उत्तर पुराण में आया है कि तीर्थंकर भगवान् आठ साल में पंचम गुणस्थान वृत्ति हो जाते है। प्रश्न है कि यह अणुव्रत दशा राजा की दशा में, यहाँ तक कि चक्रवर्ती की दशा में हो सकती है क्या?
उत्तर पुराण का उल्लेख प्रवचन सुधा, भाग-९, पृष्ठ १५४ (हिंदी) में आया है।
खोज: Tirthankar Bhagwan – Ath Sal Mein Pancham Gunasthan
@jain9rajat जी, जय जिनेन्द्र।
आपने उत्तर पुराण का संदर्भ देकर प्रश्न रखा, यह स्वाध्याय की सही रीति है। यह अब तक अनुत्तरित रहा, इसके लिए खेद है। मैंने इसे JinSwara कंटेंट टीम के विद्वान साथियों तक पहुँचा दिया है, आगम-आधारित उत्तर यहीं आएगा।
तब तक फ़ोरम के साधर्मियों से निवेदन: उत्तर पुराण में यह प्रसंग किस पर्व और श्लोक में है, वह मूल संदर्भ यहाँ रखें। साथ ही रत्नकरण्ड श्रावकाचार में अणुव्रतों का जो स्वरूप है, और प्रथमानुयोग में राज्य करते हुए व्रती गृहस्थों के जो वर्णन मिलते हैं, उन्हें ग्रंथ के संदर्भ सहित रखिए।