क्या प्रसाद ग्रहण करना चाहिए?


#1

Being a Jain, should you accept Prasad offered by your Hindu friends, neighbor or colleagues during their festival or occasion? I accept it as I don’t want to offend, but is it wrong?

क्या एक जैन व्यक्ति को अपने हिन्दू दोस्तों आदि से प्रसाद ले लेना चाहिए?

  1. यदि नहीं, तो क्या प्रसाद के लिए मना कर देने से उनकी भावनाओं को ठेश पहुँचाना सही है?
  2. यदि हां, तो क्या हमें कुदेव आदिक को मानने का दोष लगेगा?

Question originally asked on Quora -https://www.quora.com/Being-a-Jain-should-you-accept-Prasad-offered-by-your-Hindu-friends-neighbor-or-colleagues-during-their-festival-or-occasion-I-accept-it-as-I-dont-want-to-offend-but-is-it-wrong?ch=10&share=fbb1812b&srid=uqGBl


#2

A better way can be to reject it without offending and along with this, you can propagate what Jainism says to such act.

This happens with me too, and I politely ask them to not offer me because according to Jainism, we do not offer प्रसाद to people that was offered to God or on the name of God.

अगर हम ग्रहण करेंगे तो अनुमोदना का दोष अवश्य लगेगा।


#3

अलग अलग उपाय हैं।

  1. जहाँ आप सीधे मना कर सकते हैं वहाँ लेने से मना कर दें।
  2. ऐसे स्थान से दूर रहने का प्रयास करें जहाँ प्रसाद आदि लेने की स्तिथि हो।
  3. यदि कोई आपसी वाला प्रसाद दे तो ले लें, उनसे यदि आप मना करते हैं तो उससे उन्हें धार्मिक ठेस पहुंचती है।
    लेने के मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि आप उस मान्यता को मानने लगे हैं।
    अनुमोदना का पाप भी तब लगेगा जब आपका हृदय उस क्रिया को श्रद्धान के साथ उचित मानेगा।
  4. आप उस प्रसाद को लेकर किसी दूसरे को भी दे सकते हैं( उसे फेकने के स्थान पर) ।
  5. यदि वो आपसे पूछे कि आप क्यों नहीं ले रहे हैं तो उसे आप सही कारण बता सकते हैं, वो इसलिए क्योंकि प्रसाद देने वाला उसे अपमान मानेगा और जिसे आप प्रसाद देंगे वह उसे सम्मान मानेगा।
  6. बहाने भी बनाये जा सकते हैं लेकिन फिर उसमें झूठ का पाप लगेगा। ( इसे भी तरीका ही समझें जैसे मैं बाहर का नहीं खाता, आज मेरा उपवास है इत्यादि। )
    झूठ बोलना पाप है

#4

दूसरे को देने से क्या हमें उस व्यक्ति को प्रसाद देने का पाप नहीं लगेगा ? ये ऐसी बात हुई की मैं स्वयं तो जहर नहीं खाता पर मैं किसी से लेकर किसी दूसरे को दे सकता हूँ |


#5

पाप कैसे लगेगा ? आपने उसे प्रसाद दिया है इसलिए नहीं क्योंकि आप उसे पाप का भागीदार बनाना चाहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वो उसे ग्रहण करता है और आप नहीँ।
अब इसमें पाप को जोड़ना खींचातानी ही होगी।

आपके जहर का उदाहरण प्रसाद वाली स्तिथि पर घटित नहीं हो रहा है कारण की इस प्रसाद को पाप की गिनती में ही नहीं गिना जा रहा है, अतः उसे जहर की उपमा देना निरर्थक है।


#6

A simple answer would be that it comes down to the situation. But still, I would like to mention two points -

  1. As far as पाप is concerned, I would say that yes, it involves अनुमोदना - directly or indirectly - of गृहीत मिथ्यात्व. Since even the followers of कुदेव-कुशास्त्र-कुगुरू are included under अनायतन.

    बृहद् द्रव्यसंग्रह - अथानायतनषट्कं कथयति। मिथ्यादेवो, मिथ्यादेवाराधको, मिथ्यातपो, मिथ्यातपस्वी, मिथ्यागमो, मिथ्यागमधरा; पुरुषाश्चेत्युक्तलक्षणमनायतनषट्कं सरागसम्यग्दृष्टीनां त्याज्यं भवतीति

    = अब छह अनायतनोंका कथन करते हैं - मिथ्यादेव, मिथ्यादेवोंके सेवक, मिथ्यातप, मिथ्यातपस्वी, मिथ्याशास्त्र और मिथ्याशास्त्रोंके धारक, इस प्रकारके छह अनायतन सरागसम्यग्दृष्टियोंको त्याग करने चाहिए। (बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा ४१ की टीका).

    Source: http://www.jainkosh.org/wiki/आयतन

  2. My refusal to accept them would be justified if I am able to do so in all situations irrespective of person, place, time, etc. What if they were being offered to me by, let’s say, a world renowned artist or a famous sportsperson or even my boss for that matter? Would I be able to deny then? And will it be possible for me to cite the same reason which I offered to my friend?