स्वाध्याय बाल शिक्षा भाग-३ — जैन स्वाध्याय सामग्री | Swadhyay Bal Siksha Bhag-3

स्वाध्याय बाल शिक्षा भाग-३

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स्याद्वाद
बाल शिक्षा

भाग-३

॥ श्री वीतरागाय नमः ॥

स्याद्वाद बाल-शिक्षा
तीसरा भाग

  • लेखिका *
    गणिनी आर्यिका श्री १०५ स्याद्वादमती माताजी

भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्

भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद् पुष्प संख्या-१३९

आशीर्वाद : प.पू. आचार्य श्री १०८ विमलसागरजी महाराज
प. पू. आचार्य श्री १०८ भरतसागरजी महाराज

संयोजन : आर्यिका श्री १०५ यशस्विनी माताजी

ग्रन्थ : स्याद्वाद बाल शिक्षा (भाग-३)

लेखिका : गणिनी आर्यिका श्री १०५ स्याद्वादमती माताजी

संस्करण : बाईसवाँ

वीर निर्वाण सम्वत् २०३९ सन् २०१३

सर्वाधिकार सुरक्षित :

प्रकाशक : भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्

पुस्तक प्राप्ति स्थान : (१) गणिनी आर्यिका स्याद्वादमती माताजी संघ
(२) आचार्य विमल भक्त साहित्य सदन
सम्मेदशिखरजी
(३) श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मन्दिर
डी-२१०, श्यामपार्क एक्सटेंशन
महावीर वाटिका, साहिबाबाद (उ.प्र.)

मूल्य : सदुपयोग

मुद्रक : सुभाष ऑफसेट
मदनगंज-किशनगढ़ (राज.)
फोन : ०१४६३-२४२१२१

अनुक्रमणिका

प्रार्थना … ३
१. नवदेवता स्तवन … ४
२. सुप्रभात स्तोत्र … ६
३. कर्म … ८
४. पाक्षिक श्रावक के अष्टमूल गुण … १६
५. आवश्यक … २३
६. सम्यग्दर्शन … २९
७. आलोचना पाठ … ३८

प्रार्थना

हे वीतराग स्वामी, नित प्रार्थना हमारी।
अज्ञान को तजें हम, बन ज्ञान के पुजारी।।

हिंसादि पाप तजकर
सत्यपथ ये हम चलेंगे,
क्रोध कषाय तजकर।
समभाव हम धरेंगे।।१।। हे वीतराग०

माता पिता की सेवा
भक्ति गुरुजनों की,
प्रातः सुजल्दी उठकर।
नित करेंगे ईश भक्ति।।१।। हे वीतराग०

दो नाथ हमको शक्ति
तुम सम बनेंगे हम भी,
दुःखियों की सेवा करके।
पायेंगे आत्म शक्ति।।१।। हे वीतराग०

नव देवता स्तवन

दोहा

परमेष्ठी पाँचों नमूँ, जिनवाणी उरलाय।
जिन मारग को धारकर, ध्येय चैत्यालय ध्याय।।
(तर्ज—अहो जगत् गुरु देव सुनियो-----)

अरहंत प्रभु को नाम, है जग में सुखदाई।
पाति चत्तु क्षयकार, केवल ज्योति पाई।
वीतराग सरवज्ञ, हित उपदेशी कहाये।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित भक्ति सुखाये।।१।।

सिद्ध प्रभु गुणखान, सिद्धि के हो प्रदाता।
कर्म आठ सब काट, करते मुक्ति वासा।।
शुद्ध बुद्ध अधिकार, शिव सुखकारी नाथा।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित मोहे माथा।।२।।

आचार्य गुणकार, पञ्चाचार को पाले।
शिक्षा दीक्षा प्रधान, भविजन के दुख टाले।।
अनुग्रह निज काज, मुक्ति मारग चलावे।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो आचारज भजावे।।३।।

ज्ञान ध्यान लवलीन, जिनवाणी रस पीते।
अध्ययन शिक्षा प्रदान, संघ में जो नित करते।।
रत्नत्रय गुणधाम, उपदेशामृत देते।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित उवज्झाय भजते।।४।।

दर्शन ज्ञान चरित्र, मुक्ती मार्ग कहाये।
तिनप्रति साधन रूप, साधु दिगम्बर भाये।।
विषयाशा को त्याग, नित आतम चित्त धारे।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित साधु ध्यावे।।५।।

तत्व द्रव्य गुण सार, वीतराग मुख निकसी।
गणधर ने गुणधार, जिनमाला इक गूंथी।।
‘स्याद्वाद’ चिह्न सार, वस्तु अनेकान्त गाई।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिनवाणी ध्याई।।६।।

सम्यक् श्रद्धा सार, देव शास्त्र गुरु भाई।
सम्यक् तत्व विचार, सम्यक् ज्ञान कहाई।।
सम्यक् होय आचार, सम्यक् चारित गाई।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो जिन मारग ध्याई।।७।।

वीतराग जिनबिम्ब, मूरत हो सुखदाई।
दर्पण सम निजविम्ब, दिखता जिसमें भाई।।
कर्म कलंक नशाय, जो नित दर्शन पाते।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित चैत्य को ध्याते।।८।।

वीतराग जिनबिम्ब, कृत्रिमकृत्रिम जितने।
शोभत है जिस देश, है चैत्यालय उतने।।
उन सबको जो सार, भक्ति महिमा गाई।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो चैत्यालय ध्यावे।।९।।

दोहा

नव देवता को नित भजे, कर्म कलंक नशाय।
भव सागर से पार हो, शिव सुख में रस जाय।।

नोट—प्रतिदिन प्रातः पाठ करने से जीवन सुख, शान्ति और समृद्धि
को प्राप्त होता है।

स्वाध्याय बाल शिक्षा ४ भाग ३
स्वाध्याय बाल शिक्षा ४ भाग ३

२-सुप्रभात स्तोत्रम्

यः स्वगीतरत्नावे यदभ्यञ्जनाभिषेकोत्सवे,
यददीक्षाप्रणमोत्सवे यदखिलज्ञानप्रकाशोत्सवे।
यद्विद्यागममोत्सवे जिनपः, पूज्यस्तदंतः सर्वथा,
संगीतस्त्वमितिः प्रसरतो मे सुप्रभातत्वः।।१।।

श्रीमन्नमतामरौघकिरीटमणिप्रभाभि-
रालोकाद्युद्गत।
श्रीनाभिन्दननन्दन ! जिनाजितशमवालय,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।२।।

छद्मप्रक्षयवत्समयीजमान,
देवाभिनन्दन मुने ! सुमते जिनेंद्र।
पद्मप्रभामृतघृतितिसुगुण,
स्वद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।३।।

अहं सुपार्श्व कदलीदलवर्णगात्र,
प्रालेयांतरितगिरिकर्णगौर।
चन्द्रप्रभ स्फटिकप्रभुर
पुष्पदन्त !
सुप्रभातम्।।४।।
सप्तजाकाञ्चनरुचे जिन शीतलाख्य,
श्रेयान्दिगम्बरिद्विहृल्कलंक।
बन्धुकस्त्वसुरख जिन वासुपूज्य,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।५।।
उद्दण्डदर्पकरिपो विमलामलीग,
स्थैर्यान्तर्धृत-जिनवत्सुबुधारा।
दुष्कर्मकल्पविर्धवत
धर्मनाथ,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।६।।
देवागरीकुसुमसंक्रिम
शान्तिनाथ,
कुन्थु। दयागुणविभूषणभित्ताग।
देवाधिदेव
भगवत्स्तीर्थनाथ,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।७।।

यम्मोहमल्लदमज्जन
मल्लिनाथ,
क्षेत्रकार्यविघ्न
शासनसुव्रतख।
सत्समदा प्रशमितो
नमिप्रमेय,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।८।।
तापिच्छप्रख्यविर्धज्ज्वल
घोरोपवर्गविर्धन्।
स्याद्वादसुरक्षितिपूर्ण
वर्धमान,
लद्धानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम्।।९।।
प्रात्यन्तरीलहरिकणपीतभास,
यद्युत्तिमयसुखखास्रव
व्याप्ति। सत्ततिसंततं
जिनवल्लभानां,
सुप्रभातम्।।१०।।
सुप्रभातं सुनक्षत्रं, मांगल्यं परिकर्तितम्।
चतुर्विंशतितीर्थानां, सुप्रभातं दिने दिने।।११।।
सुप्रभातं सुनक्षत्रं, श्रेयः प्रत्यभिनन्दितम्।
देवताश्च मिथ्याः, सुप्रभातं दिने दिने।।१२।।
सुप्रभातं तबैकस्य, बुद्धयसम्यग्मनः।
येन प्रवर्तितं तीर्थं, भव्यसत्त्वसुखावहम्।।१३।।
सुप्रभातं जिनेंद्राणां, ज्ञानोन्मीलितचक्षुषाम्।
अज्ञानतिमिरध्वंसा, नित्यमस्तमितो रविः।।१४।।
सुप्रभातं जिनेंद्रस्य, वीरःकमलोलोचनः।
येन कर्त्वादौ दत्त्वा, शुक्लध्यानोपदेशनम्।।१५।।
सुप्रभातं सुनक्षत्रं, शुक्लध्यानोपसुर्गमम्।
त्रैलोक्यहितकर्त्तृणां, जिननामेव शासनम्।।१६।।

स्वाध्याय बाल शिक्षा ६ भाग ३
स्वाध्याय बाल शिक्षा ७ भाग ३

३-कर्म

प्रश्न १-कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जीव के रागद्वेषादि परिणामों के कारण जो कर्मरूप
पुद्गल वर्गणायें जीव के साथ बंध को प्राप्त होती हैं
उन्हें कर्म कहते हैं। अर्थात् जिनका निमित्त पाकर जीव
सुख-दुःख का अनुभव करता है उसे कर्म कहते हैं।

प्रश्न २-कर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर-कर्म के ३ भेद हैं-१-द्रव्य कर्म, २-नोकर्म, ३-भावकर्म।
द्रव्यकर्म के ८ भेद हैं-१-ज्ञानावरणीय २-दर्शनावरणीय
३-वेदनीय ४-मोहनीय ५-आयु ६-नाम ७-गोत्र
८-अन्तराय। इन आठों कर्मों में १-ज्ञानावरणीय
२-दर्शनावरणीय ३-मोहनीय ४-अन्तराय ये चार घातियाँ
कर्म हैं और १-वेदनीय २-आयु ३-नाम ४-गोत्र ये चार
अघातियाँ कर्म हैं।
नोकर्म-छः पर्याप्तियों और तीन शरीर के ग्रहण योग्य
पुद्गल परमाणुओं को नोकर्म परमाणु कहते हैं एवं
उनसे जिन छः पर्याप्त एवं तीन शरीरों की रचना होती
है उन्हें नोकर्म कहते हैं।
भावकर्म-रागद्वेष तथा क्रोधादि कषायें भावकर्म हैं।

प्रश्न ३-छः पर्याप्त एवं तीन शरीरों के नाम बताइये ?
उत्तर-१-आहार पर्याप्त २-शरीर पर्याप्त ३-इन्द्रिय पर्याप्त
४-श्वासोच्छ्वास पर्याप्त ५-भाषा पर्याप्त ६-मनः पर्याप्त
ये छः पर्याप्तियाँ हैं।
औदारिक शरीर, वैक्रियक शरीर, आहारक शरीर ये
तीन शरीर हैं। ये मिलकर नोकर्म होते हैं।

प्रश्न ४-ज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो आत्मा के ज्ञान गुण का घात करता है उसे ज्ञानावरण
कर्म कहते हैं। जैसे आकाश में बादल सूर्य को ढक देते
हैं। वैसे ही ज्ञानावरण कर्म जीव के ज्ञान को प्रकट नहीं
होने देता। इस कर्म के ५ भेद हैं-

स्वाध्याय बाल शिक्षा ९ भाग ३

१-मतिज्ञानावरण २-श्रुतज्ञानावरण ३-अवधिज्ञानावरण
४-मनःपर्ययज्ञानावरण ५-केवलज्ञानावरण।

प्रश्न ५-दर्शनावरण कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो आत्मा के दर्शन गुण का घात करता है उसे दर्शनावरण
कर्म कहते हैं। जैसे मन्दिर में भगवान के दर्शन को
इच्छा है पर पहरेदार बाहर ही रोक देता है अन्दर नहीं
जाने देता है उसी प्रकार यह कर्म जीव को आत्मा के
दर्शन नहीं होने देता है।
इस कर्म के नौ भेद हैं-१-चक्षुदर्शनावरण २-अचक्षु-
दर्शनावरण ३-अवधिदर्शनावरण ४-केवलदर्शनावरण
५-निद्रा ६-निद्रा-निद्रा ७-प्रचला ८-प्रचला-प्रचला
९-स्त्यानगृद्धि।

प्रश्न ६-वेदनीय कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिस कर्म के उदय से जीव सुख दुःख रूप आकुलता
को प्राप्त होता है उसे वेदनीय कर्म कहते हैं। जैसे-इष्ट
वस्तु को प्राप्ति होने पर, इच्छा की पूर्ति होने पर जीव
हर्ष को प्राप्त होता है और रोग होने पर अनिष्ट वस्तु की
प्राप्ति होने पर जीव दुःख को, आकुलता को प्राप्त होता
है।
वेदनीय कर्म के दो भेद हैं-१-साता वेदनीय २-असाता
वेदनीय।

प्रश्न ७-मोहनीय कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिस कर्म के उदय से जीव के सम्यक्त्व और चारित्रगुण
का घात होता है उसे मोहनीय कर्म कहते हैं। जैसे-
मदिरा को पीने वाला व्यक्ति नशे में माँ को माँ और
पत्नी को भी माँ कहता है। अपने को भूलकर पागल
समान हो जाता है। वैसे ही मोही जीव सम्यक्त्व और
चारित्र से गिर जाता है। इसके दो भेद हैं-१-दर्शन
मोहनीय २-चारित्र मोहनीय।
दर्शन मोहनीय हलाहल विष के समान है। इसके तीन
भेद हैं-१-मिथ्यात्व २-सम्यक् मिथ्यात्व ३-सम्यक् प्रकृति।
चारित्र मोहनीय कर्म भी एक जहर है। इसके २५

स्वाध्याय बाल शिक्षा ९ भाग ३

भेद हैं-१-अनन्तानुबन्धी क्रोध २-अनन्तानुबन्धी मान
३-अनन्तानुबन्धी माया ४-अनन्तानुबन्धी लोभ।
५-अप्रत्याख्यान क्रोध ६-अप्रत्याख्यान मान
७-अप्रत्याख्यान माया ८-अप्रत्याख्यान लोभ।
९-प्रत्याख्यान क्रोध १०-प्रत्याख्यान मान ११-प्रत्याख्यान
माया १२-प्रत्याख्यान लोभ १३-संज्वलन क्रोध
१४-संज्वलन मान १५-संज्वलन माया १६-संज्वलन
लोभ। १७-हास्य १८-रति १९-अरति २०-शोक
२१-भय २२-जुगुप्सा २३-स्त्रीवेद २४-पुरुष वेद
२५-नपुंसक वेद।

प्रश्न ८-आयु कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिस कर्म के उदय से आत्मा देव, नारकी, तिर्यञ्च और
मनुष्य शरीर में रुका रहता है उसे आयु कहते हैं।
जैसे-जेल (कारागृह) में जिस जीव को जितने दिन की
सजा है उतने दिनों तक वह बाहर नहीं जा सकता है।
उसी प्रकार आयु कर्म जीव को एक पर्याय में रोक रखता
है। आयु कर्म के ४ भेद हैं-१-नरकायु २-तिर्यञ्च
आयु ३-देवायु ४-मनुष्य आयु।

प्रश्न ९-नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिस कर्म के उदय से जीव का आकार नारकी, तिर्यञ्च,
देव, मनुष्य आदि रूप बनता है उसे नामकर्म कहते
हैं। जैसे-चित्रकार अनेक प्रकार के चित्र बनाता है उसी
प्रकार नामकर्म भी जीव के नाना आकार बनाता है।
नामकर्म के ९३ भेद हैं।
चार गति-१-नरक २-तिर्यञ्च ३-मनुष्य ४-देव।
पाँच जाति-१-एकेन्द्रिय २-द्वीन्द्रिय ३-त्रीन्द्रिय
४-चतुरिन्द्रिय ५-पंचेन्द्रिय।
पाँच शरीर-१०-औदारिक ११-वैक्रियक १२-आहारक
१३-तैजस १४-कार्माण।
तीन आंगोपांग-१५-औदारिक १६-वैक्रियक
१७-आहारक।
१८-निर्माण

स्वाध्याय बाल शिक्षा १० भाग ३

१९-आदि बंधन २०-औदारिक बंधन २१-वैक्रियक
बंधन २२-आहारक बंधन २३-तैजस बंधन २४-कार्माण
बंधन।
पाँच संस्थान-२४-औदारिक २५-वैक्रियक
२६-आहारक २७-तैजस २८-कार्माण।
छह संस्थान-२९-समचतुरस्रसंस्थान ३०-न्यग्रोध-
परिमंडल संस्थान ३१-स्वाति संस्थान ३२-कुब्जक संस्थान
३३-वामन संस्थान ३४-हुण्डक संस्थान।
छह संहनन-३५-वज्रवृषभनाराच संहनन
३६-वज्रनाराच संहनन ३७-नाराचसंहनन ३८-अर्धनाराच
संहनन ३९-कीलक संहनन ४०-असंप्राप्तासृपाटिका
संहनन।
पाँच वर्ण कर्म-४१-कृष्ण ४२-नील ४३-रक्त
४४-पीत ४५-श्वेत।
दो गंध-४६-सुगन्ध ४७-दुर्गन्ध।
पाँच रसकर्म-४८-खट्टा ४९-मीठा ५०-कड़ुआ
५१-कषायला ५२-चरपरा।
आठ स्पर्श-५३-कठोर ५४-कोमल ५५-हलका
५६-भारी ५७-ठंडा ५८-गरम ५९-चिकना ६०-रूखा।
चार आनुपूर्वी-६१-नरक ६२-तिर्यञ्च ६३-मनुष्य
६४-देव।
६५-अगुरु लघु कर्म ६६-उपघात कर्म ६७-परघात
कर्म ६८-आतप कर्म ६९-उद्योत कर्म ७०-उच्छ्वास।
दो विहायोगति-७१-एक मनोज्ञ ७२-शुभ अमनोज्ञ
७३-त्रस ७४-स्थावर ७५-बादर ७६-सूक्ष्म ७७-पर्याप्त
कर्म ७८-अपर्याप्त कर्म ७९-प्रत्येक नामकर्म ८०-साधारण
नामकर्म ८१-स्थिर नामकर्म ८२-अस्थिर नामकर्म
८३-शुभ नामकर्म ८४-अशुभ नामकर्म ८५-सुभग नामकर्म
८६-दुर्भग नामकर्म ८७-सुस्वर नामकर्म ८८-दुस्वर नामकर्म
८९-आदेय नामकर्म ९०-अनादेय नामकर्म ९१-यशकीर्ति
नामकर्म ९२-अपयशकीर्ति नामकर्म ९३-तीर्थंकर नामकर्म।

स्वाध्याय बाल शिक्षा ११ भाग ३

प्रश्न १०-गोत्र कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिसके उदय से जीव का उच्च-नीच कुल में जन्म होता
है उसे गोत्र कर्म कहते हैं। जैसे-कुम्भकार छोटे-बड़े
बर्तन बनाता है, वैसे ही गोत्र कर्म छोटे-बड़े (उच्च-
नीच) कुल में उत्पन्न करता है।
इस कर्म के दो भेद हैं-१-उच्च गोत्र २-नीच गोत्र।

प्रश्न ११-अन्तराय कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिस कर्म के उदय से दान आदि कार्यों में विघ्न आवे
उसे अन्तराय कर्म कहते हैं। जैसे-भण्डारी देने नहीं
देता है या कंजूस दान नहीं देता है वैसे ही अन्तराय कर्म
भी देने में विघ्न करता है। इसके पाँच भेद हैं-
१-दानान्तराय २-लाभान्तराय ३-भोगान्तराय
४-उपभोगान्तराय ५-वीर्यान्तराय।

प्रश्न १२-एक बालक बहुत पढ़ता है, स्वाध्याय सुनता है, फिर
भी उसको याद नहीं रहता है क्यों ?
उत्तर-बालक को ज्ञानावरण कर्म का तीव्र उदय है, इसलिए
याद नहीं रहता है।

प्रश्न १३-अनिल भगवान के दर्शन के लिए मन्दिर गया पर
दरवाजा बन्द था दर्शन नहीं हुए क्यों ?
उत्तर-भगवान के दर्शन के लिये गया पर दर्शन हुए ही नहीं
इसलिए अनिल को दर्शनावरणी कर्म का उदय है।

प्रश्न १४-एक बालक बहुत बीमार रहता है उसे किस कर्म का
उदय है ?
उत्तर-बालक को वेदनीय (असाता) कर्म का उदय है।

प्रश्न १५-एक माँ का पुत्र अमेरिका गया है, उसकी माँ याद
आते ही रोती है क्यों ?
उत्तर-माँ को मोहनीय कर्म का उदय है।

स्वाध्याय बाल शिक्षा १२ भाग ३

प्रश्न १६-एक जीव नारकीय, देव, तिर्यञ्च, मनुष्य पर्यायों में
भटकता है क्यों ?
उत्तर-नाना गतियों में जीव आयु कर्म के उदय से भटकता है।

प्रश्न १७-कोई जीव का बहुत सुन्दर शरीर है और कोई कुरूप
है किस कर्म के उदय से ?
उत्तर-शुभ नामकर्म के उदय से सुन्दर और दुर्भग नामकर्म के
उदय से कुरूप शरीर मिलता है।

प्रश्न १८-कोई उच्च कुलीन है कोई नीच कुल वाला है यह
किस कर्म के उदय से।
उत्तर-गोत्र कर्म के उदय से।

प्रश्न १९-एक व्यक्ति दान देना चाहता है पर दे नहीं पाता है
किस कारण से ?
उत्तर-दानान्तराय कर्म के उदय के कारण।

प्रश्न २०-भोजन में अन्तराय आने से मुनिराज, आर्यिका,
त्यागिवृत्ति आदि आहार छोड़ देते हैं किस कर्म के
उदय से ?
उत्तर-लाभान्तराय कर्म के उदय से आहार के लिए जाने पर
भी आहार का लाभ मुनियों, त्यागियों को नहीं मिलता है।

प्रश्न २१-इन कर्मों में सबसे अच्छा कर्म कौन-सा है ?
उत्तर-कर्म आठों ही दुःख रूप हैं। कोई भी कर्म अच्छा नहीं है।

प्रश्न २२-ज्ञानावरण का बंध कैसे होता है ?
उत्तर-ज्ञानावरण का बंध ज्ञान प्राप्ति करने वालों की पढ़ाई
आदि में विघ्न डालने से होता है जैसे-कोई पढ़ रहा है
उसकी पुस्तक छीन लेना, पुस्तक चुरा लेना, पुस्तक
फाड़ देना। पढ़ते हुए की बिजली आदि बुझा देना।
मुनिराज स्वाध्याय कर रहे हैं वहाँ जाकर जोर-जोर से
बातें करना। प्रवचन में बातें करना। अपने ज्ञान को
ईर्ष्या से किसी को बताना नहीं। गुरु का नाम छिपा लेना
आदि।

स्वाध्याय बाल शिक्षा १३ भाग ३

प्रश्नोत्तर

प्रश्न २३- दर्शनावरण कर्म का बंध कैसे होता है ?
उत्तर- दर्शनमोह में भिन्न आत्मा एवं दिन में सोने से दर्शनावरणी कर्म का बंध होता है।
प्रश्न २४- वेदनीय कर्म का बंध कैसे होता है ?
उत्तर- दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन आदि क्रियाओं से वेदनीय कर्म का बंध होता है।
प्रश्न २५- मोहनीय कर्म का बंध कैसे होता है ?
उत्तर- आत्मा श्रद्धान करने से मोहनीय कर्म का बंध होता है।
प्रश्न २६- चारित्र आयु कर्म का बंध किन कारणों से होता है ?
उत्तर- (अ) अति आरम्भ, अति परिग्रह से नरकायु का बंध होता है।
(ब) मायाचार से तिर्यंचायु का बंध होता है।
(स) सरल परिणाम, कोमलता, स्वभाव की निर्भयता से देवायु का बंध होता है।
(द) अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रह से मनुष्यायु का बंध होता है।
प्रश्न २७- नामकर्म का बंध कैसे होता है ?
उत्तर- मन, वचन, काय की कुटिलता से अशुभ नामकर्म का बंध होता है और इससे विपरीत मन, वचन, काय की सरलता से शुभ नामकर्म का बंध होता है।
प्रश्न २८- शशी बहुत अच्छा गाती है पर मीना की आवाज बिल्कुल अच्छी नहीं है क्यों ?
उत्तर- यह नामकर्म का फल है। शशी को सुन्दर नामकर्म का उदय है, इसलिए उसकी आवाज अच्छी है पर मीना को दुस्वर नामकर्म का उदय है इसलिए उसकी आवाज अच्छी नहीं है।
प्रश्न २९- वृषभ सबको अच्छा लगता है पर विजय को कोई देखता भी नहीं क्यों ?
उत्तर- वृषभ को सुभग नामकर्म का उदय है और विजय को दुर्भग नामकर्म का उदय है इसलिये ऐसा होता है।

स्वाध्याय बाल शिक्षा भाग ३
१३

प्रश्न ३०- घर में मनोज कुछ नहीं करता फिर भी सब उसका यश गाते हैं और दिलीप सबका भला करता है, कितना ही परोपकार करे पर सब उसको निंदा ही करते हैं क्यों ?
उत्तर- मनोज को यशकीर्ति नामकर्म का उदय है और दिलीप को अपयश कीर्ति नामकर्म का उदय है इसी कारण निंदा और प्रशंसा हो रही है।
प्रश्न ३१- गोत्र कर्म का बंध किन कारणों से होता है ?
उत्तर- दूसरे की निन्दा और अपनी प्रशंसा करने से नीच गोत्र का बन्ध होता है। अपने दुर्गुणों को प्रकट करना एवं दूसरों के गुणों को प्रकट करने से उच्च गोत्रकर्म का बन्ध होता है।
प्रश्न ३२- अन्तराय कर्म का बंध किन कारणों से होता है ?
उत्तर- दूसरों को दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य, ज्ञान, सुखादि में विघ्न करने से अन्तराय कर्म का बन्ध होता है।
प्रश्न ३३- क्या कर्मों से छूटने का कोई उपाय है ?
उत्तर- हाँ, कर्मों से छूटने का भी उपाय है। जिन भावों से कर्म बंधते हैं उनको नहीं करना एवं जिन आज्ञानुसार तप करने से कर्मों से छूटा जा सकता है।
प्रश्न ३४- क्या हम भी कर्मों से छूट सकते हैं। कब ?
उत्तर- जी हाँ ! हम भी कर्मों से छूट सकते हैं पर कब जब दिगम्बर मुनि बनकर श्मशान भूमि का त्याग कर शुक्लध्यान में लीन होवेंगे तब।

स्वाध्याय बाल शिक्षा भाग ३
१४

अष्टम- श्रावक के अष्टगुण

प्रश्न ३५- श्रावक किसे कहते हैं ?
उत्तर- १- “श्रृणोति इति श्रावक” जो हित की बात को सुने उसे श्रावक कहते हैं।
२- श्रृणोति सभावण्यानि, व्रतानधारयति च।
करोति शुभकर्माणि श्रावकस्तद्धिधीयते ।।
जो साधु श्रावकों को सुनता है, व्रतों को धारण करता है, शुभ कर्मों को करता है, वह श्रावक कहलाता है।
३- जो श्रद्धान, विवेकवान, क्रियावान होता है उसे श्रावक कहते हैं। अर्थात् सच्चे देव, शास्त्र, गुरु की श्रद्धापूर्वक धर्मानुसार क्रिया करने वाले मनुष्य को श्रावक कहते हैं।
प्रश्न ३६- श्रावक के कितने और कौन से मूलगुण हैं ?
उत्तर- श्रावक के ८ मूलगुण होते हैं-
(अ) १-मद्य (शराब) त्याग २-मांस त्याग ३-मधु (शहद) त्याग, ४-बड़ ५-पीपल ६-पाकर ७-उमर (गूलर) ८-कदम्बर (अंजीर) का त्याग।
अर्थात् ५ उदम्बर और ३ मकार का त्याग ये श्रावक के आठ मूलगुण हैं। अथवा
(ब) ५ अणुव्रतों का पालन और ३ मकार का त्याग भी श्रावक के ८ मूलगुण हैं। अर्थात् १-अहिंसाणुव्रत २-सत्याणुव्रत ३-अचौर्याणुव्रत ४-ब्रह्मचर्याणुव्रत ५-परिग्रह-प्रमाण व्रत ६-मद्य त्याग ७-मांस त्याग ८-मधु त्याग।
अथवा
(स) १-मद्य त्याग २-मांस त्याग ३-मधु त्याग ४-पांचिभोजन का त्याग ५-पांच उदम्बर फलों का त्याग ६-देव वन्दना ७-जीव दया एवं ८-जल छानकर पीना भी श्रावक के ८ मूलगुण हैं। अपने कुल व पद के अनुसार तीनों ही प्रकार के मूलगुण पालने योग्य हैं।

स्वाध्याय बाल शिक्षा भाग ३
१५

प्रश्न ३७- मूलगुण किसे कहते हैं ?
उत्तर- जीवन के अनिवार्य (मुख्य) गुणों को मूलगुण कहते हैं। जैसे-बड़ के बिना वृक्ष हरा नहीं रह सकता, टिक नहीं सकता वैसे ही जिन गुणों के बिना श्रावक धर्म नहीं टिक सकता उन्हें मूलगुण कहते हैं।
प्रश्न ३८- मद्य (शराब) पीने से क्या हानि है ?
उत्तर- शराब पीने से विवेक, ज्ञान, सत्य, दया, क्षमादि गुण नष्ट हो जाते हैं। शराब पीने वाला व्यक्ति पागल की तरह सत्य को सत्य और असत्य भी कहता है। उसका कोई विश्वास नहीं करता।
प्रश्न ३९- शराब पीने से होनेवाली शारीरिक हानियाँ बताइये ?
उत्तर- शराब पीने से शरीर में रोग हो जाते हैं। कैंसर, पेट में छाले, दिमाग का पागलपन आदि अनेक बीमारियाँ शराब पीने से हो जाती हैं। शराब की एक बूंद में तीन लोक पूर्ण कर दें इतने सूक्ष्म जीव होते हैं। अतः इसके सेवन से अनेक जीवों की हिंसा होती है।
प्रश्न ४०- शराबी व्यक्ति का उदाहरण दीजिये ?
उत्तर- इस विषय में एक लौकिक कथा है-
एक संन्यासी का नाम एकपाद था। एक दिन उसकी गंगा में स्नान की इच्छा हुई। वह चल पड़ा। नगर के बाहर जाते हुए मार्ग में एक धोबी को शुंभ दिखाई दिया। मुनी भील संन्यासियों के साथ मांस और सुरा सेवन कर रहे थे। संन्यासी उस झुण्ड में जा फंसा। शराब के नशे में मस्त हुए मुनी ने उसे पकड़ लिया और उससे बोले तुझे मद्य, मांस और स्त्री में से किसी एक का सेवन करना होगा। नहीं तो तुझे जीते जी गंगा का दर्शन नहीं हो सकता है। यह सुनकर संन्यासी ने सोचा मैंने स्मृति में पढ़ा है कि तिल बराबर भी मांस खाने से विषतियाँ आती हैं। और मिल्लनी के साथ संबंध करने पर भी प्रायश्चित्त मिलता है परन्तु मद्य सिरमौर दोषिणियों यज्ञ में शराब पीने को अनुमति है

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और लिखा है जो इस विधि से मदिरापान करता है उसका मदिरापान, मदिरापान नहीं है। तथा धोबी, जल, गुड़, धतूरा आदि जिन वस्तुओं से शराब बनती है वे भी शुद्ध हैं। ऐसा विचारकर उसने शराब पी ली। पीते ही उसका मन चंचल हो गया, नशे में मस्त होकर उसने अपनी लंगोटी खोल दी और भिल्लनियों के साथ कुचेष्टाएँ करने लगा। ऐसा लगता था मानो कोई भूत चढ़ा है। फिर मुझ से पीड़ित होकर उसने मांस खा भी लिया। कामोदक से पीड़ित होकर उस संन्यासी ने भिल्लनी को भोगा सारा जीवन निंदित बना लिया। एकपाद नामक संन्यासी सौधर्मिणी नामक यज्ञ में मदिरापान को दोष नहीं बतलाया, ऐसा समझकर मदिरापान करके दुर्गति को प्राप्त हुआ। ऐसी मदिरा को ज्ञानी जनों को दूर से त्याग देना चाहिए।
प्रश्न ४१- मांस खाने से क्या हानि है ?
उत्तर- मांस खाने से पेट में सड़न, दिल की बीमारियाँ आदि हो जाती हैं। अंडे भी मांस ही हैं। उसके खाने में भी मांस का दोष लगता है। क्योंकि वह शिशु का कलेवर है।
प्रश्न ४२- अंडे खाने से क्या हानि है ?
उत्तर- विज्ञान ने सिद्ध किया है कि अंडे में कोलेस्ट्रोल नामक भयानक तत्व पाया जाता है। इससे दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, धमनियों में जख्म आदि रोग हो जाते हैं। विज्ञान ने यह भी सिद्ध किया है कि इनसे पेट में सड़न उत्पन्न हो जाती है। इसमें डी०डी०टी० विष मिला होता है। ये मनुष्यों के हाजमे को बिगाड़ता है।
प्रश्न ४३- शहद क्या है ? इसके खाने से क्या हानि है ?
उत्तर- मधु एक अशुद्ध, अपवित्र पदार्थ है वह जीवन को अपवित्र बनाता है। मधुमक्खियाँ फूलों से रस चूस कर लाती हैं और रहने पर आकर उसका वमन करती हैं।

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(शहद मक्खियों का वमन है।) उसी छत्ते में वे अपना-अपना मल भी छोड़ती हैं। ऐसे अशुद्ध छत्ते में अनंतानंत जीवों का पिंड रहता है और उसे जब निचोड़ कर रस निकाला जाता है वह सारा जीवों का खून, पीप, वमन का एक रस बनकर शहद कहलाता है। ज्ञानी जन ऐसी हिंसाभय वस्तु का दूर से त्याग कर देते हैं। कभी घर में भी प्रयोग नहीं करते हैं। मधु की एक बूंद खाने वाले को ७ गाँव के जलने के बराबर पाप लगता है।
प्रश्न ४४- रात्रिभोजन क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर- जीवों की रक्षा, अहिंसा व्रत का पालन एवं शरीर को स्वस्थ रखने के लिये और बुद्धि को निर्मल बनाये रखने के लिये दिन में ही भोजन करना चाहिये। रात्रि में कभी नहीं।
प्रश्न ४५- रात्रिभोजन से क्या हानियाँ हैं ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण बताइये ?
उत्तर- विज्ञान ने भी सिद्ध किया है कि दिन में वृक्ष विषैली हवा छोड़ते हैं जिससे सारा बाहरी वातावरण विषैला बन जाता है, जिस भोजन से इस हवा का सम्पर्क होता है वह भोजन भी विषैला बनकर शरीर में रोग उत्पन्न करता है। रात्रि में मच्छर आदि छोटे-छोटे जीव अधिक मात्रा में उत्पन्न हो जाते हैं। वे भोजन में गिर जाते हैं और दिखाई भी नहीं देते हैं और यदि दिखते, मक्खी आदि पेट में चले गये तो कंठमाला, जलौदर आदि रोग शरीर में हो जाते हैं।
सूर्य के प्रकाश में सूक्ष्म जीवों की अधिक उत्पत्ति नहीं होती है। यदि कुछ होते भी हैं तो दिखाई देने पर उन्हें आसानी से निकाला जा सकता है, पर रात्रि में तो दिखाई नहीं देते हैं पेट में चले जाते हैं और मांस का काम करते हैं। इसी कारण, रात्रि में भोजन खाना, मांस के खाने के बराबर कहा है।

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प्रश्न ४६- जैनधर्म में रात्रिभोजन निषेध क्यों ?

उत्तर- जैनधर्म अहिंसामयी वैज्ञानिक धर्म है। प्राणी मात्र की रक्षा निहित है। रात्रिभोजन नहीं करना यह जैनधर्म का मूल नियम है। रात्रिभोजन से स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है और अस्वस्थ व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता है इसलिये रात्रि भोजन करना जैनधर्म में निषेध है। तथा
जनश्रुतिनुसार- रात्रिभोजन बनान व खान से अनन्त जीव भोजन में गिरकर मर जाते हैं उससे अहिंसा धर्म का पालन नहीं होता। रात्रि में छोटे मच्छर को जीरा और बड़े मच्छर या मक्खी को इलायची समझकर व्यक्ति गटागट कर जाता है।

प्रश्न ४७- आज मानव प्रातः ६ बजे तक भी प्रसाद छोड़कर बिस्तर नहीं छोड़ पाते हैं क्यों ?

उत्तर- जीव का शरीर एक मशीन है। रात्रि में भोजन करने वाले व्यक्ति ने इसे भोजन पचाने का काम दे दिया है, इंजीनियर सो चुका उसमें कुछ भी गड़बड़ी होगी तो कौन सम्हालेगा ? शरीर की मशीन अपनी क्रिया कर रही है, अतः प्रमाद छूट नहीं पाता है और प्रातः आठ-दस बजे तक भी नींद नहीं उड़ती है। जबकि योगी लोगों की तन्द्रा तीन-चार बजे ही छूट जाती है। कारण वे एक समय शुद्ध भोजन करते हैं। शरीर को मशीन का कार्य पूर्ण हो चुकता है, इंजीनियर जागृत है बिगड़ने का काम ही नहीं।

प्रश्न ४८- सद्गृहस्थ के लिए रात्रिभोजन न करने से होने वाले लाभ बताइये ?

उत्तर- घर में माँ, भाभी, बहने भोजन का कार्य करते हुए सुबह से शाम तक थक जाती हैं यदि घर के सदस्य दिन में भोजन कर लेते तो रात्रि में वे स्वतन्त्रता से धर्मकार्य, आरती के जाय आदि करके गुणों का श्रवण कर सकती हैं अथवा रात्रि में अच्छी-अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करके बच्चों की उचित शिक्षा भी दे सकती हैं पर सुबह भी भोजन, दोपहर में नाश्ता, रात को १२ बजे भी गरम-गरम पकौड़ी-नाश्ता खाने वालों के मन में माता, पत्नी या बहन के लिए करुणा या दया कहाँ है ? क्या वे दासियाँ तो नहीं हैं ? क्या यही अहिंसा है ? सच्चा अहिंसक स्वयं भी सुखी रहता है दूसरे को भी सुखी रखता है।
स्वयं परिवार में भोजनदि क्रियाएँ दिन में हो जाती हैं रात्रि में मन्दिर में सामाजिक, स्वाध्याय, आरती, भक्ति आदि करते हैं। नारी जीवन की सहानुभूति देना भी एक पुण्य है। अपने समान सभी को समझो नहीं सच्ची व्यावहारिकता है। घर में स्त्रियों को बिना प्रयोजन दुःख नहीं देना यह सच्चा अपनत्व है।

प्रश्न ४९- पंचपरमेष्ठी को नमस्कार क्यों करना चाहिये ?

उत्तर- पंचपरमेष्ठी को उनके समान उत्तम गुणों की प्राप्ति के लिए नमस्कार करना चाहिए एवं यह जैनियों का मूल नियम है। पुण्य पुरुषों को नमस्कार करने से मिथ्याचार का परिपालन, लोक-मर्यादा अनुशासन एवं आने वाली पीढ़ी के लिए गुणों की शिक्षा मिलती है।

प्रश्न ५०- जल छानकर पीना क्यों आवश्यक है ?

उत्तर- जल में असंख्य जीवराशि रहती है, यह पेट में नहीं जाने पाये इसलिए जल छानकर पीना चाहिये। इससे जीव दया का पालन होता है। अहिंसा व्रत को रक्षा के लिए भी जल छानकर पीना आवश्यक है।

५-आवश्यक

प्रश्न ५१- वैज्ञानिकों का इस सम्बन्ध में विशेष कथन बताइये ?

उत्तर- वैज्ञानिकों का कहना है कि एक बूँद जल में ३६४० जीव रहते हैं। इनका कहना है कि ना खा या भरकर रोग आदि बिना छना जल पीने से ही होते हैं।
वैज्ञानिकों ने जहाँ आज यह सिद्ध किया है कि जल में मेढक, मछली आदि अनेक जीव होते हैं। वे पेट में पहुँच कर नाना रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए सबको जल छानकर गर्म करके पीना चाहिए। यहाँ जैनधर्म में आचार्यों ने पहले ही जल छानने को जैनों का मुख्य कर्तव्य कहा है। यही कारण है कि जैन साधु आज छना, गर्म किया हुआ जल ही उपयोग करते हैं।

प्रश्न ५२- जैनधर्म धारण करने वाले के मूल चिह्न (नियम) क्या हैं ?

उत्तर- जैनधर्म धारण करने वाले के मूल ३ चिह्न (नियम) हैं-
१- रात्रि भोजन त्याग।
२- जल छानकर पीना।
३- नित्य देवदर्शन करना।

प्रश्न ५३- आवश्यक किसे कहते हैं तथा कितने हैं ?

उत्तर- अवश्य करने योग्य क्रिया को आवश्यक कहते हैं।
आवश्यक छः प्रकार के हैं- १-देवपूजा २-गुरुपास्ति
३-स्वाध्याय ४-संयम ५-दान ६-तप।

प्रश्न ५४- देवपूजा किसे कहते हैं ?

उत्तर- नव देवताओं की पूजा, भक्ति, स्तुति, वंदना, गुणों का स्मरण एवं अष्ट द्रव्यों से पूजादि देवपूजा कहलाती है।

प्रश्न ५५- नव देवताओं के नाम बताइये ?

उत्तर- १-अरहंत २-सिद्ध ३-आचार्य ४-उपाध्याय ५-साधु
६-जिनधर्म ७-जिनगम (शास्त्र) ८-जिन चैत्य और
९-जिन चैत्यालय से नव देवता नित्य पूज्य हैं।

प्रश्न ५६- अष्ट द्रव्यों के नाम बताइये ?

उत्तर- १-जल २-चंदन ३-अक्षत ४-पुष्प ५-नैवेद्य ६-दीप
७-धूप ८-फल ये अष्ट द्रव्य कहे जाते हैं।

प्रश्न ५७- देवपूजा का फल क्या है ?

उत्तर- जिनेन्द्र की पूजा-भक्ति से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है और अष्ट द्रव्यों से श्रद्धा, भक्ति, विनय से पूजा करने वाला जीव संसार में इन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदि के उत्तमोत्तम सुखों को भोगकर आठ कर्मों का नाश करके ८वीं पृथ्वी मोक्ष में जाता है। वही सिद्धों के आठ गुणों को प्राप्त कर वह जीव अनादा सुखों को प्राप्त करता है।

प्रश्न ५८- गुरुपास्ति का अर्थ क्या है ?

उत्तर- सच्चे दिगम्बर, आरम्भ, परिग्रह रहित साधुओं की उपासना करना गुरुपास्ति है।

प्रश्न ५९- गुरु की उपासना कैसे की जाती है ?

उत्तर- सच्चे दिगम्बर गुरुओं की उपासना के कई अंग हैं।
जैसे-
१- मुनिराज को आहार दान, वसतिका दान, शास्त्र दानादि देना।
२- उनकी वैयावृत्ति करना।
३- उनकी ज्ञान-वृद्धि के साधन जुटाना।
४- उनकी चर्चा में सहायक बनना, बाधा नहीं पहुँचाना।
५- शरीर में रोगादि होने पर उपचार करना।
६- गुरुजनों की आज्ञा से पूजा करके स्वयं भी मुनिपद के धारण करने की भावना करना आदि।

प्रश्न ६०- स्वाध्याय का अर्थ क्या है ?

उत्तर- स्व याने अपने अध्याय याने समीपी आना=अपनी आत्मा के समीप आने का नाम स्वाध्याय है।
दूसरे अर्थ में जिनेन्द्र देव की वाणी को ध्यान से पढ़ना, पढ़ाना, सुनना, सुनाना भी स्वाध्याय है।

प्रश्न ६१- स्वाध्याय आवश्यक क्यों ?

उत्तर- स्वाध्याय प्रत्येक मानव का आवश्यक कर्तव्य है। क्योंकि स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है। ज्ञान से तप की सिद्धि होती है। तप सिद्धि से कर्मों की निर्जरा और कर्म निर्जरा से मोक्ष पद प्राप्त होता है।

प्रश्न ६२- स्वाध्याय के कितने भेद हैं ? कौन से ?

उत्तर- स्वाध्याय के पाँच भेद हैं- १-वाचना २-पृच्छना
३-अनुप्रेक्षा ४-आम्नाय ५-धर्मोपदेश।

प्रश्न ६३- वाचना किसे कहते हैं ?

उत्तर- शास्त्रों को शुद्ध उच्चारण पूर्वक पढ़ना वाचना है।

प्रश्न ६४- पृच्छना किसे कहते हैं ?

उत्तर- तत्व में शङ्का उत्पन्न होने पर ज्ञानोजनों से पूछना यह पृच्छना नामक स्वाध्याय है।

प्रश्न ६५- अनुप्रेक्षा स्वाध्याय क्या है ?

उत्तर- पढ़े हुए शास्त्रों के रहस्य का निरन्तर चिन्तन, मनन करना अनुप्रेक्षा स्वाध्याय है।

प्रश्न ६६- आम्नाय नामक स्वाध्याय किसे कहते हैं ?

उत्तर- जो गद्य-पद्य जिस छन्दादि में है उसे उसी प्रकार से शुद्ध उच्चारण पूर्वक पढ़ना आम्नाय नामक स्वाध्याय है या पूर्वाचार्यों के उद्देश्य को ध्यान रखते हुए ग्रंथ का अर्थ करना आम्नाय है।

प्रश्न ६७- धर्मोपदेश नामक स्वाध्याय किसे कहते हैं ?

उत्तर- जो यदि सात तत्वों का कथन करना धर्मोपदेश नाम का स्वाध्याय है।

प्रश्न ६८- संयम किसे कहते हैं ?

उत्तर- पाँच इन्द्रिय और छठे मन को वश में करना, छहकाय के जीवों की रक्षा करना यह संयम है।

प्रश्न ६९- संयम के कितने भेद हैं ?

उत्तर- संयम के दो भेद हैं- १-प्राणी संयम २-इन्द्रिय संयम।
१-छः काय के जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है।
२-पाँच इन्द्रिय और छठे मन को वश में करना इन्द्रिय संयम है।

प्रश्न ७०- तप किसे कहते हैं ?

उत्तर- (अ) स्वर्ण के समान जिससे आत्मा को तपाकर खरा
बनाया जाता है उसे तप कहते हैं।
(ब) कर्मों के क्षय करने के लिए जो क्रिया की जाती है
वह तप कहलाती है। ये बारह प्रकार के होते हैं।
इनमें छः अन्तरंग तप छः बहिरंग तप होते हैं।
१-अनशन २-अनोदर ३-अन्तरिक्षवृत्तिदान ४-रस परित्याग
५-विविक्त शय्यासन ६-काय-क्लेश। ये छः बहिरंग
तप हैं। अन्तरंग तप ये हैं- १-प्रायश्चित २-विनय
३-वैयावृत्य ४-स्वाध्याय ५-ध्यान और ६-व्युत्सर्ग।




प्रश्न ७२-आहार, औषध, ज्ञान, अभयदान का स्वरूप बताइये ?

उत्तर- १- मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका आदि उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रों में यथाशक्ति नवधा भक्तिपूर्वक सगुण दान देना आहार दान है।
२- रोग के दूर करने के लिए शुद्ध निर्दोष औषधादि से उपचार करना औषध दान है।
३- ज्ञान को बढ़ाने वाले साधन पुस्तकादि देना, अपने पास होने वाले ज्ञान का वितरित करना ज्ञानदान है। पुस्तकं छापना, कापियाँ, कलम आदि बाँटना भी ज्ञान दान है। शिविर आदि लगाना भी ज्ञानदान है।
४- जीवों को भय से निकालना, जीवों की रक्षा करना यह अभयदान है।
आहारदान में श्रीरंग राजा, औषधदान में एक सेठ की पुत्री वृषभसेना, ज्ञानदान में कोदेश एवं अभयदान में एक शूकर विशेष प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न ७३-नवधा भक्ति के नाम बताइये ?

उत्तर- १-पड़गाहन २-उच्चस्थान ३-पादप्रक्षालन ४-पूजा ५-आनाति नमस्कार ६-मन शुद्धि ७-वचन शुद्धि ८-काय-शुद्धि ९-भोजन शुद्धि।

प्रश्न ७४-पड़गाहन किसे कहते हैं ?

उत्तर- जब पात्र अपने द्वार पर आवे तब भक्तिपूर्वक प्रार्थना करे कि भी गुरु ! मेरे घर परम्मो हो जाइये। हे स्वामि ‘नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु’ । अत्र-अत्र-अत्र, तिष्ठ-तिष्ठ-तिष्ठ, आहार जल शुद्ध है। इस प्रकार बोलते हुए पड़गाहन करे। पात्र के रुकने पर तीन प्रदक्षिणा आदि यथायोग्य करके मनशुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि आहार जल शुद्ध है घर में प्रवेश कीजिये। इस प्रकार बोलकर विनयपूर्वक पात्र को भक्ति से घर के चौक में प्रवेश करावें।

प्रश्न ७५-उच्च स्थान का स्वरूप बताइये ?

उत्तर- जब पात्र अपने यहाँ भोजन ग्रहण करना स्वीकार कर ले, तब पात्र को अपने भीतर न लाकर निर्दोष निर्गंधि उच्च स्थान (पाटपर) पर बैठाने का नाम उच्च स्थान है।

प्रश्न ७६-पाद प्रक्षालन का स्वरूप लिखो ?

उत्तर- आये हुए पात्र के भक्तिपूर्वक पैर धोने को पाद प्रक्षालन कहते हैं।

प्रश्न ७७-पूजा किसे कहते हैं ?

उत्तर- यथायोग्य जलगंधादि अष्ट द्रव्य से पात्र की अर्चा करना पूजा है।

प्रश्न ७८-आनाति (नमस्कार) का स्वरूप बताइये ?

उत्तर- पञ्चांग नमस्कार को (नमस्कार) आनाति कहते हैं।

प्रश्न ७९-मनशुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि एवं भोजनशुद्धि का स्वरूप बताइये ?

उत्तर- १-आर्त, रौद्र ध्यान रहित अवस्था को मनशुद्धि कहते हैं।
२-परुष, कर्कश आदि वचन नहीं बोलने को वचन शुद्धि कहते हैं।
३-विषया विवाह, विजातीय विवाह आदि से रहित शरीर को शुद्धि को कायशुद्धि कहते हैं।
४-प्रयत्नपूर्वक शोधकर भोजन तैयार करना पिंडशुद्धि एवं निदोषसेवी दोषों से रहित निर्दोष आहार को भोजनशुद्धि कहते हैं।

प्रश्न ८०-दाता के ७ गुण कौन-कौन से हैं ?

उत्तर- १-श्रद्धा २-तुष्टि ३-भक्ति ४-विज्ञान ५-अलुब्धता ६-क्षमा ७-सन्तोष। इन सात गुणों से युक्त दाता प्रशसनीय होता है।

१-श्रद्धा-

पात्र को दिये गये दान के फल में प्रतीति रखने को श्रद्धा कहते हैं।

२-तुष्टि-

देते समय या दान दिये जाने पर जो हर्ष होता है उसे तुष्टि कहते हैं।

३-भक्ति-

पात्रगत गुण के अनुराग को भक्ति गुण कहते हैं।

४-विज्ञान-

देने योग्य द्रव्यादिक की जानकारी विज्ञान गुण है।

५-अलुब्धता-

सांसारिक फल की इच्छा न रखना अलोलुप्य (अलुब्धता) है।

६-क्षमा-

मुनिपर क्रोधादिक के कारण मिलने पर भी क्रोध नहीं करना क्षमा गुण है।

७-सन्तोष-

“सत्त्व” मन का वह गुण है कि दाता अल्पधन वाला होकर भी बड़े धनाढ्यों को आश्चर्य में डालता है।

प्रश्न ८१-पाँच सुन का स्वरूप एवं भेद बताइये ?

उत्तर- जिन हिंसात्मक कार्यों से गृहस्थ निरन्तर पापों का संचय करता है उन्हें पाँच सुन कहते हैं।
१-पीसना २-कूटना ३-चौका चूली करना ४-पानी की पिणोची (एण्डा) वगैरह को सफाई करना और ५-घर-द्वार को झाड़ना-बुहारना।
इन पाँच सुन क्रियाओं में जो पाप लगता है वह पाप पाँच सुन रहित उत्तम, माध्यम, जघन्य पात्रों में दान देने से धुल जाता है। जिस प्रकार जल खून को धो देता है उसी प्रकार सत्यार्थों के लिये दिया गया दान भी निश्चय से पाँच सुनो द्वारा लगे पापों को धो देता है।

प्रश्न ८२-सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं ?

उत्तर- १-अनंतनुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति इन ७ प्रकृतियों के उपशम, क्षय, क्षयोपशम से होने वाली जो विशुद्धि है उसे सम्यग्दर्शन कहते हैं। अनंतनुबंधी ४ और एक मिथ्यात्व इन प्रकृतियों के उपशम, क्षय, क्षयोपशम से होनेवाली विशुद्धि को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
२-वस्तु के यथार्थ श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
३-सात तत्त्व और ९ पदार्थ के यथार्थ श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
४-सच्चे देव, शास्त्र, गुरु के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
५-पर द्रव्यों से भिन्न अपनी आत्मा की रुचि सम्यग्दर्शन है।
६-प्रशम, संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य लघुशुकुच, सम्यग्दर्शन है।

प्रश्न ८३-तत्त्व किसे कहते हैं वे कितने हैं ?

उत्तर- वस्तु के भाव को तत्त्व कहते हैं वे ७ हैं-१-जीव २-अजीव ३-आस्रव ४-बंध ५-संवर ६-निर्जरा ७-मोक्ष ये ७ तत्त्व हैं।

प्रश्न ८४-जीव तत्त्व किसे कहते हैं ?

उत्तर- उपयोग लक्षण वाला जीव तत्त्व कहलाता है।

प्रश्न ८५-अजीव तत्त्व किसे कहते हैं ?

उत्तर- जिसमें चेतना नहीं पाई जाती है उसे अजीव तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न ८६-आस्रव किसे कहते हैं ?

उत्तर- कर्मों के आने को आस्रव कहते हैं।

प्रश्न ८७-बंध किसे कहते हैं ?

उत्तर- आये हुए कर्मों का जीव प्रदेशों के साथ बंध जाना बंध है।

प्रश्न ८८-संवर किसे कहते हैं ?

उत्तर- कर्मों का आना रुक जाना संवर कहलाता है।

प्रश्न ८९-निर्जरा किसे कहते हैं ?

उत्तर- कर्मों का एक देश क्षय (क्षय होना) निर्जरा है।

प्रश्न ९०-मोक्ष किसे कहते हैं ?

उत्तर- कर्मों का आत्मा का पूर्ण रूप से छूट जाना मोक्ष है।

प्रश्न ९१-सात तत्त्वों को एक उदाहरण देकर समझाइये ?

उत्तर- एक नाव है वह अजीव है, उसमें बैठे व्यक्ति जीव तत्त्व है। नाव में एक छेद है। अतः उस छेद से पानी अन्दर नाव में आ रहा है। यह जो पानी आने का द्वार है वही आस्रव है। पानी का नाव में रुक जाना बंध है और नाविक ने पानी के आने के द्वार को रोकने के लिये छिद्र को बन्द कर दिया वही छेद का बन्द हो जाना संवर है। और फिर अन्दर से भरा पानी धीरे-धीरे निकाल रहा है वह है निर्जरा। जब सब पानी धीरे-धीरे निकल कर नाव पूर्ण हल्की हो गई है वही है मोक्ष।
शरीर भी एक नाव है, वह अजीव तत्त्व है, आत्मा जीव तत्त्व है, शुभशुभ मन, वचन, काय की वृत्ति आस्रव के द्वार हैं। आत्मा में कर्मों का रुक जाना बंध है। मन, वचन, काय की चंचलता को रोकना संवर है। तप के द्वारा कर्मों का आत्मा से एक देश छूट जाना निर्जरा है और कर्मों से आत्मा का पूर्ण रूप से अलग हो जाना यही मोक्ष है।

प्रश्न ९२-तुम कौन से तत्त्व हो और तुम्हारा शरीर कौन सा तत्त्व है ?

उत्तर- हम जीव तत्त्व हैं और शरीर अजीव तत्त्व है।

प्रश्न ९३-नौ पदार्थ कौन से हैं ?

उत्तर- ७ तत्त्व में पुण्य और पाप मिला देने से ९ पदार्थ होते हैं। (जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप) ।

प्रश्न ९४-सच्चे देव किसे कहते हैं ?

उत्तर- जो वीतरागी हो, सर्वज्ञ हो और हितोपदेशी हो ऐसे जितेन्द्रिय पुरुष सच्चे देव कहलाते हैं।

प्रश्न ९५-सच्चे शास्त्र किसे कहते हैं ?

उत्तर- १-जो आर्त (अरहन्त देव) द्वारा कहा गया हो।
२-उल्लङ्घन करने योग्य नहीं हो। ३-उनके अनुमान से बाधित नहीं हो। ४-कुमार्ग का खंडन करने वाला हो एवं ५-किसी के द्वारा भी जो खंडित नहीं किया जा सकता हो। ऐसे पाँच लक्षण युक्त शास्त्र सच्चा शास्त्र कहलाता है।

प्रश्न ९६-सच्चे गुरु कौन से होते हैं ?

उत्तर- १-(अ) जो विषय आशाओं से रहित, आरम्भ और परिग्रह से रहित ज्ञान-ध्यान में लीन रहते हैं वे ही सच्चे गुरु हैं।
२-(ब) विषयों की आशा से रहित साम्यभाव के धनी, स्व और पर के उपकार की भावना में निरन्तर लीन रहने वाले और स्वार्थ त्याग को कठिन तपस्या हर्ष से युक्त होकर करने वाले दिगम्बर साधु ही सच्चे साधु (गुरु) होते हैं।

प्रश्न ९७-सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं ?

उत्तर- सम्यग्दर्शन के तीन भेद हैं। १-औपशमिक सम्यक्त्व २-क्षायोपशमिक सम्यक्त्व ३-क्षायिक सम्यक्त्व।
औपशमिक सम्यक्त्व—जो ७ प्रकृतियों (अनंतनुबंधी, क्रोध, मान, माया, लोभ एवं मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृति) के उपशम से होता है अथवा ५ प्रकृतियों (अनंतनुबंधी की ४ और मिथ्यात्व) के उपशम से होता है, वह औपशमिक सम्यक्त्व है। जो ७ प्रकृतियों के क्षयोपशम से होता है वह क्षायोपशमिक एवं जो ७ प्रकृतियों के क्षय से होता है वह क्षायिक सम्यक्त्व है।

प्रश्न ९८-सम्यक्त्व के कितने दोष हैं ?

उत्तर- सम्यक्त्व के २८ दोष ( ८ मद, ८ शंकादि दोष ८ अनायतन, ३ मूढ़ता) ।

आठ मद—१-ज्ञान मद २-प्रतिष्ठा मद ३-कुल मद ४-जाति मद ५-बल मद ६-ऋद्धि या धन मद ७-तप मद और ८-शरीर मद। इन आठों को निमित्त करके घमण्ड करने को मद कहते हैं।

आठ शङ्कादि दोष—

१-शङ्का (जिनेन्द्रदेव के वचनों में शङ्का करना)
२-कांक्षा (फल की इच्छा करना)
३-विचिकित्सा (मुनियों के गंदे शरीर को देख करके ग्लानि करना)
४-मूढ़दृष्टि (सच्चे ज्ञान का अभाव होना)
५-अनुपगूहन (दूसरे के दोषों को प्रकट करना)
६-अस्थितिकरण (धर्म से गिर जाने वाले को उसमें स्थिर नहीं करना)
७-अवात्सल्य (धर्मात्माओं से प्रेम (स्नेह) नहीं करना)
८-अप्रभावना (जिन धर्म की प्रभावना नहीं करना या जिनधर्म के विरुद्ध कार्य करना)
छः अनायतन—कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्र और इनके सेवक तीन।
तीन मूढ़ता—लोक मूढ़ता, देव मूढ़ता, पाखण्ड मूढ़ता।
लोक मूढ़ता—धर्म मानकर नदी में स्नान करना, पर्वत से गिरना, अग्नि में जलना आदि ये सब लोक मूढ़ताएँ हैं।
देव मूढ़ता—पुत्र प्राप्ति आदि फल की इच्छा से रागी-द्वेषी कुदेवताओं को पूजना देव मूढ़ता है।
गुरु मूढ़ता—परिग्रह, आरंभ और हिंसा संयुक्त पाखण्डी साधुओं का आदर सम्मान, भक्ति पूजा आदि करना गुरु मूढ़ता है।

प्रश्न ९९-तीन मूढ़ताओं का स्वरूप बताइये ?

उत्तर-लोक मूढ़ता—नदी और समुद्र आदि में स्नान करना, बालू या पत्थर आदि का ढेर लगाना, पर्वत से गिरना तथा अग्नि में जलकर धर्म मानना आदि खोटे कार्य में धर्म मानना लोक मूढ़ता होती है।

देव मूढ़ता—पुत्र प्राप्ति, रोग निवृत्ति और धनलाभ आदि इच्छित फल की इच्छा से रागी-द्वेषी कुदेवताओं की पूजन, उपासना, सेवादि करना देव मूढ़ता है।
गुरु मूढ़ता—परिग्रह, आरंभ और हिंसा सहित पाखंडी साधुओं का आदर सम्मान, भक्ति-पूजा आदि करना गुरु मूढ़ता है।

प्रश्न १००-सम्यग्दृष्टि जीव की विशेषताएँ बताइए ?

उत्तर-१-सम्यग्दृष्टि जीव राज्य के भय से स्नेह या लोभ एवं प्रेम से कुदेव, कुगुरु और कुशास्त्रों को प्रणाम एवं विनय नहीं करता है।
२-सम्यग्दृष्टि जीव सात भय से रहित होता है।

प्रश्न १०१-सात भयों के नाम बताइये ?

उत्तर-१-इहलोक भय २-परलोक भय ३-वेदना भय ४-मरण भय ५-आकस्मिक भय ६-अनरक्षा भय ७-अगुप्ति भय।

प्रश्न १०२-सम्यग्दर्शन के कितने अङ्ग हैं ?

उत्तर-सम्यग्दर्शन के ८ अङ्ग हैं ?
१-निःशंकित अंग २-निःकांक्षित अंग ३-निर्विचिकित्सा अंग ४-अमूढ़दृष्टि अंग ५-उपगूहन अंग ६-स्थितिकरण अंग ७-वात्सल्य अंग ८-प्रभावना अंग।

प्रश्न १०३-प्रत्येक अङ्ग में प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन संक्षेप में कीजिये ?

उत्तर-१-निःशंकित अंग—जिनेन्द्र भगवान के वचनों में शंका नहीं करना। इस अंग में अंजन चोर प्रसिद्ध हुआ।

  • अंजन चोर एक राजपुत्र था। सप्त व्यसनों में लीन वह बड़ा चोर बन गया था। एक वेश्या से उसका घनिष्ठ प्रेम था। उसने अंजन से नगर की रानी के गले का हार चुरा कर लाने को कहा, प्रेमासक्त अंजन बिना सोचे-समझे राजमहल में अर्धरात्रि को पहुँच गया और रानी के गले से रत्नमयी हार निकाल कर दौड़ने लगा, पीछे पहरेदार दौड़ रहे थे। भयानक जंगल में पहरेदार उसका पीछा कर रहे थे, अपनी रक्षा के लिये व हार को फेंककर श्मशान भूमि में पहुँच गया। वहाँ एक सेठ विष्ठा साधना कर रहे थे, पर उन्हें विश्वास नहीं होने से विष्ठा सिद्ध नहीं हो रही थी। सेठ से विष्ठा साधन (सिद्धि) के लिये मगीकार मंत्र अंजन ने सीखा और सींक पर जाकर बैठ गया। सींक पर बैठते ही मंत्र भूल गया परन्तु सेठ के वचन का श्रद्धान करके वह सींक को काटने लगा, “आर्णे तार्णे कछु ना जाणै सेठ वचन प्रमाण” बस सेठ के यह वचन ही प्रमाण है बोलकर निःशंकित होकर उसने विष्ठा सिद्ध की। सेठ से जाकर उसने वृतान्त कहा और फिर मुनिराज के पास जैनेश्वरी दीक्षा लेकर मुक्ति का पात्र हुआ।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3052.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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