सो वह तो हिंसा ही है । हमारे नगर में लोग रथ खींचने के लिए पशु नहीं लगाते अपितु समाज के लोग इखट्टा होकर स्वयं अपने हाथो से रथ खींचते है । स्वयं रथ खींचने में कोई दोष भी नहीं और अपने हाथो से श्री जी का रथ खींचने में उत्साह भी आता है । पर पशु को हठाकर ट्रेक्टर लगाना कुछ उचित नहीं । सभी मॉडर्न ट्रांपोर्ट हिंसा के ही साधन है, मेरा एक मित्र एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर है, वह रोज ही देखता है, बहुत बड़े बड़े पंछी जो इतना ऊपर उड़ते है की हमे निचे से दीखते भी नहीं उनका इंजन के प्रोपेलर में फसकर कीमा बन जाता है और पैसेंजर्स को पता भी नहीं चलता, ऐसा हर रोज होता है । चेन्नई एयरपोर्ट पर एयर इंडिया के इंजीनियर का कीमा बन गया था, उसकी बॉडी का कोई पार्ट भी नहीं बचा पूरी चटनी बन गयी, तो फिर पंछियो की बॉडी कहा से मिलेगी, इंजन पर कभी खून तो कभी डेंट मिलते है । सबसे ज्यादा बर्ड स्ट्राइक इंडिया में ही होते है । यह सब हिंसा के ही साधन है । और यदि आप पुराने जमाने को आज के युग से बेकार मानती है, तो यह एक पोस्ट देखे - https://www.quora.com/Regarding-Jainism-why-are-the-people-during-the-4th-Era-were-not-using-modern-electronics-weapons-equipments-when-they-were-more-intelligent-and-some-of-them-were-avadhi-gyan-too

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#9

जैन दर्शन में स्थापना का महत्व बताया है ।लकड़े के हाथी घोड़े बनवाकर स्वयं साधर्मियो को खीचना चाहिए। पालतू जानवर का उपयोग कदापि नही करना चाहिए। राजा लोग घोड़े आदि को अपने बेटे की तरह रखते थे आज कल सिर्फ पैसो के लिए मरते भी बोहोत है इसमें क्या धर्म होगा?

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#10

@Chinmay I would like to apologise as my example might sound harsh but I didn’t mean to disrespect.
I would like you to have practical applicability of what is written in shastra.

These shastra belongs to the era when there were no vehicles so the only source was pashu upyog. Now time has changed.

On a personal basis I do not distinguish between any animal. But I agree some people do. And also from religious perspective m not in favour of pets.

Kaal k sath sadhno aur example ko bdlna zaroori hai. Ho skta hai. Probability is more high that in that era people used to be kind and didn’t used to use animals selfishly. Now days they are not.

How can we expect from a normal person whose source of Income is that animal will always take care of animal and would not think about his income only. If his pet gets ill he will through him outside or will sale him and we know the rest.

I agree that these things are possible m not saying these means are ahinsak but we should always opt for least ahinsak things. Fuel you are talking about comes in ekendriya and animals m talking comes in pachendriya. There is the main difference.

पंचकल्याणक जैसे कार्यक्रम हमे वीतरागता और संयम की और ले जाने के लिए होने चाहिए। न कि हम दिखावे में फंसे रह जाय। जितना कम हो सके उतनी कम हिंसा वाले साधनों का इस्तेमाल करना चाहिए।

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#11

“These shastra belongs to the era…” @jinesh @jainsulabh Do you think is it well to have faith in this manner? or its more practical.

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