गुणश्रेणी निर्जरा और आस्रव-बंध

मोक्षमार्गप्रकाशक

#1

मोक्षमार्गप्रकाशक के सातवें अधिकार में केवल निश्चयाभासके अवलम्बी जीवकी प्रवृत्ति के section में ऐसा आया है -

फिर वह कहता है कि छद्मस्थके तो परद्रव्य चिंतवनसे आस्रव-बन्ध होता है? सो भी नहीं है; क्योंकि शुक्लध्यानमें भी मुनियोंको छहों द्रव्योंके द्रव्य-गुण-पर्यायोंका चिंतवन होनेका निरूपण किया है, और अवधि-मनःपर्यय आदिमें परद्रव्यको जाननेकी ही विशेषता होती है; तथा चौथे गुणस्थानमें कोई अपने स्वरूपका चिंतवन करता है उसके भी आस्रव-बन्ध अधिक हैं तथा गुणश्रेणी निर्जरा नहीं है; पाँचवे-छट्ठे गुणस्थानमें आहार-विहारादि क्रिया होने पर परद्रव्य चिंतवनसे भी आस्रव-बन्ध थोड़ा है और गुणश्रेणी निर्जरा होती रहती है। इसलिये स्वद्रव्य-परद्रव्यके चिंतवनसे निर्जरा-बन्ध नहीं होते, रागादि घटने से निर्जरा है और रागादि होने से बन्ध है। उसे रागादिके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं है, इसलिये अन्यथा मानता है |

गुणश्रेणी निर्जरा क्या होती है ? व निर्जरा के भेद किस प्रकार किये गए हैं ? मैंने अब तक सविपाक और अविपाक निर्जरा पढ़ी है | इसके अतिरिक्त और कौनसी निर्जरा होती है ? और वे निर्जरा कब कैसे होती है ?

क्या आश्रव और बंध के भी ऐसे कोई भेद हैं ?


#2

गुणश्रेणी निर्जरा अविपाक निर्जरा है | यह अविपाक निर्जरा कैसे होती है उसी को बताने के लिए इसका नाम गुणश्रेणी निर्जरा है जहाँ गुणाकार रूप से द्रव्य प्रतिसमय निर्जरा केलिए सिंचित किया जाता है |

Please see this video for details:

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#3

निर्जरा

झरना ,निर्झरण का नाम निर्जरा है।अर्थात कर्मों का झरना ही निर्जर है ।वह कर्मों का झरना 2 प्रकार से होता है ; इस कारण वह निर्जरा ही 2 प्रकार की है :-

1)सविपाक निर्जरा:- ‘स’ अर्थात सहित , ‘विपाक’ अर्थात उदय । जो कर्म उदय आने पर सत्ता में झर जाते हैं ,उसे सविपाक निर्जरा कहते हैं ।

जिनसेन स्वामी ने सविपाक निर्जरा को हरिवंश पुराण (63 पर्व ) में सविपाकज निर्जरा कहा है।'ज’अर्थात उत्पन्न होना।जो कर्म उदय द्वार से झरते हुए आगामी बंधन को उत्पन्न करने में कारण है ,उसे सविपकज निर्जरा कहते हैं।

अकलंक देव ने राजवार्तिक (9अध्याय ,7वा सूत्र,) में अनुबंधिनी निर्जरा कहा है। जो निर्जरा आगामी बंध में कारण हो ,उसे अनुबंधिनी निर्जरा कहते हैं ।

यह अनुबंधिनी निर्जरा भी 2 प्रकार की है:-

१)कुशलानुबंधिनी :- संयम के प्रभाव से देवादि गति में जो निर्जरा होती है , उसे कुशलानुबंधिनी निर्जरा कहते हैं ।

२)अकुशलानुबंधिनी :- नरकादि गति में जो प्रति समय निर्जरा होती है ,उसे
अकुशलानुबंधिनी निर्जरा कहते हैं ।

2)अविपाक निर्जरा :- ‘अ’ अर्थात ‘नहीं’ , ‘विपाक’ अर्थात ‘उदय’ ।जो कर्म उदय में आए बिना ही झर जाते हैं , इस प्रकार कर्मों के झरन को अविपाक निर्जरा कहते हैं।

प्रश्न:- करणानुयोग में ऐसा नियम है कि कर्म का झरना उदय में आए बिना नहीं हो सकता है , अतः उपर्युक्त बात कैसे संभव है?

उत्तर:- उदय में आए बिना ही झर जाते हैं ।इसका अर्थ यह है कि कर्मों के उदय द्वार को छोड़ कर उदीरणा आदि द्वारों से कर्मो का झरन होता है वह अविपाक निर्जरा है ।

अविपाक निर्जरा को हरिवंशपुराण में अविपाकज निर्जरा कहा है।

अविपाकज में आया ‘ज’ शब्द का अर्थ ‘उत्पन्न होना’ होता है।जो कर्मों का उदय आगामी कर्मों को उत्पन्न करने में कारण नही हो , उसे अविपाकज निर्जरा कहते हैं ।

अविपाकज निर्जरा को राजवार्तिक में निरनुबंधिनी निर्जरा कहा है ।

जो कर्मों का झरन आगामी बंध में कारण नहीं होता है ,ऐसे कर्मों के झरना को निरनुबंधिनी निर्जरा कहते हैं।

मंगत राय जी ने अपनी 12 भावना में कहा भी है:-

उदय भोग अविपाक समय , पक जाय आम डाली ।
दूजी है अविपाक पकावें , पाल विषै माली।।
पहली सबके होय नहीं कुछ सरे काम तेरा ।
दूजी करे जु उद्यम करके, मिटे जगत फेरा ।।

अर्थ :-उदय द्वार से जो कर्म भोगे जाते हैं ,उसे अविपाक निर्जरा कहते हैं ,जैसे डाली पर आम स्वयमेव स्वसमय में पक जाता है।
उदीरणा आदि द्वारों से जो कर्म बजोगे जाते हैं ,उसे अविपाक निर्जरा कहते हैं , जैसे कच्चे आम को माली पाल में पकता है।

प्रश्न :- यहाँ कोई कह कि अपने तो उदय और उदीरणा आदि को ही निर्जरा कह दिया , परन्तु आगम में तो उदय ,उदीरणा आदि और निर्जरा का वर्णन तो भिन्न भिन्न ही किया है ,तब आप दोनों को एक कैसे कहते हों ?

उत्तर:- आपका कहना सही है ।आगम में उदय,उदीरणा और निर्जरा का निरूपण पृथक - पृथक ही किया है ,परन्तु उदय ,उदीरणा आदि का नाम ही निर्जरा है , क्योंकि कर्मों की 10 अवस्थाएं होती हैं ,उन 10 अवस्थाओं में निर्जरा नामक कोई अवस्था नहीं है और निर्जरा में भी मात्र कर्मों का खिरना ही होता है और कुछ विशेष नहीं होता है तथा वह कर्मों का खिरना 2 रूपों में होता है ।एक उदय रूप में और दूसरा उदीरणा आदि रूपों में होता है ।

उदय रूप से कर्मों के खिरने को सविपाक निर्जरा कहते हैं।
उदीरणा आदि रूपों से कर्मों के खिरने को अविपाक निर्जरा कहते हैं।

अनेक विद्वान कहते हैं कि कर्म फल दिए बिना ही अकर्म रूप परिणमित हो जाते है ,उसे निर्जरा कहते हैं । उपर्युक्त बात से इस कथन का भी निराकरण हो जाता है , क्योंकि कर्मों की 10 अवस्थाओं में 'बिना फल दिए बिना ही जहर जाए ’ ऐसी कोई अवस्था नहीं है तथा ऐसा कोई भी कर्म नहीं है , जो उदयादि में आए बिना ही अकर्म रूप परिणमित हो जाए ।


#4

उदीरणा - अकालपाक / समय से पहले उदय में आना

अविपाक निर्जरा - कर्मों का बिना फल दिए नष्ट होना / अकर्मरूप परिणमित होना

इसका कोई प्रमाण उपलब्ध हो तो बतायें जहाँ अविपाक निर्जरा में उदीरणा की चर्चा आयी हो ।

प्रथम पंक्ति में अविपाक की जगह सविपाक आएगा (कविवर मंगतराय जी कृत बारह भावना)

यहाँ कवि ने निर्जरा के दो भेदों की ओर इंगित किया है । लेकिन उदीरणा की कोई बात नहीं है ।


यदि अविपाक निर्जरा को उदीरणा में गर्भित करते है तो कुछ विचारणीय बिन्दु / प्रश्न -

  • सात तत्त्वों में कर्मों के आस्रव-बन्ध की चर्चा है, लेकिन उदय की कोई चर्चा नहीं है । लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होता कि ऐसी कोई अवस्था नहीं ।

  • कर्मों की दस अवस्थाओं में संवर / मोक्ष या उसके जैसी भी कोई अवस्था नहीं है । उपशान्त तो अलग चीज है, उसको संवर नहीं कहा जा सकता । फिर संवर को किसमें गर्भित करेंगे ?

  • 10 अवस्था तो कर्म की है, जब निर्जरा होती है, तब कर्म अकर्मरूप परिणमित होता है, अतः अब वे परमाणु कर्म की अवस्था रूप नहीं रहे । अतः उन्हें कर्म की अवस्था में कैसे रखते ?

  • मोहनीय का कभी अभाव ही नहीं हो पायेगा । क्योंकि मोहनीय कर्म के उदय का अर्थ ही यह है कि यहाँ जीव में कोई न कोई विकार है अथवा जब जीव में विकार होता है तब जिस कर्म का उदय निमित्त हो, वह मोहनीय कर्म है । अब यदि निर्जरा को उदीरणा में गर्भित करते है, तो उसका मतलब यह हुआ कि किसी न किसी रूप में मोहनीय कर्म का उदय / उदीरणा जब तक है तब तक जीव में भी कोई ना कोई कषाय भाव होगा ही । और यदि कषाय है तो नवीन मोह का बन्ध भी होता ही रहेगा ।

  • उपशम, क्षय और क्षयोपशम को भी कर्म की अवस्था में नहीं गिनाया है, किन्तु फिर भी वैसी अवस्था होती तो है । क्या उनका भी निषेध कर देना चाहिए ?

  • उदीरणा में परिणामों की तीव्रता होती है । मंद परिणाम नहीं रह सकते । राजवर्तिक, अध्याय 6, सूत्र 6 में से -

(as quoted in जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, भाग 1, पृ. 410)

यदि अविपाक निर्जरा में कर्म की उदीरणा मानी जाए, तो मोह का अभाव होना तो दूर, मंद भी नहीं हो सकता, तीव्रता पाई जाएगी ।


जहाँ तक ख्याल में आता है, अविपाक निर्जरा और उदीरणा ये दो बिल्कुल अलग अलग प्रकरण है । तथापि यदि इस संदर्भ में कोई प्रमेय मिलता है, तो अवश्य अवगत कराएं ।


#5

जिनेश जी!

आपकी सभी शंकाएँ जायज़ होने पर भी स्याद्वाद से निराकर्णीय हैं।

सविपाकज और अविपाकज की परिभाषाओं को ध्यान से देखें, उत्तर आपके सामने है।

कर्मनिर्जरा और बन्ध-व्युच्छित्ति, द्रव्यकर्म-भावकर्म और द्रव्यनिर्जरा-भावनिर्जरा की परिभाषाओं से समझने में आसानी होगी।

एक बार चार्ट पुनः देखें।