तत्त्वज्ञान उत्तक
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प्रश्न 1- पहले उत्तर के अंतिम अक्षर से ही दूसरा उत्तर शुरू होना चाहिये।
[1] 6 अंगुल बराबर एक नाप = प…
[2] नंदीश्वर द्वीप मे एक पर्वत का नाम = …
[3] चित्रा पृथ्वी का एक भाग = …
[4] नापने का सबसे बड़ा प्रमाण = …
[5] खर भाग की 16 पृथ्वीयो मे से
एक पृथ्वी का नाम = …
[6] 16 स्वर्गों मे से एक स्वर्ग का नाम = …
[7] जम्बूद्वीप की 14 नदियों मे से
एक नदी का नाम = …
[8] एक वात वलय का नाम = …
[9] सुमेरु पर्वत पर स्थित एक वन = …
[10] एक संहनन का नाम = …
प्रश्न 2- पहिचानो मैं कौन हूँ।
[1] ज या र्ध वि
[3] य त ल वा व
[5] र णी स पि व अ
[7] री क मु गि ता
[9] प्र बुं अ ध ति द
[2] म वि प्र त त त र
[4] त द ज नु ग
[6] द ख जी र शि स म् मे
[8] त द अ र थ ण् ड व न
[10] ति वि स अ म् ग थि भ
प्रश्न 3- आओ खेले संख्या से
[1] नरक मे अकृत्रिम चैत्यालय = …
[2] सोमनस वन की ऊंचाई = …
[3] अचल मेरु की ऊंचाई = …
[4] 11 वा द्वीप कितने योजन का है = …
[5] सौधर्म इंद्र की पत्नियां = …
[6] रांवायां मे कितने पद है = …
[7] पृथ्वी काय सम्बन्धी कितनी योनिया है = …
[8] 406 जीवसमास मे कुल मनुष्य सम्बन्धी जीवसमास = …
[9] घाति कर्म मे सर्व घाति प्रकृतिया कितनी है = …
[10] 6वे नरक के बिलो की संख्या कितनी है = …
शिन 4- टन टन टन टन टेलिफोन, सिद्धप्रभु का आया फोन…
मै से
[1] 4608362528 = पंच परमेष्ठी
रिरहत 46 सिद्ध08 आचार्य 36 उपाध्याय 25 सर्व साधु 28
[2] 5928529342
[3] 5120150253
[4] 3361206021
[5] 35101222512
[6] 0706061421
[7] 8005020507
[8] 2091821003
[9] 3904452440
[10] 856974810
[11] 130970531
प्रश्न 5- सही विकल्प चुनो।
[1] वज्रधर स्वामी कौनसे द्वीप में रहते है?
[a] धातकी खंड [b] पुष्करवर द्वीप
[2] पहले नरक के नारकियों की ऊंचाई कितनी है?
[a] 7 धनुष 6 हाथ 3 अंगुल -
[b] 7 धनुष 3 हाथ 6 अंगुल
[3] 9वे ग्रैवेयक की उत्कृष्ट आयु कितनी है?
[a] 31 सागर [b] 21 सागर
[4] घाति कर्म की प्रकृतिया कितनी है?
[a] 47 [b] 48
[5] दुसरा काल कितना बड़ा होता है?
[a] 2 कोडाकोडी सागर [b] 3 कोडाकोडी सागर
[6] भवन वासी कितने प्रकार के होते है?
[a] 8 [b] 10
[7] कितने कर्मों का उपशम होता है?
[a] 1 कर्म [b] 8 कर्म
[8] समवशरण में कितनी सीढ़ियां होती है?
[a] 2000 [b] 20000
[9] करण परिणाम है।
[a] सम्यक्त्व सहित [b] मिथ्यात्व सहित
[10] पर्याप्ति कितनी होती है?
[a] 6 [b] 7
प्रश्न 6- निम्न प्रश्नो के उत्तर लिखो।
1] सातवें नरक से निकला जीव नियम से कौनसी
गति में जाता है?
2] भद्रशाल वन कौनसी पृथ्वी पर है?
3] सौधर्म ऐशान के कितने विमान होते है?
4] साधुओं के विघ्न दूर करना क्या कहलाता है?
5] पर्याप्ति कैसे प्रारम्भ तथा कैसे अंत होती है?
7] तदुभय किस तप का भेद है?
8] सिद्धशिला का विस्तार कितना है?
9] दूसरों के द्वारा त्यागे स्थान में निवास करने को क्या कहते
?
10] पारिणामिक भाव के कितने भेद हैं?
आधार तत्वार्थसूत्र
Serial number:- 01057
नाम:- …
पिता/पति का नाम:- …
दूरभाष:- …
पता:- …
प्रश्न 1:- 1. … 2. … 3. …
4. … 5. … 6. …
7. … 8. … 9. …
10. …
प्रश्न 2:-1. … 2. … 3. …
4. … 5. … 6. …
7. … 8. … 9. …
10. …
प्रश्न3:- 1. … 2. … 3. … 4. …
5. … 6. … 7. … 8. …
9. … 10. …
प्रश्न4:- 1. …
2. …
3. …
4. …
5. …
6. …
7. …
8. …
9. …
10. …
प्रश्न5:- 1. … 2. … 3. …
4. … 5. … 6. …
7. … 8. … 9. …
10. …
प्रश्न6:- 1. … 2. … 3. …
4. … 5. … 6. …
7. … 8. … 9. …
10. …
नाटक - पूरब और पश्चिम
संचालक - अंकित जैन ‘निश्चल जैन’
(पं. अजयप्रसाद जी एवं उनके पड़ोस में रहने वाले सेठ लक्ष्मीदास जी बाल्यकाल से ही घनिष्ठ मित्र थे किन्तु एक तरफ पंडित जी सच्चे स्वाध्याय और भक्ति के प्रति अपना जीवन समर्पित करते हैं, वहीं सेठ जी व्यापार करते हुए परिग्रह जुटाने में लगे रहते हैं।)
पंडित जी का पुत्र ‘ध्रुव’ और सेठजी का पुत्र ‘सम्यक’ भी एक साथ एक ही Class में पढ़ते हैं। दोनों ही 10वीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। अब आगे देखिए क्या होता है।
प्रथम दृश्य
(पंडित जी और सेठ जी आपस में बातचीत कर रहे हैं।) तभी दोनों बालक खुशी-2 दौड़ते हुए आते हैं।
बालक - पिताजी! पिताजी! हम दोनों 10वीं में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गए।
सेठजी - शाबास! बच्चों! शाबाश! हमें तुम लोगों से यही आशा थी तुमने हमारे विश्वास को सच्चा ठहराया। अरे (सेठानी से) अरे भगवान! हम सभी का मुँह मीठा करवाओ। मिठाई लाओ
सेठानी - जी अभी लाई।
पंडितजी - अरे बच्चों! तुम दोनों उत्तीर्ण हो गए। जाओ जिनमंदिर में जाकर भगवान का नमस्कार करके आओ।
बच्चे - जी। (बच्चे जिनमंदिर चले जाते हैं।)
(सेठानी मिठाई लाती है व लोग मिठाई खाकर प्रसन्न होते हैं तभी …
दृश्य - 1
सेठजी: अरे भई! माई लाइफ। खूब के भविष्य के विषय में कोई विचार किया है या नहीं? वह आगे क्या करेगा, क्या पढ़ेगा?
पंडितजी: हाँ-हाँ भई! सोचा है। मैं तो अब अपने बुढ़ापे में होडरमल स्मारक महाविद्यालय में बैठूँगा। जहाँ से मेरा पुत्र विद्वान बनकर साक्षात्कार कर एक बहुत बड़ा विद्वान बनकर सामने रहेगा।
सेठजी: अरे भई! क्या रखा है होडरमल स्मारक में, क्या रखा है पंडितजी में! केवल मंदिर में ही देवता का प्रवचन ही तो करेगा। न तो कोई आजीविका का ठिकाना, न दुनियादारी का। मैं तो अपने बेटे को U.S.A. भेज रहा हूँ। U.S.A. में एक फौजी मि. जी अभी वहीं रहता है उसने मुझसे कहा कि मैं उसे वहीं भेजूँ ताकि वह वहाँ से पढ़कर बहुत बड़ा व्यापारी बने।
मुंशीजी: मैं तो कहता हूँ, तू भी अपने पुत्र को समय के साथ U.S.A. भेज दे।
पंडितजी: नहीं भाई नहीं। मुझे तो अपने बेटे को एक सात्विक विद्वान बनाना है। विदेशी लोग तो संस्कार से वंचित रह जाते हैं और यदि उसका पुण्य का उदय हुआ तो धन सम्मान प्रतिष्ठा, यश स्वर्ग ही उसके कदमों में झुकेंगे।
सेठजी: अरे छोड़ो ये पुण्य-पाप वगैरह की बातें। मुझे तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता। तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो। मैंने तो एक मित्र होने के कारण अपनी एक सलाह तुम्हारे सामने रखी थी।
(इस तरह सेठ जी अपने पुत्र सम्यक को U.S.A. भेज देते हैं और पंडित जी अपने बेटे को होडरमल स्मारक में भेज देते हैं। वे अपने-अपने स्थान पर अध्ययन करते हैं। जहाँ एक ओर खूब सम्यक में जैनदर्शन के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को अपनी तीव्र बुद्धि से समझाना है, संस्कारित होता है। अच्छा वक्ता, विद्वान अध्यापक बनता है। वहीं उसका मित्र सम्यक स्वयं को सम्यक कहलवाना पसंद नहीं करता, वह अपना नाम SAM (सैम) रख लेता है। वह पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति में ढल चुका है। वह सारी वासनाओं में प्रवृत्त रहता है। गलत संगति रखता है।)
(इस तरह दोनों 5 वर्ष पश्चात् अपने नगर में आते हैं और एक दूसरे से मिलते हैं।)
दृश्य - 2
ध्रुव: अरे सम्यक! जय जिनेंद्र! कितने दिन हो गए तुम्हें देखे हुए।
SAM: Hey dood! क्या नहीं पुराना जय जिनेंद्र। आजकल तो Modern world है। Hi, Hello का जमाना है।
ध्रुव: अरे सम्यक! तुम भूल गए क्या? पिताजी ने संबोधन में भी किसी का अभिवादन करने के लिए जय जिनेंद्र बोलना सिखाया था।
SAM: अरे! वो तो पुराना जमाना था। वक्त के साथ आदमी को भी बदलना पड़ता है। तुमने तो कहावत नहीं, सब कुछ बदल रहा है। मेरा नाम सम्यक-वम्यक नहीं है। मेरा नाम SAM है SAM।
ध्रुव: मित्र! तुम अभी मार्ग से भटक गए हो, स्टीव-2 सभी संसार का सबसे गलत रास्ते पर जा रहे हो।
SAM: गलत रास्ते पर मैं नहीं हूँ। क्या मिलेगा मुझे एक Teacher बनकर, उसे 10-15 हजार की Salary सैलरी और मेरे Business में मैं daily 2 लाख का कमाऊँगा। 2 Lacs. 2 Lacs
ध्रुव: अरे मित्र! कमाई 2 लाख की हो या 10 हजार की शुद्धि न्यास और ईमानदारी की हो तो हो ही टिकती है अथवा पानी की तरह बह जाती है। ये सब तो पुण्य पाप पर निर्भर करता है कि किसका वेतन —
SAM: बस-2, अपने प्रवचन मंदिर में देना, मुझे तुम्हारी फालतू की बातों को सुनने का समय नहीं है, मेरे पास लाखों काम हैं।
(इस प्रकार SAM ध्रुव की अवहेलना कर चला जाता है और ध्रुव ऐसा सोचता है कि यदि उसमें वर्तमान में समझने की योग्यता नहीं है, ऐसी काललब्धि नहीं है तो वह स्वयं क्या कर सकता है। ऐसा विचार कर वह स्वयं की तसल्ली देता है।)
(वे दोनों मित्र अपने जीवन को सफल बताते हैं तो हम सभी दोनों का दैनिक जीवन देखते हैं।)
सर्वप्रथम ध्रुव का जीवन देखते हैं।
दृश्य - 3
(प्रातः काल)
(ध्रुव जागता है, मुँह धोकर सामायिक करने बैठता है। वहाँ धोकर जिनमंदिर में देवदर्शन करने जाता है। वहाँ आधा घंटा स्वाध्याय कर वह घर घूम गया। घर से साधारण दूध नाश्ता कर विद्यालय में अध्यापन कार्य करने चला जाता है। वहाँ से आकर वह कुछ स्वाध्याय करने बैठ जाता है। शाम को जल्दी भोजन कर वह कटहल हुए मंदिर जाता है, वहाँ देवदर्शन, भक्ति कर प्रवचन करता है। घर आकर वह पू. गुरुदेव की सी.डी. सुनता है और रात्रि 10 बजे सो जाता है।)
(डरे खूब का जीवन एक बहुत ही साधारण, आदर्शपूर्ण एवं
शान्तिपूर्ण जीवन है। अब हम देखते हैं कि SAM का जीवन
किस प्रकार का जीवन है।
दूसरा-५
(सुबह 10 बजे रहे हैं। SAM की माँ उसे उठाने का
प्रयत्न कर रही है।)
सेठानी: अरे सम्यक्! सम्यक् !! उठ जाओ बेटा उठ जाओ। देखो
दश बज गए। सूरज सिर पर निकल आया।
SAM (उठकर): O Mom ! क्या सम्यक् सम्यक् लगा रखा है। मेरा
नाम SAM है SAM। सुबह सुबह उठकर मुझे करना
क्या है? लाओ मेरा ब्रेड और जैम लाकर दो।
सेठानी: अरे बेटा! पहले नहा धोकर जिनमंदिर में देव
दर्शन करके तो आओ।
SAM: क्या करती हूँ मंदिर में जाकर। फालतू का
समय बर्बाद क्यों करना। क्या मिलेगा मुझे
मंदिर में जाकर।
सेठानी: अरे बेटा! तू विदेश जाकर सभी धार्मिक संस्कार…
SAM: अरे! ओ हो। अब Mom आप मुझे समझाने मत
लग जाना। आप क्या जानो आज का जमाना
कहाँ से कहाँ जा रहा है।
सेठानी: ओ बेटा! मैं समझ गयी कि आज का जमाना
कहाँ जा रहा है।
SAM (गुस्से में): छोड़ो। जिसे देखो बस प्रवचन देने में
लगा है। बात तो कोई समझता ही नहीं।
(SAM वहाँ से गुस्से में चला जाता है। )
(SAM को वह अपने दोस्तों के साथ जुआ खेलने जाता
है। जुए के अड्डे पर क्या होता है देखिए।
(SAM और उसके सभी दोस्त बैठकर जुआ खेल रहे हैं।)
SAM बार-बार हारता जा रहा है।)
(देखा आपने यह है वास्तविक सच कि विदेश
आप विदेश जाएँ और उन्नति करें, इससे आपके
जीवन में कोई संकट नहीं आता परन्तु यदि आप
विदेश जाकर अपने संस्कारों की विस्मृत विद्या से
निश्चित ही आपके जीवन में संकट आएगा।)
इस नाटक का मूल उद्देश्य बस इतना ही है
यह हम कितने भी उन्नत हो जाएँ, धनवान हो जाएँ
किन्तु अपनी सभ्यता नहीं छोड़नी चाहिए। गलत
कार्यों में अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिए।
गुरु का सम्मान समारोह
प्रवचन खत्म होकर जिनवाणी स्तुति के पश्चात् एक
श्रोता मंच पर आकर 7
पहला श्रोता: अभी हमने पं. श्रुत शास्त्री जी के प्रवचन
सुने, वे प्रतिदिन इसी जिनवाणी का स्वाध्याय
करते हैं। अतः नगर की जैन समाज ने उन्हें
सम्मानित करने का निर्णय लिया है। हम
उन्हें समाज रत्न की उपाधि से सम्मानित करते
हैं। मैं समाज के अध्यक्ष सेठ धनदत्त जैन
जी से निवेदन करूँगा वे आवे और पण्डित जी
को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित करें।
(इस प्रकार गुरु का सम्मान होता है।)
कर्म विचारे ?
(राज दरबार लगा हुआ है, मंत्रीगण, दरबारी बैठे हुए हैं,
महाराज श्रीचन्द्र का दरबार में प्रवेश।)
द्वारपाल - (बुजुर्ग आवाज पर गति धीरे-धीरे) सावधान-
परम पराक्रमी, स्याद्वाद विशालबुद्ध महाराज
श्रेणिक पधार रहे हैं।
(सभी खड़े होकर, महाराजा का अभिवादन
करते हैं, महाराजा सिंहासन पर बैठकर सभी को
बैठने का इशारा करते हैं)
महाराजा - हे महामंत्री ! अपने राज्य में सर्व कुशलता तो है या
नहीं ?
महामंत्री - महाराज ! आप जैसे न्यायप्रिय, धर्मप्रिय, अनुशासन
प्रिय, प्रजावत्सल महाराज के शासन में कुशलता
न होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रजाजन आनंद सहित अपने-अपने धर्माचरण को
करते हुए, व्यापारदि कार्य अत्यन्त निर्भय होकर
कर रहे हैं।
महाराज - (प्रसन्नतापूर्वक) हे महामंत्री ! यह समाचार सुनकर
(कर्म विचारे १/४)
नेत्र कौन? नाटक में छः दृश्यों का परिचय ठीक ढंग से प्रस्तुत
किया गया है एवं अभिनव भगवान महावीर और उनकी अहिंसा में
भगवान महावीर का संक्षिप्त परिचय व अहिंसा के स्वरूप को स्पष्ट
किया है।
मैं लेखक नहीं हूँ, फिर भी लिखने का काम कर रहा हूँ। अतः
कलापक्ष व भावपक्ष दोनों में ही त्रुटियाँ होने की पूरी संभावना है, जिनके
भी ज्ञान में त्रुटियाँ आवे तो सूचित कीजिएगा। आप स्वयं भी सुधार कर
या परिवर्तन/परिवर्धन कर इनका तत्त्वरूपार्थ में उपयोग कर सकते हैं।
यदि तत्त्वज्ञान पक्ष या अन्य अवसरों पर ये संवाद संक्षिप्त होकर
कुछ ज्ञानवर्धन में सहयोगी बन सके तो निश्चित ही परिश्रम सार्थक होगा।
‘समर्पण’ प्रकाशन के लिए हार्दिक धन्यवाद, जिन्होंने इसे प्रकाशित
करवाकर मेरा उत्साहवर्धन किया है।
संपर्क-सूत्र
राजकुमार शास्त्री, ऋषभकुमार शास्त्री, अजितकुमार शास्त्री, पीयूष शास्त्री
(9414103492) (9425845620) (9414499549) (9785643202)
पल-पल चिंतन जाता है, बीता पल नहीं वापस आता है।
क्या तुम्हें खोया है? क्या तुम्हें पाया है? कर लो तू चिंतन सही।
क्योंकि आशा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो परचों में रहती टकी।
मोक्ष लोभ में तू भागता है, रजनों का संसार सतावा है।
ये सब छलावा है, ये सब भुलावा है, कर ले तू चिंतन सही।
क्योंकि आशा अनंत गुणों का धनी…। रा.1।
देख-शास्त्र-गुरु शास्त्र मिली तुझको, जिनवाणी की राह मिली हमको।
अब भी न संभला गर, मौका ये चूका गर
भव-भव में पछतायेगा, क्योंकि आशा अनंत गुणों का धनी…।
-बाबूलाल पाटनी, कोलकाता
महाराज
- मैं प्रश्न हुआ। हे सेनापति! अपनी राज्य की सीमाओं के बारे में क्या समाचार है ?
सेनापति
- महाराज! आपके पराक्रम को देखते हुए पड़ोसी राज्य अपने तक ही सीमित हैं, कोई अपने राज्य की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। सेना 24 घंटे सावधान रहती है। राज्य के अन्दर भी डाकू-लुटेरों का अभाव है। प्रजा अत्यन्त शांति के साथ आपके शासन में लौकिक-लोकोत्तर कर्मों को सम्पन्न कर रहे हैं।
महाराज
- सेनापति! राज्य की शांति हेतु आपके द्वारा किये गये प्रयासों के बारे में सुनकर हम खुश हुए। हे महामंत्री! आज की इस सभा में कोई किसी का सताया हुआ दुःखी प्राणी हो, किसी पर अन्याय किया गया हो या फिर किसी भी कारण से असन्तुष्ट हो उसे प्रस्तुत किया जावे, ताकि हम उसकी समस्या का निराकरण कर उसे सन्तुष्ट कर सकें।
महामंत्री
- जो आज्ञा महाराज! आज जीवराज व कर्म के विवाद को प्रस्तुत किया जावेगा। प्रहरी! उन्हें प्रस्तुत किया जावे।
प्रहरी
- जीवराज हाजिर होऽऽऽ
- कर्म - बन्द पुद्गल हाजिर होऽऽऽ
महाराज
- विधि मंत्री! इन दोनों के बीच विवाद का कारण क्या है ? पेश किया जावे।
विधि मंत्री
- जो आज्ञा महाराज! महाराज जीवराज का कर्मराज पर आरोप है कि यह कर्म अन्यायी-अत्याचारी-लुटेरा है। यह आदिकाल से जीवराज को चार गतियों में घुमा-घुमा कर दुःखी कर रहा है, इस कर्म ने जीवराज के ज्ञानोप को चुरा लिया है। जीवराज का कर्मराज पर यह भी आरोप है कि ये कर्म उसे जानने, सुखी होने, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगट कर मोक्षमार्ग प्राप्त करने से रोकता है। जीवराज की आपसे न्याय करने की प्रार्थना है।
महाराज
- अरे! इतना अन्यायी भी क्या कोई हमारे राज्य में हो सकता है ? सेनापति इन आरोपों के संबंध में कर्म का क्या कहना है ? आप जरा संक्षेप में हमें बताइये।
सेनापति
- जो आज्ञा महाराज! है राजन् ! कर्मराज का कहना है कि मैं निर्दोष हूँ। मैं क्यों किसी को दुःखी करूँगा, मेरा जीव ने कुछ बिगाड़ा तो है नहीं जो मैं उसे परेशान करूँगा। जीव स्वयं ही अपने गुणों को भूलकर पुरुषार्थ हीनता से दुःखी हो रहा है और आरोप मेरे ऊपर लगा रहा है।
महाराज
- मामला बड़ा संगीन है। परन्तु सभी पक्षों को देख-सुनकर दूध का दूध और पानी का पानी (कर्म विचार को०/१)
किया जावेगा। हे जीवराज! आपको कर्म से क्या शिकायत है ?
जीवराज
- (रोते हुए) सरकार! मैं लुट गया, बरबाद हो गया। भव विकट वन में कर्म बैरी झूमझूम मेरी हयाँ 'लूट लिया सरकार इस दुष्ट कर्म बैरी ने लूट लिया। महाराज न्याय कीजिये। इस कर्म को फाँसी की सजा दीजिये।
महाराज
- (सान्त्वना देते हुए) जीवराज घबराओ नहीं। न्याय अवश्य होगा। जीवराज यह बताओ कि जब कर्म ने ज्ञानोप लूटा, तब तुम क्या कर रहे थे ? तुमने उसे रोका क्यों नहीं ? तुम सावधान क्यों नहीं हुए ?
जीवराज
- (हाथ जोड़ते हुए) क्षमा करें महाराज! अकेला ही हूँ मैं, कर्म सब आये सिपट के।" मैं आठ में अकेला, इनकी 148 की गैंग है महाराज! मैं इनसे कैसे मुकाबला कर सकता था ?
महाराज
- महाराज! मैंने तो इसके ज्ञान को देखा ही नहीं, तब चुराने की तो बात ही बेकार है। यह मेरे और मेरे परिवार पर झूठ ही आरोप लगा रहा है।
जीवराज
- इसी ने चुराया है सरकार। अब यह झूठ भी बोल रहा है। इसे कड़ी से कड़ी सजा दी जावे।
कर्म
- मैंने नहीं चुराया महाराज। मुझ पर झूठा आरोप लगाकर यह मेरी मानहानि कर रहा है।
जीवराज
- (मुझसे ये) अरे कर्म! मेरे ज्ञान को चुराकर, भव-भव में दुःख देकर, मुझे बरबाद कर अब ईमानदार बन रहा है।
महाराज
- (गुस्से में) शान्त हो जाइये! शान्त हो जाइये!
जीवराज (रोते हुए)
- “मैं प्रभु दीन अनाथ, ये मिल दुष्ट घने।” कियो बहुत बेहाल, सुनिये साहिब मेरे।" दया करके मेरा ज्ञानोप मुझे दिला दीजिये, मुझे इसके बंधन से छुड़वा दीजिये महाराज।
महाराज
- ठीक है, ठीक है; यहीं सभी के साथ न्याय होना है। किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
- अप्पण कुणइ कम्मं। आप यह बताइये कि आप … के साथ कब से रह रहे हैं ?
कर्म
- महाराज! मैं तो अनादिकाल से जीव के साथ रह रहा हूँ।
महाराज
- क्या आप जीव के साथ संसार में सब जगह रहते हो ?
कर्म
- जी सरकार।
महाराज
- आप जीव के साथ नरक में जाकर बहुत दुःख भोगते हो ?
कर्म
- दुःख। (आश्चर्य व्यक्त करते हुए) मुझे किस बात का दुःख, महाराज। दुःख तो जीव ही भोगता होगा।
- (कर्म विचार को०/२)
महाराज
- अच्छा तो जीव के साथ स्वर्ग में जाकर आनंद तो लेते होगे ?
कर्म
- (विस्मय से) आनन्द! यह आनंद किस चिड़िया का नाम है। ये सुख-दुःख स्वर्ग-नरक क्या है ? मुझे कुछ नहीं पता, महाराज।
महाराज
- अच्छा ये बताओ! यह जो आपके सामने खड़ा है वह कौन है ?
कर्म
- सरकार! मुझे अपना ही पता नहीं है कि मैं कौन हूँ, तो मैं ये कैसे बताऊँ कि यह कौन है ?
महाराज
- अच्छा जीवराज! आपको तो पता ही होगा कि ये सामने कौन है ?
जीवराज
- अरे महाराज! यही तो दुष्ट कर्म है, पुद्गल होते हुए भी मुझे घुमा-घुमा कर ‘कबहूँ तरु निगोद, कबहूँ नरक दिखाये, सुर-नर पशु गति माँहिं बहुविधि नाच नचाये। जिन कारण जग बंधु, यदुविधि वैर लियो जी।’ इन्हें तो कभी नहीं भूल सकता सरकार।
महाराज
- अरे! आप तो इन्हें अच्छी तरह जानते हैं। तो फिर अब आप ही बताइये कि आप कौन हैं ?
जीवराज (रोते हुए)
- मैं महाराज ? मैं तो जीव हूँ, दुखिया हूँ, चारों गतियों में भटक रहा हूँ। परेशान हूँ महाराज।
महाराज
- अच्छा तो जीवराज! जरा अब आप यह भी बतायें कि नरक में आपको क्या-क्या कष्ट प्राप्त हुए ?
जीवराज
- हे महाराज! कुछ मत पूछिये। (रोते हुए) इन कर्मों ने मुझे जब नरक में पटका महाराज, तब - “जहाँ भूमि परसत दुःख इसो, बिच्छू सास ठगों नहीं तिसो।” ‘तहाँ राध श्रीजित वाहिनी, कुधि कुल कलित देह दाहिनी।’ (पंकियों को पाकर नहीं, संवाद की तरह धीरे-धीरे पढ़ा जावे।) और सरकार - “सिंधु नीर तैं प्यास न जाय, तो पय एक न बूंद न सहाय। तीन लोक को गजउ खाय, मिटै न भूख कणा न सहाय।।” सरकार इस दुष्ट कर्म ने एक-एक बूंद पानी और एक-एक दाने को तरसाया। महाराज अब आपसे ही न्याय की आशा है - “जब आवो तुम पास सुनि सुन सुबस तिसरो। नीति-निपुण जगराय कोजे न्याय हमारो।।”
महाराज
- (मुस्कुराते हुए) अरे भाई जीवराज! तो स्वर्ग का आनंद भी तो ये कर्म ही दिलाते होंगे। उनके बारे में भी तो कुछ बताओ।
जीवराज
- आनन्द! ओ कहो महाराज! जैसे-जैसे बड़े मेहनत से, तप-त्याग के कष्ट सहन करके स्वर्ग पहुँचाता हूँ, थोड़ा सा मजा आता है कि ये दुष्ट (कर्म को तरफ इशारा करके, गुस्से में देखते हुए) वहाँ भी आ टपकता है और समय हो गया की घंटी बजा देता है। वहाँ से मुझे टपका कर स्यात्काय पेढ़ पौधे में रहने को सजा दे देता है। महाराज! मजा कम सजा ज्यादा है। ऐसे दुष्ट कर्म को महाराज कठोर सजा देने को कृपा करें।
महाराज
- अच्छा जीवराज! ये कर्म लुटेरे हैं, चोर हैं, इन्होंने तुम्हें स्वर्ग में भ्रमाया, नरक में रुलाया, दुःखी किया, ये तुम्हें कैसे फँसा है? जबकि इन कर्मों को तो कुछ पता ही नहीं है।
जीवराज
- अरे सरकार! ये सब, कर्म कैसे जान सकते हैं, यह तो मेरे मूर्ख हैं, जड़ हैं। (अहंकार से) मैं तो यह सब अपने ज्ञान से जानता हूँ। इस विश्व में एकमात्र मैं ही तो समझदार हूँ।
महाराज
- (गुस्से में) श्रीमान् जीवराज! अभी आपने स्वयं कहा कि मैं अपने ज्ञान से जानता हूँ। इसका मतलब तुम्हारा ज्ञान तुम्हारे पास से है और जबरदस्ती तुम कर्म पर आरोप लगा रहे हो कि इसने मेरा ज्ञानपन चुरा लिया। आप झूठ बोल रहे हो। सजा आपको ही मिलेगी।
जीवराज
- अरे नहीं-नहीं महाराज! मैं तो लोकलोक को जानना चाहता हूँ, परन्तु ये कर्मराज के दुष्ट बेटे ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी मुझे पूर्ण ज्ञान हो नहीं होने देते। वे अतराय तो और अधिक खतरनाक है मैं कुछ लेना-देना, भोगना चाहता हूँ वहाँ टाँग अड़ा देता है। ये छोटा बेटा वेदनीय तो पक्का बदमाश है, जब देखो कभी पेट दर्द, कभी सिर दर्द, कभी ब्लड प्रेशर तो कभी शुगर, कैंसर जैसी बीमारियों से जीना हराम कर देता है। ये सब हो मेरे दुःख के कारण हैं, महाराज! न्यास कीजिये इनसे छुटकारा दिलाइये।
महाराज
- अच्छा जीवराज! आप अपने पक्ष में कोई गवाह पेश करना चाहेंगे?
जीवराज
- जी महाराज! मैं अपने पक्ष में श्रीमान् व्यवहारचन्द को प्रस्तुत करना चाहूँगा।
महाराज
- व्यवहारचन्द को हाजिर किया जाये।
प्रहरी
- व्यवहारचन्द हाजिर होऽऽऽ
(व्यवहारचन्द हाजिर होता है)
महाराज
- क्यों व्यवहारचन्द आपने कर्म को जीव के लिए सुखी-दुःखी करते एवं संसार परिभ्रमण कराते देखा है।
व्यवहारचन्द
- जी महाराज! अरे यह कर्म ही जीव को अनादिकाल (कर्म विचारो को०/१४)
से दुःखी किये हुए है, इसका वे अज्ञावरण नाम का बेटा इस जीव को समझ नहीं होने देता, जितना जानता है, उसमें भी भ्रम पैदा कर देता है। इसका सबसे खतरनाक बेटा मोहनीय यह तो इसे मोहित करके मोक्षमार्ग में कदम ही नहीं रखने देता, वस्तुरूप हो ही नहीं समझने देता। किसी से राग किसी से द्वेष कराकर नये कर्म बंध कराके संसार में घुमाता है।
जीवराज
- (प्रसन्न होते हुए) बिल्कुल सही कह रहा है महाराज।
व्यवहारचन्द
- इस जीव को यही कर्म चारों गतियों में पटक-पटक कर रुलाता है, दुःखी करता है। मैं तो 24 घन्टे देखता हूँ, कि ये कर्म सारे परिवार सहित जीव को धोपकर कटु देते हैं, ये कर्म ही जीव को बनाते, उठाते, सुलाते हैं।
महाराज
- कर्मराज! क्या आप भी अपने पक्ष में किसी पक्षकार को प्रस्तुत करना चाहेंगे?
कर्म
- हाँ महाराज! मैं अपने पक्ष में नीर-क्षीर विवेकी श्रीमान् निश्चयकुमार को प्रस्तुत करना चाहूँगा।
महाराज
- निश्चयकुमार को हाजिर किया जाये!
प्रहरी
- निश्चयकुमार हाजिर होऽऽ (निश्चयकुमार नमस्कार करते हुए हाजिर होता है)
(कर्म विचारो को०/१४)
आपको राजसभा की शोभा बढ़ाने वाले ज्ञानवृद्ध पण्डित स्याद्वाद शास्त्री से परामर्श करके ही निर्णय किया जाये।
महाराज
- महामंत्रीजी! आपका यह सुझाव स्वागत योग्य है। पण्डित स्याद्वाद शास्त्रीजी आज तक सभी समस्याओं का समाधान करते आये हैं, मैं उनसे निवेदन करूँगा कि व्यवहारचन्द व निश्चय कुमार द्वारा किये कारणों का स्याद्वाद विधि के अधार से समाधान प्रस्तुत करें ताकि इस विवाद का हल निकालकर न्याय किया जा सके।
पण्डितजी
(नमस्कार करके) - हे न्यायप्रिय राजन्! जैन संविधान में किसी भी वस्तु के ऊर्ध्व में कथन करने के दो प्रकार हैं। जब पर्याय अपेक्षा या संयोगों या निमित्तों की अपेक्षा कथन करते हैं तो जिस प्रकार व्यवहारचन्द ने कहा है कि कर्म ही जीव को बांधता है, कर्म ही रुलाता, सुलाता, सुखी-दुःखी करता है, ज्ञान प्रकट नहीं होने देता, संसार में भ्रमण कराता है। ऐसा ही कहा जाता है।
पर यह सब औपचारिक कथन है, जब जीव दुःखी हुआ हुआ उस समय उनकी उपस्थिति का ज्ञान करने वाले कथन हैं।
महामंत्री
आगमवेदी पण्डितजी! यह तो व्यवहारचन्द
(कर्म विचारो को०/१५)
महाराज
- श्रीमान् निश्चयकुमार! आप जीव और कर्म के इस विवाद के संबंध में कुछ जानते हो तो अपना पक्ष प्रस्तुत करें।
निश्चयकुमार
- हे न्यायप्रिय राजन्! मैं इन दोनों के विवाद के संबंध में जो कुछ जानता हूँ, वह ज्यों का त्यों बताता रहा हूँ। महाराज! जीव का आरोप निराधार है। जिनवाणी का कथन है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जीव स्वयं ही दुष्कर, व्यापार, परिवार में समय नहीं निकालता, व्यापारिक कार्यों में व्यस्त रहकर आर्त्त-रौद्र परिणाम करके आकुलित होता है। अपनी अज्ञानता से स्वयं ही अपने सर्वज्ञ स्वभाव व अनंत सामर्थ्य को भूलकर अन्य पदार्थों को अच्छा-बुरा मानकर मोह-राग-द्वेष करके जन्म-मरण कर रहा है, और अपना दोष कर्म के ऊपर लगा रहा है। कर्म निर्दोष है, महाराज।
महामंत्री
- हे महाराज! ये व्यवहारचन्द एवं निश्चयकुमार ने जो जिनवाणी के अनुसार तर्क प्रस्तुत किये हैं, वे परस्पर विरोधी लग रहे हैं। परन्तु सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा किये गये कथन विरोधी तो हो नहीं सकते अतः इन कथनों के सही स्वरूप को समझने के लिए मैं महाराज से सादर निवेदन करूँगा कि
(कर्म विचारो को०/१५)
पण्डितजी
की बात हुई पर निश्चयकुमार ने इन सब बातों का निषेध किस आधार से किया है?
- हे तत्त्वजिज्ञासु महोदय! निश्चयकुमार ने वस्तु के सत्य स्वरूप का कथन किया है, जब जीव स्वयं अपनी पुरुषार्थ हीनता द्वारा अपनी अनादि अनंत शक्तियों को भुलाकर परपदार्थों में मोह-राग-द्वेष करता है, तब जीव की आकुलता होती है, दुःखी होता है, कोई परद्रव्य या कर्म जीव को दुःखी नहीं करते। वह कर्म जीवराज के ज्ञानपनरूपी संपत्ति का अपहरण नहीं कर सकते। क्योंकि सभी द्रव्य अपने स्वतन्त्रत्व में ही रहते हैं।
महामंत्री
- हे पण्डितप्रवर! व्यवहारचन्द एवं निश्चयकुमार के कथनों में इतना अन्तर क्यों है?
पण्डितजी
- हे शंकाष्ट भान! व्यवहारचन्द संयोग देखकर कथन कर रहे हैं, जिस तरह कमल का पत्ता जल में होने से जल में डूबा हुआ, डूबा हुआ दिखता है इसलिए वह जल से डूबा हुआ है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु निश्चयकुमार वस्तु स्वरूप को देखकर कथन करते हैं, वह वस्तुस्वभाव को देखते हैं जैसे - उसे कमल के पत्ते को स्वभाव से देखा जाये तो वह पानी को छूता ही नहीं, वह पानी में रहकर भी पानी से गीला नहीं
(कर्म विचारो को०/१६)
विधि मंत्री
होता। इसलिए ऐसा कहना कि कपाल का पता
पानी को नहीं छूता यह भ्रम सत्य है।
- हे विद्वत् शिरोमणि! हम इन दो प्रकार के वचनों
को सुनकर हम क्या अर्थ समझें?
पण्डितजी
- संबंधों को देखकर कथन करने वाले व्यवहारनय
के कथन औपचारिक हैं, अयथार्थ हैं अतः वह
जानने-सुनने योग्य तो है; पर श्रद्धेय नहीं। जबकि
वस्तुस्वरूप के अनुसार कथन होने से
निश्चयनय के कथन पारमार्थिक हैं, सत्यार्थ
हैं। वही श्रद्धेय है। ऐसा अर्थ समझना चाहिए।
मुझे बस इतना ही कहना है।
महाराज
- जीव और कर्म के आरोपों व उनके सम्बन्धों को
सुनने के बाद पण्डित स्याद्वाद कुमार द्वारा प्रस्तुत
सुन्दर स्पष्टीकरण सुनकर हम सभी इस निर्णय
पर पहुँचे हैं कि जीव अपनी भूल से ही दुःखी है।
अपनी भूल न स्वीकार कर यह जीव अपनी
सज्जनता दिखाने के लिए कर्म को जबरदस्ती
ही दोष लगा रहा है।
यह सभा इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि “कर्म
विचारें कौन, भूल जीव की अधिकाई।”
कि वह अपनी भूल सुधार कर अनिकाशन, अनंत
(कर्म विचारें कौन/१८)
दर्शन, अनंत सुख रूप अपने अनंत वैभव को
प्रकट करे अन्यथा चार गति का परिभ्रमण करना
पड़ेगा।
कर्म को इस राजसभा में विशेष घोषित किया
जाता है।
सभी
- न्यायाधीश श्रमिक महाराज की… जय हो।
दूत का प्रवेश
- हे महाराज! आपको जय हो, जय हो, जय हो।
आश्चर्य! महान आश्चर्य! नगर के चारों ओर
रत्नवृष्टि हो रही है, देवदुन्दुभी बज रही है, सुर-
गण नगर की ओर आ रहे हैं महाराज।
महाराज
- अरे यह तो सुखद समाचार है। इस तरह की
पुष्पवृष्टि, देवों का आगमन तीर्थंकर के
कल्याणकों में ही होता है। लगता है मुनिराज
महावीर स्वामी का केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई है
अतः देवगण आ रहे हैं। चलो हम सब भी इन
कल्याणक मनाने चलें।
बोलो भगवान महावीर स्वामी की जय हो।
(कर्म विचारें कौन/१९)
तीसरा दृश्य
नौकर - हाँ मुझे यह बात मंजूर है।
साधु - सोचो रे, एक बार फिर सोचो।
नौकर - खेतीछोड़ के सुख लिया एक बार नहीं एवं
बार सोचा लिया। अगर आप नहीं है
तो मैं घर छोड़कर के चला तैयार हूँ।
साधु - तो ठीक है मैं जैसा कहता हूँ तुम वैसा
ही करना। (ज्ञान में प्रश्न)
॥ तीसरा दृश्य ॥
नौकर - हाँ पर चोर पहला पर बैठा है, वह अपने
का नाटक कर रहा है अब उसकी आँखें
दुपट्टे से बंधी है।
बेटा - पिताजी ये यह इस बीच में।
पिता - पिता के हिस्से हुए, उसे न पिता की आस
जो भी रहे है, कुछ हो गई है।
फिर भी वह सो रहा है। - मेरी भी तो बिचारी
बेटा - हे! मेरे… देखो पिता भी उठ नहीं रहे।
अम्मा - प्यासा रही हूँ तो अब भी नहीं रहे।
पिता - अच्छा, लगता है ये मेरे ही हाथ से उठेंगे
(चार से) और पुतले को, कुछ हो गई चले
उसे।
बेटा - अरे अब उठ भी जाओ न। (प्रयत्न करते है)
नौकर - अरे वह तो उठ ही नहीं रहे।
बेटा - क्या हुआ इन्हें, (चेक करते हुए)
नौकर - ये तो साँस भी नहीं चल रही है।
पहला चोर
- १ चोर। १ मुनि १ वैद्य, १ पिता, १ पिता
दूसरा दृश्य
राधा - राधा का बच्चा है, १ चोर एक घर में चोरी कर
जा रहे है, पुलिस से घर में प्रवेश करते है।
- और चोरी करके बाहर जाते है।
पलायन - वहाँ। आज तो उपालंभ के व्यक्ति को
है, अगर दिन भी नहीं थी तो मैं
चलेगा।
२ चोर - हाँ भाई। बात तो सही है पर मैं सिर्फ
तुम्हारा भाई नहीं हूँ और अब अच्छा जब
तुम्हारा बुलाया होगा तब वह बहुत काम करेगा।
१ चोर - बात तो मेरी भी सही है, चलो हम फिर कभी
बातें पर मिलेंगे, आज आज-आज के कितने दिन
होते है हम आपस में कब बात करें।
१ चोर - ठीक है। तो तब रहा हम अपने काम तमाम
करो पर मिलेंगे। ठीक है ना।
१ चोर - ठीक है, चलो = विदा।
दूसरा दृश्य
पहले दृश्य के जैसा ही है।
नौकर - यहाँ से एक साधु आता है और कहता है,
साधु - अरे ये तुम क्या कर रहे हो।
नौकर - ये साधु (पास जाकर) चल मेरे पास से
१ चोर
-
यह लाठी से निकाल दे, अब जाना बहुत
मोल के घाट अगर देंगे।
साधु - मेरे बालक में एक साधु है जो पास आ
होगा, जो ये तो तुम्हारे सामने है, तो वह
सोती है तो यह तो लेले, अपने उठ जाता है
तो उठने का स्थान तो तुम यह बैठो।
१ चोर - नहीं मुझे यह सब नहीं चाहिए। अगर तुमको
पास उप पैसे या कोई आभूषण हो तो दे दो।
साधु - नहीं भाई, हमारे पास ये चीज नहीं है, जो
तो एक साधु है।
लेकिन यह बताओ तुम आप क्या
१ चोर - चोर-चोरी करेगा, डकैती तो करेगा नहीं।
तुम भी कैसा सवाल कर रहे हो।
साधु - तुम यह चोरी किस लिए कर रहे हो, इससे
तुम्हे क्या प्राप्त होगा।
१ चोर - अरे भाई बहन साधुओ के चक्कर में मैं
नहीं पड़ता हूँ, तुम ही पड़ो, ये ले चला, तुम
लिए मिलेंगे।
१ चोर - ठीक है। कब वहीं पर माना रात-8 बजे
हो तो साधु जी अब उठ तो ठीक
यह नहीं कि किस लिए कर रहा है। तो फिर
हम खाकर तुम को ही यह नहीं पे आगे
हम परिवार के चलाने के लिए कर रहा हूँ।
साधु - तुम मुझे के टाइम पर मदद कर
१ चोर - कर बाद। कोई सुने न तो मर सकता है। -
और नहीं तथा एकता है क्योंकि समाजवाद
में मिलता है कि
१) नैतिकता है, सत्य को या मुझे मोर धर्म ज्ञान
यह भावना मिलता है, हिम्मत हो तो धनवान
२) मैं हूँ ज्यादा समझी, मुझको सब समझन
यह भावना मिलता है, हिम्मत हो तो धनवान
किसी घड़ी यह बात मैंने अपने सरकार के
लिए इतना सब कुछ किया, बदले चोरों के
ने तो मेरे ऊपर ही ऐसे काम तो छोड़े है।
साधु - देख भाई नहीं होगा। सारा संसार स्वार्थी है
और लोग स्वार्थी है सब अपना। तू समझे?
मुझे भी लगता है, तो तुम्हारे साथ लगे
चोर - अच्छा ऐसी बात है तो मैं सिर्फ कार्य
बता दूँ कि मेरा परिवार मेरे साथ है, तो
फिर आप क्या दोगे।
साधु - जो तुझे चाहिए वो दे दूँ।
२ चोर - क्या तुम ये साथ मिलकर चोरी करोगे
क्या तुम अपना के घर का छोड़ सकोगे
साधु - हाँ बालक! अगर ऐसी बात है तो ठीक
है। मैं तुम्हारे साथ जाऊँगा अगर तुम मुझे
हुए तो। लेकिन
चोर - लेकिन क्या
साधु - लेकिन अगर तुम गलत हुए और मैं सही
हुआ तो तुम हर छोड़कर मेरे साथ
अंधेरे में रहोगे।
साधु: लेकिन जो यह दवाई पियेगा उसे यह
तो निश्चित हो जायेगा लेकिन जो दवाई
पियेगा वह मर जायेगा।
पक्षी: नहीं मैं यह दवाई नहीं
जरा बताओ कौन इसे पियेगा।
कुम्भी: अरे पुत्री, तुम पीजो तुम्हारे ये यह पिता
साधु: नहीं ये नहीं पी सकती, ये भली है।
और: और सीता है सब भाव से हमारी पत्नि
है और मुझे पापी की नौकरी करनी है।
मैं:
साधु:
साधु: अरे बापू जी आप तो ऐसे डरे है आप
ही तो मुझे ही गई आप पेंसिल अपने पुत्रों
के लिए आप इतना तो कर ही सकते है।
साधु: नहीं मैं क्या हूँ ये किसमें कहाँ है मैं
तो अर्थ साधन है। मुझे अभी पीना है
मैंने बस घर से जाना अगर मैं चला गया
तो फिर इस घर की देखभाल कौन करेगा।
इसलिए मैं तो अभी नहीं पी सकता हूँ।
साधु: अरे भाई तुम पी लो। उसको लो ये
अरे भाई है, इसे लो ये इतना रहा रहे
मैं तो तुम तो बस दवाई को पी लो
अरे मैं कैसे पी लूँ मुझे जहर से इसे
पीने से मैं मर जाऊँगा।
फकीर: अरे साधु जी, जहर पी लेने से डर ही
नहीं रहे।
अरे यह क्या कर रहे हो कोई लालची है
तो कोई न, मर जाऊंगा।
साधु: अरे यह। क्या हुआ
मैं: अरे अब ये देखना न क्या डर सबको
से अब डर ही नहीं रहे।
साधु: अरे यह तो वास्तव में गलत है।
(सब देख कर)
मैं: पिताजी इसलिये मर है।
जब तक बिन ये क्या करेंगे। इसलिए
तो दुनिया में समझ क्या करेंगे। इन सब से
मैं क्या करूँ। अब भी जाओ। मुझे तो
किसी से कोई मतलब अब मैं कोई बात
नहीं कहूँगा। आप तो जाओ न।
भाई: चलो जाओ। गलत बात छोड़ो जाओ।
मैं: अरे देख लो। ये मुझको पसंद भी ही नहीं
रहे इनके संबंध सब बन्द है। इनसे
अर्थ में कोई बात भी नहीं करूँगी।
भाई: नहीं ऽऽऽ ये नहीं हो सकता मुझे तो
छोड़कर नहीं जा सकते हो तो मुझे तो
हो अगर ये नहीं रहे तो मैं पहले कैसे
करूँगा। अकेला उसे।
(पिता को देखकर)
साधु: साधु क्या उसे क्या हुआ
मैं: क्या हुआ है इन्हें पता है न
साधु: बताया है, इन्हें बहुत बड़ी बीमारी हो गई
है जिसे बचना मुश्किल है।
मैं: तो क्या यह नहीं बच पाएंगे।
साधु: मैंने यह कहा है कि इन्हें बचाना मुश्किल
है नामुमकिन नहीं। मेरे पास एक ऐसी
दवाई है जो इनको पहले से ही जीवित हो
जाएगी।
मैं: तो वह दवाई दीजिए न।
साधु: मैं मेरी पहले पूरी बात ध्यान से सुनिए
वह दवाई ये नहीं पियेंगे इस दवाई को
जहर को में से कोई एक लोग पियेगा और
वह व्यक्ति ही मरेगा।
“चलो जाओ। गलत बात छोड़ो जाओ।”
“जो भी स्वभाव में पानी लेकर भरती है।”
साधु: दवाई निकाल कर ग्लास में डालता है।
पुत्रों दवाई तैयार है अब कौन कौन इसे
लेकर है, कौन पियेगा
सभी लोग: मैं पियूँगा इसे। मैं
साधु: एक बात कान खोलकर सुन लो यह दवाई
जो पियेगा उससे ये तो जीवित हो मर
दौड़ित दवाई
मैं: लेकिन, लेकिन क्या लेकिन
सारा देखकर रह जाती है और ये
प्यासे गये, तो फिर मैं क्या करूँगी।
आपका सवाल था। तो मैं सभी रहकर
दूसरे यहाँ कर चुकी मगर वह नहीं
पी सकती है।
साधु: आप लोगों में से कोई एक भी पी रहा
है, तो मैं अब में ही बस पी लेता हूँ।
सभी लोग: हाँ पी लो आप ही पी लो
साधु: (पीकर पिता को उठाकर चलने लगता
है और कहता है)
अरे भाई देख लिया न कितना स्वार्थी संसार है,
अरे तुम्हारे अपने ही तुम्हारे साथ न
दे सकें तो ये तुम्हारे अपने कैसे ये
तुम्हारे अपने नहीं है।
मैं: चुप चुप रहो।
“अरे एक भी अब ठीक हो जाये यह
दवा पी लो।”
(सभी लोग - अब ठीक हो गए)
मैं: हर रहो तुम लोग।
मैंने देख लिया है सभी करवाती है।
ये यह नाटक कर रहा था। मुझे ड़र
नहीं हुआ था। साधु अभी तक एकदम
ठीक थे। कोई भाव में यहाँ नहीं रहेगा।
एक मैं आपके साथ चलूँगा चाहे।
(सभी लोग रो रहे है।)
अब चला जाओ। ये इसी गाँव में
बैठो रो-रोके कोई मुझे से मिलते
क. अनिल पी परखी
जयपुर
08875628743
(सोम काँट)
धनीराम- ओ आप क्या कर रहे हैं, पकड़ने नीं!
क्या मुझे अपने बेटों पर इतना भी
विश्वास नहीं।
ज्ञानचन्द- बस विश्वास की नहीं बात सेवा की है
सभी माँ बाप अपने पुत्रों को सभी समझ
दान देते हैं परन्तु वृद्धावस्था में तो पुत्रों के
कर्ज पर अपने पिता-माता को सेवा नहीं
करने और करके व्यर्थ धकेलकर रोने के
लिए विवश कर देते हैं।
ज्ञानचन्द- नहीं नहीं। पश्चिम में जो आप सेवा
व सौचिर, खुशी डालते पुत्रों पर पूरा
भरोसा है।
ज्ञानचन्द- तो ठीक है कर दीजिए व्यवस्था।
‘दूसरा दृश्य’
स्थान- (धनीराम के बड़े बेटे जगत का कमरा)
जगत, तथा उसकी पत्नि बात
चीत कर रहे हैं, धनीराम चुपचाप सुन
रहे हैं।
जगत- (अपनी पत्नि से) मैंने कामसे कई बार कह दिया
है कि पिताजी का रहो खिलाना हम
(सोम काँट)
जगत- बस की बात नहीं।
जगत- देखो जरा समल के काम लो आज में
तीन महीने ही तो खिलाता हूँ।
पत्नि- तीन महीने तो क्या में तो अब एक घंटे
भी नहीं कर सकती, उन्होंने घास सा
धन दिया है तो इसको मतबल हम उन्हें
पूरी जिन्दगी खिलाते रहें, क्या! यदि
ऐसा है तो उन्होंने ऐसा प्रदर्शन ही
क्यों किया।
जगत- पर दुनिया क्या कहेगी कि उन्होंने इतने
सब कुछ दिया और हम उन्हें खाना भी
नहीं खिला सकते।
पत्नि- मगर दुनिया की बात में आयोगे तो
पार चौपट हो जायेगा, में कहती हूँ कि
आप अपने पिता को दूसरे भाइयों के
यहाँ-भेज दो वरना में तो अपने घर
चली।
जगत- नहीं नहीं तुम घर मत जाओ में अपने पिता
जी को अभी भेजता हूँ।
(सोम काँट)
(धनीराम के पास जाकर)
जगत- पिताजी
धनीराम- बेटा मैंने सब सुन लिया है, तुम्हारे
भेजने की जरूरत नहीं में स्वयं
चला जाता हूँ।
‘तीसरा दृश्य’
स्थान- मगन का घर, मगन और उसकी
पत्नि परस्पर बातचीत कर रही है।
धनीराम छन रहा है।
पत्नि- अजी तीनो आप अपने पिता जी से यह
क्यों कर सकते कि वे खाना अपने दोनों
बेटों के पास खाले!
मगन- यह कैसे हो सकता है धन तो हम चारों
की मिला है, न!
पत्नि- में कहती हूँ कि इसमें ऐसी बात क्या
है इसमें नहीं में पिता जी को खिलात-
कितनी खुशी हो गयी है। मेरा
आपको मेरा बिल्कुल भी ख्याल नहीं।
(सोम काँट)
मगन- रख्यात क्यों नहीं है
पत्नि- तो करो न अपने बूढ़े पिता से कि वे
कभी हमारे खाना खाले, वरना में तो
स्वार्थ पकड़ लूंगी।
मगन- नहीं-नहीं तुम ऐसा भूल से भी नहीं
करना। में पिता जी से कभी और रख्या
खान की बात पूछता हूँ।
धनीराम- (सुनते ही पिताजी अपने तीसरे पुत्र के
यहाँ चले जाते हैं और देखते हैं कि
इनमें सौहाद्र आना है और करहाइ है-
जीवन- पिता जी मेरी पत्नि एक महीने के
लिए मायके जा रही है अतः आप
किसी दूसरे भाई के यहाँ खाना खा लीजिए!
धनीराम- अच्छा बेटा
(रहा होने में है और रहने में मोहब
भी कहा जा जाता है)
मोहन- पिताजी मेरी शरकान (पत्नि) महीने से
नामार है इसलिए आप मेरे घर का
भोजन कर लीजिए!
(सोम काँट)
धनीराम- अरे मेरे भाई से कई बार कह दिया
जल्दी से ठीक करा।
धनीराम- (स्वयं से) अरे! वास्तव में
यह संसार स्वार्थी है मैंने काश
पंडित जी की बात मानी होती तो
आज ये ये दिन न देखते पडते, अब
में क्या करूँ।
में ज्ञानचन्द जी के पास
जाकर कुछ उपाय सोचता हूँ।
ज्ञानचन्द- आओ मित्र धनीराम क्या बात है।
धनीराम- (अपनी पूरी बात बता देता है)
ज्ञानचन्द- अब तो एक ही उपाय है कि तुम अपने
पुत्रों के मुझे एक धोखे से फसाकर
ताना लगाक रख दो जब तुम्हारे पुत्र
देखेंगे तो वे रोना का रख्याव कर के
धन लेने जरूर आयेंगे।
धनीराम- हाँ में तुम्हारे में उम्मीद मेरे रखो
मित्र हाँ अब में तुम्हारी पहले बात मान
लेता हूँ ठीक होगा।
(सोम काँट)
ज्ञानचन्द- कोई बात नहीं मित्र।
जो होता है सो निश्चित है केवल
तेगया है।
धनीराम- जाकर पंडित जी द्वारा बताई गई
विधि को अपनाता है और सो लेता है
और जब इसका इस प्रब वह निकलता
है और देखता है, तो अपने चारों भाइयों
को पाकर पिताजी की सेवा करने को कहते
हैं।
चारों एकसाथ- प्रणाम पिताजी
ज्ञानचन्द- सदा खुश रहो।
धनीराम- लो पिता जी भोजन करलो।
ज्ञानचन्द- (इस प्रकार चारों पुत्र कई दिनों तक सेवा
करते हैं और कुछ दिनों बाद पिता जी
को मृत्यु हो जाता है तो पुत्र रोने तो
नहीं है, बल्कि आपस में चर्चा करने
लगते हैं।)
जगत- लो ठीक रहा एक बड़ी बला तो टल
गई।
मगन- चलो अब पिताजी का अंतिम संस्कार करदे
और फिर मौज से शेष का बटवारा करें।
हमें स्वयं ही अपने पर गर्व होना चाहिये क्योंकि जब तक हम ही अपने कार्य को श्रेष्ठ नहीं मानेंगे, तब तक हम अन्य को भी नहीं बता/समझा सकेंगे।
जनसाधारण शास्त्री की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के संबंध में अनेक प्रकार की मिथ्या धारणायें रखते हैं। प्रस्तुत है इस संदर्भ में पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न और उनके सटीक उत्तर -
शास्त्री सम्बन्धी भ्रान्तियाँ/निराकरण
- अच्युतकान्त जैन
प्रश्न 1 : आप शास्त्री कर रहे हो यह तो ठीक, पर पढ़ाई क्या कर रहे हो ?
उत्तर : भाई साहब ! मैं शास्त्री की ही पढ़ाई कर रहा हूँ। आप जानते हैं शास्त्री की ग्रेजुएट डिग्री को देशभर में बी.ए. की डिग्री के बराबर मान्यता प्राप्त है।
चरित्र उपाध्याय = बारहवीं (हायर सेकेण्डरी)
शास्त्री = बी.ए. (ग्रेजुएशन)
यह संस्कृत में किया जाने वाला ग्रेजुएशन कोर्स है। जिस प्रकार कोई छात्र इतिहास विषय लेकर बी.ए. करता है, कोई कॉमर्स विषय लेकर बी.कॉम. करता है, साइंस विषय लेकर बी.एससी. करता है, उसी प्रकार हम जैनदर्शन विषय से शास्त्री करते हैं।
प्रश्न 2 : शास्त्री = आर्ट्स ?
उत्तर : नहीं, शास्त्री मतलब आर्ट्स नहीं होता है। यह स्वतंत्र ग्रेजुएशन कोर्स है, जिसे सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है।
प्रश्न 3 : तो क्या इसमें मात्र जैनधर्म/दर्शन ही पढ़ाया जाता है ?
उत्तर : क्या मात्र ! विषय वाला भी ग्रेजुएशन कोर्स होता है ? इसमें हम जैनदर्शन के साथ-साथ अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भी पढ़ते हैं।
हिन्दी व अंग्रेजी की जो किताबें सी.बी.एस.ई. बोर्ड में होती हैं, हम भी वे ही किताबें पढ़ते हैं।
प्रश्न 4 : फिर अन्य पढ़ाई में और इस पढ़ाई में क्या अन्तर है ?
उत्तर : ग्रेजुएशन की दृष्टि से देखा जाये तो कोई अन्तर नहीं है, दोनों का महत्व बराबर ही है, बस इतना अन्तर है कि
(1) हम संस्कृत से ग्रेजुएशन व बारहवीं करते हैं और अन्य विज्ञान, गणित आदि से।
(2) वे मात्र लौकिक पढ़ाई ही करते हैं, हम लौकिक-पारलौकिक (धार्मिक) पढ़ाई भी पढ़ते हैं।
(3) वे मात्र आजीविका हेतु पढ़ाई करते हैं, हम आजीविका के साथ-साथ अपने और दूसरों के पारलौकिक जीवन की उन्नति की और अग्रसर होकर अपना, परिवार, समाज का हित करते हैं।
प्रश्न 5 : संस्कृत ही क्यों पढ़ रहे हो ? कुछ और क्यों नहीं ?
उत्तर : (1) हमारे जैन आगम/ग्रन्थ संस्कृत में ही लिखे गये हैं, आचार्यों के मूल अभिप्राय को समझने के लिये हम संस्कृत पढ़ते हैं।
(2) आज संस्कृत की उपयोगिता ले हर कोई जानता है, अभी-अभी स्मृति ईरानी (मानव संसाधन विकास मंत्री) ने
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3491.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है