तीन मंचन-योग्य जैन नाटकों का संग्रह — (१) जिन मंदिर भिक्षालय नहीं, शिक्षालय है (भगवान से सांसारिक मांगें मांगने वाले पात्रों के माध्यम से देवदर्शन की सच्ची विधि व स्वाध्याय का मर्म), (२) भेद विज्ञान, व (३) जीव है या मैं हूँ (ब्र. आरती जैन — पंडितजी व मित्रों के दृष्टांत से ‘स्वयं को जानने’ का भेदज्ञान)। पूरे पात्र-संवाद सहित; पाठशाला व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।
A set of three staged Jain natak scripts on bhedgyan (self-knowledge), swadhyay and the true purpose of temple-worship — full characters & dialogue for pathshala and cultural programs.
नाटक
जिन मंदिर शिक्षालय नहीं; शिक्षालय है।
पात्र:- (i) विद्यार्थी, (ii) व्यापारी, (iii) युवा, (iv) बेरोजगार, (v) रिश्वतखोर, (vi) ज्ञायक।
१. विद्यार्थी:-
O’ my God! good morning
हे प्रभु! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
मुझको कुछ आता नहीं, फिर भी पास कीजिए।
हे भगवान! देखो, आपको पता ही है कि मैं क्रिकेट का फैन हूँ और अभी भारत-पाकिस्तान की श्रृंखला चल रही है, तो समझलो कि भारत की इज्जत दाव पर लगी है। अतः मैच देखना बहुत ही जरुरी है और आपको तो पता ही है कि बोर्ड की परीक्षा सिर पर है। पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है। पढ़ाई करू कि मैच देखूं। तो हे भगवान! सम्हाल लेना। मेरी इज्जत आपके ही हाथों में है। मैं अपनी पॉकेट मनी में से २१ रू. दानपात्र में जरूर डालूंगा। याद रहे भगवान। भूल मत जाना।
Good by !
२. व्यापारी:-
जाते पुण्य उदय मम, पाया।
सौ-सौ की गड्डी पाया।
चमके बंगले, सोना मंगले, चांदी मंगलं।
रुपया मंगलं, डालर मंगलं।
हे भगवन्! आप लाख रखो हो गये हो। एक पर बयालीस और योजन की धन-वर्षा है। अरे! लाखों-करोड़ों-अरबों-खरबों की कमाई यहाँ हो पा रही है और जब आप हमें खाने-पीने को नहीं मिलेगा तो हम आपको क्या चढा़वे? भगवान जय दया करो। वास दशा निधान से। हमारी दुकान अच्छी चलो। क्या जाने और अपने मजे हो जावे। भगवान अपनी यह बात पक्की रही कि अभी भले मैं आपके आगे। एक जोरदार विशेष कराऊंगा। अब तो आनन्दीश पार्श्वनाथ हम तुम्हारे ही भरोसे है।
३. रिश्वतखोर:-
हे भगवान! आप तो सर्वज्ञ हैं। मैं तो जो अर्जी लगाई है आप तो समझ ही गये होंगे। पहले तो दो सौ भगवान मैं फिट से बना रहा है फिर मैं तो ऑफिस वालों को चक्कर में फँसा पाया हूँ। अरे! वो तो फँसा दिया कि मैंने एक लाख रुपये की रिश्वत की जुगाड़ रात की बात बनाई। भगवान जी तो ग्रेनाइट की रु. पर आप ही इस बजट भुगतान से छुड़ा सकते हो। अगर मैं कोठे में चला गया। बस हो गया तो 1% आपको चढ़ा के २१% हम तो पचाऊँगी जी।
४. बेरोजगार:-
इधर-उधर देखते हुवे…
वाह-अनुभव वाह। आपके मंदिर में फर्श संगमरमर का, दीवारों पर ऑयलपेंट, वेदी पर सोने का पेंट, छत्र-चमरादि चांदी के क्या कहना भगवान…? अगर मेरी भगवान के पास इतना परिग्रह और रुए में आपका भक्त बेरोजगार घूम रहा है। किसी से मत कहना भगवान ये इसी माँ की इसी को पहन रखी है। अरे भगवान ! कुछ तो सोचो हमारे बारे में, हम जैसे बेरोजगारों पर कृपा करो। बस एक छोटी सी नौकरी दिला दो भगवान! पहली वेतन आपको ही चढ़ाऊँगा। अच्छा क्या कहूँ भगवान और वो आप समझ ही गये होंगे।
५. युवा:
तुझसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण।
पारस प्यारा, तुम हो भव से तारणहारा।।
हे पारसनाथ भगवान। मैं कब से
कोई एक:- स्वाध्याय करने से क्या लगा है?
ज्ञायक:- स्वाध्याय करने से द्विविध, मुख्यरूप, पुण्यानुबंध का लाभ होता है। कट कथ व शांत तत्व का ज्ञान पूर्वक भेदज्ञान से सम्यगज्ञान प्राप्त होता है।
सभी एक साथ:- भैया आपने तो हमारी आंखें खोल दी।
ज्ञायक:- भैया आप सब भैया भी मांग कर भगवान के पास आते हैं लेकिन भगवान कहते हैं और न लेते हैं। हम जैन हैं तो जैन का सच्चा स्वरूप तत्वों माइग्रम, जिनवाणी मिर्चा, उच्च कुल मिला फिर भी धर्म से वंचित हो रहे हैं। हमारे अभागा कौन है? अर्थात् कोई नहीं।
यद्वस्तुष्वपर्यायः -
जय जिनेन्द्र
भेद विज्ञान
प. राजकुमारजी शा.
पात्रपरिचय
धनियाँ - धोबी
जगन - शांत प्रकृति का युवक
ज्ञानेश - पंडित जी
दिव्यांश - किंचित उद्दंड प्रकृति वाला युवक
चिन्मय - विद्वान मित्र
(धोबी की दुकान-धनियाँ गुनगुना रहा है)
धनियाँ - धनिया धोबी मेरा नाम, धोएँ धोएँ मेरा काम।
भेद न भावे, जग को शिवक, उधरो जो जग लोक हो… हो… धनिया धोबी…
(प्रकट करते हुये) – ये लेऊँ भैया कितने गंदे कपड़े कर लेते हैं। इतने धोते-धोते मेरे पप्पू की अम्मा आधी घिस गई है।
दिव्यांश - (आते हुये), अरे भइया धनियाँ।
धनियाँ - कहिये भाई साहब क्या सोचा आज।
दिव्यांश - अरे करें, मैं परसों एक चादर धोने को दे गया था। वह तैयार कर दिया क्या?
धनियाँ - अरे बिल्कुल तैयार है साहब; एकदम सड़ासड़ यह रही।
दिव्यांश - ठीक है लाओ इधर, पैसे बाद में पहुंचा दूँगा।
धनियाँ - कोई बात नहीं भाई साहब पैसे तो आते रहेंगे।
(दिव्यांश चादर लेकर एक तरफ हो जाता है)
धनियाँ - (भेष बदल कर एवं मुँह लटकाये आता है)। धनिया धोबी मेरा नाम। धोएँ धोएँ मेरा काम।
जगन - को भगाऊँ (चिन्मय-ज्ञानेश) (अगम को आता देखकर)।
धनियाँ - जय जिनेन्द्र अगम भाई साहब। आप तो बहुत दिनों बाद नजर आए हैं तहाँ बाहर गए थे क्या।
अगम - हाँ भाई धनीराम! बाहर ही गया था और फिर जयपुर नाम के एम्पोरियम में एक चादर पसन्द गया था, वह तैयार कर दिया।
धनियाँ - भाई साहब, धनिया समझ का पक्का है। अच्छी चादर तो मुझ से तैयार है, यह लीजिए। (चद्दर उठाकर देता है।)
अगम - (अच्छी तरह चादर देखते हुए)। अरे धनीराम! यह चादर मेरा नहीं है। इसका दिव्यांश! यह और दिल का होगा।
धनियाँ - अरे बाप रे मुझ से यही गलती अभी-अभी हुई है। दस दिन पहले यह है चादर भी विकुल ऐसा ही था। कुछ नहीं याद बदला है।
अगम - नहीं नहीं भइया, मुझे तो अभी उस ब्लैक कलर जाना है। यह चादर बहुत जरूरी है।
धनियाँ - तो भाई साहब आप मैं आ जाऊँगा आपके यहाँ से बदलकर इस चद्दर लाये।
अगम - हां यह ठीक है।
धनियाँ के घर जाकर
जगन - अरे कोई है… दिव्यांश क्यों दिव्यांश। (कोई आवाज नहीं आती तो अंदर जाता है) अच्छा तो भाई साहब चादर तानकर सो रहे हैं। (दिव्यांश को हिलाता-चद्दर खींचता है)
दिव्यांश - (गुस्से में, आंखें मलते हुए) कौन बेवकूफ मेरी नींद खराब कर रहा है।
जगन - अरे भइया नाराज मत होओ, में तो आपकी चादर लेने आया है।
दिव्यांश - मजाक तो सबब नहीं हो गया। सुबह तो नींद खराब कर दी आकर, आ ह… क्या भला आ रहा था जो मुझे कह रहे हो कि आप चादर लेने आया हूँ यह कोई बढ़िया धोबी की दुकान समझा?
जगन - अरे नहीं भइया, ये तो चादर तुमने धोबी को दी थी चादर मेरी है।
दिव्यांश - जो कर वो बात अब साहब मेरी चादर को अपनी बताने लगे, हद हो गई, फिर कैसा कि घर भी मेरा ही है। अरे भइया, ये चादर तो ओसवाल साफा के कटोंसे धुनकर क्या है।
जगन - ऐसी धनिया ने भी कहा है कि मेरी चादर तुम्हारे पास है।
दिव्यांश - देखा एक बार मेरे ही समाझलो कि यह चादर मेरा है।
अगम - तुम भी अच्छी तरह समझलो कि यह चादर मेरा है। (चद्दर खींचता है)
दिव्यांश - नहीं मेरा है (दोनों कपडे छीनाझपटी में गुस्सा हो चादर मेरा है)। (आपस में चादर खींचते हैं)
(हंसते में चिन्मय व ज्ञानेश का प्रवेश।)
चिन्मय - अरे अरे क्या महाप्रलय मचा रखी है।
अगम - देखो भाई साहब यह मेरा चादर नहीं दे रहा है।
दिव्यांश - वह तो के भाई ने ये घर पर आकर मुझे सिर-फीर कर रहा है। गुस्सा तो ऐसा आ रहा है कि सिर फोड़ कर रख दूँ।
चिन्मय - चुप करो यार, की बातें मन करो। सारा समय में गया तो कि तुम्हारी चादर को कैसे आई।
अगम - मैंने अपनी चादर धनिया के यहाँ धुलने डाली थी। मैं इस चादर लेने आया तो मेरा चादर गलती से इनके यहां आ गया।
दिव्यांश - कहा तो हमारी चादर भी कोई पहचान है।
अगम - हाँ हाँ देखो चादर पर मेरा नाम लिखा है। (सभी चादर देखते हैं)
चिन्मय - हाँ रे! इस पर तो अगम का संदर्भ लिखा हुआ है।
दिव्यांश - यह तो सच में इसका भी के तो फिर मेरा चादर कहाँ है।
अगम - घबराओ नाहक यह रहा। तुम तो मेरी बात सुन ही नहीं रहे थे। ये तुम्हारा चादर धनिया के यहाँ से लेकर आया हूँ।
दिव्यांश - मुझे तो बड़ी भूल हो गई। में आपकी चादर को अपनी मानकर व्यर्थ ही झगड़ा कर रहा। आप क्षमा मुझे क्षमा कर देना।
चिन्मय - और भाइयो! ऐसी ही भूल हम सब अज्ञानी से करते है। पर पदार्थों को अपना मान-मानकर।
जगन - क्या बात कर रहे हो। मै तो किसी की चीज को हाथ भी नहीं लगाता।
चिन्मय - भइया जगन, यह बात इतनी जल्दी समझ में नहीं आएगी। इसी तो गंभीरता से समझना पड़ेगा।
जगन - कैसे? और साथ यह तो अविधि वर्ग साधन आदि कुछ है, इसका नाम जागकुमार है, यह एकमात्र से खाते है, उस संबंध में मेरी रुचि समजाओगे।
ज्ञानेश - जय जिनेंद्र! मेरी आधी बात सुनें। किंतु बिना तत्व निर्णय अपनी-चद्दर की अपनी मानकर सोचा था, उसी तरह हम सब भी दूसरी वस्तुओं को अपना मानकर सो रहे हैं।
दिव्यांश - क्या बात कर रहे हो। भाई साहब, हो तो मैं पहले रहा था, अभी तो मैं जाग रहा हूँ।
ज्ञानेश - नहीं भइया। अभी तो आप सो रहे हो। यह तो भ्रांत्र विद्या निद्रा मोह निद कलवरहे पर क्यों नींद है।
जगन - क्या मोह निद से क्या राग है?
ज्ञानेश - अभी दिव्यांश स्वप्निमेश में तुम्हारे चादर को मेरी मानकर सो रहा था। जैसे ही हम सब मोह निंद में शरीर, धन इत्यादि पर पदार्थों को अपना मानकर सो रहे हैं।
चिन्मय - यह बात पूरी तरह समझ में नहीं आई, जो अच्छी तरह समझाओ ना।
ज्ञानेश - अच्छा सुनो! आप सब अपना नाम तो जानते ही होगे।
दिव्यांश - हाँ-हाँ क्यों नहीं। मेरा नाम दिव्यांश है।
अगम - और हमारा?
जगन - मेरा नाम जगन है।
ज्ञानेश - जी आपके इस शरीर के नाम सलाह हैं; आप अपना नाम बताइए ना।
दिव्यांश - तो इसका बात क्या मैं और मेरा शरीर अलग-अलग थोड़े ही है। हम दोनों एक ही तो हैं।
ज्ञानेश - नहीं भइया! शरीर तो खाली पुष्ट है जो आत्मिकस्वभाव नहीं आ रही है और हम मूल के करता ही रहे एक दर्शन आदि सहित के सब जाना पहले से है।
चिन्मय - यह शरीर तो अचेतन जड़ यानी पुद्गल ठीक है, फिर मैं तो आपने बिस्ट बिस्तर अच्छा दिया कि अ-घर मेरा शरीर भी के दिए शरीर तो मेरी है इस पर तो मेरा ही अधिकार है। शरीर
ज्ञानेश - देखो समझने से समझ में आता है समझने की चाही। प्रिय सामग्री की कौन करेगे तो जरूर समझ में जाएगा। अच्छा यह बताओ कि जीव किसे कहते हैं?
अगम - अरे! वो जानना-देखना और सुख-दुःख का अनुभव करना है वही तो जीव है।
ज्ञानेश - और पुद्गल ?
चिन्मय - जिसे स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पाया जाए, उसे पुद्गल कहते हैं।
ज्ञानेश - बहुत बढ़िया, आप सबको तो याद है। अच्छा दिव्यांश तुम बताओ, तुम्हारा शरीर कैसा है?
दिव्यांश - मेरा कैसा गोरा-है।
ज्ञानेश - और वजन कितना है?
दिव्यांश - ५६ किलो।
ज्ञानेश - अब बताओ कि गोरा, काला रंग, हल्का भारी वजन, सुगंध-दुर्गंध यह जब किसीमें पाये जाते हैं?
दिव्यांश - अभी अभी तो चिन्मय ने बताया था कि स्पर्श-रस-गंध चक्र पुद्गल में पाए जाते हैं इसके वामी भी एक नहीं रहता क्या?
ज्ञानेश - तो यह बात यह हुई कि गोरा रंग और ५६ किलो का वजन पुद्गल का है। जीव का नहीं।
चिन्मय - अरे! तो यह शरीर पर तो है मैं तो यह मान ले कि शरीर मैं पुद्गल का है। तो फिर मैं कौन हूँ?
ज्ञानेश - शरीर की अपनी पहिचान है वैसी तरह जीव के भी अपनी पहिचान है। वे हैं जानना देखना। हम सब जानते देखते हैं इसलिए हम जीव हैं अर्थात् जीव।
दिव्यांश - क्या बात है ज्ञानेश भाई साहब। आपने तो आंखें ही मेरी दिया। क्या! तो अभी तक शरीर को जीव दोनों के गुणों को अपना ही मान कर सो रहे थे।
ज्ञानेश - शरीर, धन परिवार जो जो होने और शरीर में सुख दुख मुख्य के भाव होने से वे जो भी नींद नहीं है क्योंकि यह स्वभाव नहीं है।
चिन्मय - पर इन सब पदार्थों की तो हमें जरूरत देती है। अपने प्रेम का भाव है। तो क्रोध-मान का साथ हम लोग का साथ हाथ का एक सचा संतवा कैसा है। जैसे-जैसे में कोई स्थायी स्वभाव तो यह है। अतः शरीरादि पर पदार्थों के कारण होने वाले सुख से और दुख के कारण होने से वे वह भी जीव नहीं है।
ज्ञानेश - हर भाई साहब। द्रव्य मात्र तो एकीमय वेभी सेहते हैं। दोनोंये सुभिराज के द्रव्य साथ होता होकर रहते हैं। वह अपना नहीं मानते उन भावों पर भावों के ही होते हैं। वे उन्हें अपना भाव मानकर आत्मा में हो लीन होते हैं।
अगम - अच्छा तो आपने भेदज्ञान का चर्चा में सुन्दर स्वरूप चमकाया। हे पर यह भवसागर लेगा जैसे?
नाटक : जीव है या मैं हूँ।
लेखिका : ब्र.जे. आरती जैन
पात्र – दस विद्वान
पहला मित्र - चलो भाई! कहीं तीर्थ वंदना को चलते हैं।
दूसरा मित्र - हाँ भाई! विचार तो बहुत अच्छा है, चलो चलते हैं।
तीसरा मित्र - पर मित्र! ये तो बताओ कौन-से तीर्थ चलने का विचार है?
चौथा मित्र - मेरा तो विचार है कि पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन करने बनारस नगरी चलते हैं।
पाँचवा मित्र - (दौड़कर आते हुए) अरे भाईयों! कहाँ जाने की तैयारी हो रही है?
छटवा मित्र - (स्वयं मित्र से) हम सब तो बनारस तीर्थ-वंदना करने की बात कर रहे थे।
सातवाँ मित्र - अरे वाह! चलो हम सब भी साथ चलेंगे।
आठवाँ मित्र - (सभी एक चक्कर लगाकर) हम सब तैयार हैं। अब कब चलना है?
नवमा मित्र - अरे भइया! चलना ही तो हम सबको शुद्धिभागी मैं बनने का आमंत्रण देती है।
दसवा मित्र - चलो सब अब देर किस बात की है। चलो।
(चलो सब अब देर किस बात की है। सभी मिलकर जाते हैं)
सुखी मनको प्रात कर वंदें चलो वंदें चलो।
यहाँ न एक क्षण बचीं वंदें चलो वंदें चलो।
श्री विमल वाणी वो केवल कह कर नाचेंगे।
हाँ मेल पुण्य का क्या; उसे सदा रिझायेंगे।
जो जाने जानकार तुम्हें चलें चलें चलें चलें…।
सुविचार को प्राप्त कर वंदें चलो वंदें चलो।
एक-दो-तीन… महावीर भगवान की जय हो।
जावेगे, चार मित्रों के हाथ में झंडे रहेगे जिससे वे पंक्तिग कर चलायेगे।।
यात्रा प्रारंभ करते समय-बोलो पार्श्वनाथ भगवान की जय।
आठवाँ मित्र - मित्रो! बनारस पहुंचने में बहुत समय लगेगा… ऐसा करते हैं.. समय बिताने के लिए कुछ करते हैं।
नवमाँ मित्र - ठीक है भाई। (अन्ताक्षरी) खेलते हैं।
दसवा मित्र - शुरू करो अंताक्षरी, लेकर प्रभुकानाम समय बिताने के लिए करता है कट काम V-म से बोलो।
पहला मित्र - मीठे रस से भरी जिनवाणी लागे, जिनवाणी लागे। मनने आत्मा को बात भली प्यारी लागे।।
दूसरा मित्र - ग से भैया, गा रे भैया, गा रे भैया। प्रभु गुण गा तू समय न गवा।।
तीसरा मित्र - बनारस तुले – पार्श्वनाथ और बनारसे वाले। वाराणसी घर जन्म लियो है माताकी कोख को धन्य किया है
अश्वसेन हो तात के तारे-2 पार्श्वनाथ कुमार, बनारस वाले..
चौथा मित्र - बारे कुंडलपुर में वृषभ की प्यारी में वीर जन्म -2 महावीरजी
पाँचवाँ मित्र - जीओरा हो तो लीमिहु 2 जीकाऊ उस के आओ समझिउ पिआरा भाव सहित वंदन करो, धर्मका में।
छटवाँ मित्र - जोरा हो ओ जोरा। हेमा हेमा-हेमा-हेमा-हेमा रे। प्रभु तारा जी रंग मा रंग गयो रे।।
सातवाँ मित्र - रोम-रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा हो नाम तुम्हारा।।
आठवाँ मित्र - रोम-रोम प्रफुल्लित हो जाय। जब जिनवर के दर्शन पाय।।
नवमा मित्र - ये धर्म है आत्मज्ञानी का, समिधपुर महावीर स्वामी का
इस धर्म का भैया क्या कहना, ये धर्म है तारों का रास्ता
जय हो
दसवा मित्र - ढोबी खेती सुनेराव मिलवनमें वे अकेले वन में मधवन में..
पहला मित्र - (इशारा करते हुए) पूरे, अरे! मित्रो! देखो बनारस नगरी का प्रवेश। बोलो! पार्श्वनाथ भगवान की जैयू!
(नाव से उतर कर सब उत्साहित थे)
दूसरा मित्र - देखो मित्रो! नगरी में जब से प्रवेश एक बार जिनधर्म करने को, पूरे 10 मित्र है।
तीसरा मित्र - चलो मैं गिनता हूँ… (गिनता)
एक-दो-तीन – नौ।
चौथा मित्र - अरे! अरे! ये क्या हुआ, जब हम गाँव से निकले थे तो पूरे दस थे, लेकिन अब नौ ही बचे…।
एक-दो - अरे भाई! तुमने अच्छे से नहीं गिना, मैं गिनता हूँ
पाँचवा मित्र - नौ, अरे वो ही है। अरे! लगता है, तुम सबों की भी गिनना नहीं आता। मैं अकेली में गिनता हूँ, एक…दो… नाउन अरे क्या बात है, नहून ही है।
छटवा मित्र - अरे भ्राता हैं, वास्तव में अथवा एक मित्र डूब गया। ऊँ ऊँ ऊँ…
(सब मित्र रोते लगते हैं)
(सभी वहां से तरफ़ पंक्ति) निकलते हैं।
पण्डितजी - क्यों भइया! क्या बात हुई है तुम सब रो क्यों रहे हो?
सातवाँ मित्र - क्या बतायें। हमारा एक मित्र गंगा में डूब गया।
पण्डितजी - गंगा में डूब गया?
:कसौटी:-
आठवाँ मित्र- ये तो हमें नहीं मालूम लेकिन हम अपने गाँव से दस मित्र आये थे, अब नौ ही बचे।
पण्डितजी - अच्छा, अच्छा मैं समझ गया, चलो कोई बात नहीं। ये दस गिनता हूँ, देखो। एक..दो… दस। देखा। तुम लोग तो पूरे दस हो। तुम दूसरों को तो गिन रहे थे, लेकिन स्वयं को गिनना भूल जा रहे थे, इसलिए दुखी हो रहे थे।
सिद्धान्त - इसी प्रकार यह जीव, जीव को जानने के नाम पर जीव द्रव्य, जीव तत्व, जीव पदार्थ, जीवास्तिकाय आदि सभी को जानता है। जीव के सभी भेद संज्ञारी-मुक्त, त्रस, स्थावर, सूक्ष्मरूप, मार्जनास्थान, जीवसमात्, सभी कुछ सीख लेता है, अंत की परेक्षा भी रख लेता है, लेकिन वह ज्ञान-दर्शन का धर्ता भरती हुई वस्तु मैं स्वयं हूँ, जीव के सत्ता में हूँ ही, ऐसी प्रतीति नहीं करता, ऐसा भाव भासन नहीं करता, इसलिए संसार में परिभ्रमण कर दुःखी होता है, यदि स्वयं को जान ले तो, परम सुखी हो जाए।
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।
प्रूफरीडिंग बाकी है