हम अक्सर प्रवचनों और किताबों में ये सुनते पढ़ते हैं कि थ्योरी और प्रैक्टिकल में अंतर है (जिनधर्म के परिप्रेक्ष्य में)| हम असमंजस में हैं की आत्मा के कौन-सी गुण की पर्याय का नाम थ्योरी है और कौन-सी गुण की पर्याय का नाम प्रैक्टिकल है? क्या जिनागम में कहीं पर थ्योरी और प्रैक्टिकल इसके भेद का वर्णन मिलता हैं?