उत्तम क्षमा धर्म (दसलक्षण तत्त्वार्थसार TatvarthSar)
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उत्तम क्षमा धर्म
क्रोधोत्पत्तिनिमित्तानामत्यन्तं सति संभवे।
आक्रोशताडनादीनां कालुष्योपशमः क्षमा॥१४॥
अर्थ- गाली देना तथा मारना आदिक क्रोध की उत्पत्ति के बहुत भारी निमित्तों के रहते हुए भी कलुषता का अभाव होना क्षमा है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम मार्दव धर्म
अभावो योऽभिमानस्य परैः परिभवे कृते।
जात्यादीनामना वेश्मदानां मार्दव हि तत्॥१५॥
दूसरों के द्वारा अनादर किये जाने पर भी जाति आदिक मदों का आवेश न होने से जो अभिमान का अभाव है वह मार्दव धर्म है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम आर्जव धर्म
वाङ्मनःकाययोगानामवक्रत्वं तदार्जवम्।
वचन, मन और काय योगों की जो अवक्रता है वह आर्जव धर्म है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम शौच धर्म
परिपोगोपभोगत्वं जीवितेन्द्रियभेदतः॥१६॥
चतुर्विधस्य लोभस्य निवृत्तिः शौचमुच्यते।
प्राणीसम्बन्धी परिभोग और उपभोग तथा इन्द्रियसम्बन्धी परिभोग और उपभोग के भेद से लोभ चार प्रकार का होता है उसका अभाव होना शौच धर्म कहलाता है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम सत्य धर्म
ज्ञानचारित्र शिक्षादौ स धर्मः सुनिगद्यते।
धर्मोपबृंहणार्थं यत्साधु सत्यं तदुच्यते॥१७॥
ज्ञान और चारित्र की शिक्षा आदि के विषय में धर्मवृद्धि के अभिप्राय से जो निर्दोष वचन कहे जाते हैं वह सत्यधर्म कहलाता है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम संयम धर्म
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं प्राणिनां वधवर्जनम्।
समितौ वर्तमानस्य मुनेर्भवति संयमः॥१८॥
समितियों का पालन करनेवाले मुनि का इन्द्रियविषयों में विरक्त होना तथा जीवों के वध का त्याग करना संयमधर्म है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम तप धर्म
परं कर्मक्षयार्थं यत्तप्यते तत् तपः स्मृतम्।
कर्मों का क्षय करने के लिये जो तपा जावे वह तप कहलाता है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम त्याग धर्म
त्यागस्तु धर्मशास्त्रादिविश्राणनमुदाहृतम् ॥१९॥
धर्मशास्त्र आदि का देना त्यागधर्म कहा गया है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम आकिञ्चन्य धर्म
ममेदमित्युपातेषु शरीरादिषु केषुचित्।
अभिसंधिनिवृत्तिर्या तदाकिञ्चन्यमुच्यते ॥२०॥
ग्रहण किये हुए शरीर आदि किन्हीं पदार्थों में ‘यह मेरा है’ इस प्रकार के अभिप्राय का जो अभाव है वह आकिञ्चन्यधर्म कहलाता है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
स्त्री संसक्तस्य शय्यादेरनुभूताङ्गनास्मृतेः ।
तत्कथायाः श्रुतेश्च स्याद्ब्रह्मचर्यं हि वर्जनात्॥२१॥
स्त्री से सम्बन्ध रखनेवाले शय्या आदिक
पदार्थ, पूर्वकाल में भोगी हुई स्त्री का
स्मरण तथा स्त्रीसन्बन्धी कथा का
सुनना इनके त्याग करने से ब्रह्मचर्य-धर्म
होता है।
श्री अमृतचंद्र आचार्य देव कृत तत्त्वार्थसार
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 3073.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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