तत्त्वभावना - जैन स्वाध्याय सामग्री | Tattvbhavna

तत्त्वभावना

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तत्त्वभावना
(बृहत् सामायिक पाठ)
अन्वयार्थ, विस्तृत टीका व छन्द सहित

टीकाकार
श्री ब्र० शीतल प्रसाद जी

सम्पादन :
महावीर प्रसाद जैन सर्राफ १३२५ चाँदनी चौक, दिल्ली

प्रकाशक :
बिशम्भर दास महावीर प्रसाद जैन सर्राफ
१३२५, चाँदनी चौक, दिल्ली-६

तृतीय वृत्ति २४-२-१९६२ फागुन बदी ७ वि. सं. २०४८

प्रस्तावना

सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्य चूड़ामणि-
स्तद्वाचः परमार्हतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्योतिकाः।
सद्दर्शनज्ञानचारित्रगुणो यति वरास्तेषां समालम्बनं,
तत्पूजा जिनवाक्प्रपूजन मतः साक्षाज्जिनः ॥१॥
॥ पञ्चानन्दी पं० ॥

वर्तमान कलिकाल में तीन लोक के पूज्य केवली भगवान्
जो राग-द्वेष से रहित ध्यान में लीन, समस्त पदार्थों के ज्ञाता
और कर्ममल रहित हैं, जोओं को संसार पार उतारने में निमित्त
हैं इस भरतक्षेत्र में साक्षात् नहीं हैं तथापि समस्त भरतक्षेत्र में
भगवद्वाहिनी केवली भगवान् की वाणी मौजूद है तथा उन्हें
वाणी के आधार स्तम्भ श्रेष्ठ रत्नत्रयधारी मुनि भी हैं जो समस्त
विषयों, आशाओं और आरम्भ से रहित होते हैं, सदैव ध्यान
अध्ययन में रहते हैं, जिन भगवान् की आज्ञा में चलने वाले हैं
सच्चे गुरु हैं इसीलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती का
पूजन है तथा सरस्वती का पूजन साक्षात् केवली भगवान् का
पूजन है।

तीर्थंकर देव द्वारा प्रत्यक्ष देखी गई, दिव्यध्वनि में प्रस्फुटित
तथा गणधर द्वारा गुम्फित वह महान् आचार्यों द्वारा प्रसारित
जिनवाणी की रक्षा हो इसी उद्देश्य से—

बिशम्भर दास महावीर प्रसाद जैन सर्राफ १३२५, चाँदनी
चौक, देहली-६ ने स्व० पूज्य ला० बिशम्भर दास जी जैन,
श्रीमती केसर देवी जैन, श्रीमती सुन्दरी देवी जैन, श्रीमती जैनी
देवी जैन एवं श्रीमती विमला देवी जैन की पुण्य स्मृति में फरवरी
१९६२ में श्री अमितगति आचार्यकृत तत्त्वभावना ग्रन्थ प्रका-
शित कराया ॥

(iv)

अब फरवरी १९६२ में श्री अमितगति आचार्य विरचित
‘तत्त्वभावना’ बृहत् सामायिक पाठ प्रकाशित कर रहे हैं ताकि
स्वाध्याय प्रेमी बन्धु आत्म कल्याण कर सकें।

मालवा प्रान्त के राजा मुंज के गुरु आचार्य माधव सेन के
शिष्य आ० नेमी सेन के परम शिष्य श्री १०८ आचार्य अमित-
गति ने ‘तत्त्वभावना’ अर्थात् बृहत् सामायिक पाठ १२० श्लोकों
में रचा और छोटा सामायिक पाठ अर्थात् भावना द्वित्रिंशिका
३२ श्लोकों में रची। आप ११वीं शताब्दी के महान् विद्वान्
कवि एवं वीतरागी संत थे। आपके रचे हुए ७ ग्रंथ प्राप्त हैं।
१. सुभाषित रत्नसंदोह वि. सं. १०५०; २. धर्म परीक्षा वि.
सं. १०७०; ३. पञ्चसंग्रह वि. सं. १०७३ में रचे थे; ४. उपा-
सकाचार, ५. आराधना, ६. सामायिक पाठ, ७. भावना द्वि-
त्रिंशिका एवं तत्त्वभावना।

प्रस्तुत ग्रंथ ‘तत्त्वभावना’ वैराग्य और आत्मज्ञान का भण्डार
है। इसका हिन्दी अनुवाद एवं टीका ब्र० शीतलप्रसाद जी ने
४-१०-१९१३० असीज बदी ५ गुरुवार वीर सं. २४४४ वि. सं.
१९८५ में रोहतक चातुर्मास में की थी। आपके लिखे एवं अनु-
वाद किये लगभग १०० ग्रंथ हैं। सभी सारभूत एवं आध्यात्मिक
हैं। ब्र० जी का जन्म वि. सं. १९४४ में हुआ था। आप ३२
वर्ष की आयु में गृह त्याग कर जिनवाणी का प्रचार-प्रसार
अन्तिम समय तक करते रहे।

प्रथम बार यह ग्रंथ श्री मूलचंद किशनचंद कापड़िया ने
सूरत से प्रकाशित कराया था। द्वितीय वृत्ति आचार्य देवभूषण
जी ने जनवरी १९७३ में दिल्ली से प्रकाशित कराई। ग्रंथराज
अप्राप्य होने की वजह से तृतीय वृत्ति प्रकाशित की जा रही है।

जो अगणित संसार के दुःखों से छूटकर अनन्त सुख स्वरूप

(v)

मोक्ष में ले जाकर रखे, परमानन्दमय सुख का रसास्वादन करावे वो ही वास्तविक धर्म है। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त जैन संस्कृति का मूल आत्मा है। यही जिनवाणी का सार भी है। भगवान् जिनेन्द्र देव ने सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का मूल कारण सम्यग्दर्शन को ही कहा है वो ही मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी है धर्म का वीव है। पांचों इन्द्रियों का दमन सिवाय सम्यग्ज्ञान के दूसरे से नहीं हो सकता है। प्रायः आज के आत्माभिमुख वक्ता, एकान्तवादी एवं निश्चयाभासी ये भूल जाते हैं कि सम्यक्चारित्र के बिना सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान मोक्ष प्राप्त कराने में असमर्थ हैं। “ज्ञानन ज्ञानोपयोग पावत नाहीं मनोगम, तावत ही करत योग कहां पुण्य करनी।” धूप से छांव में बैठना सुखद है। व्रत, उपवास, व्यवहार, चारित्र पालन कब नरक निगोद से बचना श्रेष्ठ है। मुझे तत्वज्ञान है समस्त इन क्रियाओं को छोड़कर मात्र अध्यात्म का ऊपर से गुणगान करेगा तो इधर का रहेगा ना उधर का और अनन्त सागर दुःख उठाना पड़ेगा। समस्त शुभ क्रियाएं तो छोड़ने योग्य है ही नहीं किन्तु उन्हें धर्म मानना गलत है। शुद्धोपयोग की अवस्था में स्वतः छूट जाती है छोड़ना नहीं पड़ता है।

सम्यग्दर्शन रूपी हार को अपने हृदय में धारण करके, ज्ञानरूपी कुण्डलों को अपने दोनों कानों में पहनकर और चारित्ररूपी मुकुट को अपने मस्तक पर धारण करना चाहिए। ये तीनों रत्न ही मोक्षरूपी लक्ष्मी को वश करने में कारण है। व्यवहार रत्नत्रय भी निश्चय रत्नत्रय की प्राप्ति में मुख्य निमित्त है परन्तु जब तक चित्त में बाह्य क्रियाओं की लिप्तता का समावेश रहेगा तब तक कभी भी रत्नत्रय का पालन नहीं हो सकता। यह विषयकषाय रागादि भावों से रहित हो, मोक्ष प्रदान करने वाला है। ये ध्यान के द्वारा जाना है वीतरागी मुनियों के ही होता है

(vi)

रागियों के नहीं। अपनी निजी आत्मा ही तीन लोक का नाथ है अनन्त अविनाशी गुणों का समुद्र है। ध्यान मार्ग से उसका स्वरूप जाना जाता है एवं जिस प्रकार समस्त कर्मों से रहित सिद्धों का स्वरूप शुद्ध है उसी प्रकार हमारी आत्मा भी द्रव्यदृष्टि से शुद्ध है इस प्रकार अपने अन्तरंग परमात्मा में जो श्रद्धान होता है वह निश्चय सम्यग्दर्शन है। उत्कृष्ट आत्मा ही ज्ञान है, जो स्वसंवेदन स्वरूप आत्मा का ज्ञान करना है वही निश्चय सम्यग्ज्ञान है। यह निजआत्मा सम्यक्चारित्र स्वरूप है। अन्तरंग में ध्यान के द्वारा जो स्वसंज्ञ अपना आचरण करता है वही निश्चय चारित्र है। “पर द्रव्यन ते भिन्न आप में रुचि सम्यक्त्व भला है, आप रूप को आनपना सो सम्यक्ज्ञान कला है। आप रूप में लीन रहे थिर सम्यक्चारित्र सोई।” ऐसा ध्यान वीतरागी मुनियों के ही मुख्य रूप से सम्भव है। मात्र आत्मा आत्मा कह कर परिग्रह के संबंध में लिप्त रहने वालों के नहीं। जो ज्ञानी चैतन्य स्वरूप उत्कृष्ट आत्मा-परमात्मा का ध्यान करते हैं उनके ध्यायरूपी अग्नि से अनन्त कर्म पिण्ड देखते-२ भस्म हो जाते हैं।

अनादि काल से यह जीव चार गतियों और चौरासी लाख योनियों में जन्म मरण के दुःखों को उठा रहा है लेकिन इसके दुःखों का अन्त नहीं आया। सभी जीव सुख चाहते हैं लेकिन सुख का उपाय कोई नहीं करना चाहता। अनन्तों सागर निगोद में रहकर मात्र दो हजार सागर कुछ अधिक के लिए त्रस पर्याय प्राप्त होती है जिसमें १६ भव पुरुष, १६ भव स्त्री एवं १६ भव नपुंसक पर्याय के प्राप्त होते हैं यदि इसमें अष्ट कर्मों का विनाश करके मोक्ष की प्राप्ति नहीं की तो फिर अनन्तों सागर तक निगोद में जाना पड़ता है।

“यह मानुष पर्याय सुकुल सुनिकी जिनवाणी” ऐसा सब कुछ प्राप्त करके भी भविष्यत के अनन्तों भवों का नाश इसका क्योंकि

(vii)

में करने का भाव लेकर कष्ट में निर्भय मुनि बनूं समाधि मरण करूं, ऐसा भाव न आया तो जन्म निरर्थक होगा।

श्रावकों के अष्ट मूल धारण करके, देव दर्शन, श्री जी का प्रक्षाल, पूजा पाठ, जाप, स्वाध्याय, सामायिक, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा, दान, मुनि समागम, प्राणोपाय पर करुणा का भाव ऐसा करते हुये निम्न कार्यों का त्याग करना चाहिए। सप्त व्यसन-मद्य, मांस, मधु, अण्डा, जिमीकंद, रात्रि भोजन, २२ अभक्ष्य, चांदी व सोने का वर्क, होटल में जाना वहां जाकर खाना, रात्रि की शादी में जाना, रात्रि की शादी करना-कराना, अनछना पानी पीना, पांच पाप इत्यादि। निरन्तर महाव्रती बनने की भावना रखे और अन्त में समता भावपूर्वक समाधिमरण करूँ ऐसी भावना हमेशा भावे।

मैं किसी का भला बुरा कर सकता हूं या कोई मेरा क्या देगा ऐसा कर्तृत्व भाव न लावे। कोई देवता मेरा भला बुरा कर सकता है, मैं कुटुम्ब का पालन करता हूं, चेतन स्त्री, पुत्र कुटुम्बी अचेतन धन, मकान, परिग्रह से राग द्वेष घटावे, मिथ्यात्व का सर्वथा त्याग करे-त्रिकाली ध्रुव अजर अमर आत्मा एकाकी है अपनी है बाकी समस्त पदार्थ, मेरा शरीर भी पर है ऐसा दृढ़ विश्वास लाकर अहंकार ममकार का त्याग करे। “जीव जुदा पुद्गल जुदा, याही तत्व को सार। सब ग्रन्थों में पढ़ लीजिए, है याही को विस्तार।” “लाख करोड़ ग्रन्थन को सार, भेद ज्ञान और दया विचार।” जब शरीर भी मुझसे भिन्न है तो फिर बाकी सभी पदार्थ तो साक्षात् भिन्न दिख ही रहे हैं। इस जगत का बनाने वाला, पालन द्वारा, विनाश करने वाला कोई ईश्वर नहीं है। जगत अनादि निधन है। अपने स्वकर्म के किये कर्मों के अनुसार जीवों को सुख-दुःख भोगना पड़ता है। इन सभी बातों का वर्णन अभिगत आचार्य ने बहुत ही सुन्दर-

( viii )

रूप में किया है। मोक्ष प्राप्ति का सरल उपाय ध्यान का विशेष वर्णन इसमें लिखा है। “निज को निज में जान, पर को पर में मान। तेरा आत्म है परमातम, और सभी पर मान।”
कर्मों की निर्जरा का एक मात्र साक्षात्‌ उपाय, एकाकीपन, निसंगता, आत्मा के सम्मुख होना, आत्मा में रमणता या ब्रह्म-चर्य, स्व में रमण या स्वाध्याय, साम्यभाव, सिद्धि, स्वारम्भ-लंबि, आत्मलीनता, चित्त को स्थिरता, सामायिक, ध्यान इत्यादि सभी पर्यायवाची शब्द हैं। महान्‌तों के लिए तो इनको विशेष प्रमुखता हो किंतु श्रावकों का भी २ या ३ बार अवश्य करने को कहा है ताकि आगे जाकर सरलता से आत्म कल्याण कर सकें। कर्मों की निर्जरा होकर मोक्ष प्राप्ति का ये ही उपाय है। सामायिक में प्राणी मात्र से दोषों को क्षमा माँगकर, क्षमा करके, अचल आसन, समय की पाबन्दी, राग द्वेष मोह का त्याग करके संकल्प-विकल्प को छोड़कर शरीर को पड़ोसी समझ कर अन्दर जो चैतन्य स्वरूप ज्ञाता दृष्टा परमात्मा विराजमान है अर्थात्‌ शरीररूपी देवालय में जो मेरा आत्मा भगवान स्वरूप है उसको सबसे एकाकी अनुभव करना है वो देखने दिखाने की चीज नहीं, अतीन्द्रिय है, सिर्फ़ अनुभवगम्य है और अनुभव भी पर से विरक्त हुये बिना नहीं होगा। कुछ भी काम करते हुए, प्रत्येक क्रिया को हमारी कोई अन्दर अनुभव कर रहा है वो ही मेरा परमात्म-स्वरूप आत्मा है। सेठ के यहाँ लाखों करोड़ों का व्यापार करता हुआ मुनीम उस धन की लाभ-हानि से विरक्त है। लड़की की सगाई पक्की होने पर लड़की भी माँ-बाप के घर को पर मानने लगती है। इसी प्रकार ज्ञानीजन शरीर से भी विरक्त रहते हैं।
कहते हैं संसार में शरण नहीं। वो पर्याय को अपेक्षा है। यदि पंचपरमेष्ठी की शरण लेकर अपनी आत्मा का स्मरण लिया

( ix )

जावे तो अनादि का जन्म मरण का रोग मिट जावे। “शुद्धात्म और पंचगुरु जब मैं शरणा दो।” जितने भी सिद्ध हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे, इसी उपाय से हुए हैं।
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति चारों गतियों में हो सकती है किंतु संयम धारण मात्र मनुष्य पर्याय में ही हो सकता है अतः संयम मुख्य है। सर्वार्थ सिद्धि के देव भी जो निरन्तर ३३ सागर तक उत्कृष्ट धार्मिक चर्चा में ही लगे रहते हैं संयम धारण नहीं करने के कारण मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते सोचते हैं कब मनुष्य पर्याय पावें, मुनिसंयत धारण करके तप द्वारा ध्यानाग्नि में कर्मों को विनष्ट करके मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त करें।
पद्मनंदि मुनि ने परमायोगांशांति में आत्मध्यान व आत्मत्व में एकाग्र होने की भावना बताई है-
देव तत्प्राप्तिमो गुरु मुनि जनं शास्त्रार्दि मन्त्य गृहे।
सर्वं भक्तिपरं वयं व्यवहृतो मार्ग स्थिता। निश्चयात्‌॥
अस्माकं पुनरेकताऽश्ययतो व्यक्तीभवच्छिद्‌ गुण-
स्फारी भूतमति प्रबोध महसामात्मैव तत्वं परम्‌॥११३॥
जब हम व्यवहार मार्ग में लगते हैं तब हम श्री जिनेन्द्र देव इनकी प्रतिमा, जिनगुरु व साधुजन तथा शास्त्रादि सबकी भक्ति करते हैं परन्तु हम जब निश्चयमार्ग में जाते हैं तब प्रगट चैतन्य गुण से झलकती हुई भेदविज्ञान की ज्योति जल जाती है उस समय हम एक भाव में लय हो जाते हैं तब हमको उत्कृष्ट तत्व एक आत्मा ही अनुभव में आता है अर्थात्‌ शुद्ध आत्मा के सिवाय अन्य कुछ अनुभव में न आवे वही निर्मल आत्मध्यान है।
जिनके भीतर ज्ञान अग्नि बढ़ती सम्यक्त्व की पवन से।
ईंधन कर्म जलाय, दोष मन सब कर दूर निज रमण से ॥१६५
सम्यक्त्व ज्ञानवत्तस्य समधुते ज्ञान भागेण मुढा।
लंचिस्वा जन्मनुई निरुपमितं सुधा ये धियावत्ति सिद्धि।

( x )

ते शिक्षावन्ति नूनं निजमुदबुद्धि बाहुगुमेन तीव्रम्‌।
कल्पांतोद्‌भूतवातस्तु भित्तज्वरासार कोर्णांतरम्‌॥१६६॥
मोक्ष का उपाय रत्नत्रय की एकता है। मार्ग को जान लेने मात्र से ही कार्य को सिद्धि नहीं हो सकती है। जो ऐसा मानते हैं कि हमने आत्मा की पहचान लिया है अब हमें कुछ भी चारित्र पालने की आवश्यकता नहीं हम चाहे पाप करें या पुण्य करें हमें बन्ध नहीं होगा वे ऐसे मूढ़ हैं जैसे वे लोग मूर्ख हैं जो अपनी भुजा से समुद्र पार कर-कर के, चले जायेंगे जो कल्पकाल की घोर पवन से डांवाडोल है जिसमें अनेक मगरमच्छ भयानक जंतु हैं।
सम्यग्दर्शन सम्यक्ज्ञान सम्यक्चारित्र तीनों की एकता की जरूरत है। जैसे व्यापार करना है तो पहले दोतियों को समझते हैं, विश्वास लाते हैं फिर जब उस विश्वास सहित ज्ञान के अनु-सार उद्योग करते हैं तब ही व्यापार में सफलता पा सकता है।
अमितगति हमारे राज ने सुभाषित रत्नसंदोह में कहा है-
सम्यग्दर्शनं तपोधर्मोऽवचारित्रं भाजः सफलाः समस्ताः।
यथार्थचारित्रेण विना भवन्ति शास्त्वेह समन्तश्चरित्रे यतन्ते॥१४२
सम्यग्दर्शन सम्यक्ज्ञान तथा तप व इन्द्रिय दमन सहित जो जीव चारित्र को पालन करने वाले हैं वे सर्वे ही सफलता को पा लेते हैं क्योंकि चारित्र के बिना उन सबका होना व्यर्थ है। तीनों की एकता से जो भाव पैदा होता है उसे स्वानुभव कहते हैं।
जहाँ अज्ञान ज्ञान सहित आत्मस्वरूप में रमणता होती है वहीं स्वानुभव या आत्मध्यान पैदा होता है। यही ध्यान मोक्ष का मार्ग है, कर्मों को निर्जरा करके आत्मा को शुद्ध करता है। इसलिए मात्र जानने से ही कार्य बनेगा इस बुद्धि को दूर कर श्रद्धान व ज्ञान सहित चारित्र को पालना चाहिए। मन को

( xi )

निराकुल करने के लिए श्रावक या मुनि का चारित्र पालन करना ही चाहिए—


सम्यग्दर्शनरूपी नौका/सम्यग्ज्ञानरूपी जल/सम्यक्चारित्र रूपी—
|
विश्वास
मन


खिवैया तभी भवसागर
से तिरोगे।
व्यापार करना
काय

रीति समझना
वचन

मोक्ष के मुंह में हूँ और मेरी उम्र क्षण भर भी नहीं है ऐसा सोचकर मनुष्य को यथा सम्भव जप, तप, संयम, स्वाध्याय, पूजा, दान आदि का आचरण करते रहना चाहिए।

सारांश में ध्यान ही मुक्ति का कारण है !

जो शरीर इन्द्रिय मन और वचन में आत्मबुद्धि/ममकार व अहंकार बुद्धि रखता है वह बहिरात्मा आत्माभिमुख ध्यान करने में असमर्थ है।

जो शरीर व आत्मा में भेद करता हुआ सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्र से युक्त होकर प्रमाण, नय और निक्षेप के आश्रय से जीवादि नौ पदार्थों, सात तत्वों, छह द्रव्यों और पांच अस्तिकायों के साथ शरीर व आत्मा के भेद को जानता है अन्तरंग-बहिरंग परिग्रह रहित ऐसा अन्तरात्मा ही परमात्मा के ध्यान में समर्थ होता है।

सम्यग्ज्ञानी जीव के मोह क्षोभ से रहित बाह्य और अभ्यन्तर्य क्रियाओं का निरोध ही साम्यभाव/सम्यक्चारित्र है जो मुक्ति का साक्षात् मार्ग है।

ध्यान के चार प्रकार में—

१. आर्तध्यान, २. रौद्रध्यान

( xii )

दोनों चार-चार प्रकार के हैं संसार के कारण हैं, त्याज्य हैं, क्रमशः तिर्यंच गति नरक गति को ले जाने वाले हैं। ३. धर्म-ध्यान स्वर्ग का कारण है परम्परा से मोक्ष का, पंचम काल में हो सकता है। ये आज्ञा विचय, विपाक विचय, अपाय विचय, संस्थान विचय ४ प्रकार का है—१. पिण्डस्थ, २. पदस्थ, ३. रूपस्थ, ४. रूपातीत के भेद से भी चार प्रकार का है।

पिण्डस्थ की पृथ्वी अग्नि जल आदि ५ धारणाओं एवं ध्यान का समस्त विषय सचित्र पेज १२२ से आचार्य श्री ने बहुत ही अच्छा वर्णन किया है। चित्रों को देखकर अभ्यास करने से सरलता से ध्यान मार्ग में प्रवृत्त हो सकते हैं। ४. शुक्लध्यान इस पंचम काल में नहीं होता है साक्षात् मुक्ति का कारण है।

सभी साधर्मी जन इस ग्रन्थराज का स्वाध्याय कर आत्म-कल्याण करें इसी शुभ भावना के साथ।

२४-२-१९६२ सोमवार
फागुन बदी ७ सं० २०४८
श्री चन्दा प्रभु जी ज्ञानकल्याण
एवं
श्री गुणसागरजी की निर्माण जयन्ती।

विनितः
जिन चरण सेवक
महावीर प्रसाद जैन सर्राफ
१२१२५, चाँदनी चौक
देहली

श्री अमितगति आचार्यकृत-

तत्वभावना

या

बड़ा सामायिक पाठ।

मज्झारणा-दोहा।

अरहं सिद्धाचार्यको, वंदि साधु गुणराय।
निजवासो यूष चैत्यजिन, मंदिर नमूं सुखदाय ॥१॥
परमातम सम आपको, ध्याय सुगुण उर लाय।
समताभाव प्रकाशके, आतम सुख झलकाय ॥२॥
सामायिकके भावको, कर प्रकाश निज ज्ञान।
भव्यजीव भी रस पियें, यह उपकार पिछान ॥३॥
अमितगति आचार्यकृत, तत्वभावना सार।
बालबोध भाषा करूँ, भवदधि तारनहार ॥४॥
सम्मति वीर सुवीरको, वर्द्धमान महावीर।
गौतम गुरु कुन्दादिको, सुमरों लियो धरि धीर ॥५॥

उत्थानिका—

पहले ही चलने में जो हिंसा हुई उसका पश्चाताप करते हैं—

तत्वभावना

शार्दूलविक्रीडित छन्द

एकद्वित्रिबहुत्रीन्द्रियप्रभृतयो ये पञ्चधावस्थिताः।
जीवाः संचरता मया दशदिशश्चित्तप्रमादात्मना ।।
ते ध्वस्ता यदि लोलिता विधिटिताः संघट्टिता मोटिताः।
मार्गालोचनमोचिता जिन ! तदा मिथ्यास्तु मे दुष्कृतम् ।।१।।

अन्वयार्थ

(जिन) हे जिनेन्द्र ! (चित्तप्रमादात्मना) प्रमाद या आलस्य या असावधानीना या कषाय सहित चित्तको करके (मार्गालोचनमोचिता) मार्ग या पथको देखना छोड़कर (दशदिशः संचरता) पूर्वादि दश दिशाओं में चलते हुए (मया) मेरे से (एक द्वित्रिबहुत्रीन्द्रियप्रभृतयः) एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, आदि अर्थात् चौइन्द्रिय व पंचेन्द्रिय (ये) जो (पञ्चधा) पांच प्रकार से (जीवाः) संसारो जीव (अवस्थाः) शास्त्रमें स्थापित किये गए हैं (ते) वे जीव (यदि) यदि (ध्वस्ताः) नाश किये गए हों (लोलिताः) उलट पुलट किये गए हों (विधिटिताः) अलग अलग कर दिये गए हों (संघट्टिताः) मिला दिये गए हों (मोटिताः) पैरों से रौंदे गए हों (तदा) तो (मे) मेरा (दुष्कृतम्) यह पाप (मिथ्या) नाश (अस्तु) हो।

भावार्थ

सामायिक करते समय पिछले किये गए पापों को याद करके प्रतिक्रमण या पश्चाताप इसीलिए किया जाता है कि जिससे आगेके लिए उस पाप से बचा जाए। अहिंसारत की रक्षाके लिए यह आवश्यक है कि चार हाथ जमीन आगे देखकर चला जावे। मुनिगण महाव्रती होते हैं वे दिनके प्रकाशमें प्राशुक रौंदो हुई जमीन पर ही चलते हैं और बड़ी भारी सावधानी रखते हैं कि मेरे द्वारा कोई छोटा-बड़ा वृक्षभी रौंदा न जावे, कोई छोटा

कीड़ा भी पैरोंके नीचे न आजावे। फिर भी साधन अवस्था में किसी समय सावधानी न रहने से कोई जंतु कदाचित् पैरके नीचे दबकर मर जाय, या उलट पलट हो जावे, अथवा शरीर, जमीन, कमंडल आदिको मुलायम पींछीसे पोछते हुए कोई जंतु जो मिले वे अलग-२ कर दिये जावें, व कई जो अलग थे वे मिला दिये जावें इत्यादि कारणोंसे प्रमाद हेतु होनेसे हिंसा सम्बन्धी पापका बंध संभव है। उस पापके बंधको छुड़ानेके लिए मुनिगण इस तरह विचारकर भावना भाते हैं। इस भावना से, पाप कर्म जो बंधचुका है उसकी स्थितिमें व उसके अनुभागमें कमी हो जाती है। श्रावकोंने आरंभ त्यागी आठवों प्रतिमासे उद्दिष्ट त्यागी ग्यारहवीं श्रेणी तकके श्रावक हिंसासे बचनेमें बहुत ही सावधान होते हैं। वे स्वयं हिंसाकारक आरम्भ नहीं करते हैं, न कराते हैं। इसलिए ये श्रावक भी मुनि के समान किसी सवारी पर नहीं चढ़ते हैं—मार्गको देखकर चलते हैं। ग्यारहवीं प्रतिमा वाले ऐलक मुनि समान व्यवहार करते हैं; इसलिए रात्रि को न चलते हैं न बोलते हैं। उससे पहले के श्रावक अति आवश्यकता ही तो धर्मकार्यवश प्रकाशमें मार्गको देखते हुए चलते हैं। आठवीसे नीचेके श्रावक आरम्भ त्यागी नहीं होते हैं। उनसे हिंसा अधिक हो जाती है। वे आरम्भमें हिंसा से बच नहीं सकते तथापि यथासम्भव आरम्भ व्यर्थ व अनावश्यक नहीं करते। आवश्यक आरम्भ करते हुए भी जीवदया भावों में रखते हैं। यथासम्भव जीवघात बचाते हैं। युद्धमें सामना करने वालेको ही प्रहार करते हैं। भागते हुएको, शरण में आए हुएको, घायलको, स्त्रीको, बालकको नहीं सताते हैं। खेतीमें भी जान बूझकर किसीको नहीं मारते हैं। व्यापारमें भी पशुओं पर अधिक भार लादकर कष्ट नहीं देते हैं। सवारी पर चलते हुए अधिकतर रौंदे हुए

मार्ग पर सवारीको ले जाते हैं। पैदल चलते हुए अपनी आंखों देखकर चलते हैं। तोभी आरंभी श्रावकसे बुहारी देते हुए, घरके काम करते हुए, माल उठाते धरते हुए, मकान आदि बनवाते हुए बहुत अधिक जीवहिंसा हो जाती है। यहां इस श्लोकमें मात्र चलते समय जो हिंसा होती है उसीकी मुख्यता है। हिंसासे लगे हुए पाप-रसको घटानेका विचार ऐसे श्रावकभी करते हैं जिससे आनेके लिए उनके व्यवहारमें अधिक सावधानी हो जावे। जो मानव किसी कर्मको छोड़ नहीं सकता है परंतु निरंतर विचारता है कि यह कर्म छोड़ देने योग्य है वह कभी न कभी छोड़भी देगा व उसे कम करता जायगा, इसलिए हिंसा त्यागकी भावना हरएक मुनि व श्रावकको करना उचित है। यह पाठ सर्व ही प्रकारके धर्मात्मा मुनि, आर्यिका, श्रावक व श्राविका द्वारा मनन करने योग्य है। हिंसा हुई हो तो उसका पश्चाताप अहिंसा पालनेमें सावधान करने वाला होता है।

मूल श्लोकानुसार छन्द गीता

हे श्री जिनेन्द्र ! प्रमाद चित्त हो मार्ग को देखे बिना।
दश दिशा भ्रमण करते विराजे पंथ बिच जंतु घना।
जो एक हैं त्रय आदि इन्द्रिय दलमले छिनभिन किये।
उलटते तथा पलटते मिलाए। पाप मिथ्या होय ये ।।१।।

उत्थानिका

हमारा समय शुभ कार्योंमें बीते ऐसी भावना करते हैं—

अहंद्भक्तिपरायणस्य विशदं जैनं वचोऽभ्यस्यतो।
निर्जिन्दृस्य परोपवादवदने शक्यस्य सत्कीर्तने।
चारित्रोज्झतचेतसः सपयतः कोपादिद्वेषिणः।
चैद्याध्यात्मसमाहितस्य सकलाः सन्तु मे वासराः ॥१॥

अन्वयार्थ - (देव) हे जिनेन्द्रदेव (मे) मेरे (सकलाः) सर्वे (वासराः) दिवसम (अहंद्भक्तिपरायणस्य) अर्हन्तकी भक्ति की लीनतामें (विशदं) निर्मल (जैनं वचो) जिनवाणीके (अभ्यस्यनः) अभ्यास करने में, (परोपवादवदने) दूसरों की निन्दा कहने में (निर्जिन्दृस्य) जिह्वा रहित रहने में अर्थात् दूसरों की निन्दा न करने में (सत्कीर्तने) संत पुरुषों के गुणों के वर्णन में (शक्यस्य) अपनी शक्ति लगाने में (चारित्रोज्झतचेतसः) चारित्र के लिए उद्यमी चित्त रखने में (कोपादिद्वेषिणः) क्रोध आदि शत्रुओं को (सपयतः) क्षय करनेमें तथा (अध्यात्मसमाहितस्य) आत्मा के भीतर भले प्रकार लीन होने में (सन्तु) बीतें।

भावार्थ - यहां मोक्षार्थी सुख शांतिको चाहता हुआ व स्वाधीनता के मनोहर वन में रमने की उत्कंठा करता हुआ, मुख शांति व स्वाधीनता के निमित्त कार्यों में नित्य लगे रहने की भावना करता है। साधक शिष्य का प्रयोजन अपने भावों में से क्रोधादि कषायों के मैल को कम करके शांति, क्षमा, वैराग्य, असंगपन्न, आत्मानुभव आदि शुभ तथा शुद्ध भावों को प्राप्त करना है। इस मतलव को ध्यानमें लेकर जिन क्रिया संगति करने से व जिस क्रिया के करने से वह मतलब भिड़ हो उसमें अपने मन को जोड़ता है। और जिनकी संगति से व जिस क्रिया से क्रोधादि कषाय बढ़ें व संसार से मोह अधिक हो आवे उनसे

बचता है। जैनधर्म के सेवन का यही प्रयोजन है। यह धर्म सुख-शांतिमय है तथा सुखशांति को देने वाला है। इस धर्म में वही देव पूजने योग्य है जो सर्वज्ञ, वीतराग व आनन्दमयी है। वही शास्त्र मानने योग्य है जिसमें सुखशांति पाने का उपाय यथार्थ बताया हो। वही गुरु वन्दने योग्य है जो आत्मज्ञानी, वैरागी व सुखशांति का भोगने वाला है। वही मनन व ध्यान कार्यकारी है जो सुख व शांति प्रदान करे। इसलिए साधक ने नीचे लिखे कार्यों में लगे रहने की भावना की है। (१) श्री अर्हन्त को भक्ति व पूजा व गुणों का स्मरण; क्योंकि यह भक्ति अवश्य परिणामों को शांत कर देती है। (२) जिनवाणी का पढ़ना; क्योंकि इससे अज्ञान और अभांति मिटती है। (३) दूसरों की निन्दा न करना; क्योंकि जिसकी आदत परनिन्दा की पड़ जाती है वह दूसरों के अवगुणों को ढूंढा करता है। उसका उपयोग अपनी उन्नति में कुछ नहीं होता है व वह स्वयं श्रीगुण वाला हो जाता है। (४) धर्मात्माओं के गुणों का वर्णन; क्योंकि ऐसे गुणों के कथन से मन उन गुणों के लाभ में उत्साही हो जाता है। (५) चारित्र के लिए उत्साही होना व उद्यम करना; क्योंकि राग-द्वेष के हटाने का उपाय मुनि व श्रावक का चारित्र पालना है। भीतरी चारित्र आत्मस्वरूप में लीनता है, उसका निमित्त साधक व्यवहार में महाव्रत व अणुव्रत का पालन है। (६) क्रोधादि शत्रुओं को नाश करना। वास्तव में जितना इनका अभाव होगा उतना अपना आत्मा का स्वभाव प्रकाशमान होगा। (७) आत्म स्वरूप में लीनता या अनुभव; क्योंकि यही स्वात्मानुभव वास्तव में सुखशांति को साक्षात् देनेवाला है। जो मानव सच्चे दिल से इन सातों बातों को चाहता है, इनके साधने के लिए उपाय क्रिया

करता है वही सुखशांति को पाता हुआ मोक्षमार्ग पर चलने वाला है। जैन मंदिरों में जो नित्य पूजा के पीछे शांतिपाठ पढ़ा जाता है उसमें भी इसी तरह की भावना बताई है। जैसे-

शास्त्रभ्यासो जिनपूजनुतिः संगतिः सर्वबंधुभिः।
सद्‌वृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम् ॥
सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्वे।
सम्पद्यन्तां मम सव्वे पाथवेऽप्सर्गाः ॥

भावार्थ - जब तक मोक्ष न हो तब तक मैं इतनी बातें प्राप्त हों (१) शास्त्र पठन (२) जिन भक्ति (३) सत् पुरुषों की संगति (४) सुचारित्र वालों के गुणों की कथा (५) परनिन्दा न करना (६) सबसे प्यारे मीठे वचन बोलना (७) आत्मतत्व में विचार रहना।

जहां तक आत्मतत्व भले प्रकार न जाग्रत हो वहां तक व्यवहार धर्म में देवशास्त्रगुरुका आराधन करते ही रहना चाहिए। श्रीपद्मनंदि मुनि परमार्थविंशति में इस तरह कहते हैं-

देवं तत्त्वार्पणां गुरुं मुनिजनं शास्त्रानि भव्यान्महे।
सर्वं नवित्सपरा वयं स्वबहुतो मार्ये स्थिता निश्शयात् ॥
अस्माकं पुनरेकताश्रयतो व्यक्तीमवच्छिद्रगुणाः।
स्फारीभूतप्रतिप्रबंधहनतामात्मैव तत्त्वं परम् ॥

भावार्थ - हम व्यवहार धर्म में चलते हुए अत्यन्त भक्तिवंत हों जिनेन्द्रदेव को, उनकी मूर्तिको, मुनीश्वरको व शास्त्र आदि सर्वको मानते हैं अर्थात् इन सबकी सेवा क्रिया करते हैं। परन्तु जब ही रत्नत्रय की एकता अर्थात् समताभाव का आश्रय करेंगे और हमारे भीतर चैतन्य तत्व प्रकट होकर बुद्धि विशाल हो

जायागो तब हमारे लिए निश्चय से एक आत्मतत्त्व ही देव, मुझ या शास्त्र हो जाएगा। इस प्रकार साधक को व्यवहार धर्म को भावना। निश्चयधर्म के लाभ के लिए करते रहना चाहिए।

मूल श्लोकानुसार गीता छन्द

हे देव ! श्री जिन भक्ति करते जैन श्रव अभ्यास्ते।
निन्दा न करते अन्यजन की साधु गुण सुप्रकासते ॥
चारित्र चित्त में चाहते क्रोधादि शत्रु निवारते।
बीतें दिखत मेरे सभी अध्यात्म अनुभव धारते ॥२१॥

उत्थानिका

आगे कहते हैं कि मेरे चरित्र में जो दोष लगे हों वे व्यर्थ होंवें-

आलस्याकुलितेन मूढमनसा सन्मार्गनिर्णायिना।
लोभक्रोधादमप्रमादनदहेषादिविद्विषत्तमना ॥
यद्बाह्याचरितं विरुद्धमथवा चारित्रमुद्देमया।
मिथ्या दुष्कृतमस्तु सो जिनपते ! तत्त्वप्रसादेन मे ॥२१॥

अन्वयार्थ

(देव) हे भगवन् (आलस्याकुलितेन) आलस्य से भरकर व (मूढमनसा) मन में विवेक को छोड़कर मूर्खता धारु के (सन्मार्गनिर्णायिना) मोक्षमार्ग की विराधना करते हुए (लोभक्रोधादमप्रमादनदहेषादिविद्विषत्तमना) व अपने आत्माकी शोध, लोभ, मान, असावधानो, कामभाव, द्वेष आदि से लिप्त करके (मया) मुझ (अधिया) निर्बुद्धि के द्वारा (यत्तु) जो कुछ (चारित्रशुद्धेः) चारित्रको शुद्धतासे (विरुद्धम्) विपरीत (आच-रितं) आचरण किया गया हो (भो जिनपते !) हे जिनेन्द्र भग-वान ! (तत्त्वप्रसादेन) आपके प्रसाद से (तत्तु) वह (मे) मेरा (दुष्कृतम्) दुष्कृत या पाप या दोष (मिथ्या) नाश (अस्तु) हो।

भाषा में यहाँ पर भी प्रतिक्रमण का भाव झलकाया गया है। जहाँ तक कषायों का अभाव न हो अर्थात् वीतरागी न हो जावे वहाँ तक कषायों का जोर कभी कम व कभी अधिक होता रहता है। जिस समय परिणाम में कषाय मंद होती है तब ही भावों में शांति, विवेक, बुद्धिमानी झलकती है। तब वह मानव मुनि हो या श्रावक अपने धारण किए हुए चारित्र के नियमों में बहुत बड़ा सावधान रहता है और मन, वचन, कायसे कोई दोष नहीं लगने देता है। परन्तु जिस समय किसी निमित्तवश परि-णाम में लोभ का कुछ जोर हो जावे या क्रोध का वेग उठ आवे या मानभाव में अन्धेरा हो जावे या आलस्य हो जावे या द्वेष-बुद्धि पैदा हो जावे या कामभाव से बावला हो जावे उस समय मन में अशांति, अज्ञान और मूढता कम व अधिक घर कर लेती है। तब उसी मुनि व श्रावक से चारित्र के पालन में बहुत से दोष लग जाते हैं। कदाचित् काय व वचन सम्बन्धी न हो व बहुत ही अल्प हों परन्तु मानसिक दोष तो हो ही जाते हैं। इसीलिए प्रतिक्रमण किया जाता है। जिसमें यह भावना भाई जाती है कि वे दोष दूर हों व उनसे लगा हुआ पाप क्षय हो जावे या कम हो जावे। श्री जिनेन्द्र भगवान के गुण परम पवित्र हैं। इसलिए उनके निर्मल गुणों के स्मरण से परिणाम निर्मल हो जाते हैं और पवित्र भावों में यह शक्ति है कि पापों का नाश कर डालें। जैसे स्थूल शरीर में बहुत सावधानी से हवा, पानी व भोजन लेते हुए व समय में भोजनपान, नीहार, विहार व निद्रा लेते हुए कभी भी किसी न किसी बात में भूल हो जाती है। अनिष्ट भोजन जबान के स्वादवश खा लिया जाता, रात्रिको देर तक जागकर निद्रा कम ली जाती, व काम-काज में उलझ जानेसे बेसमय भोजन किया जाता, व अधिक स्त्री-प्रसंग किया जाता इत्यादि अपनी

ही भूलोंसे छोटे वा बड़े रोग पैदा हो जाते हैं। तब गृहस्थ लोग उनको दूर करने के लिए औषधियां काम में लेते हैं कि वह रोग शीघ्र मिट जावे, अधिक न बढ़े जिससे कि शरीर बेकाम हो जावे। इसी तरह मुनि व श्रावक बड़ी सावधानी से अपना आचरण पालते हैं तथापि कभी-कभी किसी ही बाह्य या कारणों के वश होकर चलने में देखनेका प्रमाद हो जावे, बोलने में कठोर व कषाय युक्त वचन निकल जावे, भोजन में स्वादिष्ट पदार्थ की लालसा हो जावे, किसी स्त्रीको देखकर मनमें विकार हो जावे, अशुद्धावनी कृति को देखकर मनमें अरतिभाव आजावे, सामायिक करते हुए धर्मध्यान न होकर किसी कारण से आत्मध्यान हो जावे इत्यादि दोष हो जाना संभव है। तब वह मुनि या श्रावक प्रतिक्रमण करके तथा परमात्मा के पवित्र गुणोंका स्मरण करके अपने भावोंको निर्मल करता है, मानों दोषोंके रोगोंको हटाने के लिए औषधि पीता है। ऐसा करने से दोषरूपी रोग मिटते रहते हैं, बढ़ने नहीं पाते। और वह आगामीके लिए सावधान रहता है। वास्तव में यह प्रतिक्रमण एक तरह का स्नान है जो मन के मैल को व आत्मा के पापों को धो देता है।

श्री पद्मनंदि मुनिने आलोचना पाठ में ऐसा ही कहा है-

पापं कारितवान्यदत्रकृतवानन्यैः कृतं साधितं।
धारित्वाऽहं प्रतिपन्नवांश्च मनसा वाचा च कायेन च ॥
काले संप्रति यच्च भाविनि नवस्थानादनुद्गतं।
तन्मिथ्याखिलमस्तु मे जिनपते ! त्वत्प्रसादेन पुरः ॥३०॥

प्रस्तावना

[११]

भावार्थ - हे जिनेन्द्र ! जो मैंने अपने मन वचन कायके द्वारा इस समय तक पाप किया हो, कराया हो व दूसरों से किये जाने पर उसे प्रभुबुद्धि में पड़कर भला माना हो ऐसे सब तरहके दोष जो पहले लगे हों व अब लगते हों व आगे लगेंगे उन सब दोषों का नाश हो। मैं आपके सामने अपनी निन्दा कर रहा हूँ।

मूल श्लोकानुसार छन्द गीता

हे देव ! आलस दान हो अविवेक वृषप नासिया।
कर क्रोध लोभ प्रमाद मान कु काम द्वेष प्रकासिया ॥
चारित्र शुद्ध विरद्ध जो कुछ सो रहित मैंने किया।
जिनराज ! तब परसाद से हो नाश मैं अब बाधिया ॥३॥
उत्थानिका - आगे भावना करते हैं कि मेरा समय धर्म-ध्यान व रत्नत्रय का एकाग्रता में बीते -

जीवोजीवापयत्थत्तव्विबुधो बंधावदो बंधतः।

शशव्वरसंवरनिरजेरे विवधतो मुक्तिप्पियं कांक्षतः ॥
वेहादेः परमात्मतत्त्वममलं मे पश्यतत्तत्त्वतो।
धम्मज्झत्तसमाधिशुद्धमनसः कालः प्रयातु प्रभो ॥४॥

अन्वयार्थ

  • (प्रभो) हे प्रभु ! (जीवाजीवापयत्थत्तव्विबुद्धः) जीव और अजीव पदार्थों को जानते हुए (बंधावदो बंधतः) आस्रव और बंधको रोकते हुए (शशव्वर) निरन्तर (संवरनिरजेरे विवधतः) संवर और निर्जराको करते हुए (मुक्तिप्पियं कांक्षतः) मोक्षरूपी प्रियाकी चाह रखते हुए (वेहादेः) शरीर आदि पर पदार्थोंसे भिन्न (अमलं) निर्मल (परमात्मतत्त्वं) परमात्माके स्व-रूपको (तत्त्वतः) यथार्थ रूपसे (पश्यतः) अनुभव करते हुए और

[१२]

प्रस्तावना

(धम्मज्झत्तसमाधिशुद्धमनसः) धर्मध्यान और समाभाव में शुद्ध मनको लगाये हुए (मे) मेरा (कालाः) समय (प्रयातु) बीते।

भावार्थ

  • इसमें आचार्यने जैन सिद्धान्तके मूलश्लोकभूत सात तत्त्वोंका संकेत करते हुए उन पर अज्ञानको दृढ़ किया है। तथा उनमें कौन ग्रहण योग्य हैं व कौन त्यागने योग्य हैं इस भेद विज्ञान का स्वरूप निश्चय और व्यवहारनय दोनोंसे बताया है। असल बात यह है कि जिसको सुखशान्ति पानेकी चाह हो व अपने आत्माको पवित्र करनेकी रुचि हो उसको सात तत्त्वोंको भले प्रकार समझकर उन पर अपना विश्वास मानना चाहिए। जीव और अजीव तत्त्व में तो वह समस्या है कि यह लोक जीव और अजीव पदार्थों का समुदाय है। बिना इन दो पदार्थों को माने हुए संसार और मोक्ष बन ही नहीं सकता है। यदि एक मात्र जीव ही पदार्थ होता तो सब जीव शुद्ध अपने स्वभाव ही में पाए जाते। न कोई अशुद्ध होता न कोई दुःखी होता न शुद्ध होने के लिए व सुखी होने के लिए कोई धर्म का साधन करता। क्योंकि जीव का स्वरूप ज्ञानदर्शन सुख शांतिमय है। यह स्वभाव से सबको जानने देखनेकी शक्ति रखता है, क्रोधादि इसका स्वभाव नहीं है किन्तु शांति इसका स्वभाव है, आनंद भी इसका स्वभाव है। सब ही जीव परमात्म स्वरूप ही उस लोक में होते यदि एक जीव पदार्थ ही होता और यदि एक अजीव पदार्थ ही होता तो सब कुछ जड़ अचेतन होता फिर कोई जानने वाला व सुख दुःख को वेदने वाला नहीं होता फिर कहना सुनना समझना समझाना कुछ भी नहीं होता तो दोनोंका एकांत नहीं है। जगत् में जीवभी

[१३]

प्रस्तावना

और अजीव भी है। संसारो जीव सब अशुद्ध है; क्योंकि इनमें ज्ञान का क्षयोपशम है, क्रोधादि है, क्लेश आदि भोगते हैं। यह वस्तु-दशा इसलिए है कि इनके साथ कर्मरूपी पुद्गलों का जो बहुत सूक्ष्म हैं तथा अजीव के पांच भेदों में से एक है, उनका बंध है। इसी को पाप व पुण्य कर्म का बंध कहते हैं। अजीव पांच - पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल। इनमें पुद्गल मूर्तिक है; क्योंकि इसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, गुण पाए जाते हैं, शेष चार अमूर्तिक हैं। सारी रचना जो हमारी पांचों इन्द्रियों से मालूम करने में आती है पुद्गलसे रची हुई है। हम शरीर से पुद्गल को छूते हैं; मुख से पुद्गल को खाते पीते व चबाते हैं, नाक से पुद्गल को ही सूंघते हैं, आंख से पुद्गल को ही देखते हैं, कान से शब्दों को सुनते हैं जो पुद्गल से बने हुए हैं। सूक्ष्म पुद्गल इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण में नहीं आते हैं तथापि उनके कार्य प्रगट हैं। उन कार्यों के द्वारा उनका समझा लिया जाता है। जैसे कर्म पुद्गल बहुत सूक्ष्म हैं इन्द्रियों से जाने नहीं जाते परंतु संसार में जीवों के भीतर अशुद्धता व दुःख सुख का भोगता देखकर अनुमान लगाते हैं कि पाप व पुण्य का अथवा कर्मों का बंध है। इस लोक में जीव और पुद्गल एक दूसरे पर अमर दलसे है, हलन चलन करते हैं, तरह-२ के कामों को करने वाले वे दो ही बड़े कार्यकारी हैं। बहुत से पुद्गल अपने स्वभाव से काम किया करते हैं, जैसे आग की गर्मीसे पानी का भाप बनना, बादलों का गिरकर पानी बरसना, धूप होना, छाया होना आदि का पुद्गलों के द्वारा उनके स्वभाव ही से हुआ करते हैं, बहुत से कामों को यह संसारी जीव करता है। जैसे- खेती करना, मकान बनाना, कपड़ा बनना आदि-२। तीसरा कोई एक ईश्वर कराने वाला

यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:

नहीं है, न काम करने कराने में इसकी कोई आवश्यकता ही है। घी के सामने अग्नि आने से पिघलेगा ही, बर्फ के सामने गर्मी आने से पानी होगा ही। ईश्वर का इन कामों में हाथ है ऐसा कहना व्यर्थ है। ईश्वर निर्विकार, इच्छारहित, परमानन्दमई है, वह किसी वस्तु के बनाने व बिगाड़ने में दखल नहीं देता है।

जीव और पुद्गल चार काम अपनी ही ताकत से करते हैं; जैसे—चलना, ठहरना, जगह पाना और अवस्थाओं को बदलना। क्योंकि हरएक काम के लिए खास निर्मित कारण की जरूरत है। इसलिए इन चारों कामोंके लिए जैन सिद्धांत ने चार द्रव्य माने हैं। सो जीव और पुद्गलों के चलने में उदासीन कारण है वह लोकव्यापी धर्मद्रव्य है। जो जीव और पुद्गलों के ठहरने में सहकारी है वह लोकव्यापी अधर्मद्रव्य है। जो सब द्रव्योंको अवकाश देता है वह अनंतव्यापी आकाशद्रव्य है। जो सब द्रव्योंको अवस्था बदलने में मदद देता है वह कालाणु नामका कालद्रव्य है, जो रत्नों के समान अलग-अलग लोक के असंख्यात प्रदेशों में लिष्ठा है।

जीव और कर्म पुद्गल इन दो द्रव्योंके सम्बन्ध के कारण से आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये पाँच तत्व व्यवहार किए जाते हैं।

संसारी जीवों के मन, वचन, कायके कार्योंके होते हुए आत्मा के प्रदेश कंपते हैं इस कारणसे चारों तरफके कर्म पुद्गल जीव के अच्छे या बुरे भावों के अनुसार पुण्य या पापरूप में आते हैं। इसी को आस्रव तत्व कहते हैं। ये आए हुए ही कर्मपुद्गल जीव के साथ जो कार्मण शरीर है उसीमें बंध जाते हैं। यह बंधन किसी नियमित समय के लिए होता है। उस समय के

[१५]
भीतर-२ वे अवश्य गिर जाते हैं। जिन कर्मों के अनुकूल सामग्री होती है वे कर्मफल देकर व अनुकूल सामग्री बिना फल दिये भी झड़ जाते हैं।

आस्रव और बंध तत्व से यह ज्ञान होता है कि जीव अशुद्ध कैसे होता है। क्योंकि जब तक परमात्म स्वभावके निकट न पहुँचे तबतक संसारी जीवोंके मन वचन काय काम किया करते हैं और हर समय जैसे पुराने कर्म झड़ते हैं वैसे नए पुण्य या पाप कर्म बंधते भी जाते हैं। यदि आत्मा को कर्मबंध से छुड़ाना हो तो संवर और निर्जरा तत्वको समझना चाहिए। कर्मोंके आने और बंधके रोकने को संवर कहते हैं। संवर के लिए उद्यम करना चाहिए। जिन भावों से कर्म बंधते हैं उनको रोकना चाहिए। इस संवरके लिए हिंसादि पांच पाप छोड़कर अहिंसा सत्य आदि पांच व्रत पालना चाहिए, क्रोधादि भावोंको रोककर उत्तम क्षमा आदि दशधर्ममें पालना चाहिए, आर्तध्यान रौद्रध्यान रोककरधर्म-ध्यान शुक्लध्यान साधना चाहिए, प्राचीन बंधे हुए कर्मोंको अपने समय के पहले व उनका बिना फल भोगे हुए दूर करने की रीति को निर्जरा तत्व कहते हैं—तप करनेसे अर्थात् इच्छाओंको रोक कर आत्मध्यान व वीतराग भावका अभ्यास करनेसे कर्म झड़ते जाते हैं। सर्व कर्मोंके बंधसे छूटकर आत्माके पवित्र हो जानेका नाम मोक्ष तत्व है। मोक्ष अवस्था में आत्मा सदा अपने ज्ञाना-नंदका विलास किया करता है। इन सात तत्वोंमें अजीव आस्रव व बंध त्यागने योग्य हैं जबकि जीव, संवर, निर्जरा व मोक्ष ग्रहण करने योग्य हैं। परंतु निश्चयनयसे इन सात तत्वोंमें दो ही पदार्थ

[१६]
हैं—जीव और अजीव। इन दोनों में से जीवको ही ग्रहण करके उसके ही शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना चाहिए इसलिए आचार्यने कहा है कि जीव अजीवसे भिन्न है ऐसा जानना, आस्रव बंधके कारणोंको रोको, सदा संवर और निर्जराका उपाय करो, स्वाधीनता रूप मोक्ष पाने को उत्कंठा रखो तथा निश्चयनय से एक अद्वैत ही शुद्ध आत्मतत्व का भेद विज्ञान के बल से राग-द्वेषादि भावों से भिन्न वीतराग विज्ञानमय विचारों और अनुभव करो। यही मार्ग सुख शांति पाने का तथा कर्मोंके बंध से छूटने का है। जब तक हम इस देह में हैं हमें अपना समय इसी तरह पर बिताकर सफल करना चाहिए। यही मानव-जीवन का लाभ है। श्री ज्ञाननंदि मुनि ने आलोचना के पाठ में मुक्तिपद की ही भावना की है जैसे—

इन्द्रत्वं च निगोदत्वं च बहुधा मध्ये तथा योनयः।
संसारे भ्रमंता चिरं यदबलाः प्राप्ता मयाऽनंतशः ॥
तन्नाप्येषामिहास्ति किंचिदपि मे हित्वा विमुक्तप्रदाम्।
सम्यग्दर्शनबोधवृत्तियुगवदीं तां देव ! पूर्णां कुरुः ॥

भावार्थ—हे देव! मैंने इस संसार में चिरकालमें भ्रमण करते हुए इन्द्रपना तथा निगोदपना तथा इनके मध्य की बहुत प्रकार योनियों को अनंतबार पाया। इसलिए सिवाय मोक्षके देनेवाले सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्रमई रत्नत्रय की पदवी के और कोई वस्तु मेरे लिए अपूर्व नहीं है अर्थात् मैं सिवाय अभेद रत्नत्रय रूप आत्मानुभव के और किसी वस्तुको नहीं चाहता हूँ; क्योंकि इसीसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। इस कारण आप इसीकी पूर्ति कीजिए।

[१७]

वास्तव में ऐसी-२ भावना परिणामों को निर्मल करनेवाली हैं और सुख शान्ति प्रदान करने वाली हैं।

मूल श्लोकानुसार छंद गीता

सत् तत्त्व जीव अजोक्ष जानत बंध आश्रय रोकते।
करते सुसंबर निर्जरा नित मुक्तिश्रिय अवलोकते ॥
बेहादिभिन्नं मुनिनर्मलं परमात्म तत्त्वं सुध्यायते।
सम काल बीते हे प्रभो ! वृष ध्यान समता पावते ॥४॥

उत्थानिका—आगे कहते हैं कि उत्तम कार्य वही कर सकता है जिसका संसार वास समाप्त होने को आया है व जो मुक्ति पाने के लिए शीघ्र ही अधिकारी हो गया है—

पूर्ववत् छंद

कषायसवननिर्जयः सकलसंगनिर्मुक्तता।
चरित्रपरमोक्षमौ जननदुःखतो घोरता ॥
मुनीन्द्रपदसेवना जिनवचोरुचिरुत्थापिता।
हृषीकहरिनिग्रहौ निकटनिर्वृतेर्जयते ॥५॥

अन्वयार्थ—(कषायमदनिर्जयः) क्रोधादि कषायोंके मदको जीतना (सकलसंगनिर्मुक्तता) सर्व परिग्रह का त्याग (चरित्र-परमोक्षमौ) चारित्रके लिए गाढ़ प्रयत्न (जननदुःखतो घोरता) संसारके दुःखोंसे भय (मुनीन्द्रपदसेवना) मुनीश्वरोंके चरणों की सेवा (जिनवचोरुचिः) जिनवाणी में रुचि (त्यागिता) सर्व वस्तु का त्याग या एक देश त्याग अथवा दान करना और (हृषीकहरिनिग्रहौ) इन्द्रिय रूपी सिंह को वश करना (निकट-निर्वृतेः) जिसके मुक्ति निकट है उस महात्मा के (जायते) ये बातें प्रकट होती हैं।

[१८]

तत्त्त्वभावना

मूल श्लोकानुसार छंद गीता

सत् तत्व जीव अजोष जानप्त बंध आस्रव रोकते ।

पुत्वीबूत छंद

कषायमवनिर्णयः सफलसंगनिर्मुक्ता ।

चरित्रपरमोद्यमी जननदुःखतो भीरुता ।।

मुनीन्द्रपवसेवना जिनवचोरुचिस्त्यागिता ।

हृषीकहरिनिगहो निकटनिवू तेर्जायते ।।५।।

तस्वभावना

भावार्थ—यहां यह दिखलाया है कि जिनको संसार-समुद्र तिरने में बहुत थोड़ी देर है अर्थात् जो दीर्घकाल तक संसार में फंसे न रहेंगे और शीघ्र ही मुक्ति को पाएँगे उन महात्माओं को ही वे सब कारण व साधन सहज में मिल जाते हैं, जो कर्मों को काटने वाले हैं। वास्तव में मुक्ति का साक्षात् साधन निर्ग्रथ पद है । अर्थात् सर्व परिग्रह रहित साधुपद है। जिसका बाहरी भेष नग्न दिगम्बर है, मात्र पोछो व कमंडल और होता है, जिससे जीवदया पाली जावे और शौच का काम लिया जावे । ये साधु शरीरसे ममता के त्यागी होते हैं, इसीलिए अपने केशों को हाथ से घास के समान उखाड़ कर फेंक देते हैं। तथा ये अहिंसाव्रत के पूर्ण पालक होते हैं इसीलिए चार हाथ प्राशुक भूमि आगे देखकर दिन में चलते हैं। रात्रि को एक स्थान में ठहरते हैं। जिनके वचन बड़े मिष्ट, अल्प व शास्त्रोक्त होते हैं । जो शुद्ध भोजन समताभाव से गृहस्थों को बिना किसी प्रकार का कष्ट दिये हुए जो उन्होंने अपने कुटुम्बक हेतु बनाया है उसीका कुछ भाग भक्तिपूर्वक दिए जाने पर लेते हैं। जो निर्जंतु स्थानों में मलमूत्र करते हैं व जो किसी वस्तु को देख शोधकर उठाते धरते हैं। ऐसे पांच समिति के पालक हैं, जो बिना दिए हुए अपने से कभी कोई वस्तु यहां तक कि पानी व फलफूल भी नहीं लेते। जो सत्य वचनों के सिवाय कभी भी हिंसाकारी असत्य नहीं कहते । जो परम शुद्ध ब्रह्मचर्य की दृष्टि से देखते हुए कामभाव को अपने मन में जगह नहीं देते । जो किसी क्षेत्र व रुपये पैसे पर व किसी अन्य चेतन अचेतन पदार्थ पर ममत्व भाव नहीं रखते । ऐसे पांच अहिंसादि महाव्रतों के पालक हैं। तत्त्वभावना

जिन्होंने क्रोधादि कषायों को ऐसा जीत लिया है कि सताये जाने पर भी किसी पर द्वेष नहीं करते हैं। अपने शत्रु की भी आत्मा का हित ही चाहते हैं। जो विद्वान् व माननीय होने पर भी कभी घमंड नहीं करते। कहीं तिरस्कार हो जाय तो जरा भी उदास नहीं होते। जो कभी कपट या मायाचार नहीं करते मन में जो होता है बही वचन से कहते, वचन से कहते वही क्रिया करते हैं। जो लोभ के यहां तक त्यागी हैं कि अनेक प्रलोभनों के कारण मिलने पर भी वीतराग भाव से नहीं ह्यते। जिनका निरंतर यह उद्यम रहता है कि हम स्वरूपाचरण चरित्र में डटे रहें अपने निजआत्मा का अनुभव करते रहें, जिनके मन में चार गतिरूप संसार महाभयंकर आकुलता का समुद्र दीखता है, सदा यह खटका रखते हैं कि यह मेरा आत्मा कहीं इस गोरखधंधे में न फंस जाये। जो अपने गुरुओं की सेवा इसीलिए करते रहते हैं कि गुरु उनके चारित्रकी संभाल रखते और उनको सदा मोक्ष मार्गपर भले प्रकार चलने के लिए उत्तेजना देते व सुधार करते हैं। जो जिनवाणी को तत्वविचार में परम उपयोगो समझकर उसका निरन्तर बड़े प्रेम से अभ्यास करते हैं। जो अपने आत्मोकशुद्ध भावों के सिवाय सर्व पर भावोंको त्याग देते हैं या जो निरंतर जीवरक्षा करके अभयदान देते व धर्मोपदेश देकर जानदान देते हैं व जिनके वश में पांचों इन्द्रियां रहती हैं। इसोसे वे जिन था जितेंद्रिय होते हैं ऐसे साधु महात्मा भावलिंगी मुनि होते हैं। वे यातो उसी जन्म से या दो चार दस जन्म में संसार से मुक्त हो जाते हैं। आचार्य के कहने का मतलब यह है कि इन सब बातों को बड़ा दुर्लभ व परम उपयोगी समझना चाहिए और जब इनमें से कोई या सब बातें प्राप्त हो जावें तो तत्त्वभावना

बड़ा उत्तम समय मानना चाहिए और प्रमाद छोड़कर अपने हित में दृढ़ रहना चाहिए । जो पुरुषार्थी होते हैं वे ही साधु निजानंद भोगते हुए अनंत सुख के अधिकारी हो जाते हैं । श्रीपद्मनंद मुनि यतिभावनाष्टकमें मुनिका स्वरूप कहते हैं— आदाय व्रतममलतत्त्वममलं ज्ञात्वाथ गत्वा वनम् । निःशेषाण्यपि मोहकर्मजनितां हित्वा विकल्पावलीम् । ये तिष्ठंति मनोभ्रुकुच्चिटनलंकरवप्रमोदं गता । निष्कंप्या गिरिवज्जयंति मुनयस्ते सर्वसंगोज्झिताः ॥१॥ भावार्थ—जो साधु महाव्रतों को लेकर, निर्मल आत्मा के तत्त्व को समझकर तथा वन में जाके सब ही मोह कर्म के वश से पैदा होने वाले अनेक विकारों को छोड़ करके मन, श्वासोच्छ्वास और आत्मा तीनों की निश्चलता में एकतान होते हुए आनन्द को भोगते हुए पर्वत के समान कंप रहित रहते हैं वे सर्व परिग्रह के त्यागी निर्ग्रन्थ साधुविनय प्राप्त करते हैं अर्थात् कर्मोंको जीतकर परमात्मा, परमेश्वर व परमब्रह्म होजाते हैं— मूलश्लोकानुसार छन्द गोता

कुकषाय अरिको चूरना अर सब परिग्रह त्यागना ।

चारित्रमें उद्यम घना संसार क्लेश निवारना ।

आचार्य पद का सेवना जिनवाणि में रुचि धारना । इन्द्रिय विजय पर त्याग हो दिग मोक्ष का जब आवना ॥२॥ उत्थानिका—आगे भावना भाते हैं कि सुख-दुःख आदि में मेरा भाव समता भाव को भजे क्योंकि यही समता निर्जरा का कारण है ।

मंदाक्रांता

विछिण्ठे वा प्रशमवति वा आंधवे वा रिपौ वा ।

मूढोघे वा बुधसंवसि व पत्तने वा वने वा ॥

तत्त्त्वभावना

संपत्तौ वा मम विपदि वा जीवते वा मृतौ वा ।

कालो देव ! व्रजतु सकलः कुर्वतस्तुल्यवृत्तिम् ।।६।। अन्वयार्थ— (देव) हे जिनेन्द्रदेव ! (मम) मेरा (सकलः) सर्व (कालः) समय (विद्विष्टे वा) मेरे से द्वेष करने वाले में (प्रशमवति वा) अथवा मेरे ऊपर शांत भाव रखने वाले में, (बांधवे वा) बन्धु में (रिपौ वा) अर्थात् शत्रू में (मूखोंघे वा) मूखों के समुदाय में (बुधसदसि वा) अथवा बुद्धिमानों की सभा में (पत्तने वा) नगरमें (वने वा) अथवा जंगल में (संपत्तौ वा) धनादि की प्राप्ति में (विपदि वा) अथवा आपत्ति में (जीवते वा) जीने में (मृतौ वा) अथवा मरने में (तुल्यवृत्तिम्) समान रूप या समता रूप वर्तन (कुर्वतः) करते हुए (व्रजतु) बीते । शिखरिणी छन्द

सुखे वा दुःखे वा व्यसनजन के वा सुहृदि वा ।

गृहे वारण्ये वा कनकनिकरे वा दृषदि वा ।।

प्रिये वानिष्टे वा मम समधियो यांतु दिवसा ।

वधानस्य स्वान्ते तब जिनपते ! वाक्यमनघम् ।।७।।

अन्वयार्थ - (जिनपते) हे जिनेन्द्र (सुखे वा) सुख में (दुःखे वा) अथवा दुःख में (व्यसनजन के वा) आपत्ति में डालने वाले शत्रु में (सुहृदि वा) अथवा मित्र में (गृहे वा) घर में (अरण्ये वा) अथवा जंगल में (कनकनिकरे वा) सुवर्णके ढेर में (दृषादि वा) अथवा पाषाण में (प्रिये वा) किसी प्रिय या मनोज्ञ वस्तुमें (अनिष्टे वा) अथवा किसी अमनोज्ञ वस्तुमें (समधियः) समता बद्धिको रखते हुए तथा (तव) आपके (अनघम्) पाप रहित या तत्त्वभावना

पवित्र (वाक्यम्) वचन को (स्वान्ते) अपने मन में (दधानस्य) धारण करते हुए (मम) मेरे (दिवसाः) दिन (यांतु) बीतें । भावार्थ - इन दो श्लोकों में आचार्य ने सामायिक के स्वरूप को दिखला दिया है। वास्तव में समताभाव को ही सामायिक कहते हैं। यह समताभाव असल में तबही जगता है जब निश्चय नयकी शरण ग्रहण की जावे औरव्यवहार नयकी दृष्टिको गौण रक्खा जावे । निश्चय नय वह दृष्टि या अपेक्षा है जिसके द्वारा देखने से हर एक पदार्थ का मूल या असली रूप दिख जाता है। यही द्रव्य दृष्टि है, द्रव्यको मात्र उसके असली स्वभाव में देखने वाली है। व्यवहार नय वह दृष्टि है जिसके पदार्थ की भिन्न-२ अवस्थाओं को व तीर्थ के भेदों को व असली हालत पर पहुंचने के साधनों को व उसके अशुद्ध स्वरूप को देखा जा सके । जैन सिद्धांत ने यह आवश्यक बताया है कि दोनों नयों से पदार्थोंको देखना चाहिए जैसा कहा है–

व्यवहारनिश्चयो यः प्रबुद्धय तत्वेन भवति मध्यस्थः । प्राप्नोति वेशनायाः सएव फलमविकलं शिष्यः ।।

(पुरुषार्थ०) ।

भावार्थ - जो शिष्य व्यवहारनय और निश्चयनय दोनों को समझकर मध्यस्थ या वीतरागी हो जाता है या किसी एक नय के पक्षपात से रहित हो जाता है वही जिनवाणी को समझने के पूर्ण फल को प्राप्त करना है।

यह जगत व्यवहारनय (PRACTICAL POINT OF

VIEW) से देखते हुए अनंत भेदरूप विचित्र दिखलाई पड़ता है। यह राजा है यह रंक है, यह स्वामी यह सेवक है, यह धनवान तत्त्वभावना

है यह निर्धन है, यह गुणवान है यह कुरूप है, यह बलवान है यह निर्बल है, यह विद्वान् है यह मूर्ख है, यह गुरु है यह शिष्य है, यह पूज्य है यह पूजक है, यह वंदनीय है यह वंदना करने वाला है, यह साधू है यह गृहस्थ है, यह शत्रु है यह मित्र है, यह पिता है यह पुत्र है, यह माता है यह पुत्री है, यह बांधव है यह अन्य है, यह पुरुष है यह स्त्री है, यह बालक है यह जवान है, यह वृद्ध है यह शिशु है, यह निरोगी है यह सरोग है, यह हिन्दू है यह मुसलमान है, यह पारसो है यह सिक्ख है, यह जर्मन है यह जापानी है, यह अंग्रेज है यह फ्रांसीसी है, यह अमेरिकन है यह आफ्रिकावासी है, यह गोरा है यह काला है, यह क्षत्रि है यह वैश्य है, यह ब्राह्मण है यह शूद्र है, यह पर्वत है यह नदी है, यह सूर्य है यह चन्द्र है, यह स्वर्ग है यह नर्क है, यह स्वदेश है यह परदेश है, यह यह भरत है यह विदेह है, यह घर है यह जंगल है, यह बन है यह उपवन है, यह सुवर्ण है यह कांच है, यह रत्न है यह पाषाण है, यह महल है यह

श्मशान है, यह फूल है यह कंटक है, यह शय्या है यह भूमि है, यह चांदी है यह लोहा है, यह तांबा है यह मिट्टी है,

यह निर्मल है यह मैली है, यह घट है यह पट है, इत्यादि जितने कुछ भेद प्रभेद हैं ये सब व्यवहारनय की दृष्टि में हैं। यही दृष्टि रागद्वेष मोह का कारण है जिन चेतन पदार्थों से अर्थात् स्त्री, पुत्र, मित्र, बंधु, पशु आदि से अपना स्वार्थ सधता है अथवा जिन अचेतन पदार्थों से अर्थात् घर, वस्त्र, बर्तन सामान आदि से अपना मतलब निकलता है उनसे तो राग

तत्वभावना

होता है तथा जिन पुरुषों से व स्त्रियों से अपने स्वार्थ साधन में हानि पड़ती है अथवा जो घर, वस्त्र, वर्तन या सामान अपने चित्त को कष्टप्रद भासते हैं उनसे द्वेष पैदा हो जाता है । व्यव- हारनय की दृष्टि से देखते हुए अहंकार व ममकार पैदा होते हैं, मैं राजा हूं, मैं धनवान हूं, मैं बड़ा हूं, मैं दोन हूं, मैं दुखी हूं, मैं रोगी हूं, मैं निरोगी हूं, मैं सुन्दर हूं, मैं कुरूप हूं, मैं पुरुष हूँ मैं स्त्रो हूँ इत्यादि अहंबुद्धि होती है। यह तन मेरा है, यह धन मेरा है, यह वस्त्र मेरा है, यह घर मेरा है, यह राज्य मेरा है, यह खेत मेरा है, यह आभूषण मेरा है, यह भोजन मेरा है, यह ग्रन्य मेरा है, यह मंदिर मेरा है, इत्यादि ममकार बुद्धि पैदा होती है। इस अहंकार ममकार के द्वारा वर्तन करते हुए चारों कषायों की प्रबलता हो जाती है। कषायों के द्वारा तीव्र कर्म का बंध हो जाता है और यह मोही प्राणी संसार के झंझटों में व सुख तथा दुःख में उलझा रहता है। कभी अपने सच्चे सुख को व अपना सच्चो शांति को नहीं पाता है ।

निश्चय नय से देखते हुए ये सब ऊपर लिखित भेद नहीं

दीखते हैं। ये सब भेद जीब और पुद्गल इन दो मूल द्रव्यों के निमित्त से हैं। बस जो निश्चय से देखता है उसे सबं ही जीव संसारो या सिद्ध, नारकी, देव, पशु, मनुष्य, छोटे, बड़े, राजा, 'रंक आदि एक रूप अपने शुद्ध केवल स्वभाव में ही दिखते हैं। सब ही पूर्ण ज्ञान दर्शन सुख बीर्य के धारी परमात्मारूप ही दिखते हैं। आप भो अपने को परमात्मारूप दिखता है, अन्य सब भी परमात्मारूप दिखते हैं। तथा सब पुद्गल स्पर्श, रस, गंधवान अजीवरूप एक से दिखते हैं। इस दृष्टि से देखते हुए ही समताभाव की जागृति होती है, रागद्वेष का अभाव होता है, तत्त्वभावना

शत्रुमित्र की कल्पना मिटती है, अमनोज व पदार्थ का भेद निकलता है, इष्ट व अनिष्ट का द्वैत मिट जाता है। यहो दृष्टि वीतरागभाव को पैदा करती है। स्वामी नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती ने द्रव्य संग्रह में कहा है -

अण्णाणगुणोण्हि य चउगइम्हि कुव्वंति तद् असुहृणया । विण्णेया संसारीसब्बे सुद्धा हु

सुखमया ।।

भावार्थ - व्यवहारनय से १४ मार्गणा के भेद कि यह अमुक गतिवाला है यह अमुक इन्द्रिय वाला है इत्यादि अथवा १४ गुण स्थान के भेद कि यह मिथ्याती है यह सम्यक्ती है, यह साधु है, यह केवली है इत्यादि संसारी जीवों में दिखते हैं परन्तु शुद्ध निश्चयनय से देखते हुए सर्व ही जीव शुद्ध एक रूप परमात्मा है। समताभाव लाने के लिए हमको व्यवहारनय से देखना बन्द करके निश्चयनय से देखने का अभ्यास करना चाहिए। यही कारण है कि जो साधु या गृहस्थ सामायिक में तन्मय होते हैं वे उपसर्ग करने वाले पर व प्रशंसा करने वाले पर समताभाव रखते हैं। वीतराग भाव का साधक निश्चयनय के द्वारा अव- लोकन करता है। तत्व विचार के समय आत्मध्यान जगाने के लिए निश्चयनय का आश्रय हो कार्यकारी है। जैसा कि स्वामी अमृतचन्द्र आचार्य ने समयसार कलश में कहा है -

इवमेव तात्पर्यं हेयः शुद्धनयो नहि ।

नास्ति बन्धस्तदत्यागात् तत्यागाद्वन्ध एव हि ।। भावार्थ - मतलब यही है कि शुद्ध निश्चयनय भी छोड़ना न चाहिए क्योंकि जब तक इसका सहारा होगा तब तक कर्म का बंधन होगा तथा इस नय के त्याग होते ही कर्म का बंध होगा । दोनों श्लोकों में आचार्य ने निश्चयनय को प्रधान करके तत्त्वभावना

समताभाव का स्वरूप दिखलाया है। यह सच्ची तत्वभावना का एक प्रकार है ।

वास्तव में समताभाव लाने के लिए ऐसी ही भावना कार्य- कारी है। श्री पद्मनंदि मुनि निश्चय पंचाशत में कहते हैं— शुद्धाच्छुद्धमशुद्धं ध्यायन्माप्नोत्यशुद्धमेवस्वम् । • जनयति हेम्नो हेमं लोहाल्लोहं नरः कटकम् ।।१८।। भावार्थ—जो कोई अपने आत्मा को शुद्ध स्वरूपमय ध्याता है वह शुद्ध आत्मा को पाता है तथा जो अशुद्ध रूप अपने को ध्याता है वह अशुद्ध ही आत्मा को पाता है जैसे कोई मनुष्य सोने से सोने का कड़ा व लोहे से लोहे का कड़ा बना लेता है। मूल श्लोकानुसार छन्द गीता

द्वेषकारी शांतिधारी बंधु में अर शत्रु में । मूर्खजन वा पंडितों में शुभ नगर वा बनों में ।। सम्पत्तिमें वा विपत्ति में, वा जन्ममें वा मरणमें। हे देव ! मेरा काल बीते भाय समता धरण में ॥६॥ सुख में वा दुःख में वा क्लेशकर अरि मित्र में। घरमें अरणमें कनक ढेरी और लोष्ट पाषाण में ।। प्रिय वस्तु वा अप्रिय रहो ममदिवस हों समबुद्धिमें । हे जिन पते ! तब निर्मलं वच सदा धारूं हृदयमें ।।७।। उत्थानिका—आगे कहते हैं कि उत्तम कार्य करनेवाला ऊंची गतिको व नीच कार्य करनेवाला नीची गतिको जाता है-- (शार्दूलविक्रीडत छन्द)

ये कार्यं रचयंति निद्यमध्धमास्ते यांति निद्यां गतिम् । ये वंद्यं रचयंति बन्धमतयस्ते यांप्ति वंद्यां पुनः ।। तत्वभावना

ऊर्ध्वं यान्ति सुधागृहं विवधतः कूपं खर्नसस्त्वधः । कुर्वन्तीति विबुध्य पापविम्खा धर्म सदा कोविदाः ।।८।। अन्वयार्थ – (ये) जो (अभयाः) नीच लोग (निद्यम्) निन्दा के लायक खराब (कार्य) काम (रचयन्ति) करते हैं (ते) ये (निद्यां) निंदनीय या बुरी (गलिम्) गतिको (यांति) पहुंचते हैं (पुनः) परन्तु (ये) जो (बंद्यमतयः) प्रशंसनीय बुद्धिधारी (बंद्य) प्रशंसा के लायकः उत्तम कार्य को (रचयन्ति) करते हैं तो वे (वंद्यां) माननीय या उत्तम गति को (यांति) जाते हैं जैसे (सुधागृह) राजमहल को (विदधतः) बनाने वाले (ऊर्ध्व)

ऊपर को (तु) परन्तु (कप) कुएंको (खनतः) खोदनेवाले (अधः) नीचेको (यांति) जाते हैं (इति) ऐसा (विबुध्य) भले प्रकार जान- कर (पापविमुखाः) पांपोंसे मुंह मोड़नेवाले (कोविदाः) बुद्धिमान पुरुप (सदा) निरन्तर (धर्म) धर्म को (कुर्वन्ति) साधते रहते हैं । भावार्थ – इस श्लोक में आचार्य ने दिखलाया है कि हरएक जीव अपने भले या बुरे का जिम्मेदार है। जो जैसा कार्य करता है वह वैसा हो जाता है। इस संसारी जोब के पास मन बचन काय से तीन पाप तथा पुण्य कर्म के आने के द्वार हैं। जब ये शुभ कार्यों में बर्तते हैं तब मुख्यता से पुण्य कर्म आते हैं और जब ये अशुभ कार्यों में वर्तते हैं तब पाप कर्म आते हैं। यह जीव हर समय अपने शुभ या अशुभ भावों के अनुसार पुण्य तथा पाप कर्मों को बांधता रहता है । साधारण रूप से आयुकर्म को छोड़ कर ज्ञानावरणादि सात कर्मों को नित्य बांधता रहता है। आयु कर्म को विशेष काल में अपनी भोगने वाली आयु के आठ

त्रिभागों में से किसी में या मरण के पहले बांधता है । आयुकर्म के अनुसार ही यह जीव चार गतियों में से किसी गत्ति में जाता तत्त्वभावना

है : एक मानव की अपेक्षा देवगति ही ऊंची है नरकगति व पशुगति नीची है व मानवगति बराबर की है। यदि उच्चभाव होंगे तो ऊंची आयु को नीच भाव होंगे तो नीच आयु को, मध्यम भाव होंगे तो मध्यम आयु को बांधकर तदनुसार गति में जाता है। जो रौद्रध्यानी हिंसक, दुष्कर्मी है वह नर्कायु बांध नर्क को, जो आर्तध्यानी दुःखित भावधारी है वह तिर्यंच आयु बांध कर पशु गति को, जो धर्मध्यानी है वह देव आयु बांधकर देव गति को, जो कोमल परिणामी है यह मनुष्य आयु बांधकर मनुष्य गति को जाता है। परन्तु जो शुक्लध्यान को आराधता है और गुणस्थानों में चढ़ता हुआ अर्हत केवलो हो जाता है वह कोई भी आयु न बांधकर सब कर्मों से छूटकर शुद्ध परमात्मा हो जाता है। इस लोक में भी देखा जाता है कि जो लोग परोपकार, दान, पूजा, गुरु सेवा आदि शुभ काम किया करते हैं उनको प्रतिष्ठा व मान्यता होती है तथा जो परका अपकार, पर को बुराई, अन्याय के विषयों में प्रवृत्ति हिंसककर्म, चोरी आदि बुरे काम करते हैं वे निन्दायोग्य व बुरे समझे जाते हैं। यहां दृष्टांत दिया है कि जो लोग राजमहल बनाते हैं वे दिन पर दिन ऊपर को चढ़ते जाते हैं परन्तु जो कुआं खोदते हैं वे दिन पर दिन नीचे धंसते जाते हैं ।

इसलिए बुद्धिमानों को चाहिए कि सदा धर्म के सेवन मेंलगे रहें । जो सम्यकदर्शन पूर्वक धर्म का सेवन करगे वे इस लोक तथा परलोक दोनों में सुख पाएंगे ।

वास्तव में जैन धर्म वीतराग विज्ञानमय है। इसको हरएक धर्म क्रिया में आत्मा के गुणों का ध्यान आता है। आत्मा सुख- शांति मय है, इससे धर्म सेवन करते हुए सुखशांति तो तुरंत प्राप्त तत्त्वभावना

होती है तथा अन्तराय कर्म का क्षयोपशम होने से आत्म बल बढ़ता है । तथा पाप कर्मों का रस कम होने से व पुण्य कर्मों का रस बढ़ने से सांसारिक क्लेश घटते हैं और सांसारिक सुख बढ़ते हैं तथा तीव्र आपत्ति पड़ने पर धैर्य की प्राप्ति होती है । इतने लाभ इस शरीर में रहते हुए ही प्राप्त होते हैं, इसलिए जो धर्म का सेवन करते हैं वे परलोक के लिए उत्तम आयु बाँधकर शुभ गति में जाते हैं, ऐसा समझकर हम सबको इस पवित्र जैन धर्म की शरण में सदा रहकर व इसे निरंतर आराधनकर इस लोक तथा परलोक को प्रशंसनीय बनाना चाहिए -

श्री शुभचन्द्राचार्य श्री ज्ञानावर्णव में लिखते हैं - (मालिनी छन्द)

यदि नरकनिपातस्त्यक्तुमत्यन्तमिष्ट-

स्त्रिदशपतिमद्धिं प्राप्तुमेकान्ततो या ।।

यदि चरमपुमर्थः प्रार्थनोयस्तदानीं ।

किमपरमभिधेयं नाम धर्म विद्यत्त ॥ २३॥

भावार्थ - यदि तुझे नरक में जाने से रुकना अति प्यारा है व यदि तू इंद्र की महा विभूति को प्राप्त करना चाहता है, अथवा यदि तू चारों पुरुषाथों में से अन्तिम मोक्ष पुरषार्थ को करना चाहता है तो तुझसे और अधिक क्या कहें तू एक मात्र धर्म ही का साधन कर ।

मूल श्लोकानुसार गीता छन्द

जो निन्द्यजन दुष्कर्म करते निन्द्य गति में जात हैं। जो सन्तजन शुभ कर्म करते उच्च गति को पात हैं ॥ अरु राज्य गृह रच उच्च जाते कूप खनते नीच हों ।

ह्ह्म जान बुधजन धर्म सेवें पाप से भयभीत हों ।।८।। उत्थानिका - आगे कहते हैं कि जो लोग शरीर के सुख के लिए कुचेष्टा करते हैं वे अपनी शक्ति को नष्ट करते हैं - चेष्टाश्चिसशरोरबाधनकरोः कुर्वति चित्तेऽधमाः ।

सौख्यं यस्य चिकोर्षवोऽक्षवशगा लोकद्वयध्वंसिनीः ।। कायो यक्ष विशीयते, स शतधा मेधो यथा शारद-

स्तम्रामी बत ! कुर्वते क्रिमधियः पापोद्यमं सर्वदा ॥६॥ अन्वयार्थ – (अक्षवशगाः) इन्द्रियों के वश में पड़े हुए (अधमाः) नीच पुरुष (यस्य) जिस शारीर के (सौख्यं) सुख को (चिकीर्षवः) चाहते हुए (चित्तशरीरबाधनकरीः) मन और शरीर को बाधा देनेवाली तथा (लोकद्वयविध्वंसिनीः) इस लोक व परलोक दोनों को बिगाड़ने वाली (चेष्टाः) क्रियाएं (चित्ते) अपने मन में (कुर्वन्ति) करते रहते हैं व (यत्र) जिस संसार में (स कायः) वही शरीर (यथा) जैसे (शारदः) शरद ऋतु का (मेधो) मेघ विघट जाता है तैसे (शतधा) सैकड़ों तरह से (विर्षीयते) नष्ट हो जाता है (तत्र) तिस संसार में (अभी) ये (अधियः) मूर्ख लोग (किं) क्यों (सर्वदा) सदा (पापोद्यम) पाप का उद्यम (कुर्वते) करते रहते हैं (बत!) यह बड़े खेद की बात है ।

भावार्थ - इस श्लोक में आचार्य ने बताया है कि जो पुरुष मिथ्या दृष्टि बहिरात्मा है अर्थात् जिनको आत्मीक सच्चे सुख का पता नहीं है वे शरीर के सुख को सुख मानते हैं वे इंद्रियों के दास हो जाते हैं और इन इंद्रियों के द्वारा जो नाना प्रकार की इच्छाएं पैदा होती हैं उन्हीं को पूरा करने के लिए रात-दिन तत्त्वभावना

उद्यम करते रहते हैं। वे धनके पिपासु होकर, किसीको सताकर झूठ बोलकर, चोरी करके, विश्वासघात करके धन कमाने में ग्लानि नहीं मानते, उनको अपनी स्त्री व परस्त्री का विवेक नहीं रहता है, वे भक्ष्य व अभक्ष्यके विचार से शून्य हो जाते हैं। जिस तरह इंद्रियों की तृप्ति हो उसी तरह वर्तन करना उनके जीवन का ध्येय बन जाता है। उनको मांस व मदिरा से भी परहेज नहीं रहता है। उनको जो जो क्रियायें होती हैं वे सब हानिकारक होती हैं। इंद्रियों की लम्पटता से विवेक शून्य हो, चाहे जो कुछ खा पी लेते हैं और वे रोगों के शिकार हो जाते हैं, अधिक विषयभोग से निर्बल हो जाते हैं। फिर तो उनको शरीर सम्बन्धी और मन सम्बन्धी महान् कष्ट होते हैं उस समय उनके मन की आकुलता को समझना एक अनुभवी मानव का

ही काम है। इंद्रियों के भोगों की चाहना रहनेपर भी वे विचारे इन्द्रियों का भोग शरीर की निर्बलता व रोग के कारण नहीं कर सकते । आर्तध्यान में मन दुःखित रहता है। यदि कदाचित् थोड़ी भी मुक्ति रोग से हो जाती है कि फिर अन्धे हो विषयों के बन में पागल हो दौड़ते हैं, फिर अधिक रोगी हो जाते हैं। भावों में तीव्र विषयवासना से व हिंसा, झूठ, चोरी कुशील तथा तीन शरीर की व धन की व विषयभोग योग्य पदार्थों की ममता से अशुभ उपयोग में फंस जाते हैं। यह अशुभ उपयोग ज्ञाना- वरणीय, दर्शनावरणीय, अन्तराय और मोहनीय कर्म का तीव्र बंध करता है, साथ में असाता वेदनीय, अशुभनाम व नीच गोत्र का बंध हो जाता है तथा जब आयुकर्म के बंध का अवसर तत्त्वभावना

आता है तब यह प्राणी नरक व पशु आयु को बांध लेता है। एक न एक दिन चाह की दाह में जलता हुआ शरीर त्यागता है और नारकी या पशु या एकेंद्रिय जीव पैदा हो जाता है। इस तरह विषयलम्पटी प्राणी अपने इस अमूल्य शरीरको नष्ट करते हुए इस लोक में दुःखी व अपयश के भागी होते हैं और परलोक में कुगति के अधिकारी होते हैं। आचार्य खेद करते हैं कि ऐसे अज्ञानी लोगों को क्या यह मालूम नहीं है कि यह शरीर शरद ऋतु के मेघों की तरह नष्ट होने वाला है, यह स्थिर रहने का नहीं है। जैसे मिट्टी का घड़ा थोड़ी सी ठोकर लगने पर टूट जाता है ऐसे ही यह शरीर आयुधर्म के कब से कभी तो पूरा आयु भोग कर कभी अकाल में ही छूट जाता है तब पछताता हुआ चला जाता है। तब वे कोई भी सचेतन या अचेतन पदार्थ इसका साथ नहीं देते हैं जिनके ऊपर ये अपने सुख का आधार रखता था ।

थोड़ी सी मनुष्यायु में पापों का उद्यम करके इसलोक और परलोक को बिगाड़कर वे मूर्खजन अपना बोर अहित कर लेते हैं। आचार्य सचेत करते हैं कि हे जीवो! यदि तुम इन्द्रियों के दास न होकर उनको अपने वश में रखते और अपनी बुद्धिबल से अपने आत्मा को समझ लेते तो तुम्हें आत्मा के भीतर रहे हुए सुख समुद्र का पत्ता लग जाता जिसमें स्नान करने के लिए किसी परपदार्थ की जरूरत नहीं रहती है। यदि आत्मा को समझ लिया जाता तो जगत की आत्माओं से प्रेम पैदा हो जाता तब यह हिंसादि पापों में स्वयं नहीं प्रवर्तता किन्तु जीव दया व परोपकार भाव में वर्तता हुआ पुण्य की कमाई करता - इस तत्त्वभावना

नश्वर शरीर से आत्मोन्नति कर जाता । यहां भी सुखी रहता और परलोक में भी शुभ भावों से शुभ गति पाता है । बुद्धिमानों को खूब सोच विचारकर इस शरीर का उपयोग कुचेष्टाओं में न करके सुकर्म में करना चाहिए । जिससे यह मानवजीवन स्व पर उपकारी बनकर अपना समय सफल कर सके ।

श्री अमितगति आचार्य सुभाषितरत्नसंदोह में कहते हैं कि इन्द्रिय सुखों में लीनता महान मूर्खता है ।

नानाविधव्यसनधूलिविभूतिवातं ।

तत्त्वं विविक्तं भवगम्यजिनोशिनोक्तम् ।।

यः सेवते विषयसौख्यमती विमुच्य ।

हस्तेऽमृतं पिबति रौद्रविषं निहीनः ॥६५॥

दासत्वमेति वितनोति विहीनसेवां ।

धर्मं धुनाति विदधाति विनिन्द्य कर्म ।।

रेकश्चिनोति कुरुतेऽति विद्रूपवेषं ।

किं वा हृषीकवसतस्तनुते न भरर्थः ॥६६॥

भावार्थ-- जो अज्ञानी जिनेन्द्र के कहे हुए उस आत्म स्वरूप को जो सर्व परभावों से रहित है व जो नाना प्रकार आपत्तियों की धूल के ढेर को उड़ाने के लिए पवन के समान है, भले प्रकार समझकर विषयों के सुख को सेवता है वह मूर्ख हाथ में आए हुए अमृत को छोड़कर भयानक विष को पीता है । जो इन्द्रियों का दास हो जाता है वह दूसरों की चाकरी करता है, नीचों की सेवा करने लगता है, धर्म को नाश कर देता है, हिंसादि निन्द्यकर्म को करने लगता है, पापों को संचय करता है, अपना रूप अति कुरूप कर लेता है । अधिक क्या कहें इन्द्रियों के वश में पड़ा मानव तत्त्वभावना

क्या-२ अनर्थ नहीं कर लेता है ? वास्तव में जो इन्द्रियों का दास है वह पशु से भी निकृष्ट है। मानव ही वह है जो इन्द्रियों को काबू में रखकर अपना जीवन सुकार्यों में बिता कर सफल करता है।

मूलश्लोकानुसार गीता छन्द

जग नोच जन हो दास इन्द्रिय काय सुखको चाहते ।

इस लोफद्वयको नाशकारी कर्म निन्छ रधावते ॥

बहु काय मन पोड़ा सहें सो काय शारद मेघ सम ।

यह नष्ट होती हा ! कुधी नित पाप करते हैं अघम ॥६॥ उत्पानिका-आगे कहते हैं कि मोह में अन्धो हुई बुद्धि संसार बढ़ाने वाली और मोक्ष को बहुत दूर रखने वाली है। कांतेयं तनुमूरयं सुहृदयं मातेयमेषा स्वसा ।

जमेयं रिपुरेष पत्तनमिवं सद्मेदमेतद्वमम् ।।

एषा यावबुदेति बुद्धिरघमा संसारसंवर्धिनी ।

तावद्द्यच्छत्ति निवृति बत कुतो दुःखब्रुमोच्छेदिनों ॥१०॥ अन्वयार्थ - (इयं) यह (कांता) स्त्री है (अर्थ) यह पुत्र है (अयं) यह (सुहृत्) मित्र है (इयम्) यह (माता) मां है (एषा) यह (स्वसा) बहिन है (इयं) यह (जामा) पुत्री है (एषः) यह (रिपुः) शत्रु है (इदं) यह (पत्तनम्) नगर है (इदम्) यह (सद्म) घर है (एतत्) यह (वनं) बाग है (यावत्) जब तक (एषा) ऐसी (अधमा) तुच्छ व (संसारसंवर्धिनी) संसार को बढ़ाने वालो (बुद्धिः) बुद्धि (उदेति) पैदा होती रहती है (तावत्) तब तक (कुतः) किस तरह से (दुःबद्द्रुमोच्छेदिनी) दुःखरूपी वृक्षों को तत्त्वभावना

छेदने वाली (निर्वृति) मुक्ति को (गच्छति) यह जीव पहुंच सकता है (बत) यह बड़े खेद की बात है।

भावार्थ—यहां पर आचार्य खेद प्रगट करते हुए कहते हैं कि मोही जीव मोह में फँसकर अपने स्वरूप को भूल जाता है इस लिए अनन्त सुख को देने वाली मुक्ति को कभी नहीं पा सकता है। वास्तव में मुक्ति अपने सच्चे आत्मा के स्वभाव की प्राप्ति है और वह अपने से ही अपने को अपने में हो प्राप्त होती है। जिसका उपयोग अपने आत्मा के स्वभाव के सन्मुख होगा वही आपको पाएगा, परन्तु जिसका उपयोग अपने आत्मा को छोड़कर परपदार्थों में रमता है वह कभी भी अपने स्वरूप को नहीं पा सकता है। संसार का कारण मोह है, जबकि मुक्ति का कारण निर्मोह है। मोही जीव क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों के वशीभूत पड़े रहते हैं, इसीलिए कर्म को बांधकर संसार की चारों गतियों में भ्रमण किया करते हैं। मोही जीवों को अपने आत्मा का अपने शरीर से भिन्न विश्वास नहीं होता है। वह शरीरको ही आपा माना करते हैं। शरीर की भ्रमता से वे पांचों इन्द्रियों की इच्छाओं के दास हो जाते हैं। उन इच्छाओं की पूर्ति करने में जो चेतन व अचेतन पदार्थ सहकारी हैं उन्हीं से गाढ़ प्रीतिवान हो जाते हैं। इसलिए शरीरके जितने सम्बन्ध हैं उनको अपना सम्बन्ध समझ लेते हैं; पुत्र, पुत्री, मित्र आदि के मिलने में हर्ष व उनके वियोग में विषाद किया करते हैं। एक कुटुम्ब में जीव भिन्न-२ गतियों से आकर जमा हो जाते हैं वे ही जीव आयु पूरी करके अपनी-२ बांधी गति के अनुसार चले जाते हैं। धर्म- शाला में यात्रियों के समागम के समान कुटुम्बोजनों का समागम है। मोही जीव उनसे गाढ़ मोह करके अपने स्वात्मा को भूल जाते हैं। इसीलिए आचाचार्य ने बताया है कि जब तक इन भिन्न तत्वभावधान

पदार्थों में ममकार है कि यह तन मेरा है, यह धन मेरा है, यह राज्य मेरा है, यह उपवन मेरा है, यह घर मेरा है, यह देश मेरा है, यह नगर मेरा है, वहाँ तक मेरा ज्ञान दर्शन सुख वीर्य स्व- भाव मेरा है, मेरा पद सिद्धपद है, मेरी परिणति शुद्ध वीतराग है यह बुद्धि नहीं जमती अर्थात् भेद विज्ञान को न पाकर वे कभी भी आत्मा के श्रद्धावान नहीं हो पाते। वे उन्मत पुरुष की नाईं जगत में चेष्टा करते हुए अनंतकाल खोया करते हैं। इसलिए श्री अमितगति महाराज का तात्पर्य यह है कि अब तो तुम समाप्तो, अब तो परपदार्थों को अपना मानना त्यागो तथा अपने आत्मीक शुद्ध गुणों को अपना मानो। जिससे निज आत्मा का अनुभव प्राप्त हो, यही तत्वभावना का फल है।

अनित्यपंचाशत् में श्री पद्मनंदि मुनि कहते हैं–

दुःखव्यालसमाकुलं भव वनं जाड्यांधकाराश्रितं ।

तस्तिन्दुर्गति पल्लिपाति कुपथे भ्राम्यंति सर्वगिनः ॥ तम्मध्ये गुरुवाक्यदोपममलज्ञानप्रभाभासुरं ।

प्राप्यालोक्य च सप्तयं सुखप्रवं याति प्रबुद्धो ध्रुवं ॥१७॥ भाषार्थ—यह संसाररूपी बन दुःखरूपी अजगरों (सर्पों) से भरा हुआ है, यहाँ अज्ञानरूपी अंधकार फेला हुआ है। इस वन में दुर्गतिरूपी भीलों की तरफ ले जाने वाला खोटा मार्ग है। ऐसे वन में सर्व ही संसारो प्राणी भ्रमण किया करते हैं। परन्तु चतुर मनुष्य इसी वन के मध्य में गुरु के वचनरूपी दीपक को जो निर्मल ज्ञान के प्रकाश से चमक रहा है, पाकरके सच्चे मार्ग को ढूंढ़कर अविनाशी आनन्दमई पथ को पहुंच जाता है।

तत्त्वभावना

मूलश्लोकानुसार छन्द गीता

यह नारि पुत्र सुमित्र माता है हमारी यह बहन ।

पुत्री अरो यह घर नगर मेरा यही है सार बन ।।

जब तक रहे यह नीच मति संसार का बर्द्धन करे ।

तब दुःखतरु हम्मो मुकति तिय किस तरह सुख से वरे ।।१०।। उत्थानिका – आगे कहते हैं कि भेद विज्ञान से ही मुक्ति हो सकती है ।

नाहं कस्यचिदस्मि कश्चन न मे भावः परो विद्यते । मुक्त्वात्मानमपास्तकर्मसमिति ज्ञानेक्षणालंकृतिम् ।। यस्यैषा मतिरस्ति चेतसि सदा ज्ञातात्मतत्त्वस्थितेः । बंधस्तस्य न यंत्रितं त्रिभुवनं संसारिकैर्बन्धनैः ।।११।। अन्वयार्थ – (ज्ञानेक्षणालंकृतिम्) ज्ञान दर्शन स्वभाव से शोभायमान तथा (अपास्तकर्मसमिति) द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म के समुदाय को दूर रखने वाले (आत्मानम्) आत्मा को (मुक्त्वा) छोड़कर (कश्चन) कोई भी (परः) अन्य (भावः) भाव (मे) मेरा (न) नहीं (विद्यते) है (न) और न (अहं) मैं (कस्यचित्) किसी अन्य का (अस्मि) हूँ (एषा) ऐसी (मतिः) बुद्धि (ज्ञाता- त्मतत्त्वस्थितेः) आत्मस्वरूप की मर्यादा को जानने वाले (यस्य) जिस किसी के (चेतसि) चित्त में (सदा) नित्य (अस्ति) रहा करती है (तस्य) उस महात्मा के (बंधः न) कर्मों का बंध नहीं होता, यों तो (त्रिभुवन) तीनों लोक के संसारी प्राणी (संसारि- कैःबन्धनैः) संसार के बंधनों से (यंत्रित) जकड़े हुए हैं । भावार्थ – यहां पर आचार्य ने सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञानकी तत्त्वभावना

महिमा बताई है। इस जगत में यह संसारी प्राणी जीव पुद्गलका मिला हुआ एक आकार रखता है। अनादि काल से ही इसके

कर्मों का बंध होता ही रहता है। कर्मोंके उदय से राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि अशुद्ध भाव होते हैं तथा कर्मों के ही उदय से शरीर होता है व शरीर के साथी स्त्री पुत्रादि नौकर चाकर होते हैं। कर्मों के बड़े विकट फैले हुए जालके भीतर इतना सघन आत्मा का स्वरूप फँस जाता है कि तत्वज्ञान रहित प्राणि- योंको आत्मा का ज्ञान व श्रद्धान नहीं होता। हरएक तत्वज्ञान रहित मानव या जीव पर्यायबुद्धि बना रहता है। जिस शरीर में होता है उसी रूप अपने को मान लेता है। कभी भी अपने असली आत्मस्वरूप को नहीं पाता है। इसीलिए इन्द्रियों के सुखोंमें मग्न होकर रात-दिन इन्द्रियसुख की चेष्टा किया करता है तथा तीव्र रागद्वेष मोह में पड़कर तीव्र पापकर्म बाँधकर पशु आदि गतियों में भ्रमण किया करता है। वास्तव में कर्मबंध का मूल कारण मिथ्यात्व है। संसार की जड़ ही मिथ्यात्व है। जिसने अनंतानु- बन्धो चार कषाय तथा मिथ्यात्व को वश कर लिया है उसने संसार वृक्ष को जड़ काट डाली है। उसने जो कुछ कषायों के शेष रहने से कर्म का बंध होता भी है वह संसार के भ्रमण को अनंत- कालीन नहीं कर सकता है। वह बन्धन अवश्य शीघ्र कट भी जायगा। इसका कारण यह है कि उसकी बुद्धि संसार में लिप्त नहीं होती है। क्योंकि उसके अंतरंग में यह भेद विज्ञान भले प्रकार जाग्रत है कि मेरे आत्मा का स्वभाव ज्ञान दर्शन सुख वीर्यमई अमूर्तीक अविनाशी है। कोई भी रागादि भाव आत्मा का स्वभाव नहीं है। ज्ञानावरणादि आठ कर्म व शरीरादि नो- कर्म सर्व भिन्न पदार्थ है, इस जगत में परमाणू मात्र भी मेरा तत्त्वभावना

नहीं है, मेरा स्वरूप सर्व अन्य आत्मद्रव्यों से भी निराली सत्ता का रखने वाला है, मेरे में अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का तो अस्तित्व है परन्तु परद्रव्य क्षेत्र काल भावका नास्तित्व है। इस भेद विज्ञान के कारण से वह सदा आत्मसुख के स्वाद का उत्सुक रहता हुआ अपने आत्मा का मनन किया करता है। इसलिए

उसका आत्मा संसार के बढ़ाने वाले कर्मों से गाढ़ बन्धन में नहीं पड़ता है। आचार्य ने प्रेरणा की है कि ये भव्यजीवो ! यदि तुम समताभाव को पाना चाहते हो तो इस भेद विज्ञान का भले प्रकार अभ्यास करो, यही स्वामुभव को जगाने वाला है। एकत्व अशीति में पद्मनंद मुनि कहते हैं-

हेयं हि कर्म रागादि तत्कार्यं च विवेकिनः ।

उपादेयं परं ज्योतिरुपयोगैकलक्षणम् ।

यदैवचंतन्य महंतदेव तदेश जानाति तदेव पश्यति ।

तदेव बैंकं परमस्ति निश्चयाव्गतोस्मि भावेन तवेकतां परम् ॥७५-७६।।

भावार्थ - ज्ञानी पुरुषों को उचित है कि रागादि सब कर्मों को त्यागने योग्य समझकर इनसे मोह छोड़ दें और ज्ञानदर्शन मई उपयोग लक्षण के धारी परमज्योतिरूप आत्मा को जो ग्रहण करने योग्य है ग्रहण करले। जो कोई चैतन्यमई है वही मैं हूँ, बही जानता है, वही देखता है, वही निश्चय से एक उत्कृष्ट पदार्थ है, मैं उसी के साथ परम एक भाव को प्राप्त हो गया हूँ। इस प्रकार की भावना ही स्वानुभव को उद्योत करने वाली हैं। मूलश्लोकानुसार छन्द गीता

मैं नियत वर्शन ज्ञानमय र्नाह कर्म बंधन राखता ।

मैं तो किसी का हूं नहीं परभाव मम नहि छाजता ॥

तत्त्वभावना

सद्बुद्धि ऐसो चित्त जिसके तत्त्व निज पहचानता ।

वह बंध में पड़ता नहीं जग जंतु बंधन ठामता ।।११।। उत्थानिका—फिर भी उपदेश करते हैं कि संसार के मोह में न पड़के आत्मकल्याण करो ।

चित्रोपायविवर्धितोपि न निजो देहोपि यत्रात्मनो । भायाः पुत्रकलत्रमित्रतनयाजामातृतातादयः ।।

तत्र स्वं निज कर्मपूर्ववशगाः केषां भवन्ति स्फुटं । विज्ञायेति मनीषिणा निजमतिः कार्या सदात्मस्थिता ।।१२।। अन्वयार्थ—(यत्र) जिस संसार में (चित्रोपायविवर्धितः) अनेक उपायोंसे पालन-पोषण करके बढ़ाई हुई (अपि) भी (निज- देहोऽपि) यह अपनी देह भी (आत्मनः न) अपनी नहीं होती है (तत्र) वहा (निजपूर्वकर्मवशगः) अपने-२ पूर्व में बांधे हुए कर्मों के वश पड़े हुए (पुत्रकलत्रमित्रतनयाजामातृतातादयः) पुत्र, स्त्री, मित्र, पुत्री, जमाई व पिता आदिक (भावाः) बिलकुल जुदे पदार्थ (केषां) किन जीवों के (स्वं) अपने (स्फुटं) प्रगटपने (भवन्ति) हो सकते हैं (इति) ऐसा (विज्ञाय) जान करके (मनी- षिणा) बुद्धिमान मानव को (सदा) सदा (निजमतिः) अपनी बुद्धि (आत्मस्थिता) अपने आत्मा में स्थिर (कार्या) करनी उचित है । भावार्थ—यहाँ फिर आचार्य ने जगतके सम्बन्ध को नाशवन्त झलकाया है। जगत के मोही प्राणी अपने इन्द्रियों के विषय भोग में सहकारी स्त्री, पुत्र, मित्र आदिकों से राग करते हैं व जो बाधक हैं उनसे द्वेष करते हैं । ये सब सचेतन पदार्थ बिलकुल हमसे जुदा हैं, ये सब अपने-२ भिन्न-२ कर्मों को बांधकर भिन्न भिन्न गतियों से आए हैं और इस जन्म में भिन्न-२ कर्म बांधकर तत्वभावना

भिन्न-२ गतियोंको जायेंगे। इनको अपना मानना महान मूर्खता है। ये सब कुछ सम्बन्ध रखते हैं तो वह सम्बन्ध इस शरीर के साथ है। शरीर के उत्पन्न करनेवाले को माता पिता कहते हैं। एक माताके पुत्र पुत्रियों को भाई बहन कहते हैं, शरीर को ही देखकर दे प [[?]] के पुजारी अपने २ स्वार्थों के वश होकर हमारी देहसे प्रीति दिखलाते हैं। जब हमसे स्वार्थ नहीं निकलता है तब बात भी नहीं पूछते हैं। आचार्य कहते हैं कि इन पदार्थों के स्नेह टूटने की व छूट जाने की बात क्या करते हैं। ये तो प्रगट ही जुदे हैं। अरे ! यह शरीर जो जन्म से मरण तक साथ रहता है और जिसको नाना प्रकार भोजन पान देकर खिलाते पिलाते, सुनाते, पहनाते, उठाते, पालते व जिसके लिए पैसा कमाते व रात दिन उसी की ही चिंतामें लगे रहते कि कहीं यह विगड़ न जावे, ऐसा शरीर भी एक क्षणमात्र में हमें छोड़ देता है। आयुकर्म के आधीन देह का सम्बन्ध है। आयुकर्म का नाश होते ही एक समयभर भी यह शरीर आत्मा का साथ नहीं दे सकता । तब जो लोग इस देह के साथ व देह के सम्बन्धी स्त्री पुत्रादि के साथ ऐसी दोस्ती बांधते हैं कि मानो हम इनके हैं व ये हमारे हैं वे लोग अवश्य मूर्ख हैं क्योंकि इनके मोह में अन्धे हो वे अपने आत्माके हितको भूल जाते हैं। वे कभी दिन रातमें एक क्षण भी आत्माके हित का चिन्तवन नहीं करते हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि यदि तुम चतुर मनुष्य हो तो नाशवन्त पदार्थों से क्यों स्नेह बढ़ाकर अपना बुरा करते हो ? इन पदार्थों का सम्बन्ध यदि है तो इनसे अलिप्त रहते हुए इनसे अपना प्रयो- जन साधलो व उनका यथासम्भव उपकार कर दो। परंतु उनके साथ भीतरी प्रीति न रक्खो, इनकी प्रीति अन्तमें धोखा देनेवाली तत्त्वभावना

होगी, इनकी प्रीति शोकसागर में डुबानेवाली होगी। क्योंकि ये सब पदार्थ एक दिन छूट जाएंगे या हम छोड़ेंगे या वे छोड़ेंगे । खास ध्यान अपने आत्माकी तरफ रक्खो । हमें उचित है कि हम अपने आत्माके सच्चे स्वरूपको जो निश्चयसे परमात्माके समान ज्ञाता दृष्टा अविनाशी आनन्दमयी है पहचानें, उसपर विश्वास लावें व उसीका ध्यान करें तो हमको सुख व शांतिका लाभ होगा और हम जो आज अपवित्र है वे धीरे-२ पवित्र होते चले जाएंगे। वास्तवमें आत्माकी प्रीति हमको पवित्र करनेवाली है और शरीर की व शरीर के सम्बन्धियोंकी प्रीति हमें अपवित्र करनेवाली हैं। सुभाषितरत्नसंदोह में श्री अमितगति महाराज कहते हैं- किमिह परमसौख्यं निःस्पृहत्वं यदेत-

त्किमथ परमदुःखं सस्पृहत्वं यदेतत् ॥

इति मनसि विधाय त्यक्तसंगाः सदा ये ।

विदधति जिनधर्मं ते नराः पुण्यवन्तः ॥१४॥

भावार्थ-इस संसार में परम सुख क्या है तो वह एक इच्छा रहितपना है तथा परम दुःख क्या है तो वह इच्छाओं का दास हो जाना है। ऐसा मन में समझकर जो पुरुष सर्व से ममता त्यागकर जिन धर्म को सेवन करते हैं वे ही पुण्यात्मा व पवित्र हैं। शरीर व शरीर के सम्बंधियों के संबंध में चिन्ता करना इच्छाओं के पैदा करने का बीज है, इनसे मोह, त्यागना ही इच्छाओं के मिटाने का बीज है ।

मूल श्लोकानुसार त्रिभंगी छन्द

बहु यत्न कराए वर्द्धन पाए देह न थाए जहं अपनी । तहं पुत्त्र कलत्रं पुत्री मित्रं जामानं भगिनि जननी ॥ तत्त्वभावना

निज कर्म बसाएं सुख दुःख पाए होत सदा ये नहि अपने । इम जान सुबुद्धी आत्तम शुद्धो कर निज बुद्धो प्रगटपने ।। उत्थानिका—आगे कहते हैं कि धर्म हो जीवका परममित्र है— बुर्दामोच्छित्कर्मशैलदलने यो दुनिवारः पविः ।

पोतो दुस्तरजन्मसिंधुतरणे यः सर्वसाधारणः ॥

निःशेषशरीरिरक्षणविधौ शश्वत्पितेवावृतः ।

सर्वज्ञ न निवेदितः स भवततो धर्मः सदा नोऽवतु ॥१३॥ अन्वयार्थ—(यः) जो (दुर्दामोच्छितकर्मशैलदलने) कठिनता ने नाश करने योग्य बड़े कठोर कर्मरूपी पर्वतों को चूर्ण करने में (दनिवारः) किसीसे हटाया जा न सके ऐसा (पविः) बज्र है (यः) जो (दुस्तरजन्मसिंधुतरणे) कठिनता से पार होने योग्य ऐसे संसार समुद्र से पार ले जाने में (सर्व साधारणः) सर्वे जोवों के लिए एक रूप सामान्य (पोतः) जहाज है (यः) जो (निःशेषशरीरिरक्षण- विधौ) सर्व शरीरधारी प्राणियों की रक्षा करने में (पिता इव) पित्ता के समान (शश्वत) सदा (आदृतः) माना गया है (सः) वह (सर्वज्ञेन) सर्वज्ञ भगवान से (निवेदितः) कहा हुआ (धर्मः) धर्म (नः) हमें (भवतः) संसारसे (सदा) हमेशा (अवतु) रक्षित करे ।

भावार्थ—यहां आचार्य ने जिनधर्म की यथार्थ महिमा बताई है। असल में जो जिनधर्म को प्रारण ग्रहण करते हैं उनकी सदा रक्षा होती है । जैनसिद्धांत ने बताया है कि जब इस जीवके शुद्ध वीतराग भाव होते हैं तब तो कर्मोको निर्जरा होती है तथा जब शुभ भाव होते हैं तब पूण्य कर्म का बंध होता है। पुण्य बंध दुःखों से बचाता है तथा वीतराग भाव कर्ममल को हटाकर मुक्ति तत्त्वभावना

में पहुंचता है, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यग्चारित्र मई निश्चय रत्नत्रय को जो स्वानुभवरूप है जैनधर्म कहते हैं। यह स्वानुभव परम वैराग्यमई है। यहां रागद्वेषसे रहित समतामयभाव है। इस स्वानुभाव में रुकी हुई परिणत्तिको वीतराग भाव कहते हैं तथा स्वानुभूति की रुचि रखते हुए स्वानुभूतिके कारणरूप अर्हत, सिद्ध आचार्य, उपाध्याय तथा साधु इन पंचपरमेष्ठियों की भक्ति करना शास्त्रविचारकरना आदि कार्योंमें रामभाव को शुभोपयोग कहते हैं। यह जैनधर्म परम कल्याणकारी है। इसी स्वानुभव रूप जैन धर्मकी शक्तिसे चार घातिया कर्मनाश हो जाते हैं और यह जीव केवलज्ञानी परमात्मा होजाता है। इसलिए यह धर्म पर्वतोंके चूर्ण करनेको बच्त्रके समान है। यह संसार समुद्र – रागद्वेष के जलसे भरा हुआ है। इनमें अनेक विभावरूपी लहरें उठ रही हैं इससे पार होना बहुत कठिन है परन्तु जिनको वीतरागमय और ज्ञान- मय धर्मरूप जहाज मिल जाता है वे इसके पार हो जाते हैं, यह जहाजसर्वं साधारण के लिए है। किसीको इसपरचढ़नेकी मनाई नहीं है। जो संसार – समुद्र से तर जाने के लिए दिल में पक्के उत्साही हैं उनको यह धर्मरूपी जहाज शरण देता है क्योंकि यह जैनधर्म अहिंसा धर्मके व्याख्यान में त्रस स्थावर सर्व प्राणी मात्रकी रक्षाका उपदेश देता है व पूर्ण अहिंसाधर्मके धारो साधु तदनुसार वर्तते हुए सर्व जीवमात्र को रक्षा करते हैं। अतएव उनका बर्तन पिता के समान होता है इसलिए यह जैनधर्म भो प्राणियोंकी रक्षाके उपाय बतानेके कारणसे पिताके समान है । ऐसे पवित्र जैनधर्मको जो सेवा करेंगे वे दुःखों से बचकर उन्नति करते २ परमात्मापद में अवश्य पहुंच जाएंगे। धर्म की महिमा तत्वभावना

श्री शुभचन्द्रजी ने ज्ञानावर्णव में इस भांति कही है— शार्दूलविक्रीडित छन्द

धर्मः शर्मभुजंगपुंगवपुरोसारं विधातुं क्षमो । धर्मः प्रापितमत्यलोकविपुलप्रीतिस्तवाशंसिनां ।। धर्मः स्वर्नगरोनिरन्तरसुखास्वादोदयस्यास्पदम् । धर्मः किं न करोति मुक्तिललनासंभोगयोग्यं जनम् ।।२२ भावार्थ—यह धर्म धर्मात्मा दुख्योंको अर्हत्पुरके सार सुख के प्राप्त करानेको समर्थ है। यह धर्म मध्यलोकके महान चक्रवर्ती आदिके सुखोंको देनेवाला है, यही धर्म स्वर्ग को निरन्तर रहने वाले सुखोंके प्रगट कराने का उपाय है, यही धर्म प्राणीको मुक्ति रूपी स्त्रीके भोगने योग्य बना देता है। धर्म हमारा क्या क्या उपकार नहीं करता है ? वास्तव में जिनधर्म का स्मरण तत्व भावना है। इस भावना को कभी नहीं भूलना चाहिए । मूल श्लोकानुसार मालिनी छन्द

परम कठिन कर्म शैलदलने सुवज्रं ।

दुस्तर भर्वासधु तारणे सारपोतं ।।

सकलजगतसत्त्वं रक्षकर्ता वितासम् ।

जिनकथितं धर्म रक्ष भवसे सथा हम ।।१३

उत्थानिका—आगे जिनवाणी से प्रार्थना करते हैं— यन्मात्रापश्याव्यवाच्यविकलं किंचिन्मयाभाषितम् । बालस्यास्य

कषायवर्षविषयव्यामोहसक्तात्मनः ।।

वाग्देवी जिनवक्त्रपद्मनिलया तन्मे क्षमित्वाखिलं । दत्वा नाम विशुद्धिमूर्जिततमां वेमावनिद्यः परं ।।१४।। तत्त्वभावना

अन्वयार्थ – (मया) मेरे से (यत्किंचित्) जो कुछ (मात्रापद- वाक्यवाच्यविकलं) मात्रा, पद, वाक्य व अर्थ में कम बढ़ (भाषितं) कहा गया हो (तत् अखिलं) उस सर्वको (क्षमित्वा) क्षमा करके (कषायदर्पविषयव्यामोहसक्तात्मनः) क्रोधादि कषाय, गर्व, व विषयों की चाहना में आसक्त (अस्य बालस्य मे) ऐसा जो बालक समान में उसे (जिनवक्त्रपद्मनिलया) जिनेन्द्र के मुख कमल में निवास करने वाली (वाग्देवी) सरस्वती देवी अर्थात् जिनवाणी (ऊर्जिततमां) उत्कृष्ट (ज्ञानविशुद्धिं) ज्ञान की निर्मलता को (दत्वा) देकर (अनियं पदं) परम प्रशंसनीय मोक्षपद (देयात्) प्रदान करें ।

भावार्थ – यहां पर आचार्य ने दिखलाया है कि जिनवाणी को शुद्ध ही पढ़ना चाहिए और शुद्ध ही उसका अर्थ समझना चाहिए फिर भी यदि कभी प्रमादसे कुछ भूल हो गई हो, किसी वचन को कमबढ़ कह दिया हो तो उसके कारण जो पापबंध हुआ हो उसको दूर करने के हेतु से यह भव्यजीव प्रतिक्रमण या पश्चात्ताप करता है जिनवाणी मुझपर क्षमा करे यह मात्रभक्ति करने का व उच्च भावना भाने का एक प्रकार है जिससे भावों में यह बात आजावे कि मुझे शुद्ध ही पढ़ना चाहिए । फिर वह जिनवाणी को हृदयमें धारकर यह विचारता है कि मैं बिलकुल अज्ञानी हूं इसीसे क्रोध, मान, माया व लोभ कषायोंके वशीभूत हो जाता हूं या पांचों इन्द्रियोंके विषयों में आशक्त हो जाता हूं जिससे मेरे भावों में अशुद्धि हो जाती है और मैं कर्मों का बंध कर लेता हूं । अब मैं यह प्रार्थना करता हूं कि जिनवाणी के निरन्तर मननसे यह मेरी कलुषता मिटे और परम शुद्धता मेरे आत्माको प्राप्त हो अर्थात् शुद्धोपयोग रहा करे जिससे मैं अवि- तत्त्वभावना

नाशी निजपदको पासकूं, जहां कोई कर्मका सम्बन्ध नहीं रहता है और यह आत्मा स्वयं परमात्मा हो जाता है। वास्तव में सम्यग्दृष्टि व ज्ञानी जीव को वीतराग भाव की ही प्राप्ति का यत्न करना चाहिए । यह बीतरागता उसी समय प्राप्त होती है जब विषय कषायों से ग्लानि हो जावे और शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा से प्रीति बढ़ जावे। क्योंकि आत्मा का स्वभाव ही परम वीतरागमय है इसलिए आत्मा के ध्यान से स्वयं वीतरागता झलक जाती है और तब सुखशांतिकी प्राप्ति होती है, पिछला कर्म कटता है। असल में आत्मा की भूमिमें चलना ही जीव का परम हित है।

श्री पद्मनंदी मुनि निश्चयपंचाशत् में कहते हैं- स्वपरविभागावगमे जायते सम्यक् परे परित्यक्ते । सहजैकबोधरूपे तिष्ठत्यात्मा स्वयं सिद्धः ॥४२॥ भावार्थ-जब आपा परका भेदरूप ज्ञान भले प्रकार पैदा हो जाता है तब पर से मोह छोड़ने पर यह स्वयं सिद्ध आत्मा स्वाभाविक एक ज्ञान स्वरूप में ठहर जाता है।

मूल श्लोकानुसार मालिनी छन्द

कथन किया जो मैं शब्द पद अर्थहीनं ।

विषय विमोही हो क्रोध मानाद्यधीनं ।।

जिनमुखसे प्रगटो वाणिदेवी क्षमाकर ।

वर निर्मलज्ञानं देय शिवपद कृपाकर ।।१४।।

उत्थानिका-आगे साधक विचारता है कि मेरी बुद्धि ज्ञान होने पर भी विषयों से क्यों विरक्त नहीं होती है- निःसारा भयदायिनोऽसुखकरा भोगाः सदा नश्वराः ।

निंद्यस्यामभवातिभावजनकाः विद्याविदां निंदिता ॥ तत्त्वभावना

नेस्थं चितयतोपि में बत मतिर्व्यावर्तते भोगतः । कं पृच्छामि कमाश्रयामि कमहं मूढ़ः प्रपद्ये विधिम् ॥ १५॥ अन्वयार्थ – (भोगाः) ये इन्द्रियों के भोग (निःसाराः) असार अर्थात् सार रहित तुच्छ जीर्ण तृण के समान हैं (भयदायिनः) भय को पैदा करने वाले हैं (असुखकराः) आकुलता भय कष्टको उत्पन्न करने वाले हैं व (सदा) सदा ही (नश्वराः) नाश होने वाले है (निद्यस्थानभवातिजनकाः) दुर्गति में जन्म कराकर क्लेश को पैदा करने वाले हैं तथा (विज्ञादितां) विद्वानों के द्वारा (निदिताः) निंदनीय हैं (इत्थं) इस तरह (चितयतः अपि) विचार करते हुए भी (मे) मेरी (मतिः) बुद्धि (बत) खेदकी बात है कि (भोगतः) भोगों से (न) नहीं (व्यावर्तते) हटती है तब (अहं) मैं (मूढ़ः) बुद्धि रहित (क) किसको (पृच्छामि) पूंछू (कम्) किसका आश्रयामि) सहारा लूं (कम) कौन सो (विधिम्) तदबीर (प्रपद्ये) करूं ।

भावार्थ—इस श्लोक में एक श्रद्धावान जेनी अपनी भूलको विचारते हुए अपने कषायों के जोय को कम कर रहा है । इस जोव के साथ मोह कर्म का बन्ध है । मोह ही उदय में आकर जोवको बाबला बना देता है और यह उन्मत्त हो न करने याग्य कार्य कर लेता है । मोहकर्मके मूल दो भेद हैं—एक दर्शनमोह, दूसरा चास्त्रिमोह, दर्शनमोहके उदयसे आत्माको अपने आपक्षा सच्चा विश्वास नहीं होपाता है । चरित्रमोहका उदय आत्मा में ठहरने नहीं देता है—अपने आत्माके सिवाय अन्य चेतन व अचेतन पदार्थों में राग द्वेष करा देता है । इसके चार भेद हैं—अनन्तानु- बन्त्री कृषाय, जो अज्ञान के बिगाड़ने में दर्शनमोह के साथी है । तत्त्वभावना

अप्रत्याख्यानावरण कषाय—जिसके उदय होने पर श्रद्धान होने पर भी एक देश भी त्याग नहीं किया जाता अर्थात् श्रावक के व्रत नहीं लिए जाते । प्रत्याख्यानावरण कषाय—जिसके उदय से पूर्ण त्याग कर साधु का आचरण नहीं पाला जाता है । संज्वलन कषाय—जो आत्मध्यान को नाश नहीं कर सकते परन्तु जो मल पैदा करते हैं, जो पूर्ण वीतरागता को नहीं होने देते । जिस किसी महान पुरुष के अनन्तानुबन्धी कषाय और दर्शन मोह के दबने से सम्यग्दर्शन हो गया है वह पुरुष यह अच्छी तरह समझ गया है कि विषयभोगों से कभी भी इस जीव को तृप्ति नहीं होती है ! उल्टी तृष्णा की आग बढ़ती हुई चली जाती है, इसीलिए ये भोग असार है, फल कुछ निकलता नहीं, तथा भोगों के चले जाने का व अपने मरण होने का भय सदा बना रहता है । यह भोगो जीव चाहता है कि भोग्य पदार्थ कभी नष्ट न हों व मैं कहीं मर न जाऊँ । तथा इन भोगों की प्राप्ति के लिए व उनकी रक्षा के लिए बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है और यदि कोई भोग नहीं रहता है तो यह प्राणी आकुलता में पड़कर दुःखी हुआ करता है । ये भोग अवश्य नष्ट होने वाले हैं । या तो आप ही मर जायगा या ये भोग्य पदार्थ हमारा साथ छोड़ देंगे तथा इनके भोगने में बहुत तीव्र राग करना पड़ता है जिससे दुर्गति हो जाती है तथा इसीलिए इन भोगों को विद्वानों ने निन्दा योग्य बुरा समझा है ।

श्री शुभचन्द्राचार्य ने भी ज्ञानार्णव में कहा है— अतृप्तिजनकं मोहह्वाषवन्हेर्मले धनम् ।

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:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2444.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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