तत्त्वभावना — जैन स्वाध्याय सामग्री | Tattvbhavna

तत्त्वभावना

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

तत्त्वभावना
(बृहत् सामायिक पाठ)
अन्वयार्थ, विस्तृत टीका व छन्द सहित

टीकाकार
श्री ब्र० शीतल प्रसाद जी

सम्पादन :
महावीर प्रसाद जैन सर्राफ १३२५ चाँदनी चौक, दिल्ली

प्रकाशक :
बिशम्भर दास महावीर प्रसाद जैन सर्राफ
१३२५, चाँदनी चौक, दिल्ली-६

तृतीय वृत्ति २४-२-१९६२ फागुन बदी ७ वि. सं. २०४८

प्रस्तावना

सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्य चूड़ामणि-
स्तद्वाचः परमार्हतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्योतिकाः।
सद्दर्शनज्ञानचारित्रगुणो यति वरास्तेषां समालम्बनं,
तत्पूजा जिनवाक्प्रपूजन मतः साक्षाज्जिनः ॥१॥
॥ पञ्चानन्दी पं० ॥

वर्तमान कलिकाल में तीन लोक के पूज्य केवली भगवान्
जो राग-द्वेष से रहित ध्यान में लीन, समस्त पदार्थों के ज्ञाता
और कर्ममल रहित हैं, जोओं को संसार पार उतारने में निमित्त
हैं इस भरतक्षेत्र में साक्षात् नहीं हैं तथापि समस्त भरतक्षेत्र में
भगवद्वाहिनी केवली भगवान् की वाणी मौजूद है तथा उन्हें
वाणी के आधार स्तम्भ श्रेष्ठ रत्नत्रयधारी मुनि भी हैं जो समस्त
विषयों, आशाओं और आरम्भ से रहित होते हैं, सदैव ध्यान
अध्ययन में रहते हैं, जिन भगवान् की आज्ञा में चलने वाले हैं
सच्चे गुरु हैं इसीलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती का
पूजन है तथा सरस्वती का पूजन साक्षात् केवली भगवान् का
पूजन है।

तीर्थंकर देव द्वारा प्रत्यक्ष देखी गई, दिव्यध्वनि में प्रस्फुटित
तथा गणधर द्वारा गुम्फित वह महान् आचार्यों द्वारा प्रसारित
जिनवाणी की रक्षा हो इसी उद्देश्य से—

बिशम्भर दास महावीर प्रसाद जैन सर्राफ १३२५, चाँदनी
चौक, देहली-६ ने स्व० पूज्य ला० बिशम्भर दास जी जैन,
श्रीमती केसर देवी जैन, श्रीमती सुन्दरी देवी जैन, श्रीमती जैनी
देवी जैन एवं श्रीमती विमला देवी जैन की पुण्य स्मृति में फरवरी
१९६२ में श्री अमितगति आचार्यकृत तत्त्वभावना ग्रन्थ प्रका-
शित कराया ॥

(iv)

अब फरवरी १९६२ में श्री अमितगति आचार्य विरचित
‘तत्त्वभावना’ बृहत् सामायिक पाठ प्रकाशित कर रहे हैं ताकि
स्वाध्याय प्रेमी बन्धु आत्म कल्याण कर सकें।

मालवा प्रान्त के राजा मुंज के गुरु आचार्य माधव सेन के
शिष्य आ० नेमी सेन के परम शिष्य श्री १०८ आचार्य अमित-
गति ने ‘तत्त्वभावना’ अर्थात् बृहत् सामायिक पाठ १२० श्लोकों
में रचा और छोटा सामायिक पाठ अर्थात् भावना द्वित्रिंशिका
३२ श्लोकों में रची। आप ११वीं शताब्दी के महान् विद्वान्
कवि एवं वीतरागी संत थे। आपके रचे हुए ७ ग्रंथ प्राप्त हैं।
१. सुभाषित रत्नसंदोह वि. सं. १०५०; २. धर्म परीक्षा वि.
सं. १०७०; ३. पञ्चसंग्रह वि. सं. १०७३ में रचे थे; ४. उपा-
सकाचार, ५. आराधना, ६. सामायिक पाठ, ७. भावना द्वि-
त्रिंशिका एवं तत्त्वभावना।

प्रस्तुत ग्रंथ ‘तत्त्वभावना’ वैराग्य और आत्मज्ञान का भण्डार
है। इसका हिन्दी अनुवाद एवं टीका ब्र० शीतलप्रसाद जी ने
४-१०-१९१३० असीज बदी ५ गुरुवार वीर सं. २४४४ वि. सं.
१९८५ में रोहतक चातुर्मास में की थी। आपके लिखे एवं अनु-
वाद किये लगभग १०० ग्रंथ हैं। सभी सारभूत एवं आध्यात्मिक
हैं। ब्र० जी का जन्म वि. सं. १९४४ में हुआ था। आप ३२
वर्ष की आयु में गृह त्याग कर जिनवाणी का प्रचार-प्रसार
अन्तिम समय तक करते रहे।

प्रथम बार यह ग्रंथ श्री मूलचंद किशनचंद कापड़िया ने
सूरत से प्रकाशित कराया था। द्वितीय वृत्ति आचार्य देवभूषण
जी ने जनवरी १९७३ में दिल्ली से प्रकाशित कराई। ग्रंथराज
अप्राप्य होने की वजह से तृतीय वृत्ति प्रकाशित की जा रही है।

जो अगणित संसार के दुःखों से छूटकर अनन्त सुख स्वरूप

(v)

मोक्ष में ले जाकर रखे, परमानन्दमय सुख का रसास्वादन करावे वो ही वास्तविक धर्म है। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त जैन संस्कृति का मूल आत्मा है। यही जिनवाणी का सार भी है। भगवान् जिनेन्द्र देव ने सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का मूल कारण सम्यग्दर्शन को ही कहा है वो ही मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी है धर्म का वीव है। पांचों इन्द्रियों का दमन सिवाय सम्यग्ज्ञान के दूसरे से नहीं हो सकता है। प्रायः आज के आत्माभिमुख वक्ता, एकान्तवादी एवं निश्चयाभासी ये भूल जाते हैं कि सम्यक्चारित्र के बिना सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान मोक्ष प्राप्त कराने में असमर्थ हैं। “ज्ञानन ज्ञानोपयोग पावत नाहीं मनोगम, तावत ही करत योग कहां पुण्य करनी।” धूप से छांव में बैठना सुखद है। व्रत, उपवास, व्यवहार, चारित्र पालन कब नरक निगोद से बचना श्रेष्ठ है। मुझे तत्वज्ञान है समस्त इन क्रियाओं को छोड़कर मात्र अध्यात्म का ऊपर से गुणगान करेगा तो इधर का रहेगा ना उधर का और अनन्त सागर दुःख उठाना पड़ेगा। समस्त शुभ क्रियाएं तो छोड़ने योग्य है ही नहीं किन्तु उन्हें धर्म मानना गलत है। शुद्धोपयोग की अवस्था में स्वतः छूट जाती है छोड़ना नहीं पड़ता है।

सम्यग्दर्शन रूपी हार को अपने हृदय में धारण करके, ज्ञानरूपी कुण्डलों को अपने दोनों कानों में पहनकर और चारित्ररूपी मुकुट को अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए। ये तीनों रत्न ही मोक्षरूपी लक्ष्मी को वश करने में कारण है। व्यवहार रत्नत्रय भी निश्चय रत्नत्रय की प्राप्ति में मुख्य निमित्त है परन्तु जब तक चित्त में बाह्य क्रियाओं की लिप्तता का समावेश रहेगा तब तक कभी भी रत्नत्रय का पालन नहीं हो सकता। यह विषयकषाय रागादि भावों से रहित हो, मोक्ष प्रदान करने वाला है। ये ध्यान के द्वारा जाना है वीतरागी मुनियों के ही होता है

(vi)

रागियों के नहीं। अपनी निजी आत्मा ही तीन लोक का नाथ है अनन्त अविनाशी गुणों का समुद्र है। ध्यान मार्ग से उसका स्वरूप जाना जाता है एवं जिस प्रकार समस्त कर्मों से रहित सिद्धों का स्वरूप शुद्ध है उसी प्रकार हमारी आत्मा भी द्रव्यदृष्टि से शुद्ध है इस प्रकार अपने अन्तरंग परमात्मा में जो श्रद्धान होता है वह निश्चय सम्यग्दर्शन है। उत्कृष्ट आत्मा ही ज्ञान है, जो स्वसंवेदन स्वरूप आत्मा का ज्ञान करना है वही निश्चय सम्यग्ज्ञान है। यह निजआत्मा सम्यक्चारित्र स्वरूप है। अन्तरंग में ध्यान के द्वारा जो स्वसंज्ञ अपना आचरण करता है वही निश्चय चारित्र है। “पर द्रव्यन ते भिन्न आप में रुचि सम्यक्त्व भला है, आप रूप को आनपना सो सम्यक्ज्ञान कला है। आप रूप में लीन रहे थिर सम्यक्चारित्र सोई।” ऐसा ध्यान वीतरागी मुनियों के ही मुख्य रूप से सम्भव है। मात्र आत्मा आत्मा कह कर परिग्रह के संबंध में लिप्त रहने वालों के नहीं। जो ज्ञानी चैतन्य स्वरूप उत्कृष्ट आत्मा-परमात्मा का ध्यान करते हैं उनके ध्यायरूपी अग्नि से अनन्त कर्म पिण्ड देखते-२ भस्म हो जाते हैं।

अनादि काल से यह जीव चार गतियों और चौरासी लाख योनियों में जन्म मरण के दुःखों को उठा रहा है लेकिन इसके दुःखों का अन्त नहीं आया। सभी जीव सुख चाहते हैं लेकिन सुख का उपाय कोई नहीं करना चाहता। अनन्तों सागर निगोद में रहकर मात्र दो हजार सागर कुछ अधिक के लिए त्रस पर्याय प्राप्त होती है जिसमें १६ भव पुरुष, १६ भव स्त्री एवं १६ भव नपुंसक पर्याय के प्राप्त होते हैं यदि इसमें अष्ट कर्मों का विनाश करके मोक्ष की प्राप्ति नहीं की तो फिर अनन्तों सागर तक निगोद में जाना पड़ता है।

“यह मानुष पर्याय सुकुल सुनिकी जिनवाणी” ऐसा सब कुछ प्राप्त करके भी भविष्यत के अनन्तों भवों का नाश इसका क्योंकि

(vii)

में करने का भाव लेकर कष्ट में निर्भय मुनि बनूं समाधि मरण करूं, ऐसा भाव न आया तो जन्म निरर्थक होगा।

श्रावकों के अष्ट मूल धारण करके, देव दर्शन, श्री जी का प्रक्षाल, पूजा पाठ, जाप, स्वाध्याय, सामायिक, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा, दान, मुनि समागम, प्राणोपाय पर करुणा का भाव ऐसा करते हुये निम्न कार्यों का त्याग करना चाहिए। सप्त व्यसन-मद्य, मांस, मधु, अण्डा, जिमीकंद, रात्रि भोजन, २२ अभक्ष्य, चांदी व सोने का वर्क, होटल में जाना वहां जाकर खाना, रात्रि की शादी में जाना, रात्रि की शादी करना-कराना, अनछना पानी पीना, पांच पाप इत्यादि। निरन्तर महाव्रती बनने की भावना रखे और अन्त में समता भावपूर्वक समाधिमरण करूँ ऐसी भावना हमेशा भावे।

मैं किसी का भला बुरा कर सकता हूं या कोई मेरा क्या देगा ऐसा कर्तृत्व भाव न लावे। कोई देवता मेरा भला बुरा कर सकता है, मैं कुटुम्ब का पालन करता हूं, चेतन स्त्री, पुत्र कुटुम्बी अचेतन धन, मकान, परिग्रह से राग द्वेष घटावे, मिथ्यात्व का सर्वथा त्याग करे-त्रिकाली ध्रुव अजर अमर आत्मा एकाकी है अपनी है बाकी समस्त पदार्थ, मेरा शरीर भी पर है ऐसा दृढ़ विश्वास लाकर अहंकार ममकार का त्याग करे। “जीव जुदा पुद्गल जुदा, याही तत्व को सार। सब ग्रन्थों में पढ़ लीजिए, है याही को विस्तार।” “लाख करोड़ ग्रन्थन को सार, भेद ज्ञान और दया विचार।” जब शरीर भी मुझसे भिन्न है तो फिर बाकी सभी पदार्थ तो साक्षात् भिन्न दिख ही रहे हैं। इस जगत का बनाने वाला, पालन द्वारा, विनाश करने वाला कोई ईश्वर नहीं है। जगत अनादि निधन है। अपने स्वकर्म के किये कर्मों के अनुसार जीवों को सुख-दुःख भोगना पड़ता है। इन सभी बातों का वर्णन अभिगत आचार्य ने बहुत ही सुन्दर-

( viii )

रूप में किया है। मोक्ष प्राप्ति का सरल उपाय ध्यान का विशेष वर्णन इसमें लिखा है। “निज को निज में जान, पर को पर में मान। तेरा आत्म है परमातम, और सभी पर मान।”
कर्मों की निर्जरा का एक मात्र साक्षात्‌ उपाय, एकाकीपन, निसंगता, आत्मा के सम्मुख होना, आत्मा में रमणता या ब्रह्म-चर्य, स्व में रमण या स्वाध्याय, साम्यभाव, सिद्धि, स्वारम्भ-लंबि, आत्मलीनता, चित्त को स्थिरता, सामायिक, ध्यान इत्यादि सभी पर्यायवाची शब्द हैं। महान्‌तों के लिए तो इनको विशेष प्रमुखता हो किंतु श्रावकों का भी २ या ३ बार अवश्य करने को कहा है ताकि आगे जाकर सरलता से आत्म कल्याण कर सकें। कर्मों की निर्जरा होकर मोक्ष प्राप्ति का ये ही उपाय है। सामायिक में प्राणी मात्र से दोषों को क्षमा माँगकर, क्षमा करके, अचल आसन, समय की पाबन्दी, राग द्वेष मोह का त्याग करके संकल्प-विकल्प को छोड़कर शरीर को पड़ोसी समझ कर अन्दर जो चैतन्य स्वरूप ज्ञाता दृष्टा परमात्मा विराजमान है अर्थात्‌ शरीररूपी देवालय में जो मेरा आत्मा भगवान स्वरूप है उसको सबसे एकाकी अनुभव करना है वो देखने दिखाने की चीज नहीं, अतीन्द्रिय है, सिर्फ़ अनुभवगम्य है और अनुभव भी पर से विरक्त हुये बिना नहीं होगा। कुछ भी काम करते हुए, प्रत्येक क्रिया को हमारी कोई अन्दर अनुभव कर रहा है वो ही मेरा परमात्म-स्वरूप आत्मा है। सेठ के यहाँ लाखों करोड़ों का व्यापार करता हुआ मुनीम उस धन की लाभ-हानि से विरक्त है। लड़की की सगाई पक्की होने पर लड़की भी माँ-बाप के घर को पर मानने लगती है। इसी प्रकार ज्ञानीजन शरीर से भी विरक्त रहते हैं।
कहते हैं संसार में शरण नहीं। वो पर्याय को अपेक्षा है। यदि पंचपरमेष्ठी की शरण लेकर अपनी आत्मा का स्मरण लिया

( ix )

जावे तो अनादि का जन्म मरण का रोग मिट जावे। “शुद्धात्म और पंचगुरु जब मैं शरणा दो।” जितने भी सिद्ध हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे, इसी उपाय से हुए हैं।
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति चारों गतियों में हो सकती है किंतु संयम धारण मात्र मनुष्य पर्याय में ही हो सकता है अतः संयम मुख्य है। सर्वार्थ सिद्धि के देव भी जो निरन्तर ३३ सागर तक उत्कृष्ट धार्मिक चर्चा में ही लगे रहते हैं संयम धारण नहीं करने के कारण मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते सोचते हैं कब मनुष्य पर्याय पावें, मुनिसंयत धारण करके तप द्वारा ध्यानाग्नि में कर्मों को विनष्ट करके मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त करें।
पद्मनंदि मुनि ने परमायोगांशांति में आत्मध्यान व आत्मत्व में एकाग्र होने की भावना बताई है-
देव तत्प्राप्तिमो गुरु मुनि जनं शास्त्रार्दि मन्त्य गृहे।
सर्वं भक्तिपरं वयं व्यवहृतो मार्ग स्थिता। निश्चयात्‌॥
अस्माकं पुनरेकताऽश्ययतो व्यक्तीभवच्छिद्‌ गुण-
स्फारी भूतमति प्रबोध महसामात्मैव तत्वं परम्‌॥११३॥
जब हम व्यवहार मार्ग में लगते हैं तब हम श्री जिनेन्द्र देव इनकी प्रतिमा, जिनगुरु व साधुजन तथा शास्त्रादि सबकी भक्ति करते हैं परन्तु हम जब निश्चयमार्ग में जाते हैं तब प्रगट चैतन्य गुण से झलकती हुई भेदविज्ञान की ज्योति जल जाती है उस समय हम एक भाव में लय हो जाते हैं तब हमको उत्कृष्ट तत्व एक आत्मा ही अनुभव में आता है अर्थात्‌ शुद्ध आत्मा के सिवाय अन्य कुछ अनुभव में न आवे वही निर्मल आत्मध्यान है।
जिनके भीतर ज्ञान अग्नि बढ़ती सम्यक्त्व की पवन से।
ईंधन कर्म जलाय, दोष मन सब कर दूर निज रमण से ॥१६५
सम्यक्त्व ज्ञानवत्तस्य समधुते ज्ञान भागेण मुढा।
लंचिस्वा जन्मनुई निरुपमितं सुधा ये धियावत्ति सिद्धि।

( x )

ते शिक्षावन्ति नूनं निजमुदबुद्धि बाहुगुमेन तीव्रम्‌।
कल्पांतोद्‌भूतवातस्तु भित्तज्वरासार कोर्णांतरम्‌॥१६६॥
मोक्ष का उपाय रत्नत्रय की एकता है। मार्ग को जान लेने मात्र से ही कार्य को सिद्धि नहीं हो सकती है। जो ऐसा मानते हैं कि हमने आत्मा की पहचान लिया है अब हमें कुछ भी चारित्र पालने की आवश्यकता नहीं हम चाहे पाप करें या पुण्य करें हमें बन्ध नहीं होगा वे ऐसे मूढ़ हैं जैसे वे लोग मूर्ख हैं जो अपनी भुजा से समुद्र पार कर-कर के, चले जायेंगे जो कल्पकाल की घोर पवन से डांवाडोल है जिसमें अनेक मगरमच्छ भयानक जंतु हैं।
सम्यग्दर्शन सम्यक्ज्ञान सम्यक्चारित्र तीनों की एकता की जरूरत है। जैसे व्यापार करना है तो पहले दोतियों को समझते हैं, विश्वास लाते हैं फिर जब उस विश्वास सहित ज्ञान के अनु-सार उद्योग करते हैं तब ही व्यापार में सफलता पा सकता है।
अमितगति हमारे राज ने सुभाषित रत्नसंदोह में कहा है-
सम्यग्दर्शनं तपोधर्मोऽवचारित्रं भाजः सफलाः समस्ताः।
यथार्थचारित्रेण विना भवन्ति शास्त्वेह समन्तश्चरित्रे यतन्ते॥१४२
सम्यग्दर्शन सम्यक्ज्ञान तथा तप व इन्द्रिय दमन सहित जो जीव चारित्र को पालन करने वाले हैं वे सर्वे ही सफलता को पा लेते हैं क्योंकि चारित्र के बिना उन सबका होना व्यर्थ है। तीनों की एकता से जो भाव पैदा होता है उसे स्वानुभव कहते हैं।
जहाँ अज्ञान ज्ञान सहित आत्मस्वरूप में रमणता होती है वहीं स्वानुभव या आत्मध्यान पैदा होता है। यही ध्यान मोक्ष का मार्ग है, कर्मों को निर्जरा करके आत्मा को शुद्ध करता है। इसलिए मात्र जानने से ही कार्य बनेगा इस बुद्धि को दूर कर श्रद्धान व ज्ञान सहित चारित्र को पालना चाहिए। मन को

( xi )

निराकुल करने के लिए श्रावक या मुनि का चारित्र पालन करना ही चाहिए—


सम्यग्दर्शनरूपी नौका/सम्यग्ज्ञानरूपी जल/सम्यक्चारित्र रूपी—
|
विश्वास
मन


खिवैया तभी भवसागर
से तिरोगे।
व्यापार करना
काय

रीति समझना
वचन

मोक्ष के मुंह में हूँ और मेरी उम्र क्षण भर भी नहीं है ऐसा सोचकर मनुष्य को यथा सम्भव जप, तप, संयम, स्वाध्याय, पूजा, दान आदि का आचरण करते रहना चाहिए।

सारांश में ध्यान ही मुक्ति का कारण है !

जो शरीर इन्द्रिय मन और वचन में आत्मबुद्धि/ममकार व अहंकार बुद्धि रखता है वह बहिरात्मा आत्माभिमुख ध्यान करने में असमर्थ है।

जो शरीर व आत्मा में भेद करता हुआ सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्र से युक्त होकर प्रमाण, नय और निक्षेप के आश्रय से जीवादि नौ पदार्थों, सात तत्वों, छह द्रव्यों और पांच अस्तिकायों के साथ शरीर व आत्मा के भेद को जानता है अन्तरंग-बहिरंग परिग्रह रहित ऐसा अन्तरात्मा ही परमात्मा के ध्यान में समर्थ होता है।

सम्यग्ज्ञानी जीव के मोह क्षोभ से रहित बाह्य और अभ्यन्तर्य क्रियाओं का निरोध ही साम्यभाव/सम्यक्चारित्र है जो मुक्ति का साक्षात् मार्ग है।

ध्यान के चार प्रकार में—

१. आर्तध्यान, २. रौद्रध्यान

( xii )

दोनों चार-चार प्रकार के हैं संसार के कारण हैं, त्याज्य हैं, क्रमशः तिर्यंच गति नरक गति को ले जाने वाले हैं। ३. धर्म-ध्यान स्वर्ग का कारण है परम्परा से मोक्ष का, पंचम काल में हो सकता है। ये आज्ञा विचय, विपाक विचय, अपाय विचय, संस्थान विचय ४ प्रकार का है—१. पिण्डस्थ, २. पदस्थ, ३. रूपस्थ, ४. रूपातीत के भेद से भी चार प्रकार का है।

पिण्डस्थ की पृथ्वी अग्नि जल आदि ५ धारणाओं एवं ध्यान का समस्त विषय सचित्र पेज १२२ से आचार्य श्री ने बहुत ही अच्छा वर्णन किया है। चित्रों को देखकर अभ्यास करने से सरलता से ध्यान मार्ग में प्रवृत्त हो सकते हैं। ४. शुक्लध्यान इस पंचम काल में नहीं होता है साक्षात् मुक्ति का कारण है।

सभी साधर्मी जन इस ग्रन्थराज का स्वाध्याय कर आत्म-कल्याण करें इसी शुभ भावना के साथ।

२४-२-१९६२ सोमवार
फागुन बदी ७ सं० २०४८
श्री चन्दा प्रभु जी ज्ञानकल्याण
एवं
श्री गुणसागरजी की निर्माण जयन्ती।

विनितः
जिन चरण सेवक
महावीर प्रसाद जैन सर्राफ
१२१२५, चाँदनी चौक
देहली

श्री अमितगति आचार्यकृत-

तत्वभावना

या

बड़ा सामायिक पाठ।

मज्झारणा-दोहा।

अरहं सिद्धाचार्यको, वंदि साधु गुणराय।
निजवासो यूष चैत्यजिन, मंदिर नमूं सुखदाय ॥१॥
परमातम सम आपको, ध्याय सुगुण उर लाय।
समताभाव प्रकाशके, आतम सुख झलकाय ॥२॥
सामायिकके भावको, कर प्रकाश निज ज्ञान।
भव्यजीव भी रस पियें, यह उपकार पिछान ॥३॥
अमितगति आचार्यकृत, तत्वभावना सार।
बालबोध भाषा करूँ, भवदधि तारनहार ॥४॥
सम्मति वीर सुवीरको, वर्द्धमान महावीर।
गौतम गुरु कुन्दादिको, सुमरों लियो धरि धीर ॥५॥

उत्थानिका—

पहले ही चलने में जो हिंसा हुई उसका पश्चाताप करते हैं—

तत्वभावना

शार्दूलविक्रीडित छन्द

एकद्वित्रिबहुत्रीन्द्रियप्रभृतयो ये पञ्चधावस्थिताः।
जीवाः संचरता मया दशदिशश्चित्तप्रमादात्मना ।।
ते ध्वस्ता यदि लोलिता विधिटिताः संघट्टिता मोटिताः।
मार्गालोचनमोचिता जिन ! तदा मिथ्यास्तु मे दुष्कृतम् ।।१।।

अन्वयार्थ

(जिन) हे जिनेन्द्र ! (चित्तप्रमादात्मना) प्रमाद या आलस्य या असावधानीना या कषाय सहित चित्तको करके (मार्गालोचनमोचिता) मार्ग या पथको देखना छोड़कर (दशदिशः संचरता) पूर्वादि दश दिशाओं में चलते हुए (मया) मेरे से (एक द्वित्रिबहुत्रीन्द्रियप्रभृतयः) एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, आदि अर्थात् चौइन्द्रिय व पंचेन्द्रिय (ये) जो (पञ्चधा) पांच प्रकार से (जीवाः) संसारो जीव (अवस्थाः) शास्त्रमें स्थापित किये गए हैं (ते) वे जीव (यदि) यदि (ध्वस्ताः) नाश किये गए हों (लोलिताः) उलट पुलट किये गए हों (विधिटिताः) अलग अलग कर दिये गए हों (संघट्टिताः) मिला दिये गए हों (मोटिताः) पैरों से रौंदे गए हों (तदा) तो (मे) मेरा (दुष्कृतम्) यह पाप (मिथ्या) नाश (अस्तु) हो।

भावार्थ

सामायिक करते समय पिछले किये गए पापों को याद करके प्रतिक्रमण या पश्चाताप इसीलिए किया जाता है कि जिससे आगेके लिए उस पाप से बचा जाए। अहिंसारत की रक्षाके लिए यह आवश्यक है कि चार हाथ जमीन आगे देखकर चला जावे। मुनिगण महाव्रती होते हैं वे दिनके प्रकाशमें प्राशुक रौंदो हुई जमीन पर ही चलते हैं और बड़ी भारी सावधानी रखते हैं कि मेरे द्वारा कोई छोटा-बड़ा वृक्षभी रौंदा न जावे, कोई छोटा

तत्वभावना

कीड़ा भी पैरोंके नीचे न आजावे। फिर भी साधन अवस्था में किसी समय सावधानी न रहने से कोई जंतु कदाचित् पैरके नीचे दबकर मर जाय, या उलट पलट हो जावे, अथवा शरीर, जमीन, कमंडल आदिको मुलायम पींछीसे पोछते हुए कोई जंतु जो मिले वे अलग-२ कर दिये जावें, व कई जो अलग थे वे मिला दिये जावें इत्यादि कारणोंसे प्रमाद हेतु होनेसे हिंसा सम्बन्धी पापका बंध संभव है। उस पापके बंधको छुड़ानेके लिए मुनिगण इस तरह विचारकर भावना भाते हैं। इस भावना से, पाप कर्म जो बंधचुका है उसकी स्थितिमें व उसके अनुभागमें कमी हो जाती है। श्रावकोंने आरंभ त्यागी आठवों प्रतिमासे उद्दिष्ट त्यागी ग्यारहवीं श्रेणी तकके श्रावक हिंसासे बचनेमें बहुत ही सावधान होते हैं। वे स्वयं हिंसाकारक आरम्भ नहीं करते हैं, न कराते हैं। इसलिए ये श्रावक भी मुनि के समान किसी सवारी पर नहीं चढ़ते हैं—मार्गको देखकर चलते हैं। ग्यारहवीं प्रतिमा वाले ऐलक मुनि समान व्यवहार करते हैं; इसलिए रात्रि को न चलते हैं न बोलते हैं। उससे पहले के श्रावक अति आवश्यकता ही तो धर्मकार्यवश प्रकाशमें मार्गको देखते हुए चलते हैं। आठवीसे नीचेके श्रावक आरम्भ त्यागी नहीं होते हैं। उनसे हिंसा अधिक हो जाती है। वे आरम्भमें हिंसा से बच नहीं सकते तथापि यथासम्भव आरम्भ व्यर्थ व अनावश्यक नहीं करते। आवश्यक आरम्भ करते हुए भी जीवदया भावों में रखते हैं। यथासम्भव जीवघात बचाते हैं। युद्धमें सामना करने वालेको ही प्रहार करते हैं। भागते हुएको, शरण में आए हुएको, घायलको, स्त्रीको, बालकको नहीं सताते हैं। खेतीमें भी जान बूझकर किसीको नहीं मारते हैं। व्यापारमें भी पशुओं पर अधिक भार लादकर कष्ट नहीं देते हैं। सवारी पर चलते हुए अधिकतर रौंदे हुए

तत्वभावना

मार्ग पर सवारीको ले जाते हैं। पैदल चलते हुए अपनी आंखों देखकर चलते हैं। तोभी आरंभी श्रावकसे बुहारी देते हुए, घरके काम करते हुए, माल उठाते धरते हुए, मकान आदि बनवाते हुए बहुत अधिक जीवहिंसा हो जाती है। यहां इस श्लोकमें मात्र चलते समय जो हिंसा होती है उसीकी मुख्यता है। हिंसासे लगे हुए पाप-रसको घटानेका विचार ऐसे श्रावकभी करते हैं जिससे आनेके लिए उनके व्यवहारमें अधिक सावधानी हो जावे। जो मानव किसी कर्मको छोड़ नहीं सकता है परंतु निरंतर विचारता है कि यह कर्म छोड़ देने योग्य है वह कभी न कभी छोड़भी देगा व उसे कम करता जायगा, इसलिए हिंसा त्यागकी भावना हरएक मुनि व श्रावकको करना उचित है। यह पाठ सर्व ही प्रकारके धर्मात्मा मुनि, आर्यिका, श्रावक व श्राविका द्वारा मनन करने योग्य है। हिंसा हुई हो तो उसका पश्चाताप अहिंसा पालनेमें सावधान करने वाला होता है।

मूल श्लोकानुसार छन्द गीता

हे श्री जिनेन्द्र ! प्रमाद चित्त हो मार्ग को देखे बिना।
दश दिशा भ्रमण करते विराजे पंथ बिच जंतु घना।
जो एक हैं त्रय आदि इन्द्रिय दलमले छिनभिन किये।
उलटते तथा पलटते मिलाए। पाप मिथ्या होय ये ।।१।।

उत्थानिका

हमारा समय शुभ कार्योंमें बीते ऐसी भावना करते हैं—

तत्वभावना

अहंद्भक्तिपरायणस्य विशदं जैनं वचोऽभ्यस्यतो।
निर्जिन्दृस्य परोपवादवदने शक्यस्य सत्कीर्तने।
चारित्रोज्झतचेतसः सपयतः कोपादिद्वेषिणः।
चैद्याध्यात्मसमाहितस्य सकलाः सन्तु मे वासराः ॥१॥

अन्वयार्थ - (देव) हे जिनेन्द्रदेव (मे) मेरे (सकलाः) सर्वे (वासराः) दिवसम (अहंद्भक्तिपरायणस्य) अर्हन्तकी भक्ति की लीनतामें (विशदं) निर्मल (जैनं वचो) जिनवाणीके (अभ्यस्यनः) अभ्यास करने में, (परोपवादवदने) दूसरों की निन्दा कहने में (निर्जिन्दृस्य) जिह्वा रहित रहने में अर्थात् दूसरों की निन्दा न करने में (सत्कीर्तने) संत पुरुषों के गुणों के वर्णन में (शक्यस्य) अपनी शक्ति लगाने में (चारित्रोज्झतचेतसः) चारित्र के लिए उद्यमी चित्त रखने में (कोपादिद्वेषिणः) क्रोध आदि शत्रुओं को (सपयतः) क्षय करनेमें तथा (अध्यात्मसमाहितस्य) आत्मा के भीतर भले प्रकार लीन होने में (सन्तु) बीतें।

भावार्थ - यहां मोक्षार्थी सुख शांतिको चाहता हुआ व स्वाधीनता के मनोहर वन में रमने की उत्कंठा करता हुआ, मुख शांति व स्वाधीनता के निमित्त कार्यों में नित्य लगे रहने की भावना करता है। साधक शिष्य का प्रयोजन अपने भावों में से क्रोधादि कषायों के मैल को कम करके शांति, क्षमा, वैराग्य, असंगपन्न, आत्मानुभव आदि शुभ तथा शुद्ध भावों को प्राप्त करना है। इस मतलव को ध्यानमें लेकर जिन क्रिया संगति करने से व जिस क्रिया के करने से वह मतलब भिड़ हो उसमें अपने मन को जोड़ता है। और जिनकी संगति से व जिस क्रिया से क्रोधादि कषाय बढ़ें व संसार से मोह अधिक हो आवे उनसे

बचता है। जैनधर्म के सेवन का यही प्रयोजन है। यह धर्म सुख-शांतिमय है तथा सुखशांति को देने वाला है। इस धर्म में वही देव पूजने योग्य है जो सर्वज्ञ, वीतराग व आनन्दमयी है। वही शास्त्र मानने योग्य है जिसमें सुखशांति पाने का उपाय यथार्थ बताया हो। वही गुरु वन्दने योग्य है जो आत्मज्ञानी, वैरागी व सुखशांति का भोगने वाला है। वही मनन व ध्यान कार्यकारी है जो सुख व शांति प्रदान करे। इसलिए साधक ने नीचे लिखे कार्यों में लगे रहने की भावना की है। (१) श्री अर्हन्त को भक्ति व पूजा व गुणों का स्मरण; क्योंकि यह भक्ति अवश्य परिणामों को शांत कर देती है। (२) जिनवाणी का पढ़ना; क्योंकि इससे अज्ञान और अभांति मिटती है। (३) दूसरों की निन्दा न करना; क्योंकि जिसकी आदत परनिन्दा की पड़ जाती है वह दूसरों के अवगुणों को ढूंढा करता है। उसका उपयोग अपनी उन्नति में कुछ नहीं होता है व वह स्वयं श्रीगुण वाला हो जाता है। (४) धर्मात्माओं के गुणों का वर्णन; क्योंकि ऐसे गुणों के कथन से मन उन गुणों के लाभ में उत्साही हो जाता है। (५) चारित्र के लिए उत्साही होना व उद्यम करना; क्योंकि राग-द्वेष के हटाने का उपाय मुनि व श्रावक का चारित्र पालना है। भीतरी चारित्र आत्मस्वरूप में लीनता है, उसका निमित्त साधक व्यवहार में महाव्रत व अणुव्रत का पालन है। (६) क्रोधादि शत्रुओं को नाश करना। वास्तव में जितना इनका अभाव होगा उतना अपना आत्मा का स्वभाव प्रकाशमान होगा। (७) आत्म स्वरूप में लीनता या अनुभव; क्योंकि यही स्वात्मानुभव वास्तव में सुखशांति को साक्षात् देनेवाला है। जो मानव सच्चे दिल से इन सातों बातों को चाहता है, इनके साधने के लिए उपाय क्रिया

करता है वही सुखशांति को पाता हुआ मोक्षमार्ग पर चलने वाला है। जैन मंदिरों में जो नित्य पूजा के पीछे शांतिपाठ पढ़ा जाता है उसमें भी इसी तरह की भावना बताई है। जैसे-

शास्त्रभ्यासो जिनपूजनुतिः संगतिः सर्वबंधुभिः।
सद्‌वृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम् ॥
सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्वे।
सम्पद्यन्तां मम सव्वे पाथवेऽप्सर्गाः ॥

भावार्थ - जब तक मोक्ष न हो तब तक मैं इतनी बातें प्राप्त हों (१) शास्त्र पठन (२) जिन भक्ति (३) सत् पुरुषों की संगति (४) सुचारित्र वालों के गुणों की कथा (५) परनिन्दा न करना (६) सबसे प्यारे मीठे वचन बोलना (७) आत्मतत्व में विचार रहना।

जहां तक आत्मतत्व भले प्रकार न जाग्रत हो वहां तक व्यवहार धर्म में देवशास्त्रगुरुका आराधन करते ही रहना चाहिए। श्रीपद्मनंदि मुनि परमार्थविंशति में इस तरह कहते हैं-

देवं तत्त्वार्पणां गुरुं मुनिजनं शास्त्रानि भव्यान्महे।
सर्वं नवित्सपरा वयं स्वबहुतो मार्ये स्थिता निश्शयात् ॥
अस्माकं पुनरेकताश्रयतो व्यक्तीमवच्छिद्रगुणाः।
स्फारीभूतप्रतिप्रबंधहनतामात्मैव तत्त्वं परम् ॥

भावार्थ - हम व्यवहार धर्म में चलते हुए अत्यन्त भक्तिवंत हों जिनेन्द्रदेव को, उनकी मूर्तिको, मुनीश्वरको व शास्त्र आदि सर्वको मानते हैं अर्थात् इन सबकी सेवा क्रिया करते हैं। परन्तु जब ही रत्नत्रय की एकता अर्थात् समताभाव का आश्रय करेंगे और हमारे भीतर चैतन्य तत्व प्रकट होकर बुद्धि विशाल हो

तत्त्वभावना

जायागो तब हमारे लिए निश्चय से एक आत्मतत्त्व ही देव, मुझ या शास्त्र हो जाएगा। इस प्रकार साधक को व्यवहार धर्म को भावना। निश्चयधर्म के लाभ के लिए करते रहना चाहिए।

मूल श्लोकानुसार गीता छन्द

हे देव ! श्री जिन भक्ति करते जैन श्रव अभ्यास्ते।
निन्दा न करते अन्यजन की साधु गुण सुप्रकासते ॥
चारित्र चित्त में चाहते क्रोधादि शत्रु निवारते।
बीतें दिखत मेरे सभी अध्यात्म अनुभव धारते ॥२१॥

उत्थानिका

आगे कहते हैं कि मेरे चरित्र में जो दोष लगे हों वे व्यर्थ होंवें-

आलस्याकुलितेन मूढमनसा सन्मार्गनिर्णायिना।
लोभक्रोधादमप्रमादनदहेषादिविद्विषत्तमना ॥
यद्बाह्याचरितं विरुद्धमथवा चारित्रमुद्देमया।
मिथ्या दुष्कृतमस्तु सो जिनपते ! तत्त्वप्रसादेन मे ॥२१॥

अन्वयार्थ

(देव) हे भगवन् (आलस्याकुलितेन) आलस्य से भरकर व (मूढमनसा) मन में विवेक को छोड़कर मूर्खता धारु के (सन्मार्गनिर्णायिना) मोक्षमार्ग की विराधना करते हुए (लोभक्रोधादमप्रमादनदहेषादिविद्विषत्तमना) व अपने आत्माकी शोध, लोभ, मान, असावधानो, कामभाव, द्वेष आदि से लिप्त करके (मया) मुझ (अधिया) निर्बुद्धि के द्वारा (यत्तु) जो कुछ (चारित्रशुद्धेः) चारित्रको शुद्धतासे (विरुद्धम्) विपरीत (आच-रितं) आचरण किया गया हो (भो जिनपते !) हे जिनेन्द्र भग-वान ! (तत्त्वप्रसादेन) आपके प्रसाद से (तत्तु) वह (मे) मेरा (दुष्कृतम्) दुष्कृत या पाप या दोष (मिथ्या) नाश (अस्तु) हो।

तत्त्वभावना

भाषा में यहाँ पर भी प्रतिक्रमण का भाव झलकाया गया है। जहाँ तक कषायों का अभाव न हो अर्थात् वीतरागी न हो जावे वहाँ तक कषायों का जोर कभी कम व कभी अधिक होता रहता है। जिस समय परिणाम में कषाय मंद होती है तब ही भावों में शांति, विवेक, बुद्धिमानी झलकती है। तब वह मानव मुनि हो या श्रावक अपने धारण किए हुए चारित्र के नियमों में बहुत बड़ा सावधान रहता है और मन, वचन, कायसे कोई दोष नहीं लगने देता है। परन्तु जिस समय किसी निमित्तवश परि-णाम में लोभ का कुछ जोर हो जावे या क्रोध का वेग उठ आवे या मानभाव में अन्धेरा हो जावे या आलस्य हो जावे या द्वेष-बुद्धि पैदा हो जावे या कामभाव से बावला हो जावे उस समय मन में अशांति, अज्ञान और मूढता कम व अधिक घर कर लेती है। तब उसी मुनि व श्रावक से चारित्र के पालन में बहुत से दोष लग जाते हैं। कदाचित् काय व वचन सम्बन्धी न हो व बहुत ही अल्प हों परन्तु मानसिक दोष तो हो ही जाते हैं। इसीलिए प्रतिक्रमण किया जाता है। जिसमें यह भावना भाई जाती है कि वे दोष दूर हों व उनसे लगा हुआ पाप क्षय हो जावे या कम हो जावे। श्री जिनेन्द्र भगवान के गुण परम पवित्र हैं। इसलिए उनके निर्मल गुणों के स्मरण से परिणाम निर्मल हो जाते हैं और पवित्र भावों में यह शक्ति है कि पापों का नाश कर डालें। जैसे स्थूल शरीर में बहुत सावधानी से हवा, पानी व भोजन लेते हुए व समय में भोजनपान, नीहार, विहार व निद्रा लेते हुए कभी भी किसी न किसी बात में भूल हो जाती है। अनिष्ट भोजन जबान के स्वादवश खा लिया जाता, रात्रिको देर तक जागकर निद्रा कम ली जाती, व काम-काज में उलझ जानेसे बेसमय भोजन किया जाता, व अधिक स्त्री-प्रसंग किया जाता इत्यादि अपनी

तत्त्वभावना

ही भूलोंसे छोटे वा बड़े रोग पैदा हो जाते हैं। तब गृहस्थ लोग उनको दूर करने के लिए औषधियां काम में लेते हैं कि वह रोग शीघ्र मिट जावे, अधिक न बढ़े जिससे कि शरीर बेकाम हो जावे। इसी तरह मुनि व श्रावक बड़ी सावधानी से अपना आचरण पालते हैं तथापि कभी-कभी किसी ही बाह्य या कारणों के वश होकर चलने में देखनेका प्रमाद हो जावे, बोलने में कठोर व कषाय युक्त वचन निकल जावे, भोजन में स्वादिष्ट पदार्थ की लालसा हो जावे, किसी स्त्रीको देखकर मनमें विकार हो जावे, अशुद्धावनी कृति को देखकर मनमें अरतिभाव आजावे, सामायिक करते हुए धर्मध्यान न होकर किसी कारण से आत्मध्यान हो जावे इत्यादि दोष हो जाना संभव है। तब वह मुनि या श्रावक प्रतिक्रमण करके तथा परमात्मा के पवित्र गुणोंका स्मरण करके अपने भावोंको निर्मल करता है, मानों दोषोंके रोगोंको हटाने के लिए औषधि पीता है। ऐसा करने से दोषरूपी रोग मिटते रहते हैं, बढ़ने नहीं पाते। और वह आगामीके लिए सावधान रहता है। वास्तव में यह प्रतिक्रमण एक तरह का स्नान है जो मन के मैल को व आत्मा के पापों को धो देता है।

श्री पद्मनंदि मुनिने आलोचना पाठ में ऐसा ही कहा है-

पापं कारितवान्यदत्रकृतवानन्यैः कृतं साधितं।
धारित्वाऽहं प्रतिपन्नवांश्च मनसा वाचा च कायेन च ॥
काले संप्रति यच्च भाविनि नवस्थानादनुद्गतं।
तन्मिथ्याखिलमस्तु मे जिनपते ! त्वत्प्रसादेन पुरः ॥३०॥

प्रस्तावना

[११]

भावार्थ - हे जिनेन्द्र ! जो मैंने अपने मन वचन कायके द्वारा इस समय तक पाप किया हो, कराया हो व दूसरों से किये जाने पर उसे प्रभुबुद्धि में पड़कर भला माना हो ऐसे सब तरहके दोष जो पहले लगे हों व अब लगते हों व आगे लगेंगे उन सब दोषों का नाश हो। मैं आपके सामने अपनी निन्दा कर रहा हूँ।

मूल श्लोकानुसार छन्द गीता

हे देव ! आलस दान हो अविवेक वृषप नासिया।
कर क्रोध लोभ प्रमाद मान कु काम द्वेष प्रकासिया ॥
चारित्र शुद्ध विरद्ध जो कुछ सो रहित मैंने किया।
जिनराज ! तब परसाद से हो नाश मैं अब बाधिया ॥३॥
उत्थानिका - आगे भावना करते हैं कि मेरा समय धर्म-ध्यान व रत्नत्रय का एकाग्रता में बीते -

जीवोजीवापयत्थत्तव्विबुधो बंधावदो बंधतः।

शशव्वरसंवरनिरजेरे विवधतो मुक्तिप्पियं कांक्षतः ॥
वेहादेः परमात्मतत्त्वममलं मे पश्यतत्तत्त्वतो।
धम्मज्झत्तसमाधिशुद्धमनसः कालः प्रयातु प्रभो ॥४॥

अन्वयार्थ

  • (प्रभो) हे प्रभु ! (जीवाजीवापयत्थत्तव्विबुद्धः) जीव और अजीव पदार्थों को जानते हुए (बंधावदो बंधतः) आस्रव और बंधको रोकते हुए (शशव्वर) निरन्तर (संवरनिरजेरे विवधतः) संवर और निर्जराको करते हुए (मुक्तिप्पियं कांक्षतः) मोक्षरूपी प्रियाकी चाह रखते हुए (वेहादेः) शरीर आदि पर पदार्थोंसे भिन्न (अमलं) निर्मल (परमात्मतत्त्वं) परमात्माके स्व-रूपको (तत्त्वतः) यथार्थ रूपसे (पश्यतः) अनुभव करते हुए और

[१२]

प्रस्तावना

(धम्मज्झत्तसमाधिशुद्धमनसः) धर्मध्यान और समाभाव में शुद्ध मनको लगाये हुए (मे) मेरा (कालाः) समय (प्रयातु) बीते।

भावार्थ

  • इसमें आचार्यने जैन सिद्धान्तके मूलश्लोकभूत सात तत्त्वोंका संकेत करते हुए उन पर अज्ञानको दृढ़ किया है। तथा उनमें कौन ग्रहण योग्य हैं व कौन त्यागने योग्य हैं इस भेद विज्ञान का स्वरूप निश्चय और व्यवहारनय दोनोंसे बताया है। असल बात यह है कि जिसको सुखशान्ति पानेकी चाह हो व अपने आत्माको पवित्र करनेकी रुचि हो उसको सात तत्त्वोंको भले प्रकार समझकर उन पर अपना विश्वास मानना चाहिए। जीव और अजीव तत्त्व में तो वह समस्या है कि यह लोक जीव और अजीव पदार्थों का समुदाय है। बिना इन दो पदार्थों को माने हुए संसार और मोक्ष बन ही नहीं सकता है। यदि एक मात्र जीव ही पदार्थ होता तो सब जीव शुद्ध अपने स्वभाव ही में पाए जाते। न कोई अशुद्ध होता न कोई दुःखी होता न शुद्ध होने के लिए व सुखी होने के लिए कोई धर्म का साधन करता। क्योंकि जीव का स्वरूप ज्ञानदर्शन सुख शांतिमय है। यह स्वभाव से सबको जानने देखनेकी शक्ति रखता है, क्रोधादि इसका स्वभाव नहीं है किन्तु शांति इसका स्वभाव है, आनंद भी इसका स्वभाव है। सब ही जीव परमात्म स्वरूप ही उस लोक में होते यदि एक जीव पदार्थ ही होता और यदि एक अजीव पदार्थ ही होता तो सब कुछ जड़ अचेतन होता फिर कोई जानने वाला व सुख दुःख को वेदने वाला नहीं होता फिर कहना सुनना समझना समझाना कुछ भी नहीं होता तो दोनोंका एकांत नहीं है। जगत् में जीवभी

[१३]

प्रस्तावना

और अजीव भी है। संसारो जीव सब अशुद्ध है; क्योंकि इनमें ज्ञान का क्षयोपशम है, क्रोधादि है, क्लेश आदि भोगते हैं। यह वस्तु-दशा इसलिए है कि इनके साथ कर्मरूपी पुद्गलों का जो बहुत सूक्ष्म हैं तथा अजीव के पांच भेदों में से एक है, उनका बंध है। इसी को पाप व पुण्य कर्म का बंध कहते हैं। अजीव पांच - पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल। इनमें पुद्गल मूर्तिक है; क्योंकि इसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, गुण पाए जाते हैं, शेष चार अमूर्तिक हैं। सारी रचना जो हमारी पांचों इन्द्रियों से मालूम करने में आती है पुद्गलसे रची हुई है। हम शरीर से पुद्गल को छूते हैं; मुख से पुद्गल को खाते पीते व चबाते हैं, नाक से पुद्गल को ही सूंघते हैं, आंख से पुद्गल को ही देखते हैं, कान से शब्दों को सुनते हैं जो पुद्गल से बने हुए हैं। सूक्ष्म पुद्गल इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण में नहीं आते हैं तथापि उनके कार्य प्रगट हैं। उन कार्यों के द्वारा उनका समझा लिया जाता है। जैसे कर्म पुद्गल बहुत सूक्ष्म हैं इन्द्रियों से जाने नहीं जाते परंतु संसार में जीवों के भीतर अशुद्धता व दुःख सुख का भोगता देखकर अनुमान लगाते हैं कि पाप व पुण्य का अथवा कर्मों का बंध है। इस लोक में जीव और पुद्गल एक दूसरे पर अमर दलसे है, हलन चलन करते हैं, तरह-२ के कामों को करने वाले वे दो ही बड़े कार्यकारी हैं। बहुत से पुद्गल अपने स्वभाव से काम किया करते हैं, जैसे आग की गर्मीसे पानी का भाप बनना, बादलों का गिरकर पानी बरसना, धूप होना, छाया होना आदि का पुद्गलों के द्वारा उनके स्वभाव ही से हुआ करते हैं, बहुत से कामों को यह संसारी जीव करता है। जैसे- खेती करना, मकान बनाना, कपड़ा बनना आदि-२। तीसरा कोई एक ईश्वर कराने वाला

यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:

तत्त्वभावना

नहीं है, न काम करने कराने में इसकी कोई आवश्यकता ही है। घी के सामने अग्नि आने से पिघलेगा ही, बर्फ के सामने गर्मी आने से पानी होगा ही। ईश्वर का इन कामों में हाथ है ऐसा कहना व्यर्थ है। ईश्वर निर्विकार, इच्छारहित, परमानन्दमई है, वह किसी वस्तु के बनाने व बिगाड़ने में दखल नहीं देता है।

जीव और पुद्गल चार काम अपनी ही ताकत से करते हैं; जैसे—चलना, ठहरना, जगह पाना और अवस्थाओं को बदलना। क्योंकि हरएक काम के लिए खास निर्मित कारण की जरूरत है। इसलिए इन चारों कामोंके लिए जैन सिद्धांत ने चार द्रव्य माने हैं। सो जीव और पुद्गलों के चलने में उदासीन कारण है वह लोकव्यापी धर्मद्रव्य है। जो जीव और पुद्गलों के ठहरने में सहकारी है वह लोकव्यापी अधर्मद्रव्य है। जो सब द्रव्योंको अवकाश देता है वह अनंतव्यापी आकाशद्रव्य है। जो सब द्रव्योंको अवस्था बदलने में मदद देता है वह कालाणु नामका कालद्रव्य है, जो रत्नों के समान अलग-अलग लोक के असंख्यात प्रदेशों में लिष्ठा है।

जीव और कर्म पुद्गल इन दो द्रव्योंके सम्बन्ध के कारण से आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये पाँच तत्व व्यवहार किए जाते हैं।

संसारी जीवों के मन, वचन, कायके कार्योंके होते हुए आत्मा के प्रदेश कंपते हैं इस कारणसे चारों तरफके कर्म पुद्गल जीव के अच्छे या बुरे भावों के अनुसार पुण्य या पापरूप में आते हैं। इसी को आस्रव तत्व कहते हैं। ये आए हुए ही कर्मपुद्गल जीव के साथ जो कार्मण शरीर है उसीमें बंध जाते हैं। यह बंधन किसी नियमित समय के लिए होता है। उस समय के

तत्त्वभावना

[१५]
भीतर-२ वे अवश्य गिर जाते हैं। जिन कर्मों के अनुकूल सामग्री होती है वे कर्मफल देकर व अनुकूल सामग्री बिना फल दिये भी झड़ जाते हैं।

आस्रव और बंध तत्व से यह ज्ञान होता है कि जीव अशुद्ध कैसे होता है। क्योंकि जब तक परमात्म स्वभावके निकट न पहुँचे तबतक संसारी जीवोंके मन वचन काय काम किया करते हैं और हर समय जैसे पुराने कर्म झड़ते हैं वैसे नए पुण्य या पाप कर्म बंधते भी जाते हैं। यदि आत्मा को कर्मबंध से छुड़ाना हो तो संवर और निर्जरा तत्वको समझना चाहिए। कर्मोंके आने और बंधके रोकने को संवर कहते हैं। संवर के लिए उद्यम करना चाहिए। जिन भावों से कर्म बंधते हैं उनको रोकना चाहिए। इस संवरके लिए हिंसादि पांच पाप छोड़कर अहिंसा सत्य आदि पांच व्रत पालना चाहिए, क्रोधादि भावोंको रोककर उत्तम क्षमा आदि दशधर्ममें पालना चाहिए, आर्तध्यान रौद्रध्यान रोककरधर्म-ध्यान शुक्लध्यान साधना चाहिए, प्राचीन बंधे हुए कर्मोंको अपने समय के पहले व उनका बिना फल भोगे हुए दूर करने की रीति को निर्जरा तत्व कहते हैं—तप करनेसे अर्थात् इच्छाओंको रोक कर आत्मध्यान व वीतराग भावका अभ्यास करनेसे कर्म झड़ते जाते हैं। सर्व कर्मोंके बंधसे छूटकर आत्माके पवित्र हो जानेका नाम मोक्ष तत्व है। मोक्ष अवस्था में आत्मा सदा अपने ज्ञाना-नंदका विलास किया करता है। इन सात तत्वोंमें अजीव आस्रव व बंध त्यागने योग्य हैं जबकि जीव, संवर, निर्जरा व मोक्ष ग्रहण करने योग्य हैं। परंतु निश्चयनयसे इन सात तत्वोंमें दो ही पदार्थ

तत्त्वभावना

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हैं—जीव और अजीव। इन दोनों में से जीवको ही ग्रहण करके उसके ही शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना चाहिए इसलिए आचार्यने कहा है कि जीव अजीवसे भिन्न है ऐसा जानना, आस्रव बंधके कारणोंको रोको, सदा संवर और निर्जराका उपाय करो, स्वाधीनता रूप मोक्ष पाने को उत्कंठा रखो तथा निश्चयनय से एक अद्वैत ही शुद्ध आत्मतत्व का भेद विज्ञान के बल से राग-द्वेषादि भावों से भिन्न वीतराग विज्ञानमय विचारों और अनुभव करो। यही मार्ग सुख शांति पाने का तथा कर्मोंके बंध से छूटने का है। जब तक हम इस देह में हैं हमें अपना समय इसी तरह पर बिताकर सफल करना चाहिए। यही मानव-जीवन का लाभ है। श्री ज्ञाननंदि मुनि ने आलोचना के पाठ में मुक्तिपद की ही भावना की है जैसे—

इन्द्रत्वं च निगोदत्वं च बहुधा मध्ये तथा योनयः।
संसारे भ्रमंता चिरं यदबलाः प्राप्ता मयाऽनंतशः ॥
तन्नाप्येषामिहास्ति किंचिदपि मे हित्वा विमुक्तप्रदाम्।
सम्यग्दर्शनबोधवृत्तियुगवदीं तां देव ! पूर्णां कुरुः ॥

भावार्थ—हे देव! मैंने इस संसार में चिरकालमें भ्रमण करते हुए इन्द्रपना तथा निगोदपना तथा इनके मध्य की बहुत प्रकार योनियों को अनंतबार पाया। इसलिए सिवाय मोक्षके देनेवाले सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्रमई रत्नत्रय की पदवी के और कोई वस्तु मेरे लिए अपूर्व नहीं है अर्थात् मैं सिवाय अभेद रत्नत्रय रूप आत्मानुभव के और किसी वस्तुको नहीं चाहता हूँ; क्योंकि इसीसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। इस कारण आप इसीकी पूर्ति कीजिए।

तत्त्वभावना

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वास्तव में ऐसी-२ भावना परिणामों को निर्मल करनेवाली हैं और सुख शान्ति प्रदान करने वाली हैं।

मूल श्लोकानुसार छंद गीता

सत् तत्त्व जीव अजोक्ष जानत बंध आश्रय रोकते।
करते सुसंबर निर्जरा नित मुक्तिश्रिय अवलोकते ॥
बेहादिभिन्नं मुनिनर्मलं परमात्म तत्त्वं सुध्यायते।
सम काल बीते हे प्रभो ! वृष ध्यान समता पावते ॥४॥

उत्थानिका—आगे कहते हैं कि उत्तम कार्य वही कर सकता है जिसका संसार वास समाप्त होने को आया है व जो मुक्ति पाने के लिए शीघ्र ही अधिकारी हो गया है—

पूर्ववत् छंद

कषायसवननिर्जयः सकलसंगनिर्मुक्तता।
चरित्रपरमोक्षमौ जननदुःखतो घोरता ॥
मुनीन्द्रपदसेवना जिनवचोरुचिरुत्थापिता।
हृषीकहरिनिग्रहौ निकटनिर्वृतेर्जयते ॥५॥

अन्वयार्थ—(कषायमदनिर्जयः) क्रोधादि कषायोंके मदको जीतना (सकलसंगनिर्मुक्तता) सर्व परिग्रह का त्याग (चरित्र-परमोक्षमौ) चारित्रके लिए गाढ़ प्रयत्न (जननदुःखतो घोरता) संसारके दुःखोंसे भय (मुनीन्द्रपदसेवना) मुनीश्वरोंके चरणों की सेवा (जिनवचोरुचिः) जिनवाणी में रुचि (त्यागिता) सर्व वस्तु का त्याग या एक देश त्याग अथवा दान करना और (हृषीकहरिनिग्रहौ) इन्द्रिय रूपी सिंह को वश करना (निकट-निर्वृतेः) जिसके मुक्ति निकट है उस महात्मा के (जायते) ये बातें प्रकट होती हैं।

[१८]

तत्त्वभावना

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2444.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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